आदिपुराण 29 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 29 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 29 (श्लोक 1 से 169)
चक्रवर्ती भरत का दक्षिण विजय अभियान
चक्रवर्ती भरत जिनेन्द्रदेव की पूजा कर दक्षिण दिशा जीतने के लिए समुद्र तट के किनारे प्रस्थान करते हैं। उनकी भव्य सेना, चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में, नगाड़ों, तुरहियों और विजय-पताकाओं से शोभित होकर शत्रुओं के हृदयों को कंपित करती है। सेना समुद्र और उपसागर के बीच तीसरे समुद्र की तरह शोभायमान होती है। शत्रु राजा उनके आगमन से भयभीत होकर भागते हैं, शरण लेते हैं या वंश सहित नष्ट हो जाते हैं। भरत शत्रुओं का धन छीनकर उन्हें निर्धन करते हैं, पर आत्मसमर्पण करने वालों को सम्मानित करते हैं। वे प्रजा और राजाओं के कल्याण के लिए योग और क्षेम की चिंता करते हैं, जहाँ उनका पुण्य और चक्ररत्न विजय के मुख्य साधन हैं।
सेनापति कर्णाटक, आंध्र, कलिंग, केरल, पाण्ड्य आदि दक्षिण देशों के राजाओं को वश में करता है, जो भेंट देकर और प्रणाम कर कृपा पाते हैं। भरत कर वसूली द्वारा दक्षिण दिशा को जीतते हैं और सुगंधित वनों में संतोष प्राप्त करते हैं। सेना वैजयन्त द्वार के समीप वन में ठहरती है, जहाँ वन और सेना की समानता प्रकट होती है। सैनिक फलयुक्त वृक्षों का आश्रय लेते हैं, और घोड़े व हाथी तालाबों में क्रीड़ा करते हैं। कुछ हाथी मदोन्मत्त होकर जल में प्रवेश नहीं करते, पर मृणाल खाकर शोभित होते हैं। हथिनियाँ और बच्चे वन में भोजन और क्रीड़ा करते हैं।
सेना गंगा, यमुना, गोदावरी आदि नदियों और ऋष्यमूक, माल्य, महेन्द्र जैसे पर्वतों को पार करती है। सैनिक दुस्तर नदियों और दुरारोह पर्वतों को सुगम बनाते हैं। भरत उपसमुद्र और द्वीपों के राजाओं को वश में करते हैं, किलों को जीतते हैं, और रत्न लेकर राजाओं को पुनः स्थापित करते हैं। अंत में, भरत समुद्र में वरतनु देव को जीतकर कवच, हार, चूड़ारत्न आदि प्राप्त करते हैं। लवण समुद्र उनकी सेवा करता है, और वे वैजयन्त द्वार से लौटकर शिविर में प्रवेश करते हैं, जिससे दक्षिण समुद्र की पूर्ण विजय होती है।
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की भव्यता
चक्रवर्ती भरत जिनेन्द्रदेव की पूजा कर दक्षिण दिशा जीतने के लिए समुद्र तट के किनारे प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना की भव्यता नगाड़ों, तुरहियों और विजय-पताकाओं से प्रकट होती है, जो समुद्र की गर्जना और शत्रुओं के हृदयों को कंपित करती है। सेना का समूह समुद्र और उपसागर के बीच तीसरे समुद्र की तरह शोभित होता है। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में यह सेना शत्रुओं को नष्ट करती है। भरत की आज्ञा राजाओं के मस्तक पर चढ़ती है, और शत्रु उनके प्रस्थान की सूचना सुनकर भागने या शरण लेने को तत्पर हो जाते हैं।
श्लोक 12 से 21
शत्रुओं का भय और पराजय
भरत के आगमन से शत्रु राजा भयभीत और व्याकुल हो जाते हैं। जो उनके विरुद्ध खड़ा होता है, वह वंश सहित नष्ट हो जाता है। विरोधी राजा उनकी सेना का शब्द सुनकर भागते हैं या राज्य-चिह्न त्याग देते हैं। कुछ दुष्ट राजाओं को मंत्रबल से कैद कर उनके स्थान पर कुलीन राजा नियुक्त किए जाते हैं। कई राजा भरत के चरणों की शरण लेते हैं, जबकि उनके समीप आने से शत्रुओं के वाहन और तेज नष्ट हो जाते हैं, और वे मृत्यु के निकट पहुंच जाते हैं।
