आदिपुराण 33 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 33 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 33 (श्लोक 1 से 202)
चक्रवर्ती भरत, जिन्होंने समस्त राजाओं, विद्याधरों, और देवों को वश में किया, नौ निधियों और चौदह रत्नों के साथ अयोध्या की ओर लौटे। उनकी सेना, गंगा के समान विजयार्थ पर्वत से निकली, जिसमें हाथी, घोड़े, और सैनिकों के कोलाहल से दिशाएँ गूँज उठीं। गंगा किनारे देशों और पर्वतों को पार करते हुए वे कैलास पर्वत पहुँचे, जहाँ सेना ठहराकर वे जिनेन्द्र भगवान वृषभदेव की पूजा के लिए गए। कैलास की शोभा झरनों, मणियों, और वनों से सुशोभित थी, जो भगवान की सेवा का प्रतीक थी। मणिमयी सीढ़ियों से चढ़कर भरत ने वनदेवियों, हरिणों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की तुलना भरत से की, जो शांत और भयंकर दोनों था। समवसरण में प्रवेश कर भरत ने धूलिसाल, मानस्तंभ, और रत्नमयी कोट देखे। उन्होंने चैत्यवृक्षों, ध्वजाओं, और नाट्यशालाओं की पूजा की। गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को सिंहासन पर देखा, जिनकी प्रभा, छत्रत्रय, और दिव्य ध्वनि सभा को संतुष्ट करती थी। भरत ने जल, चंदन, और फूलों से पूजा की और सप्तभंगी वाणी की प्रशंसा की, जो उनकी सर्वज्ञता दर्शाती थी। उन्होंने भगवान को अरिहंत, वीतराग, और लोकगुरु कहकर जय-स्तुति की। उनकी भक्ति से मन, वचन, और शरीर पवित्र हुए, और दर्शन से पाप नष्ट हुए। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय के बाद, भगवान से धर्म स्वरूप सुनकर और समवसरण की विभूति से आनंदित होकर भरत अयोध्या लौटे। यह पर्व उनकी भक्ति, पुण्य, और जिनमत के महत्व को दर्शाता है।
श्लोक 1 से 11 अयोध्या की ओर प्रस्थान
चक्रवर्ती भरत, जिन्होंने समस्त राजाओं, विद्याधरों, और देवों को वश में किया, नौ निधियों और चौदह रत्नों के साथ अयोध्या की ओर लौटे। उनकी सेना, गंगा के समान विजयार्थ पर्वत से निकली, जिसमें हाथी, घोड़े, और पैदल सैनिक लहरों और बुलबुलों से प्रतीत होते थे। रथों, घोड़ों, और हाथियों के शब्दों से कोलाहल हुआ। भरत ने विजय पर्वत नामक हाथी पर सवार होकर गंगा किनारे देशों और पर्वतों को पार करते हुए कैलास पर्वत के समीप पहुँचे।
श्लोक 12 से 27 कैलास पर्वत का दर्शन
भरत ने कैलास पर्वत पर सेना ठहराकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा के लिए प्रस्थान किया। राजाओं के साथ वे इंद्र की तरह शोभित थे। कैलास की शोभा, झरनों, फूलों, और वनों से सुसज्जित थी, जो भगवान वृषभदेव की सेवा का प्रतीक थी। स्फटिक मणियों, नीले और हरे मणियों, और रत्नों से पर्वत इंद्रधनुष सा प्रतीत होता था। किनारों पर सिंह, किन्नर, और विद्याधर क्रीड़ा करते थे, जिससे भरत को आनंद हुआ।
श्लोक 28 से 41 पर्वत पर चढ़ाई और शोभा
भरत पैदल कैलास पर चढ़े, बिना खेद के, क्योंकि धर्म कार्यों में कष्ट नहीं होता। मणिमयी सीढ़ियों से वे शिखर पर पहुँचे, जहाँ वन की शीतल वायु ने उनका स्वागत किया। उन्होंने मंदार वनों में देवियों, हरिणियों, अजगरों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की शोभा की प्रशंसा की, जिसमें नदियाँ, वन, और मुनियों जैसे प्रदेश थे, जो द्वंद्व सहते और कल्याण करते थे।
श्लोक 42 से 51 पर्वत की महिमा
पर्वत के झरने सिंहों को तर्जना करते प्रतीत होते थे। पुरोहित ने भरत की तुलना पर्वत से की, जो सेवकों और भद्र हाथियों को धारण करता था। वन में सिहों, हरिणों, और मुनियों की उपस्थिति थी, जो शांति और भय का मिश्रण दर्शाती थी। सिंह और हरिण शांतिपूर्वक विचरण करते थे, जो जिनेन्द्र की उपस्थिति से संभव था।
