आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221
श्लोक 222 से 232 हाथियों का युद्ध और योद्धाओं की मृत्यु
हाथियों का युद्ध पर्वतों की टक्कर जैसा था। भद्र जाति के हाथी यमराज की तरह लड़े, जबकि मृगजाति के हाथी भय से भागे। शक्तिशाली योद्धा शस्त्रों से शत्रुओं को परास्त करते थे। कई योद्धाओं ने मृत्यु के समय अर्हंत का स्मरण कर स्वर्ग गति प्राप्त की। युद्धक्षेत्र रुधिर और मृत शरीरों से भरा था, जो जयकुमार की विजयलक्ष्मी को दर्शाता था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 222 to 232
श्लोक ( Shlok ) 222
तदोभयबलख्यातगजाद्रिशिखरस्थिताः । योद्धमारेभिरे राजराजसिंहाः परस्परम् ॥ २२२॥
उस समय दोनों सेनाओं में प्रसिद्ध हाथीरूनी पर्वतोंकी शिखरपर बैठे हुए अनेक राजारूपी सिहोंने भी परस्पर युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया था ।॥ २२२॥
Then, upon the battlefield,The lion-like kings—renowned among both armies—Mounted upon elephantine peaks like mighty mountain summits,Began to clash with one another in fierce and regal combat.It was as though proud lions, enthroned upon living hills,Had set the heavens roaring with their royal wrath.222
श्लोक ( Shlok ) 223
अन्योन्यरदनोद्भिन्नौ तत्र कौचिद् व्यसू गजौ । चिरं परस्पराधाराभातां यमलाद्रिवत्’ ।।
उस युद्धमें एक दूसरेके दांतोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर मरे हुए कोई दो हाथी मिले हुए दो पर्वतों के समान एक दूसरेके आधारपर ही चिरकाल तक खड़े रहे थे ।।२२३॥
In that dreadful war, two mighty elephants,Slain by the goring blows of each other’s tusks,
Yet stood locked together—Leaning upon one another even in death—Like twin mountains, torn and broken,Yet unmoved in their mutual fall,Their towering forms defying collapse,Silent sentinels of a battle’s brutal end. 223
श्लोक ( Shlok ) 224
समन्ततः शरैश्च्छन्ना रेजुराजौ गजाधिपाः । क्षुद्रवेणुगणाकीर्णसञ्चरद् गिरिसन्निभाः ॥२२४॥
चारों ओरसे बाणोंसे ढके हुए बड़े बड़े हाथी उस युद्धमें छोटे छोटे बांसों से व्याप्त और चलते हुए पर्वतों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २२४॥
In that great battle, the mighty elephants,Their vast forms enveloped on all sides by a hail of arrows,
Appeared like moving mountains—Gracefully adorned with clusters of slender bamboo shoots,
Advancing with solemn majesty,As if the very hills had come alive,Clothed in a forest of darting shafts.224
श्लोक ( Shlok ) 225
दानिनो मानिनस्तुङ्गाः ‘कामवन्तोऽन्तकोपमाः । महान्तः सर्वसत्त्वेभ्यो न युद्धयन्तां कथं गजाः । २२५।
जो दानी हैं-जिनसे मद कर रहा है, मानी हैं, ऊंचे हैं, यमराज के समान हैं और सब जीवोंसे बड़े हैं ऐसे भद्र जातिके हाथी भला क्यों न युद्ध करते ? ॥ २२५॥
Why indeed would such noble-born elephants shrink from war—They who are munificent, brimming with pride,Lofty in stature, and terrible as Yama himself?Exalted above all other creatures,Endowed with majesty, might, and self-regard—How could such beings refrain from the field of battle? 225
श्लोक ( Shlok ) 226
मृगैर्मृ गैरिवापात मात्रभग्नैर्भयाद् द्विपैः । स्वसैन्यमेव संक्षुण्णं धिक् स्थौल्यं भीतचेतसाम् ॥२२६॥
जिस प्रकार हरिण भयभीत होकर भागते हैं उसी प्रकार मृगजातिके हाथी भी प्रारम्भमें ही पराजित होकर भयसे भागने लगे थे और उससे उन्होंने अपनी ही सेनाका चूर्ण कर दिया था इससे कहना पड़ता है कि भीरु हृदयवाले मनुष्यों के स्थूलपनको धिक्कार हो ॥ २२६।।
Just as startled deer flee in terror,So too did the elephantine beasts of the antelope-lineage,
Overwhelmed by fear, turn and flee at the very onset of battle.In their panic, they crushed their own ranks beneath their fleeing tread.Alas! What scorn must be cast upon those of feeble heart—For what worth is mere bulk, when courage is wanting?226
श्लोक ( Shlok ) 227
