आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 बाहुबली की ऋद्धियां और ध्यान
बाहुबली के तप से अणिमा, महिमा आदि आठ विक्रिया-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। औषधि-ऋद्धि से वे प्राणियों का उपकार करते हैं। भोजन न लेने पर भी उनकी रस और बल-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। वे अक्षीणसंवास और अक्षीणमहानस ऋद्धियां धारण करते हैं। अध्यात्म में निपुण, वे मन को ध्यान में लगाते हैं। दश धर्मध्यान-भावनाएं और बारह अणुप्रेक्षाओं का चिंतन करते हैं। आज्ञा, अपाय, विपाक, और कर्मों का चिंतन कर धर्मध्यान में लीन रहते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
विक्रियाऽष्टतयी चित्रं प्रादुरासीत्तपोबलात्। ‘विक्रियां निखिलां हित्वा तीव्रमस्य तपस्यतः ॥१५२॥
यद्यपि वे मुनिराज समस्त प्रकारकी विक्रिया अर्थात् विकार भावोंको छोड़कर कठिन तपस्या करते थे तथापि आश्चर्य की बात है कि उनके तपके बलसे आठ प्रकारकी विक्रिया प्रकट हो गई थी। भावार्थ रागद्वेष आदि विकार भावोंको छोड़-कर कठिन तपस्या करनेवाले उन बाहुबली महाराजके अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व यह आठ प्रकारकी विक्रिया ऋद्धि प्रकट हुई थीं ।। १५२।।
Though that venerable sage, renouncing all modifications of the mind—such as attachment and aversion—remained steadfast in his severe austerities, yet wondrous indeed it was that, by the sheer force of his penance, the eight supernatural powers (aṣṭa-vikriyās) spontaneously manifested within him: aṇimā (minuteness), mahimā (vastness), garimā (heaviness), laghimā (lightness), prāpti (reach), prākāmya (fulfillment of will), īśitva (lordship), and vaśitva (mastery).152
श्लोक ( Shlok ) 153
प्राप्तौषवर्द्धरस्यासीत् सन्निधिर्जगते हितः । ‘आमर्शक्ष्वेल ‘जल्लाद्यैः प्राणिनामुपकारिणः ।।१५३।।
जिन्हें अनेक प्रकारकी औषध ऋद्धि प्राप्त है और जो आमर्श, क्ष्वेल तथा जल्ल आदिके द्वारा प्राणियोंका उपकार करते हैं ऐसे उन मुनिराजकी समीपता जगत्का कल्याण करनेवाली थी । भावार्थ-उनके समीप रहनेवाले लोगोंके समस्त रोग नष्ट हो जाते थे ॥ १५३।।
Endowed with wondrous herbal powers and possessing the sacred arts of āmṛśa, kṣvela, and jalla—by which they brought healing to living beings—those exalted sages became a sanctuary of well-being. Verily, the mere nearness of such munis dispelled the afflictions of all who came into their presence, becoming a fountain of welfare for the world.153
श्लोक ( Shlok ) 154
अना “शुषोऽपि तस्यासीद् रसद्धिः शक्तिमात्रतः । तपोबलसमुद्भूता बलर्द्धिरपि पप्रथे ॥१५४।।
यद्यपि वे आहार नहीं लेते थे तथापि शक्ति मात्रसे ही उनके रसऋद्धि प्रकट हुई थी और तपश्चरणके बलसे प्रकट हुई उनकी बल ऋद्धि भी विस्तार पा रही थी। भावार्थ भोजन करनेवाले मुनिराजके ही रसऋद्धिका उपयोग हो सकता है परन्तु वे भोजन नहीं करते थे इसलिये उनके शक्तिमात्र से रसऋद्धिका सद्भाव बतलाया है ॥ १५४॥
Though they partook not of any sustenance, the Rasa Riddhi—the miraculous power of taste—manifested in them solely through their inner potency; and the Bala Riddhi—the strength born of austerity—grew ever more resplendent by the force of their penance. For indeed, while such powers are generally ascribed to those who consume food, in their case, it was the sheer might of spiritual energy that bore witness to these perfections.154
श्लोक ( Shlok ) 155
अक्षीणावसथः सोऽभूत्तथाऽक्षीण” महाशनः (नसः) । सूते हि फलमक्षोणं तपोऽक्षू णमुपासितम् ।। १५५॥
वे मुनिराज अक्षीणसंवास तथा अक्षीणमहानस ऋद्धिको भी धारण कर रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि पूर्ण रीतिसे पालन किया हुआ तप अक्षीण फल उत्पन्न करता है ।।१५५॥
Those exalted sages had also attained the Akṣīṇa-Saṃvāsa and Akṣīṇa-Mahānasa riddhis—the inexhaustible retinue and the ever-abundant divine kitchen. And rightly so, for austerity observed in its fullest measure bears inexhaustible fruit. 155
