आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 169
चक्रवर्ती का वैभव और समुद्र विजय
चक्रवर्ती भरत राजाओं के साथ उच्च शिविर में प्रवेश करते, जहाँ वायु उनकी सेवा करती। उनकी सेना समुद्र की तरह रत्नों, राजाओं और वैभव से युक्त थी। भरत ने समुद्र में जाकर वरतनु देव को जीता, कवच, हार, चूड़ारत्न आदि प्राप्त किए, और वैजयन्त द्वार से लौटकर शिविर में प्रवेश किया। लवण समुद्र उनकी सेवा करता, मानो मंत्री या इन्द्र की तरह, और उनकी विजय का मंगल-पाठ करता। इस प्रकार भरत ने दक्षिण समुद्र को जीता।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 162 to 169
श्लोक ( Shlok ) 162
इत्युच्चैर्व्यतिवदतां पृथग्जनानां सञ्जल्पैः क्षुभितखरोष्ट्रकौक्षकैश्च ।व्याक्रोशैर्जनितरवैश्च सैनिकानां सङ्क्षोभः क्षणमभवच्चमूषु राज्ञाम् ।।१६२॥
इस प्रकार जोर जोरसे बोलते हुए साधारण पुरुषोंकी बातचीतके शब्दोंसे, क्षोभको प्राप्त हुए गधे, ऊंट तथा बैलोंके शब्दोंसे और परस्पर बुलानेसे उत्पन्न हुए सैनिकों के कठोर शब्दोंसे राजाओंकी सेनाओंमें क्षण भरके लिये बड़ा भारी क्षोभ उत्पन्न हो गया था ।।१६२।।
Thus, a great disturbance arose in the armies of the kings, caused by the loud and harsh words of common men, the braying of donkeys, camels, and bulls in their agitation, and the harsh shouts of soldiers calling to one another. (162)
श्लोक ( Shlok ) 163
अवनिपतिसमाजेनानुयातस्तुरङ्गैः रकृशविभवयोगान्निर्जयन् लोकपालान् । प्रतिदिशमुपशृण्वन्नाशिषश्चक्रपाणिः शिबिरमविशदुच्चैर्वन्दिनां पुण्यघोषैः ॥१६३॥
घोड़ोंपर बैठे हुए अनेक राजाओंका समूह जिसके पीछे पीछे चल रहा है ऐसा वह चक्रवर्ती अपने बड़े भारी वैभव से लोकपालोंको जीतता हुआ तथा प्रत्येक दिशामें बन्दीजनोंके मंगल गानोंके साथ साथ आशी-र्वाद सुनता हुआ अपने उच्च शिविर में प्रविष्ट हुआ ।। १६३।।
Followed by a multitude of kings mounted on horses, the Chakravartin—resplendent in his immense glory—entered his lofty pavilion, having conquered the Lokapālas in all directions.
As he advanced, auspicious chants of victory and blessings from heralds resounded in every quarter. (163)
श्लोक ( Shlok ) 164
अथ सरसिजिनीनां गन्धमादाय सान्द्रं धुततटवनवीथिर्मन्दमावान् समन्तात् । श्रममखिलमनौत्सीत् कर्तु मस्योपचारं प्रहित इव सगन्धः सिन्धुना गन्धवाहः ॥१६४।।
अथानन्तर जो किनारे के वनकी पंक्तियोंको हिला रहा है ऐसा वायु कमलिनियों की उत्कट गंध लेकर धीरे धीरे चारों ओर बह रहा था और समुद्र के द्वारा भेजे हुए किसी खास सम्बन्धी के समान चक्रवर्तीके समस्त परिश्रमको दूर कर रहा था ।। १६४।।
Then, a gentle breeze began to flow on all sides, carrying the intense fragrance of the lotuses and swaying the bordering lines of forest trees.
Like a cherished messenger sent by the ocean itself, it soothed the Chakravartin, dispelling all the weariness of his labors. (164)
श्लोक ( Shlok ) 165
अविदितपरिमाणैरन्वितो रत्नशङ्खैः स्फुरितमणिशिखाग्रेभोगिभिः सेवनीयः । सततमुपचितात्मा रुद्धदिक्चक्रवालो जलनिधिमनुजहे तस्य सेनानिवेशः ॥१६५॥
उस समय वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान (पड़ाव) ठीक समुद्रका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार समुद्र प्रमाणरहित शंख और रत्नोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी प्रमाणरहित शंख आदि निधियों तथा रत्नोंसे सहित था, जिस प्रकार समुद्र, जिनके मस्तकपर अनेक रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् सर्पोंसे सेवनीय होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी, जिनके मस्तकपर अनेक मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् राजाओंके द्वारा सेवनीय था, जिस प्रकार समुद्र निरन्तर बढ़ता रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी निरन्तर बढ़ता जाता था, और जिस प्रकार समुद्र सब दिशाओंको घेरे रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी सब दिशाओंको घेरे हुए था ।।१६५॥
At that time, the encampment of the Chakravartin’s army truly resembled the ocean itself.
