आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 जलयुद्ध और बाहुयुद्ध
दृष्टियुद्ध में बाहुबली की विजय के बाद दोनों भाई जलयुद्ध के लिए सरोवर में प्रवेश करते हैं। बाहुबली का जल प्रवाह भरत के वक्ष पर पड़ता है, पर भरत का जल बाहुबली के मुख तक नहीं पहुंचता, क्योंकि बाहुबली का कद अधिक है। बाहुबली जलयुद्ध में भी विजयी होते हैं। फिर बाहुयुद्ध में दोनों भाई पराक्रमी सिंहों-से युद्ध करते हैं। बाहुबली भरत को लीला में घुमा देते हैं और उन्हें कंधे पर उठाकर विजय प्राप्त करते हैं, पर बड़े भाई के सम्मान में उन्हें भूमि पर नहीं पटकते।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
विनिवार्य कृतक्षोभमनिवार्य बलार्णवन् । मर्यादया यवीयांसं जयेनायोजयन्नृपाः ॥५२॥
हर्ष से क्षोभ मचाते हुए बाहुबली के दुनिवार सेनारूपी समुद्रको रोककर राजाओंने बड़ी मर्यादाके साथ कुमार बाहुबलीको विजयसे युक्त किया अर्थात् दृष्टियुद्धमें उनकी विजय स्वीकार की ॥५२॥
Then, restraining the tumultuous ocean of Bāhubali’s irresistible army, the assembled kings, with great decorum, proclaimed Prince Bāhubali victorious—acknowledging his triumph in the gaze-combat, even as joy surged through the ranks.52
श्लोक ( Shlok ) 53
सरसीजलमागाढौ जलयुद्धं मदोद्धतौ । दिग्गजाविव तौ दोर्घैर्व्यात्यु “क्षीमासतुर्भुजैः ॥५३॥
तदनन्तर मदोन्मत्त दिग्गजोंक समान अभिमानसे उद्धत हुए वे दोनों भाई जलयुद्ध करनेके लिये सरोवरके जलमें प्रविष्ट हुए और अपनी लम्बी लम्बी भुजाओंसे एक दूसरेपर पानी उछालन लगे ।।५३।।
Thereafter, the two brothers, their pride swelling like intoxicated elephants of the quarters, entered the waters of the lake for the water-combat. With their long, powerful arms, they began to splash one another, each striving to prevail.53
श्लोक ( Shlok ) 54
अधिवक्षस्तरं जिष्णो रेजुरच्छा जलच्छटाः । शैलभर्तुरिवोत्सङ्गसंगिन्यः स्रुतयोम्भसाम् ।।५४।।
चक्रवर्ती भरतके वक्षःस्थलपर बाहुबली के द्वारा छोड़ी हुई जलकी उज्ज्वल छटाएं ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो सुमेरुपर्वतके मध्यभागमें जलका प्रवाह ही पड़ रहा हो ।।५४।।
The radiant sprays of water hurled by Bāhubali upon Bharata’s chest shone with such splendour as though a stream of pure water were cascading down the central slope of Mount Sumeru itself.54
श्लोक ( Shlok ) 55
जलौघो भरतेशेन मुक्तो दोर्बलशालिनः । प्रांशोरप्राप्य दूरेण मुखमारात् समापतत् ।।५५।।
भरतेश्वर के द्वारा छोड़ा हुआ जलका प्रवाह अत्यन्त ऊँचे वाहुबलीके मुख-को दूर छोड़कर दूरसे ही नीचे जा पड़ा ।। भावार्थ भरतेश्वरने भी बाहुबली के ऊपर पानी फेंका था परन्तु बाहुबली के ऊँचे होने के कारण वह पानी उनके मुखतक नहीं पहुँच सका, दूरसे ही नीचे जा पड़ा । भरत का शरीर पाँचसौ धनुष ऊँचा था और बाहुबलीका पाँचसौ पच्चीस धनुष । इसलिये बाहुबलीके द्वारा छोड़ा हुआ पानी भरतके मुख तथा वक्षःस्थलपर पड़ता था परन्तु भरतके द्वारा छोड़ा हुआ पानी बीच में ही रह जाता था बाहुबलीके मुखतक नहीं पहुँच पाता था ।।५५।।
The stream of water cast by Lord Bharata fell short, descending far below without reaching the lofty face of Bāhubali. Though Bharata’s stature measured five hundred bows in height, Bāhubali stood still taller at five hundred and twenty-five. Thus, the water flung by Bāhubali struck Bharata’s face and chest with full force, while Bharata’s own fell harmlessly before it could ascend to his brother’s55
