आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91: विजयार्थ पर्वत पर सेना का एकत्रीकरण
चक्रवर्ती भरत के हिमवान् पर्वत तक विजय के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए राजा लोग सामग्री से भरे कोठों के साथ निकले। अनेक सामंत अपनी सेनाओं के साथ भरत के समीप आए और उनकी जय-जयकार की। सामंतों के समूह से भरत की सेना समुद्र की तरह भर गई। विजयार्थ पर्वत सेनाओं से आच्छादित हो स्वर्ग सा सुशोभित हुआ। सेना के शब्दों से पर्वत शब्दमय हो गया, मानो गुफाओं से प्रतिध्वनि के साथ रो रहा हो।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
प्रचेलुः सर्वसामग्रया ‘नृपाः सम्भृतकोष्ठिकाः। प्रभोश्चिरं जयोद्योगमा कलय्याहिमाचलम् ॥८२॥
भरतेश्वरका हिमवान् पर्वत तक विजय प्राप्त करनेका उद्योग बहुत समयमें पूर्ण होगा ऐसा समझकर राजा लोग सब प्रकारकी सामग्रीसे कोठे भर भरकर निकले ॥८२॥
Realizing that the campaign of King Bharateshvara, extending even unto the Himalayan heights, would require long and patient endeavor, the kings set forth well-prepared—having filled their storehouses with every manner of supply and provision.Verse 82
श्लोक ( Shlok ) 83
भट र्लाकुटिकैः केचिद्धृता लालाटिकैः परे। नूपाः पश्चात्कृतानीका विभोर्निकटमाययु ॥८३॥
कितने ही राजा लाठी धारण करनेवाले योद्धाओं के साथ, और कितने ही ललाट की ओर देखनेवाले उत्तम सेवकोंके साथ, अपनी सेना पीछे छोड़कर भरतके निकट आये ।।८३।।
Many kings, leaving their armies behind, came forth to approach Bharata—some accompanied by mace-bearing warriors, others attended by loyal retainers whose gaze remained ever fixed upon their master’s brow in devoted vigilance.Verse 83
श्लोक ( Shlok ) 84
समन्तादिति सामन्तैरापतद्भिः ससाधनैः । समिद्धशासनश्चक्री समेत्य जयकारितः ॥८४॥
इस प्रकार अपनी अपनी सेना सहित चारों ओरसे आते हुए अनेक सामन्तोंने एक जगह इकट्ठे हो कर, जिनकी आज्ञा सब जगह देदीप्यमान है ऐसे चक्रवर्तीका जयजयकार किया ।।॥८४॥
Thus, from every direction, numerous feudatory kings arrived with their own armies and gathered in one place. There, united in reverence, they raised resounding cries of victory for the Chakravartin—he whose radiant command shone forth in all realms.Verse 84
श्लोक ( Shlok ) 85
सामवायिक सामन्तसमाजैरिति सर्वतः । सरिदोघैरिवाम्भोधिरापूर्यत विभोर्बलम् ॥८५॥
जिस प्रकार नदियोंके समहसे समुद्र भर जाता है उसी प्रकार सहायता देनेवाले सामन्तोंके समूहसे भरतकी सेना सभी ओरसे भर गई थी ।॥८५॥
As the ocean swells with the rushing confluence of many rivers, even so was Bharata’s army filled on all sides by the gathering host of loyal vassals who had come to offer their aid.Verse 85
श्लोक ( Shlok ) 86
सवनः सावनिः सोऽद्रिः परितो रुरुधे बलैः । जिनजन्मोत्सवे मेरुरनीकैरिव नाकिनाम् ॥८६॥
जिस प्रकार भगवान्के जन्म-कल्याण के समय वन और भूमि सहित सुमेरु पर्वत देवोंको सेनाओंसे भर जाता है उसी प्रकार वह विजयार्ध पर्वत भी वन और भूमि सहित चारों ओरसे सेनाओंसे भर गया था ।॥८६॥
Just as, at the auspicious birth of the Lord, Mount Sumeru—along with forests and lands—is filled on all sides with the hosts of the gods, even so was the mountain of victory, Vijaya-Ardha, encompassed on every side by teeming armies, together with woods and plains.Verse 86
