आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 दश अधिकारों का continuation
व्यवहारेशिता प्रायश्चित्त आदि में स्वतंत्रता देती है। इसके अभाव में द्विज न स्वयं, न दूसरों को शुद्ध कर सकता। अवध्यत्व गुणों की अधिकता से द्विज को अवध्य बनाता है, क्योंकि ब्राह्मणों की हिंसा विशेष दोषकारी है। अवध्यता धर्म का माहात्म्य है, जो तिरस्कार से बचाती है। इसके अभाव में धर्म की प्रामाणिकता नष्ट होती है। सनातन धर्म की रक्षा से संसार में रक्षा मिलती है। अदण्डधता धर्म में स्थिर द्विज को दण्ड से मुक्ति देती है। धर्मदर्शी राजा धर्मानुसार अधर्मियों को दण्ड देता है। ब्राह्मण का धन त्याज्य नहीं, अतः वह दण्ड देने योग्य नहीं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
व्यवहारेशितां प्राहुः प्रायश्चित्तादिकर्मणि । स्वतन्त्रतां द्विजस्यास्य श्रितस्य परमां श्रुतिम् ॥१९२॥
परमागमका आश्रय लेनेवाले द्विजोंको जो प्रायश्चित्त आदि कार्योंमें स्वतन्त्रता है उसे हो व्यवहारेशिता कहते हैं ।। १९२।।
The autonomy enjoyed by Dwijas who have taken refuge in the Supreme Scriptures in matters such as expiation and sacred observances—this sovereign independence in conduct is known as Vyavahāreśitā.192
श्लोक ( Shlok ) 193
तदभावे स्वमन्यांश्च न शोधयितुमर्हति । अशुद्धः परतः शुद्धिम भीप्सन्न्यक्कृतो भवेत् ॥१९३॥
व्यवहारेशिता के अभावमें द्विज न अपने आपको शुद्ध कर सकेगा और न दूसरेको ही शद्ध कर सकेगा तथा स्वय अशुद्ध होनेपर यदि दूसरेसे अपनी शुद्धि करना चाहे तो वह कभी कृती नहीं हो सकेगा ।।१९३।।
Without Vyavahāreśitā—this authority in conduct—the Dwij can neither purify himself nor bring about the purification of others.And if, while himself impure, he seeks purification through another,he shall never attain true sanctity or accomplishment.193
श्लोक ( Shlok ) 194
स्यादवध्याधिकारेऽपि स्थिरात्मा द्विजसत्तमः । ब्राह्मणो हि गुणोत्कर्षान्नान्यतो वधमर्हति ॥१९४॥
जिसका अन्तःकरण स्थिर है ऐसा उत्तम द्विज अवध्याधिकारमें भी स्थित रहता है अर्थात् अवध्य है क्योंकि ब्राह्मण गुणोंकी अधिकता के कारण किसी दूसरेके द्वारा वध करने योग्य नहीं होता ।। १९४।।
He whose inner being is steadfast—such a noble Dvija abides in the state of Avadhyatva—inviolability; for by virtue of the supreme excellence of his brāhmaṇya-qualities, he is not to be slain by any other.194
श्लोक ( Shlok ) 195
सर्वः प्राणो न हन्तव्यो ब्राह्मणस्तु विशेषतः । गुणोत्कर्षापकर्षाभ्यां वधेऽपि द्वयात्मता मता ॥१९५॥
सब प्राणियोंको नहीं मारना चाहिये और विशेषकर ब्राह्मणोंको नहीं मारना चाहिये। इस प्रकार गुणोंकी अधिकता और हीनतासे हिंसामें भी दो भेद माने गये हैं ।॥ १९५॥
None among living beings ought to be harmed—but above all, the Brāhmaṇa must not be slain.Thus, even in the matter of violence,a distinction is drawn based on excellence and deficiency of virtue.195
श्लोक ( Shlok ) 196
तस्मादवध्यतामेष पोषयेद् धार्मिके जनः। धर्मस्य तद्धि माहात्म्यं तत्स्थो यन्नाभिभूयते ॥१९६॥
इसलिये यह धार्मिक जनोंमें अपनी अवध्यताको पुष्ट करे। यथार्थमें वह धर्मका ही माहात्म्य है कि जो इस धर्ममें स्थित रहकर किसी से तिरस्कृत नहीं हो पाता ॥ १९६॥
