आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
“कुमारो हि कुमारोऽसौ नापराधोऽस्ति कश्चन । तत्र तस्य सदोषाः स्मो वयमेव प्रमादिनः ॥४२॥
कुमार तो अभी कुमार (लड़का) ही है इसमें उनका कुछ भी दोष नहीं है, प्रमाद करनेवाले केवल हम लोग ही उसमें सदोष हैं ॥४२॥
“The prince is still but a boy—there is no fault of his in this. The blame lies solely with us, the ones who acted in folly.” ॥42॥
श्लोक ( Shlok ) 43
तस्मै कन्यां गृहाणेति नास्माभिः सा समर्पिता । आराधकस्य दोषोऽसौ यत् प्रकुप्यन्ति देवताः ॥४३॥
‘तुम इस कन्याको ग्रहण करो’ ऐसा कहकर तो मैंने जयकुमारके लिये दी नहीं थी, तथापि देवता जो कुपित हो जाते हैं उसमें देवताका नहीं किन्तु आराधना करनेवाले हीका दोष समझा जाता है ॥४३॥
“I never gave her to Jayakumār with the words, ‘Take this maiden as your own.’ And yet, when the gods grow wrathful, the fault does not lie with the deity, but with the devotee whose worship was flawed.” ॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44 – 46
मयैव विहिताः सम्यक् वर्धिता बन्धवोऽपि नः । स्निग्धाश्च कथमेतेषां विदधामि विनिग्रहम् ॥४४।। इत्येतद्देव मा मँस्थाः स्यात् सदोषो यदि त्वया । कुमारोऽपि निगृह्येत न्यायोऽयं त्वदुपक्रमः ॥४५॥तदादिश’ विधेयोऽत्र’ को दण्डस्त्रिविधेऽपि नः । किंविधः किं परिक्लेशः किं वार्थहरणं प्रभो ॥४६॥
ये सब वंश मेरे ही बनाये हुए हैं, मेरे ही बढ़ाये हुए हैं, मेरे ही भाई हैं और मुझते ही सदा स्नेह रखते हैं इसलिये इनका निग्रह कैसे करूं ऐसा आप मत मानिये क्योंकि यदि आपका पुत्र भी दोषी हो तो उसे भी आप दण्ड दते हैं, इस न्यायका प्रारम्भ आपसे ही हुआ है। इसलिये हे प्रभो, आज्ञा दीजिये कि इस अपराधके लिये हम लोगोंको तीनों प्रकार के दण्डों में से कौन सा दण्ड मिलने योग्य है ? क्या फांसी ? क्या शरीरका क्लेश अथवा क्या धन हरण कर लेना ? ॥४४-४६॥
“All these lineages have been established by me, nurtured by me—they are my own brethren and have ever borne affection towards me. Therefore, do not think that I refrain from chastising them out of attachment. For even when one’s own son is at fault, does not a just king mete out punishment? This very principle of justice has originated from you.
So, O Lord, command us—what penalty befits our transgression? Of the three forms of punishment, which shall it be? Death by hanging? Bodily torment? Or the confiscation of wealth?” ॥44–46॥
श्लोक ( Shlok ) 47
तवादेशविधानेन नितरां कृतिनो वयम् । इहामुत्र च तद्देव यथार्थमनुशाधि नः ॥४७॥
हे देव, आपकी आज्ञा पालन करनेसे ही हम लोग इस लोक तथा परलोक में अत्यन्त धन्य हो सकेंगे इसलिये आप अपराधके अनुसार हमें अवश्य दण्ड दीजिये ।॥४७॥
“O Lord, by obeying your command alone shall we be truly blessed in this world and the next. Therefore, we beseech you—do grant us the punishment befitting our offence.” ॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48
इति प्रश्रयणीं वाणीं निगद्य हृदयप्रियाम् । सुमुखो राजराजस्य ‘व्यरंसीत् करसंज्ञया ॥४८॥
इस प्रकार नम्रतासे भरे हुए और हृदयको प्रिय लगनेवाले वचन कहकर वह सुमुख दूत राजराजेश्वर-चक्रवर्ती के हाथ के इशारेसे चूप हो गया ।॥४८॥
“Thus, having spoken these humble and heart-pleasing words, that gracious envoy fell silent at a mere gesture of the hand from the sovereign of kings—the Chakravartin.” ॥48॥
श्लोक ( Shlok ) 49
सतां वचांसि चेतांसि हरन्त्यपि हि रक्षसाम् । किं पुनः सामसाराणि तादृशां” समतादृशाम् ॥४९॥
जब कि सज्जन पुरुषों के वचन राक्षसों के भी चित्तको मोहित कर लेते हैं तब सबको समान दृष्टि-से देखनेवाले भरत जैसे महापुरुषों के शान्तिपूर्ण चित्तकी तो बात ही क्या है ? ॥४९।।
“When even the words of noble men can enchant the hearts of demons, what need be said of the serene mind of a great soul like Bharata, who beholds all with equal vision?” ॥49॥
श्लोक ( Shlok ) 50 – 51
इहैहीति प्रसन्नोक्त्या प्रफुल्लवदनाम्बुजः । उपसिंहासनं” चक्री नि सृष्टार्थं निवेश्य तम् ॥५०॥अकम्पनैः किमित्येवमुदीर्य प्रहितो भवान् । पुरुभ्यो निर्विशेषास्ते सर्वज्येष्ठाश्च सम्प्रति ॥५१॥
जिनका मुखरूपी कमल प्रफुल्लित हो रहा है ऐसे चक्रवर्तीने ‘यहां आओ’ इस प्रकार प्रसन्नताभरे वचनों-से उस दूतको अपने सिंहासन के निकट बैठाकर उससे इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया कि ‘महाराज अरुंपनने इस प्रकार कहकर आपको क्यों भेजा है ? वे तो हमारे पिता के तुल्य हैं और इस समय हम सभी में ज्येष्ठ हैं ।॥ ५०-५१॥
“With a lotus-like countenance blossoming in delight, the Chakravartin called out with gracious words, ‘Come hither,’ and seated the envoy near his throne. Then, with gentle speech, he began to ask: ‘Why has King Arumpaṇa sent you thus with this message? He is as a father to us all, and at this time, the eldest among us.'” ॥50–51॥
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41