आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 72 युद्ध की तैयारी
अर्ककीर्ति ने सेनापति को बुलाकर युद्ध का ऐलान किया और भेरी बजवाई। उसकी सेना में हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक तैयार हो गए। कोलाहल और शस्त्रों की ध्वनि से वातावरण भयंकर हो गया, मानो प्रलयकाल आ गया हो। अर्ककीर्ति ने युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 62 to 72
श्लोक ( Shlok )62
जयोऽप्येवं समुत्सिक्तस्तत्पट्टेन च मालया । प्रतिस्वं लब्धरन्धो मां करोत्यारम्भकम्पुरा ॥६२॥
यह जयकुमार भी पहले वीरपट्ट बांधनेसे और अब मालाके पड़ जानेसे बहुत ही अभिमानी हो रहा है। यह छिद्र पाकर पहलेसे ही मेरे लिये कुछ न कुछ आरम्भ करता ही रहता है ॥६२॥
This Jayakumāra—swollen now with pride, first from the binding of the hero’s girdle and now from the placing of the garland—grows ever more arrogant.Ever watchful for such openings, he seizes every chance to act against me, plotting without cease since times past.62
श्लोक ( Shlok )63
समूलतूलमुच्छिद्य सर्वद्विषममुंयुधि । अनुरागं जनिष्यामि राजन्यानां मयि स्थिरम् ॥६३॥
यह सबका शत्रु है इसलिये युद्धमें इसे आमूलचूल नष्टकर सब राजाओंका स्थिर प्रेम अपनेमें ही उत्पन्न करूंगा ।।६३॥
He is the enemy of all—Therefore shall I utterly uproot him in battle, leaving not a trace behind.Thus shall I win for myself the enduring loyalty and affection of all the assembled kings.63
श्लोक ( Shlok )64
द्विधा भवतु वा मा वा बलं ते न किमाशुगाः । मालां प्रत्यानयिष्यन्ति जयवक्षो विभिद्य मे ॥६४।।
सेना फूटकर दो भागोंमें विभक्त हो जाय अथवा न भी हो, उससे मुझे क्या ? मेरे वाण ही जयकुमारका वक्षःस्थल भेदनकर वरमालाको ले आवेंगे । ॥६४॥
Let the army be riven in twain—or remain whole; what care have I for that?It is my arrows that shall cleave the breast of Jayakumāra and bear back the garland of victory.64
श्लोक ( Shlok )65
नाहं सुलोचनार्थ्यस्मि मत्सरी मच्छरैरयम् । “परासुरधुमैव स्यात् किं मे विधवया त्वया ॥६५॥
में सुलोचनाको भी नहीं चाहता क्योंकि सबसे ईर्ष्या करनेवाला यह जयकुमार मेरे वाणोंसे अभी ही मर जावेगा तब उस विधवासे मुझे क्या प्रयोजन रह जावेगा ॥६५॥
I seek not even Sulochanā—For this Jayakumāra, consumed by envy of all, shall fall this very moment beneath my arrows.And once he lies slain, what need shall I have for a widow?65
श्लोक ( Shlok )66
दुराचारनिषेधेन त्रयं धर्मादि वर्धते । कारणे सति कार्यस्य किं हानिर्दृश्यते क्वचित् ॥६६॥
दुराचारका निषेध करनेसे धर्म आदि तीनों बढ़ते हैं, क्योंकि कारणके रहते हुए क्या कहीं कार्यकी हानि देखी जाती है ? ॥६६॥
By restraining unrighteous conduct, the triad of Dharma, Artha, and Kāma is upheld and nourished—For when the root cause remains intact, where indeed is the peril to its rightful fruits?66
श्लोक ( Shlok )67
व्ययो मे विक्रमस्यास्तां शरस्याप्यत्र न व्ययः । वधे प्रत्युत धर्मः स्याद् दुष्टस्यांहः कुतो भवेत् ॥६७॥
इस काममें मेरे पराक्रमका नाश होना तो दूर रहा मेरा एक बाण भी खर्च नहीं होगा बल्कि दुष्टके मारनेमें धर्म ही होगा, पाप कहांसे होगा ? ॥६७॥
Far from demanding the full measure of my valour, this task shall not even cost me a single arrow—For in the slaying of the wicked lies the fulfillment of Dharma.Whence, then, can sin arise?67
श्लोक ( Shlok )68
कीर्तिर्विख्यातकीर्तेर्मे नार्क कीर्ते र्विनङ्क्ष्यति । अकीर्तिरनिवार्या स्यात् न्यायस्यानिषेधनात् ॥६८॥
ऐसा करनेसे प्रसिद्ध कीर्तिवाले मुझ अर्ककीर्तिकी कीर्ति भी नष्ट नहीं होगी परन्तु हां, यदि इस अन्यायका निषेध नहीं करता हूँ तो किसीसे निवारण न करने योग्य मेरी अपकीर्ति अवश्य होगी ॥६८॥
By acting thus, the fame I bear—renowned as I am, Arkakīrti—shall not be stained in the least.But should I refrain from opposing this injustice, then surely shall there arise an infamy upon me—one that no effort may ever erase.68
श्लोक ( Shlok )69
तस्य” मेऽयशसः कीर्तेर्भवद्भिर्यदुदाहृतम् । भवेत्तत्सत्यसंवादि’ शीतकोऽस्म्यत्र यद्यहम् ॥६९॥
तुमने जो मेरी अपकीति और उसकी कीर्ति होनेका उदाहरण किया है सो यदि में इस विषयमें ठंडा हो जाऊं तो यह आपका निरूपण सत्य हो सकता है ।। ६९।।
You spoke of my infamy and his rising fame—That portrayal of yours may hold truth, but only if I were to grow cold and idle in this matter.So long as I act, your judgment stands void.69
श्लोक ( Shlok ) 70
यूयभाध्वं ततस्तूष्णीमुष्णकोऽहभिदं प्रति । धर्म्यमर्थ्य यशस्यं च मा निषेधि’ हितैषिभिः ॥७०॥
इसलिये तुम लोग चुप बैठो, मैं इस कार्य में उष्ण हूँ-क्रोधसे उत्तेजित हूँ । हित चाहनेवालोंको धर्म, अर्थ तथा यश बढ़ाने वाले कार्योंका कभी निषेध नहीं करना चाहिये ॥७०॥
Therefore, let all of you be silent—For I burn with wrath and stand resolved in this cause.Those who truly seek my welfare must never hinder deeds that uphold Dharma, enrich Artha, and exalt my honour. 70
श्लोक ( Shlok ) 71 – 72
एवं मन्त्रिणमुल्लङ्घय कुधीर्वा दुर्ग्रहाहितः । सेनापतिं समाहूय प्रत्यासन्नपराभवः ॥७१॥कथयित्वा महीशानां सर्वेषां रणनिश्चयम् । भेरीमास्फालयाभास जगत्त्रयभयप्रदाम् ॥७२॥
इस प्रकार जिसका पराभव निकट है और जो खोटे हठसे युक्त है ऐसे दुर्बुद्धि अर्ककीतिने मंत्रीका उल्लंघन कर सेनापतिको बुलाया और सब राजाओंसे युद्धका निश्चय कहकर तीनों लोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली भेरी बजवाई ।।७१-७२।।
Thus did Arkakīrti—of perverted mind and doomed to imminent ruin—spurning the counsel of his wise minister, summon the commander of his army.With proud defiance, he declared war upon all the assembled kings and had the war-drum sounded—its thunder striking fear into the hearts of the three worlds.71 – 72
श्लोक 73 से 81
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61