आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301
श्लोक 302 से 311 सुलोचना का जयकुमार की ओर अग्रसर होना
महेंद्रदत्त कंचुकी ने रथ को विद्याधर राजाओं की ओर ले जाकर नमि, विनमि, सुनमि, सुविनमि आदि का परिचय दिया। सुलोचना ने सबको छोड़ आगे बढ़ी। विद्याधर आशा में बैठे रहे। रथ भूमिगोचरियों की ओर उतरा। सुलोचना, कोयल की तरह, अर्ककीर्ति आदि को छोड़ जयकुमार के पास पहुँची। कंचुकी ने जयकुमार का गुण-वर्णन प्रारंभ किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 302 to 311
श्लोक ( Shlok ) 302
दक्षिणोत्तरयोः श्रेण्योर्नमेश्च विनमेः सुतौ । पतिः सुमतिरेषोऽयमितः सुविनमिः श्रियः ॥३०२॥
और सुलोचनासे कहने लगा कि ये विजयार्धकी दक्षिण तथा उत्तर श्रेणीके राजा नमि और विनमिके पुत्र हैं। यह लक्ष्मीका स्वामी सुनमि हैं और यह इस ओर सुविनमि हैं ।॥३०२॥
And he spoke to Sulochanā, saying: “These are the princes of the southern and northern lineages of Vijaya—sons of Nami and Vinami. This one, to the right, is Sunami, lord of Lakṣmī; and that one, to the left, is Suvinami.” ॥302॥
श्लोक ( Shlok ) 303
अन्येऽमी व खगाधीशा विद्याविक्रमशालिनः । पतिं वृणीष्व त्वं चैषु ‘स्वेच्छामेकत्र पूरय ॥३०३॥
विद्या और पराक्रमसे शोभायमान ये और भी अनेक विद्याधरोंके अधिपति विराजमान हैं इनमेंसे तू किसी एकको वर अर्थात् पतिरूपसे स्वीकार कर और एक हीमें अपनी इच्छा पूर्ण कर ॥ ३०३॥
Adorned with brilliance born of knowledge and valour, here sit many other sovereigns of the Vidyādharas. Among them, choose one as thy lord and fulfil thy heart’s desire in a single, noble choice. ॥303॥
श्लोक ( Shlok ) 304
इति कञ्चुकिनिदिष्टं नामादाय पृथक् पृथक् । कर्णे कृत्यात्ययात् सर्वान् रुचिश्चित्रा हि देहिनाम् ॥३०४॥
इस प्रकार कंचुकीने अलग अलग नाम लेकर जो कुछ कहा था उसे कानमें डालकर-सुनकर वह सबको छोड़ती हुई आगे चली सो ठीक ही है क्योंकि प्राणियोंकी रुचि अनेक प्रकारकी होती है ॥ ३०४।।
Thus, having heard the chamberlain speak each name aloud in turn, she moved past them all and walked onward—rightly so, for the inclinations of living beings are manifold and ever varied. ॥304॥
श्लोक ( Shlok ) 305
पश्चात् सर्वानिरीक्ष्यैषा कञ्चित्तु विवरीषते । तथैवेति खगास्तस्थुः कि वाशानावलम्बते ॥३०५॥
यह कन्या सबको देखकर बादमें किसीको वरना चाहती है यह विचारकर विद्याधर लोग ज्योंके त्यों बैठे रहे सो ठीक ही है क्योंकि आशा किसका आश्रय नहीं लेती है ? ॥३०५।।
Observing that the maiden, though beholding them all, wished to choose her lord only after passing each by, the Vidyādhara kings remained seated as they were—rightly so, for upon whom does hope not take refuge? ॥305॥
श्लोक ( Shlok ) 306
पश्चाज्ज ग्लुर्मुखाब्जानि तद्रथाद् व्यकसन्पुरः । रवेरिवोदय राज्ञां संसृतेः स्थितिरीदृशी ।।३०६।॥
जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेसे कमल विकसित हो जाते हैं और अस्त होनेसे मुरझा जाते हैं उसी प्रकार राजाओं के मुखरूपी कमल सुलोचनाके रथ सामने आनेसे पहले तो प्रफुल्लित हुए किन्तु रथके चले जानेपर बादमें मुरझा गये थे सो ठीक ही है क्योंकि संसारकी स्थिति ही ऐसी है ॥३०६।।
