आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311
श्लोक 312 से 322 युद्ध का पुनरारंभ और जयकुमार की तैयारी
प्रभात में बाजों की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं। सूर्योदय के साथ पूर्व दिशा शोभित हुई। सेनापतियों ने व्रत पालन कर, जिनेन्द्र की पूजा की और युद्ध के लिए तैयार हुए। जयकुमार रिंजय रथ पर सवार होकर, वज्रकाण्ड धनुष लेकर युद्धक्षेत्र में खड़ा हुआ, जो यमराज की तरह
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 312 to 322
श्लोक ( Shlok ) 312
प्राभातानककोटीनां निःस्वनः सेनयोः सम्मम् । आक्रामतिस्म दिक्चक्रम् अक्रमेणोच्चरँस्तदा ॥३१२॥
उसी समय दोनो सेनाओ में साथ साथ उठनेवाले प्रातःकालीन करोड़ों बाजों क शब्दों ने एक साथ सब दिशाएं भर दीं ॥३१२॥
At that very moment, the simultaneous blare of countless morning war-trumpets rising from both armies resounded together, filling all the quarters of the sky.312
श्लोक ( Shlok ) 313
प्रतीच्याऽपि युतश्चन्द्रो मयैवोदेति भास्करः । इति स्नेहादिव प्राची प्रागभावुदयाद्रवेः ॥३१३॥
यद्यपि चन्द्रमा पश्चिम दिशाके साथ है तथापि सूर्य तो मेरे ही साथ उदय होगा इसी प्रेमसे मानो पूर्व दिशा सूर्योदयसे पहले ही सुशोभित होने लगी थी ॥३१३।।
Though the moon still lingered in the western sky, the eastern horizon, as if moved by love, had already begun to glow with splendour—declaring, it seemed, “The sun shall rise with me alone.” Thus did the dawn grow radiant, even before the sun had appeared.313
श्लोक ( Shlok ) 314
सरसां कमलाक्षिभ्यः प्रबुद्धानां तदा मुदा । निर्ययौ स्वार्थमादाय निद्रेव भ्रमरावली ॥३१४।॥
उस समय भ्रमरोंकी पंक्ति तालाबोंके फूले हुए (पक्ष में जागे हुए) कमलरूपी नेत्रोंसे अपना इष्ट पदार्थ लेकर निद्राके समान बड़ी प्रसन्नताके साथ निकल रही थी ।॥३१४।।
At that hour, the rows of bees—joyous as in slumber—emerged with delight, having gathered their cherished essence from the blooming, awakened lotus-eyes of the ponds.314
श्लोक ( Shlok ) 315
गतायां स्वेन सङ्कोचं पद्मिन्यां स्वोदये रविः । लक्ष्मीं निजकरेणोच्चैर्विदधे सा हि मित्रता ॥३१५॥
कमलिनी मेरे अस्त होते ही संकुचित हो गई थी, इसलिये सूर्यने अपना उदय होते ही अपने ही ही किरणरूपी हाथोंसे उसपर बहुत अच्छी शोभा की थी सो ठीक ही है क्योंकि मित्रता यही कहलाती है ॥३१५॥
The lotus had closed the moment I set—so at my rising, it was but fitting that I, the Sun, adorned her once more with the tender touch of my own ray-like hands.Indeed, such is the true nature of friendship.315
श्लोक ( Shlok ) 316
रक्तः करैः समाश्लिष्य सन्ध्यां सद्यो व्यरज्यत। वदन्निव रविर्भाेगान् पर्यन्त विरसान् स्फुटम् ॥३१६॥
रक्त अर्थात् लाल (पक्षमें प्रेम करनेवाला) सूर्य, कर अर्थात् किरणों (पक्षमें हाथों) से संध्याका आलिंगन कर शीघ्र ही विरक्त अर्थात् लालिमारहित (पक्षमें राग-हीन) हो गया था सो मानो वह यही कह रहा था कि ये भोग अन्त समयमें नीरस होते हैं ।। ३१६।।
The red-hued Sun—passionate at heart—had embraced the twilight with his ray-like hands, only to grow pale and dispassionate soon after. It was as though he were declaring:
“Pleasures, in the end, grow flavourless at the moment of parting.” 316
श्लोक ( Shlok ) 317
पर्यष्वञ्जीत् पुरेवैतां त्वां सन्ध्यामिति वेप्यर्या । रविं ‘रक्तमपि स्थित्यै’ ‘प्राच्यक्षमत “न क्षणम् ॥ ३१७।।
इस सूर्यने पहले के समान ही अपनी संध्यारूपी स्त्रीका आलिंगन किया है इस ईर्ष्यासे ही मानो पूर्व दिशाने सूर्यको प्रेमपूर्ण अथवा लाल वर्ण होनेपर भी अपने पास क्षणभर भी नहीं ठहरने दिया था ॥३१७।।
This Sun, as ever, embraced his consort—twilight—once again; and out of jealousy, it seemed, the eastern quarter, though he shone with the hue of love, did not suffer him to linger even for a moment in her midst.317
श्लोक ( Shlok ) 318 – 319
शयित्वा वीरशय्यायां निशां नीत्वा नियामिनः । स्नात्वा संतर्पिताशेषदीनानाथवनीपकाः ॥३१८॥अञ्चित्वा विधिना स्तुत्वा जिनेन्द्रांस्त्रिजगन्नतान् । “अतिष्ठनायकाः सर्वे परिच्छिद्य रणोन्मुखाः ॥३१९ ॥
व्रत-नियम पालन करनेवाले सेनापतियोंने वीरशय्यापर शयन कर रात्रि व्यतीत की । सबेरे स्नानकर सब दीन, अनाथ तथा याचकोंको संतुष्ट किया, त्रिजगद्वन्द्य जिनेन्द्र देवकी विधिपूर्वक पूजाकर स्तुति की और फिर वे अपनी अपनी सेनाका विभागकर युद्धके लिये उत्सुक हो खड़े हो गये ।। ३१८-३१९॥
The commanders, steadfast in their vows and disciplines, spent the night upon the hero’s bed—prepared for death. At dawn, they bathed and satisfied the poor, the destitute, and the supplicants. Then, after duly worshipping and praising the revered Lord Jina, venerated across the three worlds, they divided their respective armies and rose, eager and resolute, for battle.318 – 319
श्लोक ( Shlok ) 320 – 322
अरिञ्जयाख्यमारुह्य रथं श्वेताश्वयोजितम् । गृहीत्वा वज्रकाण्डं च दत्तं यच्चक्रिणा द्वयम् ॥३२०॥बन्दिमागधवृन्देन वन्द्यमानाङ्कमालिकः । गजध्वजं समुत्थाप्य जयलक्ष्मीसमुत्सुकः ॥३२१॥ जयो ज्यास्फालनं कुर्वन कृतान्तविकृताकृतिः । द्विपानां “भीषणस्तस्थौ दिशामय्याहरन् मदम् ॥३२२॥
बन्दीजन और मागध लोगोंका समूह जिसके नामके अक्षरोंकी स्तुति करते हैं, जो विजयलक्ष्मी के लिये उत्सुक हो रहा है, जिसका आकार यमराजके समान विकृत है, जो दिग्गजों के भी मदको हरण करनेवाला है और भयंकर है ऐसा जयकुमार सफेद घोड़ोंसे जुते हुए अरिंजय नामके रथपर सवार होकर और वज्रकाण्ड नामका वह धनुष जो कि पहले चक्रवर्तीने दिया था, लेकर हाथीकी ध्वजाको उड़ाता तथा धनुषकी डोरीका आस्फालन करता हुआ खड़ा हो गया ।। ३२०-३२२।।
Amid the chants of bards and Māgadha minstrels extolling the very syllables of his name, stood Jayakumāra—his form fearsome like Yama himself, eager to claim the goddess of victory, and terrible enough to humble even the pride of the guardian elephants of the quarters.
Mounted upon the chariot named Ariñjaya, yoked with white steeds, and bearing the mighty bow Vajrakāṇḍa—once gifted by a former Cakravartin—he stood tall, with the banner bearing the emblem of an elephant fluttering above him, and the string of his bow resounding with thunderous twang. 320 – 322
श्लोक 323 से 331
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311