श्लोक ( Shlok ) 156
निर्द्वन्द्ववृत्तिरध्यात्ममिति निर्जित्य जित्वरः । ध्यानाभ्यासे मनश्चक्रे योगी योगविदां वरः ॥१५६॥
विकल्प रहितं चित्तकी वृत्ति धारण करना ही अध्यात्म है ऐसा निश्चयकर योगके जाननेवालोंम श्रेष्ठ उन जितेन्द्रिय योगिराजने मनको जीतकर उसे ध्यानके अभ्यासमें लगाया ।। १५६॥
The supreme yogi, master of all senses and foremost among those who understand the true nature of Yoga, resolved that spirituality is nothing but the unwavering fixation of the mind’s restless tendencies. With this conviction, he conquered the mind and steadfastly engaged it in the practice of profound meditation.156
श्लोक ( Shlok ) 157 –158
क्षमामथोत्तमां भेजे परं मार्दवमार्जवम् । सत्यं शौचं तपस्त्यागावाकिञ्चन्यं च संयमम् ॥१५७।।ब्रह्मचर्यं च धर्मस्य ध्यानस्यैता हि भावनाः। योग” सिद्धौ परां सिद्धिमा मनन्तीह योगिनः ॥ १५८॥
उत्तमक्षमा, उत्तममार्दव, उत्तमआर्जव, उत्तमसत्य, उत्तमशौच, उत्तमसंयम, उत्तमतप, उत्तमत्याग, उत्तमआकिञ्चन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य ये दश धर्भध्यानकी भावनाएं हैं। इस लोकमें योगकी सिद्धि होनेपर ही उत्कृष्ट सिद्धि-सफलता-मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है ऐसा योगी लोग मानते हैं ।।१५७-१५८॥
The exalted sentiments of supreme patience (uttama kṣamā), utmost gentleness (uttama mārdava), highest sincerity (uttama ārjava), unerring truthfulness (uttama satya), purest cleanliness (uttama śauca), perfect self-restraint (uttama saṃyama), intense austerity (uttama tapa), complete renunciation (uttama tyāga), absolute detachment (uttama ākiñcanya), and immaculate celibacy (uttama brahmacharya)—these ten virtues constitute the meditative essence of the soul’s discipline.
The sages of this world hold that only by attaining mastery in Yoga through these qualities can one achieve supreme accomplishment, eternal bliss, and ultimate liberation.157 –158
श्लोक ( Shlok ) 159 –160
अनित्यात्राणसंसारै कत्वाऽन्यत्वान्यशौचताम् । निर्जरास्त्रवसंरो’धलोकस्थित्यनु चिन्तनम् ॥१५९॥धर्मस्याख्याततां बोधेर्दुर्लभत्वं च लक्षयन् । सोऽनुप्रेक्षाविधि दध्यौ विशुद्धं द्वादशात्मकम् ॥१६०।।
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्स्रव, संजर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्माख्यातत्त्व इन बारह भावनाओंका उन्होंने विशुद्ध चित्तसे चिन्तवन किया था ॥१५९-१६०।।
With a pure and unwavering mind, he contemplated deeply upon these twelve profound truths: the impermanence of all things (anitya), the absence of refuge (asharaṇa), the bondage of worldly existence (saṃsāra), the oneness of the self (ekatva), the distinction of the other (anyatva), the inherent impurity of the material (aśuci), the influx of karmic particles (āsrava), the accumulation of karma (saṃjara), the shedding of karma (nirjara), the realms of existence (loka), the rarity of enlightenment (bodhi durlabha), and the essential principles of dharma (dharmākhya tattva).159 –160
श्लोक ( Shlok ) 161
आज्ञापायौ विपाकं च संस्थानं चानुचिन्तयन् । सध्यानमभजद् धर्म्य कर्मांशान् परिशातयन् ॥१६१॥
वे आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थानका चिन्तवन करते हुए तथा कर्मों-के अंशोंको क्षीण करते हुए धर्मध्यान धारण करते थे ॥१६१।।
Contemplating the nature of command (ājña), danger (apāya), fruition (vipāka), and the very substratum of existence (saṃsthāna), while gradually diminishing the residues of karma, he steadfastly maintained his meditation on the dharma.161
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
Download PDF