आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
श्लोक 153 से 161 जयकुमार की वीरता
जयकुमार के धनुष की टंकार से शत्रु भयभीत हो गए, और उनके बाण अदृश्य होकर शत्रुओं को मार गिराते थे। उसके बाण उल्काओं की तरह दिशाओं को ढक लेते थे। विद्याधरों के मुकुटों से गिरी मणियाँ जयकुमार को भेंट की तरह प्रतीत हुईं। उसने मृत विद्याधरों की स्त्रियों पर दया दिखाई। यमराज की तरह वह अन्यायियों का वध कर धर्मस्वरूप हो गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 153 to 161
श्लोक ( Shlok ) 153
निर्जिताशनिनिर्घोषजयज्याघोषभीलुकाः। चापसायकचेतांसि प्राक्षिपन् सह शत्रवः ॥१५३॥
वज्रकी गर्जनाको जीतनेवाले जयकुमार के धनुषकी डोरीके शब्द मात्रसे डरे हुए कितने ही शत्रुओंने धनुष, बाण और हृदय-सब फेंक दिये । भावार्थ-भयसे उनके धनुष-बाण गिर गये थे और हृदय विक्षिप्त हो गये थे ॥ १५३।।
“At the mere sound of the bowstring of Jayakumāra—mightier than the roar of thunder—many foes, seized with terror, cast away their bows, their arrows, and even their hearts.
(That is, their weapons fell from their hands, and their minds were thrown into disarray.)” ॥153॥
श्लोक ( Shlok ) 154
चापमाकर्णमाकृष्य ज्यानिवेशितसायकः । लघुसन्धानमोक्षः सोऽवेक्ष्य विध्यन्निव क्षणम् ॥१५४॥
कान तक धनुष खींचकर जिसने डोरीपर बाण रक्खा है और जो बड़ी शीघ्रतासे बाणोंको रखता तथा छोड़ता है ऐसा जयकुमार क्षणभरके लिये ऐसा जान पड़ता था मानो प्रहार ही नहीं कर रहा हो अर्थात् बाण चला ही नहीं रहा हो ॥ १५४॥
Jaikumara, who has drawn his bow till his ears and has placed an arrow on the string and who is quickly placing and releasing the arrows, for a moment it seemed as if he is not attacking, that is, as if he is not shooting an arrow at all. ॥154॥
श्लोक ( Shlok ) 155
न मध्ये न शरीरेषु दृष्टास्तद्योजिताः शराः । दृष्टास्ते केवली भूमौ सव्रणाः पतिताः परे ॥१५५॥
जयकुमारके द्वारा चलाये हुए बाण न बीचमें दिखते थे, और न शरीरोंमें ही दिखाई देते थे, केवल घावसहित जमीनपर पड़े हुए शत्रु ही दिखाई देते थे ।।१५५॥
The arrows loosed by Jayakumar were neither seen in mid-flight nor as they pierced the bodies — only the fallen foes, lying wounded upon the earth, bore witness to their deadly course. 155
श्लोक ( Shlok ) 156
निमीलयन्तश्चक्षूंषि ज्वलयन्तः शिलीमुखाः । मुखानि ककुभां वव्रुः खादुल्कालीविभीषणाः ॥१५६॥
जो देखनेवालोंके नेत्र बन्द कर रहे हैं, सबको जला रहे हैं और उल्काओंके समूहके समान भयंकर हैं ऐसे जयकुमारके बाणोंने दिशाओंके मुख ढक लिये थे ।।१५६।।
The arrows of Jayakumar, fierce as showers of blazing meteors, scorched all in their path, seared the eyes of onlookers, and veiled the very face of the quarters with their fiery onslaught.156
श्लोक ( Shlok ) 157
तिर्यग्गोष्फणपाषाणैर दृष्ट्वाज्यजिराद् बहिः । पातितान् खचरानूचुः सतनून् स्वर्गतान् जडाः ॥१५७
तिरछे जानेवाले गोफनोंके पत्थरोंसे युद्धके आंगनसे बाहर पड़े हुए विद्याधरोंको न देखकर मूर्ख लोग कहने लगे थे कि देखो विद्याधर शरीर सहित ही स्वर्ग चले गये हैं ॥१५७॥
Seeing no trace of the Vidyādharas—struck down by the slanting stones hurled from whirling slings and flung beyond the arena of battle—foolish men began to say, “Behold! The Vidyādharas have ascended to heaven with their bodies intact!”157
श्लोक ( Shlok ) 158
शरसंरुग्ण “विद्याधृन्मुकुटेभ्योऽगलन् सुरैः । मणयो गुणगृह्यैर्वा जयस्योपायनीकृताः ॥१५८॥