श्लोक 22 से 31
शत्रुओं का धन-हरण और प्रजा का कल्याण
भरत शत्रुओं के रत्न और धन छीनकर उन्हें निर्धन करते हैं, परंतु आत्मसमर्पण करने वाले राजाओं को उच्च पद प्रदान करते हैं। पृथिवी उनके धन से संतुष्ट हो निर्भय हो जाती है। वे अहंकारी राजाओं को दण्डित और सत्कर्मी राजाओं को सम्मानित करते हैं। प्रजा और राजाओं के कल्याण के लिए योग और क्षेम की चिंता करते हैं। उनका पुण्य और चक्ररत्न विजय के मुख्य साधन हैं, जबकि सेना केवल वैभव के लिए है।
श्लोक 32 से 41
राजाओं का सम्मान और क्षेत्रों की विजय
भरत प्रणाम करने वाले राजाओं को फल देकर अनुग्रह करते हैं और विभिन्न भाव-भंगिमाओं से उन्हें प्रसन्न करते हैं। वे नम्रीभूत राजाओं को संतुष्ट और विरोधियों को संतप्त करते हैं। अंग, वंग, कलिंग, मगध आदि देशों के राजा रत्न और हाथी भेंटकर उनकी कृपा पाते हैं। सेनापति बिना परिश्रम के कुरु, अवंती, काशी आदि देशों को वश में करता है और अन्य क्षेत्रों में भरत की आज्ञा स्थापित करता है।
श्लोक 42 से 51
रत्नों की प्राप्ति और नदियों का भ्रमण
भरत को विभिन्न क्षेत्रों से रत्न भेंट मिलते हैं, मानो पृथिवी उनकी सेना के बोझ से रत्न उत्पन्न करती हो। उनके हाथी हिमवत् से गोरथ पर्वत तक विचरण करते हैं। सेनापति बंग, मगध, काशी आदि देशों में विजय प्राप्त करता है। सेना गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियों को पार करती है और लौहित्य समुद्र तक पहुंचती है।
श्लोक 52 से 66
नदियों और पर्वतों पर विजय
भरत की सेना शोण, नर्मदा, यमुना आदि नदियों और ऋष्यमूक, माल्य जैसे पर्वतों को पार करती है। सैनिक जंगली हाथियों को वश में करते हैं और नदियों को चौड़ा करते हैं। उनकी सेना विशाला, सिन्धु, शिप्रा आदि अनेक नदियों को घेरकर विजय पताका फहराती है।
श्लोक 67 से 81
पर्वतों और दुर्गम क्षेत्रों की विजय
सेना तैरश्चिक, वैडूर्य, पुष्पगिरि जैसे पर्वतों को लांघती है और ऋक्षवान्, कम्बल आदि की गुफाओं में विश्राम करती है। सैनिक दुस्तर नदियों और दुरारोह पर्वतों को सुगम बनाते हैं। भरत उपसमुद्र और द्वीपों के राजाओं को वश में करते हैं, उनके किलों को जीतते हैं, और रत्न लेकर उन्हें पुनः स्थापित करते हैं। वे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर त्रिकलिंग, केरल, पाण्ड्य आदि देशों को जीतते हैं।
श्लोक 82 से 90
दक्षिण दिशा की पूर्ण विजय
सेनापति कालिंगक वन, तैला, गोदावरी, वैतरणी जैसी नदियों और महेन्द्र, विन्ध्य, मलय जैसे पर्वतों को जीतता है। वह दक्षिण के त्रिकलिंग, पाण्ड्य, कवाटक आदि देशों के राजाओं को भरत की आज्ञा का पालन करने को बाध्य करता है। सेना श्रीपर्वत, किष्किन्ध आदि पर्वतों तक पहुंचकर यथायोग्य लाभ प्राप्त करती है, और चक्रवर्ती भरत की विजय पूर्ण होती है।
श्लोक 91 से 101
दक्षिण देशों के राजाओं की विजय
चक्रवर्ती भरत के सेनापति ने कर्णाटक, आंध्र, कलिंग, ओण्ड्र, चोल, केरल, पाण्ड्य और अन्य देशों के राजाओं को अपनी विजयी सेना द्वारा वश में किया। ये राजा अपनी विशेषताओं जैसे यश, कठोरता, कला-कौशल, मूर्खता, कुटिलता, सरलता और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भयपूर्वक भेंट देकर और दूर से प्रणाम कर चक्रवर्ती की कृपा प्राप्त की। भरत ने कर वसूली द्वारा दक्षिण दिशा को वशीभूत किया और समुद्र तट के सुगंधित वनों को देखकर संतोष प्राप्त किया, जहाँ वायु और वन उनकी सेवा करते प्रतीत हुए।