Therefore, let the righteous one affirm his inviolability;for verily, it is the glory of Dharma itself that he who abides steadfast in it remains beyond reproach from any quarter. 196
श्लोक ( Shlok ) 197
तदभावे च बध्यत्वमयमृच्छति सर्वतः । एवं च सति धर्मस्य नश्येत् प्रामाण्यमर्हताम् ॥१९७।।
यदि वह अपनी अवध्यताको पुष्ट न करेगा तो सब लोगों से वध्य हो जावेगा अर्थात् सब लोग उसे मारने लगेंगे और ऐसा होनेपर अर्हन्तदेवके धर्मकी प्रामाणिकता नष्ट हो जावेगी ॥१९७।।
If he does not uphold his own sanctity,he shall become vulnerable to all—and all shall rise against him.Thus, with his fall,even the authenticity of the Arhant’s Dharma shall be imperiled.197
श्लोक ( Shlok ) 198
ततः सर्वप्रयत्नेन रक्ष्यो धर्मः सनातनः । स हि संरक्षितो रक्षां करोति सचराचरे ॥ १९८॥
इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नोंसे सनातनधर्मकी रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि अच्छी तरह रक्षा किया हुआ धर्म ही चराचर पदार्थोंसे भरे हुए संसार-में उसकी रक्षा कर सकता है ।।१९८।।
Therefore, by every possible effort,one must safeguard the Eternal Dharma;for only that Dharma, well-protected,can in turn protect him amidst this world teeming with all manner of beings,both animate and inanimate.198
श्लोक ( Shlok ) 199
स्याद्दण्ड्यत्वमय्येवमस्य धर्मे स्थिरात्मनः । धर्मस्थो हि जनोऽन्यस्य दण्डप्रस्थापने प्रभुः ॥१९९॥
इसी प्रकार धर्ममें जिसका अन्तःकरण स्थिर है ऐसे इस द्विजको अपने अदण्डयत्वका भी अधिकार है क्योंकि धर्ममें स्थिर रहनेवाला मनुष्य ही दूसरेके लिये दण्ड देने में समर्थ हो सकता है ।।१९९।।
Likewise, the twice-born whose heart abides unwavering in Dharma possesses the rightful claim to immunity from punishment, for verily, only he who stands firmly rooted in righteousness is truly fit to administer justice unto others. 199
श्लोक ( Shlok ) 200
‘तद्धर्मस्थी यमाम्नायं भावयन् धर्मदर्शिभिः । अधर्मस्थेषु दण्डस्य प्रणेता धार्मिको नृपः ॥२०० ll
इसलिये धर्मदर्शी लोगोंके द्वारा दिखलाई हुई धर्मात्मा जनोंकी आम्नायका विचार करता हुआ ही धार्मिक राजा अधर्मी जनोंको दण्ड देता है ॥२००॥
Therefore, the righteous king, guided by the sacred traditions upheld by seers of Dharma and reflecting upon the sacred teachings concerning the virtuous,must mete out punishment only to the unrighteous,in accordance with the counsel of those who behold the truth of Dharma.200
श्लोक ( Shlok ) 201
परिहार्य यथा देवगुरुद्रव्यं हितार्थिभिः । ब्रह्मस्वं च तथाभूतं न दण्डार्हस्ततो द्विजः ॥२०१॥
जिस प्रकार अपना हित चाहनेवाले पुरुषोंके द्वारा देव द्रव्य और गुरुद्रव्य त्याग करने योग्य है उसी प्रकार ब्राह्मणका धन भी त्याग करने योग्य है। इसलिये ही द्विज दण्ड देने के योग्य नहीं है ।। २०१।।
Just as those who seek their own true welfare must renounce wealth belonging to the gods and to the Guru,even so must the wealth of a Brāhmaṇa be regarded as untouchable and worthy of enunciation.
For this reason, the Dvija is not to be subjected to punishment.201
श्लोक 202 से 211
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
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