श्लोक 52 से 61 पर्वत की शांति और रत्न
पर्वत जिनेन्द्र की उपस्थिति से शांत था। सिंह और हरिण सहवास में थे, और मुनियों के पीछे पशु निर्भय विचरते थे। पर्वत अष्टापद नाम से जाना गया। रात्रि में औषधियाँ और मणियाँ प्रकाशमान थीं, पर किन्नर अंधेरे से डरते थे। हरिण मणियों को घास समझकर लज्जित होते थे। सूर्यकांत और चंद्रकांत मणियाँ सूर्य और चंद्र की किरणों से जल और शोभा उत्पन्न करती थीं।
श्लोक 62 से 71 जिनेन्द्र के समान पर्वत
पर्वत जिनेन्द्र के समान था, क्योंकि दोनों देवों से सेवित, स्थिर, और महान थे। पुरोहित ने इसकी शोभा की प्रशंसा की, जिससे भरत आनंदित हुए। समवसरण के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हुए, उन्होंने पुष्पवृष्टि, दुंदुभि शब्द, और मंदार वनों की सुगंधित वायु का अनुभव किया। फूलों से भरे मार्ग से वे बिना परिश्रम शिखर पर चढ़े।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का दर्शन
भरत ने जिनेन्द्र के समवसरण को देखा, जहाँ सुर और असुर बैठते थे। धूलिसाल, मानस्तंभ, और स्वच्छ परिखा को पार कर वे लतावनों और गोपुरों तक पहुँचे। रत्नों से सुशोभित कोट और मंगलद्रव्यों ने उनकी इंद्रियों को संतुष्ट किया। नाट्यशालाएँ और धूपघटों ने समवसरण की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की शोभा
भरत ने अशोक, चंपक, और सप्तपर्ण वनों में चैत्यवृक्षों की पूजा की। किन्नर देवियाँ जिनेन्द्र का उत्सव गा रही थीं। वनों की सुगंध और कोयलों के शब्दों ने आनंद बढ़ाया। ध्वजाभूमि यज्ञभूमि सी शोभित थी, जिसमें चक्र और हाथी के चिह्न थे। भरत ने इनका पूजन किया और आगे बढ़े।
श्लोक 92 से 101 समवसरण की संरचना
ध्वजाभूमि में दस प्रकार की ध्वजाएँ थीं। भरत ने चांदी के कोट, नाट्यशालाएँ, और कल्पवृक्षों के वन देखे। सिद्धार्थ वृक्षों की पूजा की और रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया। ये सब तीनों लोकों की शोभा का प्रतीक थे।
श्लोक 102 से 111 समवसरण की संरचना और पूजा
चक्रवर्ती भरत ने रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया, जो जिनेन्द्र प्रतिमाओं और तोरणों से सुशोभित थे। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने इनकी पूजा की और कक्ष को पार किया। आकाशस्फटिक से निर्मित तीसरा कोट देखा, जो जिनेन्द्र की समीपता से शुद्ध प्रतीत होता था। कल्पवासी देवों से आज्ञा लेकर वे सभा में प्रवेशे। वहाँ एक योजन विस्तृत श्रीमण्डप में बारह संघों—मुनि, देवियाँ, राजा, और पशु—का दर्शन किया। उन्होंने तीन कटनीदार पीठ की प्रदक्षिणा की, धर्मचक्रों और चक्र, हाथी आदि चिह्नों वाली आठ महाध्वजाओं की पूजा की।
श्लोक 112 से 123 जिनेन्द्र का दर्शन
भरत ने गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को मेरु शिखर जैसे सिंहासन पर देखा। वे छायारहित, तीन छत्रों से सुशोभित, और प्रभामण्डल से युक्त थे। अशोक वृक्ष चिह्न उनके शोक-निवारक स्वरूप को दर्शाता था। चामर, आकाशदुंदुभियाँ, और फूलों की वर्षा उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनकी दिव्य ध्वनि अनेक भाषाओं में हृदय का अंधकार दूर करती थी। अनन्त वीर्य, सुगंध, और शुभ लक्षणों से युक्त भगवान को देखकर भरत आनंदित हुए और घुटनों पर नमस्कार किया।
श्लोक 124 से 131 पूजा और स्तुति का प्रारंभ
