आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 रानियों की शारीरिक शोभा
रानियों की रोमराजि, स्तन, और भुजाएं कामदेव की लकड़ी, पिटारा, और पाश-सी हैं। उनका कण्ठ, मुख, और नेत्र कामदेव के उच्छ्वास, सुख-भवन, और बाणों-से युक्त हैं। उनके ललाट, बाल, और केश-लताएं कामदेव के खेल-मैदान और जाल-सी प्रतीत होती हैं। ये रानियां अपनी शारीरिक चेष्टाओं से भरत का मन हरण करती हैं। उनके स्पर्श, अवलोकन, और मधुर शब्दों से भरत को संतोष मिलता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
कटी कुटी मनोजस्य काञ्चीसालकृतावृतिः । नाभिरासां गभीरैका कूपिका चित्तजन्मनः ॥ ४२ ॥
करधनीरूपी कोटसे घिरी हुई उनकी कमर कामदेवकी कुटीके समान थी और उनकी नाभि कामदेवकी गहरी कूपिका (कुइयाँ) के समान जान पड़ती थी ॥४२॥
Encircled by jeweled girdles like a fortified wall, their slender waists seemed the very dwelling of Kāma himself, while their deep navels appeared as the secret wells from which the god of desire drew his power.42
श्लोक ( Shlok ) 43
मनोभुवोऽतिवृद्धस्य मन्ये ऽवष्ट म्भ यष्टिका । रोमराजिः स्तनौ चासां कामरत्नकरण्डको ।। ४३ ।।
मैं मानता हूँ कि उनकी रोमराजि कामदेवरूपी अत्यन्त वृद्ध पुरुषके सहारेकी लकड़ी थी और उनके स्तन कामदेवके रत्न रखनेके पिटारे थे ॥४३॥
I believe their fine lines of down were like the staff supporting the aged god of desire, while their breasts were the jeweled caskets 43
श्लोक ( Shlok ) 44
कामपाशायतौ बाहू शिरीषोद्गमकोमलौ । कामस्योच्छ् वसितं कण्ठः सुकण्ठीनां मनोहरः ।॥ ४४ ॥
शिरीषके फूलके समान कोमल उनकी दोनों भुजाएँ कामदेव के पाशके समान लम्बी थीं और अच्छे कण्ठवाली उन रानियोंका मनोहर कण्ठ कामदेवके उच्छ्वासके समान था ।।४४।।
Their arms, soft as the blossoms of the shirish tree, stretched long like Kāma’s own noose, and their sweet, melodious voices—possessed by those queens with graceful necks—were akin to the very breath of the god of desire.44
श्लोक ( Shlok ) 45
मुखं रतिसुखागारप्रमुखं मुखबन्धनम् । वैराग्यरससङ्गस्य तासां च दशनच्छदः ॥४५॥
उनका मुख रति (प्रीति) रूपी सुखका प्रधान भवन था और उनके औंठ वैराग्यरसकी प्राप्तिके मुखबन्धन अर्थात् द्वार बन्द करनेवाले कपाट थे ॥४५।।
Their faces were the principal abodes of Rati, the very essence of delight, while their lips served as the sealed gates that barred the entrance to the realm of dispassion and renunciation.45
श्लोक ( Shlok ) 46
दृग्विलासाः शरास्तासां कर्णान्तौ लक्ष्यतां गतौ । भ्रूवल्लरी धनुर्यष्टिर्जिगीषोः पुष्पधन्विनः ।। ४६ ।।
उन रानियोंके नेत्रोंके कटाक्ष विजयकी इच्छा करनेवाले कामदेवके बाणोंके समान थे, कानके अन्तभाग उसके लक्ष्य अर्थात् निशानोंके समान थे और भोंहरूपी लता धनुषकी लकड़ीके समान थी ॥४६॥
The glances of those queens’ eyes were like the arrows of Kāma, destined to conquer hearts; the contours of their ears resembled the very targets at which those shafts were aimed, while their nostrils—like the bow’s sturdy wood—completed the archer’s graceful instrument.46
श्लोक ( Shlok ) 47
ललाटाभोगमेतासां मन्ये बाह्यालिका स्थलम् ।अनङ्गनृपतेरिष्ट भोगकन्दु कचारिणः ॥४७॥
में समझता हूँ कि उन रानियोंके ललाटका विस्तार इष्टभोग रूपी गेंदसे खेलनेवाले कामदेवरूपी राजाके खेलनेका मानो मैदान ही हो ॥४७॥
I believe the broad expanse of those queens’ foreheads was like a royal playground for Kāma himself, the sovereign of desire, who delights in the game of sensual pleasure.47
श्लोक ( Shlok ) 48
अलकाः कामकृष्णाहेः शिशवः परिपुञ्जिताः । कुञ्चिताः केशवल्लर्यो मदनस्येव वागुराः ॥४८॥
उनकेइकट्ठे हुए आगे के सुन्दर बाल कामदेवरूपी काले सर्पके बच्चोंके समान जान पड़ते थे तथा कुछ कुछ टेढ़ी हुई केशरूपी लताएँ कामदेवके जालके समान जान पड़ती थीं ।॥४८।।
Their neatly gathered, lustrous hair resembled the young black serpents of Kāma himself, while here and there, the curling locks seemed like tendrils of a vine—the very traps woven by the god of desire. 48
श्लोक ( Shlok ) 49
इत्यनङ्गमयीं सृष्टि तन्वानाः स्वाङ्गसङि्गनीम् । मनोऽस्य जगृहुः कान्ताः कान्तैः स्वैः कामचेष्टितैः ll४९ll
इस प्रकार अपने शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली काममयी रचनाको प्रकट करती हुई वे रानियाँ अपनी सुन्दर कामकी चेष्टाओं से महाराज भरतका मन हरण करती थीं ।॥४९॥
Thus, manifesting their sensual nature through every curve and grace of their forms, those queens, with their enchanting acts of desire, captivated the heart of King Bharata.49
श्लोक ( Shlok ) 50
तासां मुडुकरस्पर्शै प्रेमस्निग्धैश्च वीक्षितैः । महती धुतिरस्यासीज्जल्पितैरपि मन्मनैः ॥ ५० ॥
उनके कोमल हाथोंके स्पर्शसे, प्रेमपूर्ण सरस अवलोकनसे, और अव्यक्त मधुर शब्दोंसे इसे बहुत ही संतोष होता था ।।५०।।
By the gentle touch of their tender hands, the loving sweetness of their glances, and their unspoken, mellifluous words, his heart was filled with profound delight.50
श्लोक ( Shlok ) 51
स्मितेष्वासां दरोद्भिन्नो हसितेषु विकस्वरः । फलितः परिरम्भेषु रसिकोऽभूद्रतद्रुमः ।। ५१ ।।
रससे भरा हुआ सुरतरूपी वृक्ष इन रानियोंके मन्द मन्द हँसनेपर कुछ खिल जाता था, जोरसे हँसनेपर पूर्णरूपसे खिल जाता था और आलिंगन करनपर फलोंसे युक्त हो जाता था ।।५१।।
The tree of melody, laden with delight, blossomed gently at the queens’ soft laughter, burst fully into bloom at their hearty mirth, and bore fruit abundant upon their warm embrace.51
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
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