आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 गर्भाधान, प्रीति, सुप्रीति, और धृति मंत्र
गर्भाधान मंत्रों में ‘सज्जातिभागी भव’, ‘सद्गृहिभागी भव’, ‘मुनीन्द्रभागी भव’, ‘सुरेन्द्रभागी भव’, ‘परमराज्यभागी भव’, ‘आर्हन्त्यभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणभागी भव’ मंत्रों का उच्चारण कर उत्तम जन्म, गृहस्थ, मुनि, इंद्र, चक्रवर्ती, अरहंत, और निर्वाण की प्राप्ति की कामना की जाती है। प्रीति मंत्रों में ‘त्रैलोक्यनाथो भव’, ‘त्रैकाल्यज्ञानी भव’, और ‘त्रिरत्नस्वामी भव’ मंत्र त्रिलोक के स्वामी, त्रिकालज्ञानी, और रत्नत्रय के स्वामी होने की प्रार्थना करते हैं। सुप्रीति मंत्रों में ‘अवतारकल्याणभागी भव’, ‘मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव’, ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ मंत्र गर्भ, अभिषेक, निष्क्रमण, केवलज्ञान, और निर्वाण कल्याणों की प्राप्ति के लिए हैं। धृति मंत्र गर्भाधान मंत्रों में ‘दातृ’ शब्द जोड़कर बनते हैं, जैसे ‘सज्जातिदातृभागी भव’, जो इन पदों को देने वाले होने की प्रार्थना करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
गर्भाधानमन्त्रः –
सज्जातिभागी भव सद्गृहिभागी भवेति च । पदद्वयमुदीर्यादौ पदानीमान्यतः पठेत् ॥९२॥
गर्भाधानके मन्त्र-प्रथम ही ‘सज्जातिभागी भव’ (उत्तम जातिको धारण करनेवाला हो) और ‘सद्गृहिभागी भव’ (उत्तम गृहस्थ अवस्थाको प्राप्त होओ) इन दो पदोंका उच्चारण कर पश्चात् नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिये ।। ९२ ।।
“The mantras for conception—first, one should utter the two phrases: ‘Sajjātibhāgī bhava’ (May you attain a noble lineage) and ‘Sadgṛhibhāgī bhava’ (May you be blessed with a virtuous household); thereafter, the following verses should be recited.” ॥92॥
श्लोक ( Shlok ) 93
आदौ मुनीन्द्रभागीति भवेत्यन्ते पदं वदेत् । सुरेन्द्रभागी परमराज्यभागीति च द्वयम् ॥९३॥
पहले ‘मुनीन्द्रभागी भव’ (महामुनिका पद प्राप्त करनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये और फिर ‘सुरेन्द्रभागी भव’ (इन्द्र पदका भोक्ता हो) तथा ‘परमराज्यभागी भव’ (उत्कृष्ट राज्यका उपभोग करनेवाला हो) इन दो पदोंका उच्चारण करना चाहिये ।। ९३।।
“First, one should utter the phrase ‘Munīndra bhāgī bhava’ (May you attain the status of the great sage), followed by the two phrases ‘Surendra bhāgī bhava’ (May you enjoy the station of the lord of gods) and ‘Paramarājya bhāgī bhava’ (May you partake in the highest sovereignty).” ॥93॥
श्लोक ( Shlok ) 94
आर्हन्त्यभागी भवेति पदमस्मादनन्तरम् । ततः परमनिर्वाणभागी भव पदं भवेत् ॥९४॥
तदनन्तर ‘आर्हन्त्यभागी भव’ (अरहन्त पदका प्राप्त करनेवाला हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये और फिर ‘परमनिर्वाणभागी भव’ (परम निर्वाण पदको प्राप्त करनेवाला हो), यह पद कहना चाहिये ॥९४॥
“Thereafter, one should recite the mantra ‘Ārhantya bhāgī bhava’ (May you attain the state of the Arhant), followed by the phrase ‘Paramanirvāṇa bhāgī bhava’ (May you reach the supreme state of Nirvāṇa).” ॥94॥
श्लोक ( Shlok ) 95
आधाने मन्त्र एष स्यात् पूर्वमन्त्रपुरःसरः । विनियोगश्च मन्त्राणां यथाम्नायं प्रदर्शितः ॥९५॥
गर्भाधानकी क्रियामें पहलेके मन्त्रोंके साथ साथ यह मन्त्र काममें लाना चाहिये इस प्रकार यह आम्नायके अनुसार मन्त्रोंका विनियोगका क्रम दिखलाया है ।।९५।।