Just as the rising sun causes lotuses to bloom and its setting brings their fading, even so did the lotus-like faces of the kings blossom with delight as Sulochanā’s chariot approached, only to wither in gloom once it passed them by. And rightly so—for such is the fleeting nature of all things in this world. ॥306॥
श्लोक ( Shlok ) 307
उच्चाद्वाऽदुद्रुव “निम्नमभिभूमि”चरं रथः। कञ्चुकी कथयामास नामभिस्तान्नृ पांस्तदा ॥ ३०७।।
तदनन्तर वह रथ विद्याधरोंकी ऊंची भूमिसे नीचे भूमिगोचरियोंकी ओर उतरा, उस समय वह कञ्चुकी नाम ले लेकर राजाओंका निरूपण करता जाता था ॥ ३०७॥
Thereafter, the chariot descended from the lofty terrace of the Vidyādharas to the lower ground where the mortal kings were assembled. And as it moved, the chamberlain continued to proclaim each monarch’s name, describing their virtues one by one. ॥307॥
श्लोक ( Shlok ) 308
निराकृत्यार्क कीर्त्यादीन् साऽजेया जयमागमत् । हित्वा शेषान् द्रुमांश्चूतं मधौ मधुकरी यथा ॥३०८॥
जिस प्रकार वसन्तऋतुमें कोयल सब वृक्षों को छोड़कर आमके पास पहुंचती है उसी प्रकार वह अजेय सुलोचना अर्ककीर्ति आदि राजाओंको छोड़कर जयकुमारके पास जा पहुंची ॥ ३०८ ॥
Just as the koel, in springtime, forsakes all other trees and alights upon the mango bough, even so did the unconquerable Sulochanā pass by Arkkakīrti and the other kings, and come at last to stand before Prince Jaya. ॥308॥
श्लोक ( Shlok ) 309
गृहीतप्रग्रहस्तत्र” कञ्चुकीचित्तवित्तदा । वचो व्यापारयामास जयव्यावर्णनं प्रति ॥३०९॥
उसी समय चित्तकी बातको जाननेवाला कंचुकी घोड़ोंकी रास पकड़कर जयकुमारका वर्णन करनेके लिये अपने वचनोंको व्यापृत करने लगा अर्थात् जयकुमारके गुणोंका वर्णन करने लगा ॥३०९।।
At that very moment, the chamberlain—knower of the heart’s intent—took hold of the reins and, turning his words to Prince Jaya, began to extol his virtues, letting his speech be filled with the noble qualities of the prince. ॥309॥
श्लोक ( Shlok ) 310
प्रदीपः स्वकुलस्यायं प्रभुः सोमप्रभात्मजः । श्रीमानुत्साहभेदैर्वा जयोऽयमनुजैर्वं तः ॥३१०॥
उसने कहा कि यह श्रीमान् स्वामी जयकुमार है, यह अपने कुल का दीपक है, महाराज सोमप्रभ का पुत्र है और उत्साहके भेदोंके समान अपने छोटे भाइयोंसे आवृत है-घिरा हुआ है ।।३१०।।
He proclaimed: “This illustrious lord is Prince Jaya, the radiant light of his lineage, the noble son of King Somaprabha, and—like the many forms of valour itself—he is surrounded by his younger brothers on all sides.” ॥310॥
श्लोक ( Shlok ) 311
न रूपमस्य व्यावर्ण्य तदेतदति मन्मथम्। स दर्पणोऽर्पणीयः किं करकङ्कणदर्शने ॥३११॥
कामदेवको तिरस्कृत करनेवाला इसका यह रूप तो वर्णन करने योग्य ही नहीं है क्योंकि हाथ का कंकण देखनेके लिये क्या दर्पण दिया जाता है ? ॥३११।।
This form of his, which casts even Kāma to scorn, is beyond the need of description—for who offers a mirror to behold the bracelet upon one’s own hand? ॥311॥
श्लोक 312 से 321
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301
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