Just as the ocean, boundless and vast, is adorned with conch shells and precious gems, so too was the encampment, filled beyond measure with treasures and jewels.
As the ocean is served by serpents whose crests gleam with radiant jewels, so too was the encampment attended by kings whose crowns shone with resplendent gems.
As the ocean ever expands, so did the Chakravartin’s encampment continually grow; and just as the ocean surrounds all directions, his vast army too encompassed every quarter. (165)
श्लोक ( Shlok ) 166
तत्रावासितसाधनो निधिपतिर्गत्वा रथेनाम्बुधि जैत्रास्त्रप्रतितर्जितामरसभस्तं व्यन्तराधीश्वरम् । जित्वा मागधवत् क्षणाद्वरतनुं तत्सा ह्वमम्भोनिधेः द्वीपं शश्वदलञ्चकार यशसा कल्पान्तरस्थायिना ॥ १६६॥)
जिसने अपनी सेना समुद्र के किनारे ठहरा दी है और जिसने अपने विजय-शील शस्त्रोंसे मागध देवकी सभाको जीत लिया है ऐसे निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीने रथके द्वारा समुद्र में जाकर मागधदेव के समान व्यन्तरोंके स्वामी वरतनु देवको भी जीता और समुद्रके भीतर रहनेवाले उसके वरतनु नामक द्वीपको कल्पान्त कालतक स्थिर रहनेवाले अपने यश से सदाके लिये अलंकृत कर दिया ।। १६६।।
The Chakravartin, lord of treasures, who had stationed his army upon the ocean’s shore and had already conquered the assembly of the Māgadha deity with his victorious arms, now entered the sea by chariot and vanquished Vartanu Deva—ruler of the Vyantaras and equal in power to the Māgadha lord.
With his eternal glory, he adorned the island of Vartanu, dwelling within the sea, rendering it illustrious for all time, enduring until the end of the age. (166)
श्लोक ( Shlok ) 167
लेभेऽभेद्यमुरश्छदं वरतनोग्रैवेयकं च स्फुरच्चूडारत्नमुदंशु दिव्यकटकान्सूत्रं च रत्नोज्ज्वलम् । सद्रत्नैरिति पूजितः स भगवान् श्रीवैजयन्तार्णव-द्वारेण प्रतिसन्निवृत्य कटकं प्राविक्षदुत्तोरणम् ॥ १६७॥
भरते ने वरतनु देवसे कभी न टूटनेवाला कवच, देदीप्यमान हार, चमकता हुआ चूड़ारत्न, दिव्य कड़े और रत्नोंसे प्रकाशमान यज्ञोपवीत इतनी वस्तुएं प्राप्त कीं । तदनन्तर उत्तम रत्नोंसे जिसकी पूजा की गई है ऐसे ऐश्वर्यशाली भरतने वैजयन्त नामक समुद्र के द्वार से वापिस लौटकर अनेक प्रकार के तोरणोंसे सुशोभित किये गये अपने शिविरमें प्रवेश किया ।।१६७।।
From Vartanu Deva, Bharata obtained a set of divine treasures: an unbreakable armor, a radiant necklace, a gleaming crest-jewel, celestial armlets, and a sacred thread shining with precious gems.
Thereafter, the illustrious Bharata—worshipped with the finest jewels—returned from the ocean’s gateway named Vaijayanta, and entered his pavilion adorned with splendid arches and festooned with many kinds of ornamental gateways. (167)
श्लोक ( Shlok ) 168
स्वच्छं स्व हृदयं स्फुटं प्रकटयन्मुक्ताफलच्छद्मना स्वं चान्तर्गतरागमाशु कथयन्नुद्यत्प्रवालाङ्कुरैः । सर्वस्वं च समर्पयन्नुपन’ यन्नन्तर्वणं दक्षिणो वारां राशिरमात्यवद्विभुमसौ निर्व्याजमाराधयत् ॥१६८।।
उस समय वह दक्षिण दिशा का लवण समुद्र ठीक मंत्रीकी तरह छलरहित हो भरतकी सेवा कर रहा था, क्योंकि जिस प्रकार मंत्री अपने स्वच्छ हृदयको प्रकट करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी मोतियोंके छलसे अपने स्वच्छ हृदय (मध्यभाग) को प्रकट कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपने अन्तरङ्गका अनुराग (प्रेम) प्रकट करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी उत्पन्न होते हुए मूंगाओंके अंकुरोंसे अपने अन्तरङ्गका अनु-राग (लाल वर्ण) प्रकट कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपना सर्वस्व समर्पण कर देता है उसी प्रकार समुद्र भी अपना सर्वस्व (जल) समर्पण कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपना गुप्त धन उनके समीप रखता था उसी प्रकार वह समुद्र भी अपना गुप्त धन (मणि आदि) उनके समीप रख रहा था, और जिस प्रकार मंत्री दक्षिण (उदार सरल) होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी दक्षिण (दक्षिणदिशावर्ती) था ।।१६८।।
At that time, the southern salt-ocean served Bharata like a loyal minister, without deceit.