“In the rite of conception, alongside the preceding mantras, this mantra too should be employed; thus, according to the Āmnāya, the proper sequence for the use of mantras is demonstrated.” ॥95॥
श्लोक ( Shlok ) 96
चूर्णिः-सज्जातिभागी भव, सद्गुहिभागी भव, मुनीन्द्रभागी भव, सुरेन्द्रभागी भव, परमराज्यभागी भव, आर्हन्त्यभागी भव, परमनिर्वाणभागी भव, (आधानमन्त्रः)
स्यात्प्रीतिमन्त्रस्त्रैलोक्यनाथो भवपदादिकः । त्रैकाल्यज्ञानी भव त्रिरत्नस्वामी भवेत्ययम् ॥९६॥
गर्भाधानके समय काम आनेवाले विशेष मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
सज्जातिभागी भव, सद्गृहिभागी भव, मुनीन्द्रभागी भव, सुरेन्द्रभागी भव, परम-राज्यभागी भव, आर्हन्त्यभागी भव, परमनिर्वाणभागी भव ।
अब प्रीतिमन्त्र कहते हैं- ‘त्रैलोक्यनाथो भव’ (तीनों लोकोंके अधिपति होओ) ‘त्रैकाल्य-ज्ञानी भव’ (तीनों कालका जाननेवाला हो) और ‘त्रिरत्नस्वामी भव’ (रत्नत्रयका स्वामी हो) ये तीन प्रीतिक्रियाके मन्त्र हैं ।।९६।।
The collection of special mantras employed at the time of conception is as follows:‘Sajjātibhāgī bhava’ (May you attain a noble lineage),‘Sadgṛhibhāgī bhava’ (May you be blessed with a virtuous household),‘Munīndra bhāgī bhava’ (May you attain the status of the great sage),‘Surendra bhāgī bhava’ (May you enjoy the station of the lord of gods),‘Paramarājya bhāgī bhava’ (May you partake in the highest sovereignty),‘Ārhantya bhāgī bhava’ (May you attain the state of the Arhant),and ‘Paramanirvāṇa bhāgī bhava’ (May you reach the supreme state of Nirvāṇa).
Now, the mantras of affection (prīti-mantras) are recited:
‘Trailokyanātho bhava’ (May you be lord of the three worlds),
‘Traikālajñānī bhava’ (May you be the knower of the three times),
and ‘Triratnasvāmi bhava’ (May you be the master of the Three Jewels).These three constitute the mantras of the ceremony of affection.” ॥96॥
श्लोक ( Shlok ) 97 –100
चूर्णिः- त्रैलोक्यनाथो भव, त्रैलोक्यज्ञानी भव, त्रिरत्नस्वामी भव, (प्रीतिमन्त्रः) ? मन्त्रोऽवतारकल्याणभागी भवपदादिकः । सुप्रीतो मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणवाक्परः ॥९७॥ भागीभव पदोपेतस्ततो निष्क्रान्तिवाक्परः । कल्याणमध्यमो भागी भवेत्येतेन योजितः ॥९८॥ततश्चार्हन्त्यकल्याणभागी भव पदान्वितः । ततः परमनिर्वाणकल्याणपदसङ्गतः ॥९९॥भागी भवपदान्तश्च क्रमाद्वाच्यो मनीषिभिः । धृतिमन्त्रमितो वक्ष्ये प्रीत्या शृणुत भो द्विजाः ॥१००॥
संग्रह-‘त्रैलोक्यनाथो भव, त्रैकाल्यज्ञानी भव, त्रिरत्नस्वामी भव’ ।
अब सुप्रीति क्रियाके मन्त्र कहते हैं- सुप्रीति क्रिया में ‘अवतारकल्याणभागी भव’ (गर्भकल्या-णकको प्राप्त करनेवाला हो), ‘मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव’ (सुमेरु पर्वतपर इन्द्रके द्वारा जन्माभिषेकके कल्याणको प्राप्त हो), ‘निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव’ (निष्क्रमण कल्याणको प्राप्त करनेवाला हो), ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’ (अरहन्त अवस्था-केवलज्ञानकल्याणकको प्राप्त करनेवाला हो), और ‘परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ (उत्कृष्ट निर्वाण कल्याणकको प्राप्त करनेवाला हो) ये मन्त्र विद्वानोंको अनुक्रमसे बोलना चाहिये । अव आगे धृतिमन्त्र कहते हैं सो हे द्विजो, उन्हें तुम प्रीतिपूर्वक सुनो ॥ ९७-१००।।
