आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 भरत के म्लेच्छ राजा और नौ निधियां
महाराज भरत के अधीन 18,000 म्लेच्छ राजा हैं, जिनके क्षेत्रों में रत्न-खानें हैं। उनके पास काल, महाकाल, नैसर्ण्य, पाण्डुक, पद्म, माणव, पिङ्गल, शंख, और सर्वरत्न नामक नौ निधियां हैं, जो उनकी आजीविका को निश्चिंत रखती हैं। काल निधि से शास्त्र और संगीत उत्पन्न होते हैं। महाकाल निधि से छह कर्मों के साधन, नैसर्ण्य से शय्या-आसन, पाण्डुक से धान्य और रस, पद्म से वस्त्र, पिङ्गल से आभूषण, माणव से नीति-शस्त्र, शंख से सुवर्ण, और सर्वरत्न से विविध रत्न उत्पन्न होते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
म्लेच्छराजसहस्राणि तस्याष्टदशसंख्यया । ‘रत्नानामुद्भवक्षेत्रं यैः समन्तादधिष्ठितम् ॥७२॥
जिनके चारों ओर रत्नोंके उत्पन्न होनेके क्षेत्र अर्थात् खानें विद्यमान हैं ऐसे अठारह हजार म्लेच्छ राजा थे ॥ ७२॥
There were eighteen thousand Mleccha (non-Vedic or foreign) kings, around whom existed regions rich with the emergence of jewels — that is, areas abundant in gem mines.
श्लोक ( Shlok ) 73-74
कालाख्यश्च महाकालो नैस्सर्प्यः पाण्डुका ह्वया । पद्ममाणवपिङ्गाब्ज सर्वरत्नपदादिकाः ॥७३॥
निधयो नव तस्यासन् प्रतीतैरिति नामभिः । यैरयं गृहवार्तायां निश्चिन्तोऽभून्निधीश्वरः ॥७४।॥
महाराज भरतके काल, महाकाल, नैस्तर्ण्य, पाडुण्क, पद्म, माणव, पिङ्ग, शंख और सर्वरत्न इन प्रसिद्ध नामोंसे युक्त ऐसी नौ निधियां थीं कि जिनसे चक्रवर्ती घरकी आजीविकाके विषयमें बिलकुल निश्चिन्त रहते थे ॥७३-७४।।
During the reign of Emperor Bharata, there were nine famous divine treasures (Nidhis) named: Kaal, Mahakaal, Naisarnya, Paadunka, Padma, Maanav, Pingala, Shankha, and Sarvaratna. These treasures were so magnificent and self-sustaining that they fulfilled the needs of the Chakravarti emperor’s household completely, leaving him entirely free of concern regarding livelihood.
श्लोक ( Shlok ) 75
निधिः पुण्यनिधेरस्य कालाख्यः प्रथमो मतः । यतो लौकिकशब्दादिवार्तानां प्रभवोऽन्वहम् ७५।।
पुण्यकी निधिस्वरूप महाराज भरतके पहली काल नामकी निधि थी जिससे प्रत्येक दिन लौकिक शब्द अर्थात् व्याकरण आदिके शास्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती थी ।।७५।।
पुण्यकी निधिस्वरूप महाराज भरतके पहली काल नामकी निधि थी जिससे प्रत्येक दिन लौकिक शब्द अर्थात् व्याकरण आदिके शास्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती थी ।।७५।।
श्लोक ( Shlok ) 76
इन्द्रियार्था मनोज्ञा ये वीणावंशानकादयः । तान् प्रसूते यथाकालं निधिरेष विशेषतः ॥७६॥
तथा वीणा, बाँसुरी, नगाड़े आदि जो जो इन्द्रियों के मनोज्ञ विषय थे उन्हें भी यह निधि समया-नुसार विशेष रीतिसे उत्पन्न करती रहती थी ।॥ ७६॥
This treasure also produced, in accordance with time and in special ways, melodious instruments and pleasurable sensory experiences — such as the veena (string instrument), flute, drums, and other delightful objects for the senses.
श्लोक ( Shlok ) 77
असिमष्यादिषट् कर्मसाधनद्रव्यसम्पदः । यतः शश्वत् प्रसूयन्ते महाकालो निधिः स वै ॥७७॥
जिससे असि, मषी आदि छह कर्मोंक साधनभूत द्रव्य और संपदाएं निरन्तर उत्पन्न होती रहती थीं वह महाकाल नामकी दूसरी निधि थी ।॥ ७७।
The second treasure, named Mahakaal, continuously generated materials and resources necessary for the six types of activities (Shatkarma) — such as weapons (Asi), ink (Mashi), and other essentials.
श्लोक ( Shlok ) 78
शय्यासनालयादीनां नैः सर्प्यात् प्रभवो निधेः । पाण्डुकाद्धान्यसम्भूतिः षड्रसोत्पत्तिरप्यतः ॥७८॥
शय्या, आसन तथा मकान आदिकी उत्पत्ति नैसर्ण्य नामकी निधिसे होती थी । पाण्डुक निधिसे धान्योंकी उत्पत्ति होती थी इसके सिवाय छह रसोंकी उत्पत्ति भी इसी निधिसे होती थी ।॥७८॥
Beds, seats, buildings, and similar articles originated from the Naisarnya treasure. From the Paanduk treasure emerged grains and cereals, and also the six types of tastes (rasa) in food.
श्लोक ( Shlok ) 79
पट्टांशुक दुकूलादिवस्त्राणां प्रभवो यतः । स पद्माख्यो निधिः पद्मागर्भाविर्भावितोऽद्युतत् ॥७९॥
जिससे रेशमी सूती आदि सब तरहके वस्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती है और जो कमलके भीतरी भागोंसे उत्पन्न हुए के समान प्रकाशमान है ऐसी पद्म नामकी निधि अत्यन्त देदीप्यमान थी ॥७९॥
The Padma treasure continuously produced all kinds of fabrics — silk, cotton, etc. It was extraordinarily radiant, shining like the inner petals of a lotus flower.
श्लोक ( Shlok ) 80
दिव्याभरणभेदानामुद्भवः पिङगलान्निधेः । माणवानीतिशास्त्राणां शस्त्राणां च समुद्भवः ॥८०॥
पिङ्गल नामकी निधिसे अनेक प्रकारके दिव्य आभरण उत्पन्न होते रहते थे और माणव नामकी निधिसे नीतिशास्त्र तथा अनेक प्रकारके शस्त्रोंकी उत्पत्ति होती रहती थी ।॥८०॥
From the Pingala treasure, various divine ornaments were produced. The Maanav treasure gave rise to treatises on ethics (niti shastra) and various types of weapons.
श्लोक ( Shlok ) 81
शङ्वात् प्रदक्षिणावर्तात् सौवर्णी सृष्टिनुत्सृजन्। स शङखनिधिरुत्प्रेङ्ख द्रुक्म रो चिर्जितार्करुक् ॥८१॥
जो अपने प्रदक्षिणावर्त नामके शंखसे सुवर्णकी सृष्टि उत्पन्न करती थी और जिसने उछलती हुई सुवर्ण जैसी कान्तिसे सूर्यकी किरणोंको जीत लिया है ऐसी शंख नामकी निधि थी ।॥८१॥
The Shankha treasure, through its right-spiraling conch shell (named Pradakshinaavarta), generated gold. Its brilliance, like the gleaming motion of golden light, surpassed even the rays of the sun.
श्लोक 82 से 92
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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