श्लोक ( Shlok ) 87
विजयार्द्धा चलप्रस्था विभोरध्यासिता बलैः । स्वर्गावासश्रियं तेनुर्विभक्तैर्नृपमन्दिरैः ॥ ८७।।
भरतकी सेनाओंसे अधिष्ठित हुए विजयार्ध पर्वतके शिखर अलग अलग तने हुए राजमण्डपों से स्वर्गकी शोभा धारण कर रहे थे ।।८७।।
The peaks of Mount Vijaya-Ardha, now graced by Bharata’s vast encampments, shone with celestial splendor—adorned by the many royal pavilions stretched across them, as though the very glory of heaven had descended upon the earth.Verse 87
श्लोक ( Shlok ) 88
प्रक्ष्वेलित रथं विष्वक् प्रहेषिततुरङ्गमम् । प्रबृंहितगजं सैन्यं ध्वनिसादकरोद् गिरिम् ॥८८॥
जिसमें चारों ओरसे रथ चल रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं, और हाथी गरज रहे हैं ऐसी उस सेनाने उस विजयार्ध पर्वतको एक शब्दोंके ही आधीन कर दिया था अर्थात् शब्दमय बना दिया था ।।८८।।
That mighty army, with chariots rumbling on all sides, horses neighing, and elephants trumpeting like thunder, had so enveloped Mount Vijaya-Ardha that it seemed to fall under the dominion of sound itself—transformed into a realm made wholly of resounding noise.Verse 88
श्लोक ( Shlok ) 89
बलध्वानं गुहारन्ध्रै प्रतिश्रूद्भूत “मुद्वहन् । सोऽद्रिरुद्रिक्ततद्रोधो ध्रुवं फूत्कारमातनोत् ॥८९॥
गुफाओंके छिद्रोंसे जिसकी प्रतिध्वनि निकल रही है ऐसे सेना के शब्दोंको धारण करता हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो सेनासे घिर जानेके कारण फू फू शब्द ही कर रहा हो अर्थात् रो ही रहा हो ।॥८९॥
The mountain, echoing through the hollows of its caves with the resounding clamor of the army, seemed as though it were sighing—uttering a ceaseless phū phū—as if it wept under the weight of the encircling host.Verse 89
श्लोक ( Shlok ) 90
अत्रान्तरे ज्वलन्मौलिप्रभापिञ्जरिताम्बरः । ददृशे प्रभुणा व्योम्नि गिरेरवतरत् सुरः ॥९०॥
इसी बीचमें भरतने, देदीप्यमान मुकुटकी कान्तिसे जिसने आकाशको भी पीला कर दिया है और जो पर्वतपरसे नीचे उतर रहा है ऐसा एक देव आकाशमें देखा ॥९०॥
Amidst all this, Bharata beheld in the sky a celestial being descending from the mountain—his radiant crown shining so brilliantly that even the heavens were tinged with a golden hue by its effulgence.Verse 90
श्लोक ( Shlok ) 91
स ततोऽवतरन्नद्रेर्बभौ सानुचरोऽमरः । सवनः कल्पशाखीव लसदाभरणांशुकः ॥९१॥
जिसके आभूषण तथा वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वह देव अपने सेवकों सहित उस पर्वतसे उतरता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिसके आभूषण और वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वनसहित कल्पवृक्ष ही हो ।।९१।।
That celestial being, adorned with resplendent ornaments and garments, descended the mountain attended by his retainers—radiant and magnificent, like a wish-fulfilling Kalpa-vṛkṣa tree shining amidst a forest, its branches heavy with heavenly jewels and silken leaves.Verse 91
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81