भरत ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया, उनका मुकुट और कुण्डल चञ्चल हो उठे। मोक्ष की इच्छा से उन्होंने जल, चंदन, पुष्पमाला, और अन्य सामग्री से भगवान की पूजा की। पूजा के बाद प्रणाम कर स्तोत्रों से स्तुति शुरू की। उन्होंने भगवान को अपार गुणों वाला, अविनश्वर, और परमात्मा कहा। स्वीकार किया कि उनकी शक्ति सीमित है, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति कर रहे हैं। उनकी भक्ति का फल महान है, जैसे स्वामी की सम्पत्ति सेवकों को समृद्ध करती है।
श्लोक 132 से 141 सर्वज्ञता और सप्तभंगी
भरत ने कहा कि घातिया कर्मों के नष्ट होने से भगवान के दर्शन, ज्ञान, और सुख प्रकट हुए। उनके केवलज्ञान ने लोक-अलोक को जाना। उनकी सप्तभंगी वाणी, जो पदार्थों के अस्तित्व, नास्तित्व, और अवक्तव्य स्वरूप को दर्शाती है, उनकी सर्वज्ञता को प्रमाणित करती है। यह वाणी विरोधरहित और सभी पदार्थों को समेटने वाली है, जो उनकी आप्तता को स्थापित करती है। अन्य देवों के वचनों में विरोध होता है, पर भगवान के उपदेश निर्भ्रान्त हैं।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा
भरत ने भगवान के सिंहासन को मेरु शिखर सा और छत्रत्रय को तीनों लोकों की प्रभुता का प्रतीक बताया। चामर, फूलों की वर्षा, और दुंदुभि शब्द उनकी महिमा दर्शाते थे। अशोक वृक्ष और उनकी प्रभा सभा को शोभित करते थे। उनकी दिव्य ध्वनि पशुओं तक के अंधकार को दूर करती थी। गंधकुटी मेरु की चूलिका सी थी, जो मुनियों की स्तुति से भक्तिमय प्रतीत होती थी।
श्लोक 152 से 164 समवसरण की विभूति
स्वर्ग के देव गंधकुटी में भगवान की सेवा करते थे। उनके मुकुटों पर भगवान के नखों की किरणें प्रसन्नता का प्रतीक थीं। देवांगनाओं के मुख नखों में कमल से प्रतीत होते थे। तीन कटनीदार पीठ धर्मचक्रों और ध्वजाओं से सुशोभित थी। समवसरण की संरचना—धूलिसाल, मानस्तंभ, परिखा, और वन—तीनों लोकों की शोभा का समावेश थी। यह विभूति भगवान की आंतरिक लक्ष्मी को दर्शाती थी।
श्लोक 165 से 181 जय-स्तुति
भरत ने भगवान की जय-स्तुति की, उन्हें कर्म-विजेता, सर्वज्ञ, और मोक्षदाता कहा। उनकी बाह्य विभूति वैराग्य को प्रभावित नहीं करती। उन्होंने भगवान को तीनों लोकों का स्वामी, अनन्त गुणों से युक्त, और अरिहंत कहा। गर्भ, दीक्षा, और मोक्ष कल्याणकों की प्रशंसा की। भगवान को वीतराग, स्वयंभू, और संसार-पारक कहकर नमस्कार किया। उनकी स्तुति से सभा पवित्र हुई।
श्लोक 182 से 191 स्तुति का फल
भरत ने केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणकों की पूजा करने वाले देवों का स्मरण किया। भगवान की स्तुति से उनके वचन, मन, और शरीर पवित्र हुए। उनके दर्शन से वे धन्य हुए, जन्म सार्थक हुआ, और नेत्र संतुष्ट हुए। भगवान के तीर्थ में स्नान कर वे सुखी हुए। उनके नखों की किरणों से अभिषेक सा अनुभव हुआ, और दिग्विजय के पाप नष्ट हुए।
श्लोक 192 से 202 अयोध्या की वापसी
भरत ने चक्रवर्ती विभूति और भगवान की सेवा दोनों प्राप्त की। उनकी स्तुति से अर्जित पुण्य से वे चरणों में भक्ति की कामना करते हैं। आनंद के आँसुओं के साथ उन्होंने भगवान को नमस्कार किया। वृषभदेव से धर्म स्वरूप सुनकर वे प्रसन्न हुए। मुनियों को नमस्कार कर, समवसरण की विभूति से नेत्रों को तृप्त कर, वे अयोध्या लौटे। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय और पुण्य से प्रेरित होकर उन्होंने जिनेन्द्र की भक्ति में आनंद प्राप्त किया।
पर्व 34
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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