श्लोक ( Shlok ) 56
भरतेशः किलात्रापि न यदाप जयं तदा। बलैर्भुजबलीशस्य भूयोऽप्युद्धोषितो जयः ॥५६॥
इस प्रकार जब भरतेश्वरने इस जलयुद्धमें भी विजय प्राप्त नहीं की तब बाहुबलीकी सेनाओंने फिरसे अपनी विजयकी घोषणा कर दी ।।५६।॥
Thus, when even in the battle of water Bharateshvara could not prevail, the forces of Bahubali once again proclaimed their triumph. ||56||
श्लोक ( Shlok ) 57
नियुद्धमय सङ्गीर्य नृसिंहौ सिंहविक्रमौ । धीरावाविष्कृतस्पद्धौँ तो रङ्गमवतेरतुः ॥५७।।
अथानन्तर सिंह-के समान पराक्रमको धारण करनेवाले धीरवीर तथा परस्पर स्पर्धा करनेवाले वे दोनों नर-शार्दूल-श्रेष्ठ पुरुष बाहुयुद्धकी प्रतिज्ञा कर रंगभूमिमें आ उतरे ॥५७॥
Thereafter, those two lionhearted heroes—imbued with valor like lions, steadfast and resolute, rivals in courage—vowed to engage in combat and stepped forth upon the battlefield. ||57||
श्लोक ( Shlok ) 58
वल्गितास्फोटितै श्चित्रैः धरणैर्बन्ध पीलितैः । दोर्दर्पशालिनोरासीद् बाहुयुद्धं तयोर्महत् ॥५८॥
अपनी अपनी भुजाओंके अहंकारसे सुशोभित उन दोनों भाइयोंका, अनेक प्रकारसे हाथ हिलाने, ताल ठोकने, पैंतरा बदलने और भुजाओंके व्यायाम आदिसे बड़ा भारी बाहु युद्ध (मल्ल युद्ध) हुआ ।॥५८॥
Adorned with the pride of their mighty arms, those two brothers engaged in a fierce contest of strength, marked by varied gestures—waving hands, clapping, shifting tactics, and vigorous exercises of their limbs—thus unfolded a grand and intense battle of arms (wrestling match). ||58||
श्लोक ( Shlok ) 59
ज्वलन्मुकुटभाचक्रो हेलयोद्भ्रमितोऽमुना । लीलामलातचक्रस्य चक्री भेजे क्षणं भ्र मन् ॥५९॥
जिसके मुकुटकी दीप्तिका समूह अतिशय देदीप्यमान हो रहा है ऐसे भरतको बाहुबलीने लीला मात्रमें ही घुमा दिया और उस समय घूमते हुए चक्रवर्तीने क्षण भरके लिये अलातचक्रकी लीला धारण की थी ।।५९।।
Whose radiant crown shone with unparalleled brilliance—at that moment, Bahubali effortlessly spun Bharata around as if in a divine play; and in that fleeting instant, the sovereign assumed the majestic form of the spinning discus (Alat Chakra). ||59||
श्लोक ( Shlok ) 60
यवीयान् नृपशार्दूलं ज्यायांस जितभारतम् । जित्वाऽपि नानयद् भूमि प्रभुरित्येव गौरवात् ॥६०॥
बाहुबलीने राजाओं में श्रेष्ठ, बड़े तथा भरत क्षेत्रको जीतने वाले भरत-को जीतकर भी ‘ये बड़े हैं’ इसी गौरव से उन्हें पृथिवी पर नहीं पटका ।।।। ६० ।।
Though Bahubali, greatest among kings, victorious even over Bharata’s realm, bore the pride of his triumph, yet he did not cast him down upon the earth, exalting instead the glory that “these are the great ones.” ||60||
श्लोक ( Shlok ) 61
भुजोपरोधमुद्धृत्य स तं धत्ते स्म दोर्बली । हिमाद्रिमिव नीलाद्रिः महाकटकभास्वरम् ।।६१।।
किन्तु भुजाओं-से पकड़कर ऊंचा उठाकर कन्धेपर धारण कर लिया। उस समय भरतेश्वरको कन्धेपर धारण करते हुए बाहुबली ऐते जान पड़ते थे मानो नील गिरि ने बड़े बड़े शिखरोंसे देदीप्यमान हिमवान् पर्वतको ही धारण कर रक्खा हो ।।६१।।
Yet, seizing him firmly by the arms, Bahubali lifted Bharateshvara high and bore him upon his shoulder. In that moment, carrying Bharateshvara thus, Bahubali appeared as if Neelgiri itself, crowned with towering peaks, upheld the radiant Himalayan mountain. ||61||
श्लोक 62 से 71
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
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