निःशक्तीन् शक्तिभिः शक्ताः शक्तांश्चक्रुरशक्तकान् । “शक्तियुक्तानशक्तांश्च निःशक्तीन् धिग्धिगूनताम्० ॥२२७॥
शक्तिशाली (सामर्थ्यवान्) योद्धा अपने शक्ति नामक शस्त्रसे, जिनके पास शक्ति नामक शस्त्र नहीं है ऐसे शक्तिशाली (सामर्थ्यवान्) योद्धाओंको शक्तिरहित-सामर्थ्यहीन कर रहे थे और जिनके पास शक्ति नामक शस्त्र था किन्तु स्वयं अशक्त-सामर्थ्यरहित थे उन्हें भी शक्तिरहित-शक्ति नामक शस्त्रसे रहित कर रहे थे-उनका शस्त्र छुड़ा रहे थे इसलिये आचार्य कहते हैं कि ऊनता अर्थात् आवश्यक सामग्रीकी कमीको धिक्कार हो ॥२२७॥
The valiant warriors, armed with the spear called śakti,Rendered powerless those mighty foes Who bore no such śakti in their hands.And even those who held the weapon śakti,But were themselves devoid of inner śakti (strength),Were swiftly disarmed—stripped of their spears and their pride alike.Thus, says the ācārya,Let want—let insufficiency, that bane of battle—be utterly condemned!227
श्लोक ( Shlok ) 228 – 229
शस्त्रनिभिन्नसर्वाङ्गा निमीलितविलोचनाः । सम्यक् संहृतसंरम्भाः सम्भावितपराक्रमाः ॥२२८॥ बुद्ध्यैव बद्धपल्यङ्कास्त्यक्तसर्वपरिच्छदाः । समत्याक्षुरसूञ्छूरा निधाय हृदयेऽर्हतः ॥२२९॥
जिनके समस्त अंग शस्त्रोंसे छिन्न भिन्न हो गये हैं, नेत्र बन्द हो गये हैं, जिन्होंने युद्धकी इच्छाका अच्छी तरह संकोच कर लिया है, जो अपना पराक्रम दिखा चुके हैं, जिन्होंने बुद्धिसे ही पल्यंकासन बांध लिया है और सब परिग्रह छोड़ दिये हैं ऐसे कितने ही शूरवीरोंने हृदयमें अर्हन्त भगवान्को स्थापन कर प्राण छोड़े थे ॥ २२८-२२९॥
Many were the warriors whose limbs had been rent by weapons,Whose eyes had grown dim and closed in final stillness,Who had withdrawn, with quiet resolve, their desire for battle,Having revealed the full measure of their valour.With the clarity of wisdom, they assumed the posture of meditation,Renouncing all possessions, all attachments—And, enthroning within their hearts the image of the Blessed Arhant,
They surrendered their lives in solemn, sacred peace. 228 – 229
श्लोक ( Shlok ) 230
कस्यचिद् क्रोधसंहारः स्मृतिश्च परमेष्ठिनि । ‘निष्ठायामायुषोऽत्रासीदभ्यासात् किं न जायते ॥२३०॥
किसी योद्धा के आयुकी समाप्तिके समय क्रोध शान्त हो गया था और परमेष्ठियोंका स्मरण होने लगा था सो ठीक है क्योंकि अभ्याससे क्या क्या सिद्ध नहीं होता ? ॥ २३०॥
At the final hour of a warrior’s life,His wrath grew calm, and his heart turned To the remembrance of the exalted Lords—The Supreme Ones, the Parameṣṭhins. And rightly so—for what cannot be attained
Through the power of long and steadfast practice? 230
श्लोक ( Shlok ) 231 – 232
हृदि नाराचनिर्मिन्ना वक्त्रात् स्रवदसृक्प्लवाः । “शिवाकृष्टान्त्रतन्त्रान्ताः पर्यन्तव्यस्तपत्कराः ॥२३१।गृद्धपक्षानिलोच्छिन्न मूर्च्छाः सम्प्राप्तसंज्ञकाः । समाधाय हि ते शुद्धां श्रद्धां शूरगतिं गताः ॥२३२॥
जिनके हृदय बाणोंसे छिन्न भिन्न हो गये हैं, मुँहसे रुधिरका प्रवाह बह रहा है, सियारोंने जिनकी अंतड़ियोंकी तांतोंके अन्तभाग तकको खींच लिया है और जिनके हाथ पैर फट गये हैं ऐसे कितने ही योद्धा गीधोंके पंखोंकी हवासे मूर्च्छारहित होकर कुछ कुछ सचेत हो गये थे और शुद्ध श्रद्धा धारणकर शूरगति-स्वर्ग गतिको प्राप्त हुए थे ।। २३१-२३२॥
Their hearts torn asunder by arrows,Blood streaming from their mouths,Their entrails pulled forth—torn and trailing—by ravenous jackals,Their limbs shattered, mangled in cruel disarray—Even such warriors, upon feeling the wind stirred By the wings of circling vultures overhead,Stirred from the edge of death,
And in that fleeting, final clarity,Embraced pure faith—Thus did they ascend to the noble path of heroes:
To Śūra-gati, the realm of the valiant in heaven.231 – 232
श्लोक 233 से 241
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
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आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221