श्लोक 102 से 111
वन में सेना का पड़ाव
भरत ने वैजयन्त नामक समुद्र द्वार के समीप वन में अपनी सेना ठहराई। वन और सेना में समानता थी, क्योंकि दोनों ही हाथियों, उत्तम पुरुषों, फूलों और सवारियों से युक्त थे। वन के वृक्ष राजाओं की तरह छाया, फल और वैभव से सुशोभित थे। सैनिक फलयुक्त वृक्षों का आश्रय लेते थे, तालाबों के किनारे स्त्रियों सहित विश्राम करते थे, और घोड़े घास चरते थे। वानरों द्वारा करेंच फलों के कारण सैनिक व्याकुल हो रहे थे।
श्लोक 112 से 121
घोड़ों और हाथियों की क्रीड़ा
सेना के घोड़े तालाबों में स्नान कर कमल पराग से शोभित हो रहे थे, मानो मंडप में खड़े हों। वे धूलि झाड़कर जल में प्रवेश करते और विश्राम करते थे। हाथी नारियल वनों में ठहरे, जहाँ महावत उन्हें तालाबों में नहलाने और पानी पिलाने ले जाते थे। कुछ हाथी कमलिनी युक्त जल में प्रवेश करने से डरते, जबकि अन्य विश्राम करते थे।
श्लोक 122 से 131
हाथियों का व्यवहार
कुछ नवीन और पुराने हाथी तालाबों में प्रवेश नहीं करते थे, या तो कमलिनी के भय से या वन के सुखों के स्मरण में। वे सूंड़ से पानी उछालते और मदोन्मत्त होकर क्रीड़ा करते थे। कुछ हाथी जंगली हाथियों की गंध से कुपित हो जल में प्रवेश नहीं करते थे, और अपने मद से तालाब का जल बढ़ा देते थे, मानो उदारता दिखाते हों।
श्लोक 132 से 141
हाथियों की क्रीड़ा और शोभा
हाथी सूंड़ से पानी उछालते, मृणाल खाते और कमल धारण कर शोभित होते थे। कुछ डरपोक हाथी मृणाल को साँकल समझकर किनारे पर रुक जाते थे। स्नान के बाद वे पराग से शृंगारित होकर तालाबों से बाहर निकलते, पर धूल डालकर फिर मैले हो जाते। उनकी यह प्रवृत्ति उनकी स्वाभाविक प्रकृति को दर्शाती थी। पक्षी उनके भय से किनारे चले जाते थे।
श्लोक 142 से 151
हाथियों का विश्राम और बंधन
सरोवरों में क्रीड़ा के बाद हाथी वृक्षों के पास विश्राम करते, पर बंधन स्थान का ज्ञान नहीं रखते। महावत उन्हें जल पिलाने का प्रयास करते, पर मदोन्मत्त हाथी न तो जल पीते, न भोजन करते। कुछ हिंसक हाथियों को बंधन में रखा जाता, जबकि अहिंसक मुक्त रहते। ऊँचे वृक्षों में बंधे हाथी सुखपूर्वक विश्राम करते, और हथिनियाँ बच्चों के साथ क्रीड़ा करती थीं।
श्लोक 152 से 161
हथिनियों और बच्चों की क्रीड़ा
हथिनियाँ और उनके बच्चे तालाबों में जल पीकर वन में भोजन के लिए जाते, लताएँ और पत्ते खाते। बच्चे लतागृहों में क्रीड़ा करते। कुछ बच्चे ऊँटों के दूषित जल को नहीं पीते, पर हाथियों के मद युक्त जल को प्रेम से पीते। डरे हुए घोड़े और खच्चरों से सेना में क्षोभ उत्पन्न होता, और सैनिकों के शब्दों से हलचल मचती।
श्लोक 162 से 169
चक्रवर्ती का वैभव और समुद्र विजय
चक्रवर्ती भरत राजाओं के साथ उच्च शिविर में प्रवेश करते, जहाँ वायु उनकी सेवा करती। उनकी सेना समुद्र की तरह रत्नों, राजाओं और वैभव से युक्त थी। भरत ने समुद्र में जाकर वरतनु देव को जीता, कवच, हार, चूड़ारत्न आदि प्राप्त किए, और वैजयन्त द्वार से लौटकर शिविर में प्रवेश किया। लवण समुद्र उनकी सेवा करता, मानो मंत्री या इन्द्र की तरह, और उनकी विजय का मंगल-पाठ करता। इस प्रकार भरत ने दक्षिण समुद्र को जीता।
पर्व 30
हिन्दी-भाषानुवाद
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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