आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 274 to 283
श्लोक ( Shlok ) 274 – 275
अथान्यदा समुत्त्वन्नबोधिर्मेधस्वराधिपः । तीर्थाधिनाथ मासाद्य वन्दित्वाऽऽनन्दभाजनम् ॥२७४।॥ कृत्वा धर्मपरिप्रश्नं श्रुत्वा तस्माद्यथोचितम् । आक्षेपिण्यादिकाः सम्यक् कथाबन्धोदयादिकम् ॥२७५॥
अथानन्तर-जिसे आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे जयकुमारने किसी एक दिन आनन्दके पात्र श्री आदिनाथ तीर्थ करके पास जाकर उनकी वन्दना की, धर्मविषयक प्रश्न कर उनका यथा योग्य उत्तर सुना, आक्षेपिणी आदि कथाएं कहीं और कर्मोंके बन्ध उदय आदिकी चर्चा की ।।२७४-२७५।।
Thereafter, Jayakumar—who had attained self-realization—one day approached the venerable Adinatha Tirthankara, the very embodiment of bliss, and offered his reverent salutations. He posed questions concerning the nature of Dharma and listened attentively to the fitting replies. Engaging in discourse, he narrated stories such as the Akṣepinī, and discussed at length the binding, fruition, and destruction of karmas. ॥274–275॥
श्लोक ( Shlok ) 276 – 278
“कर्मनिर्मुक्तसम्प्राप्यं शर्मसारं प्रबुद्धधीः । शिवङ्करमहादेव्यास्तनूजो ‘जगतां प्रियः ॥२७६॥अवार्योऽनन्तवीर्याख्यः शत्रुभिः शस्त्रशास्त्रवित् । आकुमारं यशस्तस्य’ शौर्य शत्रुजयावधि ॥ २७७।। त्यागः सर्वार्थिसन्तर्पी सत्य स्वप्नेऽप्यविप्लुतम् । विधायाभिषवं तस्मै प्रदायात्मीयसम्पदम् ॥२७८॥
इस प्रकार प्रबुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले जयकुमारने कर्मोंके नाशसे प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ सुखको प्राप्त किया । तदनन्तर उसने जो लोगोंको बहुत ही, प्रिय है, जिसे शत्रु नहीं रोक सकते हैं, जो शस्त्र और शास्त्र दोनोंका जाननेवाला है, जिसका यश कुमार अवस्थासे ही फैल रहा है, जिसकी शूरवीरता शत्रुओंके जीतने तक है, जिसका दान सब याचकोंको संतुष्ट करनेवाला है, और जिसका सत्य कभी स्वप्नमें भी खण्डित नहीं हुआ है ऐसे शिवंकर महादेवीके पुत्र अनन्तवीर्यका राज्याभिषेक कर उसे अपनी सब राज्य संपदा दे दी ।।२७६-२७८ ।।
Thus, Jayakumar, who had embraced an awakened and enlightened intellect, attained the supreme bliss that arises from the destruction of karmas. Thereafter, he anointed as king the noble Anantavīrya—son of the virtuous Mahadevi Shivankar—who was dearly beloved by the people, unconquerable by enemies, master of both arms and scriptures, whose fame had spread since boyhood, whose valor endured until the utter defeat of his foes, whose generosity satisfied all supplicants, and whose truthfulness had never been tarnished even in dreams. To him, Jayakumar entrusted all the wealth and sovereignty of his kingdom. ॥276–278॥
श्लोक ( Shlok ) 279 – 283
पदं परं परिप्राप्तुमव्यग्रमभिलाषुकः । विसर्जितसगोत्रा दिर्विनिर्जितनिजेन्द्रियः ॥२७९॥विजितमहामोहः सजितशुभाशयः । विजयेन जयन्तेन सञ्जयन्तेन सानुजैः ॥२८०॥ अन्यैश्च निश्चितत्यागै रागद्वेषाविदूषितैः । रविकीर्ती” रिपु जयोऽरिन्दमोऽरिञ्जया ह्वयः ॥२८१॥ सुजयश्च सुकान्तश्च सप्तमश्चाजितञ्जयः । महाजयोऽतिवीर्यश्च “वीरञ्जयसमा ह्वयः ॥ २८२॥ रविवीर्यस्तथाऽन्ये च तनूजाश्चक्रवर्तिनः । तैश्च साद्ध सुनिर्विण्णैश्चरमाङ्गो विशुद्धिभाक् ॥२८३॥
तदनन्तर जो आकुलता रहित परम पद प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहा है, जिसने अपने सब कुटुम्बका परित्याग कर दिया है, अपनी इन्द्रियोंको वश कर लिया है, महामोहको डांट दिखा दी है और शुभास्रवका संचय किया है ऐसे चरमशरीरी तथा विशुद्धि को धारण करनेवाले जयकुमारने विजय, जयंत, संजयन्त तथा परिग्रहके त्यागका निश्चय करनेवाले और राग द्वेषसे अदूषित अन्य छोटे भाइयों एवं रविकीति, रविजय, रिदम, रिजय, सुजय, सुकान्त, सातवां अजितंजय, महाजय, अतिवीर्य, वरंजय, रविवीर्य तथा इनके सिवाय और भी वैराग्यको प्राप्त हुए चक्रवर्तीके पुत्रोंके साथ साथ दीक्षा धारण की ।।२७९-२८३।।
Thereafter, Jayakumar—who had renounced all attachment to his family, subdued his senses, rebuked the great delusion, amassed auspicious spiritual influx (shubhasrava), and aspired with unwavering resolve to attain the supreme, unperturbed state—embraced initiation as a mendicant in his final embodied life, having attained the purity of mind.Alongside him were his younger brothers—Vijaya, Jayanta, Sanjayanta, and those resolved to renounce all possessions and untainted by passion or aversion—as well as his other brothers Ravikīrti, Ravijaya, Ridam, Rijaya, Sujaya, Sukanta, the seventh brother Ajitanjaya, Mahajaya, Ativīrya, Varanjaya, Ravivīrya, and many more sons of the Chakravartin who had likewise attained dispassion. Together, they all undertook the vows of renunciation. ॥279–283॥
श्लोक 284 से 303
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273