आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
अक्षत्रक्षणमात्रं ते प्राणधृत्यै विषष्वणुः । धर्मार्थमेव च प्राणान् धारयन्ति स्म केवलम् ॥ २०२॥
वे मुनि प्राण धारण करनेके लिये अक्षम्रक्षण मात्र ही आहार लेते थे और केवल धर्मसाधन करनेके लिये ही प्राण धारण करते थे। भावार्थ जिस प्रकार गाड़ी ओंगनेके लिये थोड़ी सी चिकनाईकी आवश्यकता होती है भले ही वह चिकनाई किसी भी पदार्थकी हो इसी प्रकार शरीररूपी गाड़ीको ठीक ठीक चलानेके लिये कुछ आहारकी आवश्यकता होती है भले ही वह सरस या नीरस कैसा ही हो। अल्प आहार लेकर मुनिराज शरीरको स्थिर रखते हैं और उससे संयम धारण कर मोक्षकी प्राप्ति करते हैं वे मुनिराज भी ऐसा ही करते थे ॥ २०२॥
Those noble monks consumed food solely for the preservation of life, taking just enough to sustain their bodies in order to pursue the path of righteousness. Just as a vehicle requires a small amount of oil to function, regardless of its origin, the body—likened to a chariot—needs a modicum of sustenance to move steadily. With this minimal nourishment, the monks maintain bodily stability, practicing self-restraint and ultimately attaining liberation. These venerable sages followed the same path.202
श्लोक ( Shlok ) 203
न तुष्यन्ति स्म ते लब्धौ व्यषीदन्नाप्यलब्धितः । मन्यमानास्तपोलाभमधिकं धुतकल्मषाः ॥२०३॥
वे पाप रहित मुनिराज, आहार मिल जानेपर संतुष्ट नहीं होते थे और नहीं मिलनेपर तपश्चरण रूपी अधिक लाभ समझते हुए विषाद नहीं करते थे ।। २०३॥
The sinless monks, upon receiving food, were not satisfied by it, and when food was not forthcoming, they did not lament. Instead, they regarded the practice of austerity as a greater gain, embracing it with serene contentment, free from sorrow.203
श्लोक ( Shlok ) 204
स्तुति निन्दां सुखं दुःखं तथा मानं विमाननाम् । समभावेन तेऽपश्यन् सर्वत्र समदर्शिनः ॥२०४॥
सब पदार्थोंमें समान दृष्टि रखने वाले वे मुनि स्तुति, निन्दा, सुख, दुःख तथा मान-अपमान सभीको समान रूपसे देखते थे ।।२०४।।
Those monks, who held an equal vision toward all things, viewed praise and blame, pleasure and pain, as well as honor and dishonor, with perfect equanimity, perceiving them all as one.204
श्लोक ( Shlok ) 205
वाचंयमत्व मास्थाय चरन्तो गोचरार्थिनः । निर्यान्ति स्माप्यलाभेन नाभञ्जन् मौनसङ्गरम् ।।२०५।।
वे मुनि मौन धारण करके ईर्यासमितिसे गमन करते हुए आहारके लिये जाते थे और आहार न मिलनेपर भी मौनव्रतकी प्रतिज्ञा भङ्ग नहीं करते थे ।। २०५।।
Those monks, observing silence and walking with humility, journeyed to seek alms. Even when food was not found, they did not break their vow of silence, steadfastly upholding their commitment to the practice.205
श्लोक ( Shlok ) 206
महोपवासम्लानाङ्गा यतन्ते स्म तनुस्थितौ । तत्राप्यशुद्धमाहारं नैषिषुर्मनसाऽप्यमी ॥२०६॥
अनेक महोपवास करनेसे जिनका शरीर म्लान हो गया है ऐसे वे मुनिराज केवल शरीरकी स्थितिके लिये ही प्रयत्न करते थे परन्तु अशुद्ध आहारकी मनसे भी कभी इच्छा नहीं करते थे ॥ २०६॥
Having reduced their bodies through countless austere fasts, those venerable monks exerted themselves solely to sustain the body’s condition. Yet, they never entertained the slightest desire for impure food, even in their minds.206
श्लोक ( Shlok ) 207
गोचराग्रगता योग्यं भुक्त्वान्नमविलम्बितम् । प्रत्याख्याय पुनर्वीरा निर्ययुस्ते तपोवनम् ॥२०७॥
गोचरीवृत्तिके धारण करनेवालोंमें मुख्य वे धीरवीर मुनिराज शीघ्र ही योग्य अन्नका भोजन कर तथा आगेके लिये प्रत्याख्यान कर तपोवनके लिये चले जाते थे ।।२०७।।
Among those who followed the practice of seeking alms, the most steadfast and courageous monks quickly partook of suitable food and, having made the necessary renunciation for the future, proceeded to the ascetic retreat to continue their spiritual discipline.207
श्लोक ( Shlok ) 208
तपस्ता पतनू भूततनवोऽपि मुनीश्वराः । अनबद्धात्तपोयोगान्न चेलुर्दृढ सङ्गराः ॥२०८॥
यद्यपि तपश्चरणके संतापसे उनका शरीर कृश हो गया था तथापि दृढ प्रतिज्ञाको धारण करनेवाले वे मुनिराज प्रारम्भ किये हुए तपसे विराम नहीं लेते थे ॥ २०८ ॥
Though their bodies had grown emaciated from the hardships of austerities, those resolute monks, unwavering in their vows, did not cease the penance they had begun, remaining steadfast in their commitment.208
श्लोक ( Shlok ) 209
तीव्र तपस्यतां तेषां गात्रेषु श्लथताऽभवत् । प्रतिज्ञा या तु सद्ध्यानसिद्धावशिथिलैव सा ॥२०९॥
तीव्र तपस्या करनेवाले उन मुनियोंके शरीरमें यद्यपि शिथिलता आ गई थी तथापि समीचीन ध्यानकी सिद्धिके लिये जो उनकी प्रतिज्ञा थी वह शिथिल नहीं हुई थी ॥ २०९।।
Though intense austerities had brought weariness upon their bodies, the vow undertaken by those ascetic monks—to attain perfection in right meditation—remained unshaken, firm and unwavering amidst all physical frailty.209
श्लोक ( Shlok ) 210
नाभूत्परिषहैर्भङ्गस्तेषां चिरमुपोषुषाम् । गताः परिषहा एव भङ्गं तान् जेतुमक्षमाः ॥२१०॥
चिरकाल तक उपवास करनेवाले उन मुनियोंका परीषहोंके द्वारा पराजय नहीं हो सका था बल्कि परीषह ही उन्हें जीतने के लिये असमर्थ होकर स्वयं पराजय को प्राप्त हो गये थे ।। २१०।।
Long accustomed to prolonged fasts, those steadfast monks were never vanquished by hardships. Rather, it was the parīṣahas themselves—the afflictions and trials—that, unable to subdue such unwavering souls, met their own defeat before them.210
श्लोक ( Shlok ) 211
तपस्तनूनपात्तापाद भूत्तेषां पराद्युतिः । निष्टप्तस्य सुवर्णस्य दीप्तिर्नन्वतिरेकिणी” ।॥२११॥
तपरूपी अग्निके संतापसे उनके शरीरकी कान्ति बहुत ही उत्कृष्ट हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि तपे हुए सुवर्णकी दीप्ति बढ़ ही जाती है ।।२११।
It is but fitting that the radiance of their bodies, forged in the fire of austerity, had become exceedingly resplendent—for just as gold, when purified by flame, shines ever more brilliantly, so too did their luster grow through the heat of penance.211
श्लोक 212 से 223
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201
Download PDF