“The collection of mantras—‘Trailokyanātho bhava,’ ‘Traikālajñānī bhava,’ and ‘Triratnasvāmi bhava’—has been set forth.Now, the mantras for the ceremony of supreme affection (suprīti-kriyā) are recited:
- ‘Avatārakalyāṇabhāgī bhava’ (May you partake in the welfare of the incarnation),
- ‘Mandrendra Abhiṣekakalyāṇabhāgī bhava’ (May you attain the welfare of the birth and consecration performed by Indra upon Mount Sumeru),
- ‘Niṣkrāntikalyāṇabhāgī bhava’ (May you receive the blessings of the great departure),
- ‘Ārhantyakalyāṇabhāgī bhava’ (May you attain the welfare of the Arhant state and Kevalajñāna),
- and ‘Paramanirvāṇakalyāṇabhāgī bhava’ (May you partake in the supreme welfare of Nirvāṇa).
These mantras should be chanted sequentially by the learned.Thereafter come the mantras of steadfastness (dhṛti-mantras); O twice-born, listen to them with affection.”॥97–100॥
श्लोक ( Shlok ) 101
चूर्णिः- ‘अवतारकल्याणभागी भव, मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव, निष्क्रान्ति-कल्याणभागी भव, आर्हन्त्यकल्याणभागी भव, परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ ।( सुप्रीतिमन्त्रः )
धृतिक्रियामन्त्रः- आधानमन्त्र एवात्र’ सर्वत्राहितदातृवाक् । मध्ये यथाक्रमं वाच्यो नान्यो भेदोऽत्र कश्चन ॥१०१॥
धृति क्रियाके मन्त्र-गर्भाधान क्रियाके मंत्रोंमें सब जगह दातृ शब्द लगा देनेसे धृति क्रियाके मन्त्र हो जाते हैं, विद्वानोंको अनुक्रमसे उन्हींका प्रयोग करना चाहिये, आधान क्रिया के मंत्रोंसे इन मन्त्रोंमें और कुछ भेद नहीं है। भावार्थ ‘सज्जातिदातृभागी भव’ (सज्जाति-उत्तम जातिको देनेवाला हो), ‘सद्गृहिदातृभागी भव’ (सद्गृहस्थपदका देनेवाला हो), ‘मुनीन्द्रदातृभागी भव’ (महामुनिपदका देनेवाला हो), ‘सुरेन्द्रदातृभागी भव’ (सरेन्द्रपदको देनेवाला हो), ‘परमराज्यदातृभागी भव’ (उत्तमराज्य-चक्रवर्तीक पदका देनेवाला हो), ‘आर्हन्त्यदातृभागी भव’ (अरहन्त पदका देनेवाला हो) तथा ‘परमनिर्वाणदातृभागी भव’ (उत्कृष्ट निर्वाण पदका देनेवाला हो) धृति क्रियामें इन मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये ।।१०१।।
“The mantras for the ceremony of steadfastness (dhṛti-kriyā) are formed by adding the word ‘dātṛ’ (giver) throughout the mantras of the conception rite; the learned should recite them sequentially. There is no other distinction between these mantras and those of the conception rite.The meaning is:
‘Sajjāti-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of a noble lineage),
‘Sadgṛhi-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of a virtuous household),
‘Munīndra-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of the great sage’s status),
‘Surendra-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of the lord of gods’ station),
‘Paramarājya-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of the supreme royal sovereignty),
‘Ārhantya-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of the Arhant’s state), and
‘Paramanirvāṇa-dātṛbhāgī bhava’ (May you be the bestower of the supreme Nirvāṇa).These mantras are to be recited in the dhṛti ceremony.”॥101॥
श्लोक 102 से 112
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आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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