बाणोंकी चोटसे छिन्नभिन्नं हुए विद्याधरोंके मुकुटोंसे जो मणि गिर रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो गुणोंसे वश होनेवाले देवोंने जयकुमारको भेंट ही किये हों ॥ १५८॥
The gems that fell from the shattered crowns of the Vidyādharas, sundered by the blows of Jayakumar’s arrows, appeared as though the gods—won over by his virtues—were themselves offering him celestial gifts. 158
श्लोक ( Shlok ) 159
“पतन्मृतखगान्वीतप्रियाभिः स्वाश्रुवारिणा । ‘वारिदानमिवाचर्य कृपामासादितो जयः ॥१५९॥
गिर गिरकर मरे हुए विद्याधरोंके साथ आई हुई स्त्रियां अपने अनुरूपी जलसे जो उन्हें जलांजलि सी दे रही थीं उसे देखकर जयकुमारको दया आ गई थी ॥१५९॥
As the women who had accompanied the fallen Vidyādharas wept beside their lifeless forms, their tears resembling sacred libations offered to the dead, a wave of compassion stirred within the heart of Jayakumar.159
श्लोक ( Shlok ) 160
अन्तकः समवर्तीति तद्वातैव न चेत्तथा । कथं चक्रिसुतस्यैव बले प्रेताधिपो भवेत् ॥१६०।।
यमराज समवर्ती है अर्थात् सबको समान दृष्टिसे देखता है यह केवल कहावत ही है यदि ऐसा न होता तो वह केवल चक्र-वर्तीके पुत्र अर्ककीर्तिकी सेनामें ही वयों प्रेतोंका राजा होता ? अर्थात् उसीकी सेनाको क्यों मारता ? ।।१६०।।
“Yama, the god of death, is said to be impartial — equal in his gaze toward all; but such sayings seem mere fables now. Were it truly so, why then would he reign solely as the lord of ghosts over the army of Arkkakīrti, the emperor’s son? Why does his wrath fall only upon that host?”160
श्लोक ( Shlok ) 161
वधं विधाय न्यायेन जयेनान्यायवर्तिनाम् । यमस्तीक्ष्णोऽप्यभूद्धर्मस्तत्र दिव्यानलोपमः ॥१६१॥
जयकुमारके द्वारा अन्यायमें प्रवृत्ति करनेवाले लोगोंका वध कराकर वह तीक्ष्ण यमराज भी उस युद्धमें दिव्य अग्निके समान धर्मस्वरूप हो गया था । भावार्थ -पूर्वकालमें साक्षी आदिके न मिलनेपर अपराधीकी परीक्षा करनेके लिये उसे अग्निमें प्रविष्ट कराया जाता था, अथवा जलते हुए अंगार उसके हाथपर रखाये जाते थे । अपराधी मनुष्य उस अग्निमें जल जाते थे परन्तु अपराधरहित मनुष्य सीता आदिके समान नहीं जलते थे । उसी आगको दिव्य अग्नि कहते हैं सो जिस प्रकार दिव्य अग्नि दुष्ट होनेपर भी अपराधीको ही जलाती है अपराधरहितको नहीं जलाती उसी प्रकार यमराजने दुष्ट होकर भी अन्यायी मनुष्योंका ही वध कराया न कि न्यायी मनुष्योंका भी, इसलिये वह यमराज दुष्ट होनेपर भी मानो उस समय दिव्य अग्निके समान धर्मस्वरूप हो गया था ।।१६१।।
When Jayakumar brought about the destruction of those inclined toward injustice, even the fierce Yama, god of death, took on the semblance of righteousness in that battle, like the divine fire of old.
For in ancient times, when no witness could be found, the accused were tested by fire—made to enter flames or bear burning embers upon their hands. The guilty were consumed, while the innocent, like Sītā, remained unscathed. That sacred flame, discerning between right and wrong, came to be known as the divine fire. Likewise, though Yama is feared and harsh, in that moment he slew only the wicked, sparing the just — and thus, even in his ferocity, he shone forth as a manifestation of Dharma itself.161
श्लोक 162 से 171
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152