Just as a minister reveals the purity of his heart, so too did the ocean reveal its clear depths through the sparkle of its pearls.
As a minister discloses his inner affection, so did the ocean reveal its love through the coral sprouts rising within its bosom.
As a minister offers all he possesses, the ocean too poured forth all its waters in service.
As a minister lays his secret treasures before his master, so did the ocean offer its hidden gems and jewels.
And just as a minister is dakṣiṇa—generous and sincere—so too was the ocean dakṣiṇa—belonging to the southern direction. (168)
श्लोक ( Shlok ) 169
आस्थाने जयदुन्दुभीननु नदन् प्राभातिके मङ्गले गम्भीरध्वनितैर्जयध्वनिमिव प्रस्पष्टमुच्चारयन् । सुव्यक्तं स जलाशयोऽप्यजल धीर्वाराम्पतिः श्रीपति निर्भृत्य स्थितिरन्वियाय सुचिरं शक्रो यथाद्यं जिनम् ll169 ll
अथवा जिस प्रकार इन्द्र दास होकर अनन्त चतुष्ट्यरूप लक्ष्मीके स्वामी प्रथम जिनेन्द्र भगवान् वृषभदेवकी सेवा करता था उसी प्रकार वह समुद्र भी दास होकर राज्यलक्ष्मीके अधिपति भरत चक्रधरकी सेवा कर रहा था, क्योंकि जिस प्रकार इन्द्र आस्थान अर्थात् समवसरण सभामें जाकर विजय-दुन्दुभि बजाता था उसी प्रकार वह समुद्र भी भरतके आस्थान अर्थात् सभामण्डपके समीप अपनी गर्जनासे विजय-दुन्दुभि बजा रहा था, जिस प्रकार इन्द्र प्रातःकालके समय पढ़े जानेवाले मंगल-पाठके लिये जय जय शब्दका उच्चारण करता था उसी प्रकार वह समुद्र भी प्रातःकालके समय पढ़े जानेवाले भरतके मंगल-पाठके लिये अपने गंभीर शब्दोंसे जय जय शब्दका स्पष्ट उच्चारण कर रहा था, जिस प्रकार इन्द्र जलाशय (जडाशय) अर्थात् केवल ज्ञानकी अपेक्षा अल्प ज्ञानी होकर भी अपने ज्ञानकी अपेक्षा अजलधी (अजड़धी) अर्थात् विद्वान् (अजड़ा धीर्यस्य सः) अथवा अजड (ज्ञानपूर्ण प्रमात्मा) का ध्यान करनेवाला (अजड़ ध्यायतीत्यजडधीः) था उसी प्रकार वह समुद्र भी जलाशय अर्थात् जलयुक्त होकर भी अजलधी अर्थात् जल प्राप्त करनेकी इच्छासे (नास्ति जले धीर्यस्य सः) रहित था, इस प्रकार वह समुद्र चिरकाल तक भरतेश्वरकी सेवा करता रहा ।। १६९।।
Indeed, just as Indra once served as a humble attendant to Lord Ṛṣabhadeva—the first Jina and master of infinite fourfold prosperity—so too did the ocean, as a devoted servant, render homage to Bharata, the wielder of the chakra and lord of royal fortune.
As Indra would enter the samavasaraṇa assembly and sound the drums of victory, so did the ocean, near Bharata’s royal pavilion, resound with its thunderous waves as if proclaiming triumph.
As Indra uttered cries of “Jaya! Jaya!” during the auspicious morning rites, so too did the ocean, in its deep and solemn voice, chant “Victory! Victory!” at dawn, to bless Bharata’s sacred rituals.
Just as Indra, though less than omniscient, turned his mind toward the Ajada-dhī—the Enlightened One full of pure knowledge—so too did the ocean, though filled with water (jalāśaya), yearn for the Ajaladhi—he who transcends the fluid realm, steady and wise.
In this manner, the ocean remained in ceaseless service to King Bharata for all time. (169)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसङ्ग्रहे दक्षिणार्णवद्वारविजयवर्णनं नामैकोनत्रिशं पर्व ।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भावानुवादमें दक्षिण समुद्रके द्वारके विजयका वर्णन करनेवाला उनतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
Thus ends the twenty-ninth canto, describing the conquest of the gateway of the southern ocean, in the Bhāvānuvāda (expressive rendering) of the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa-saṅgraha, composed by the revered Ācārya Bhagavajjinasena.
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन
पर्व 30 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161