आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 66
नदियों और पर्वतों पर विजय
भरत की सेना शोण, नर्मदा, यमुना आदि नदियों और ऋष्यमूक, माल्य जैसे पर्वतों को पार करती है। सैनिक जंगली हाथियों को वश में करते हैं और नदियों को चौड़ा करते हैं। उनकी सेना विशाला, सिन्धु, शिप्रा आदि अनेक नदियों को घेरकर विजय पताका फहराती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 52 to 66
श्लोक ( Shlok ) 52 – 53
दक्षिणेन नदं शोणमुत्तरेण च नर्मदाम् । बीजानदीमुभयतः परितो मेखलानदीम् ॥५२॥
विचेरुः स्वखुरोद्धूतधूलीसंरुद्धदिद्मुखाः । “जविनोऽस्य स्फुरत्प्रोथा जयसाधनवाचिनः ॥५३॥
जिन्होंने अपने खुरोंसे उठी हुई धूलि से समस्त दिशायें भर दी हैं, जो बड़े वेगशाली हैं और जिनके नथनें चंचल हो रहे हैं ऐसे महाराज भरत की विजयी सेना के घोड़े शोण नामके नद की दक्षिण ओर, नर्मदा नदी की उत्तर ओर, वीजा नदी के दोनों ओर और मेखला नदीके चारों ओर घूमे थे ।। ५२-५३।।
“The horses of Emperor Bharata’s victorious army, whose hooves raised clouds of dust that filled all the directions, swift and vigorous, with their nostrils flaring in restlessness, roamed to the south of the Shona river, to the north of the Narmada, on both banks of the Vija river, and around the four corners of the Mekhala river.” (Verses 52-53)
श्लोक ( Shlok ) 54
औदुम्बरी च पनसां तमसां प्रमृशामपि । पपुरस्य द्विपाः शुक्तिमतीं च यमुनामपि ॥५४॥
भरत के हाथियों ने उदुम्बरी, पनसा, तमसा, प्रमृशा, शुक्तिमती और यमुना नदीका पान किया था ॥५४॥
“The elephants of Bharata drank from the Udumbari, Pansa, Tamsa, Pramrisha, Shuktimati, and Yamuna rivers.” (Verse 54)
श्लोक ( Shlok ) 55
चेदिपर्वत मुल्लङ्घच चेदिराष्ट्र विजिग्यिरे । पम्पा सरोऽम्भोऽतिगमा विभोरस्य तुरङ्गमाः ।५५
चक्रवर्ती के घोड़ों ने पम्पा सरोवर के जल को पार किया था तथा चेदि नामके पर्वत को उल्लंघन कर चेदि नामके देशको जीता था ॥५५॥
“The horses of the Chakravartin crossed the waters of the Pampa lake and, by surmounting the mountain of Chedi, conquered the land of Chedi.” (Verse 55)
श्लोक ( Shlok ) 56
तमृष्यमूकमाक्रम्य कोलाहलगिरं श्रिताः । प्राङ्माल्यगिरिमासेदुर्जयिनोऽस्य जयद्विपाः ॥५६॥
सबको जीतनेवाले भरतके विजयी हाथी ऋष्यमूक पर्वतको उल्लंघन कर कोलाहल पर्वत तक जा पहुंचे थे और फिर माल्य पर्वतके पूर्व भागके समीप भी जा पहुंचे थे ।।५६।।
“The victorious elephants of Bharata, the conqueror of all, crossed the Rishyamuka mountain, reached the tumultuous peaks of Kolahala, and then advanced to the eastern slopes of the Malya mountain.” (Verse 56)
श्लोक ( Shlok ) 57
नागप्रियाद्रिमाक्रम्य “कुतपावज्ञया विभोः । सेनाचराः स्वसाच्चक्रुर्गजांश्चेदिक कूशजान् ॥५७।।
भरतकी सेनाके लोगोंने लीलापूर्वक नागप्रिय पर्वतको उल्लंघन कर चेदि और ककूश देशमें उत्पन्न हुए हाथियों को अपने आधीन कर लिया था ।॥ ५७।।
“The people of Bharata’s army, with great ease, crossed the Nagapriya mountain and brought under their control the elephants born in the lands of Chedi and Kakusha.” (Verse 57)
श्लोक ( Shlok ) 58
नदीं वृत्रवतीं क्रान्त्वा वन्येभक्षतरोधसम् । भेजुश्चित्रवतीमस्य चमूवीरास्तुरङ्गमैः ॥५८॥
उनकी सेनाके वीर पुरुष घोड़ोंके द्वारा क्षत्रवती नदीको पार कर जिसके किनारे जंगली हाथियों से खूंदे गये हैं ऐसो चित्रवती नदीको प्राप्त हुए थे ॥ ५८।।
“The valiant men of their army, riding horses, crossed the Kshatravati river, whose banks were trampled by wild elephants, and reached the banks of the Chitravati river.” (Verse 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
रुद्ध्वा माल्यवतीतीरवनं वल्येभसङ्कुलम । यामुनं च पयः पीत्वा जिग्युरस्य द्विषा दिशः ॥५९॥
जंगली हाथियोंसे भरे हुए माल्यवती नदी के किनारे के वन को घेरकर तथा यमुना नदी का पानी पीकर भरतके हाथियों ने उस ओर की समस्त दिशाएं जीत ली थीं ।।५९।।
“Surrounding the forests along the banks of the Malyavati river, filled with wild elephants, and drinking the waters of the Yamuna, Bharata’s elephants had conquered all the regions to the east.” (Verse 59)
श्लोक ( Shlok ) 60
अनुवेणुमतीतीरं गत्वास्य जयसाधनम् । वत्सभूमिं समाक्रम्य दशार्णामप्यलङ्घयत् ॥६०॥
उनकी विजयी सेनाने वेणुमती नदीके किनारे किनारे जाकर वत्स देशकी भूभिपर आक्रमण किया और फिर दशार्णा (धसान) नदीको भी उल्लंघन किया- पार किया ।।६०।।
“Their victorious army advanced along the banks of the Venumati river and launched an assault upon the land of Vatsa, then crossed and surmounted the Dasharna (Dhasan) river.” (Verse 60)
श्लोक ( Shlok ) 61
विशालां नालिकां सिन्धु परां निष्कुन्दरीमपि । बहुवज्रां च रम्यां च नदीं सिकतिनीमपि ॥ ६१।।
ऊहां च समतोयां च कञ्जामपि कपीवतीम् । निविन्ध्यां च धुनीं जम्बूमतीं च सरिदुत्तमाम् ॥ ६२॥
वसुमत्यापगामब्धिगामिनीं शर्करावतीम् । सिप्रा च कृतमालां च परिञ्जां पनसामपि ॥६३॥
नदीमवन्तिकामां च हस्तिपानीं च निम्नगाम् । कागन्धुमापगां व्याघ्रीं धुनीं चर्मण्वतीमपि ।। ६४।।
शतभोगां च नन्दां च नदीं करभवेगिनीम् । चुल्लितापीं च रेवां च सप्तपारां च कौशिकीम् ॥६५॥
सरितोऽमूरगाधापा विश्वगारुद्ध्य तद्बलम् । तुरङगमखुरोत्खाततीरा विस्तारिणीर्व्यधात् ॥६६॥
भरतकी सेनाने विशाला, नालिका, सिन्धु, पारा, निःकुन्दरी, बहुवज्रा, रम्या, सिकतिनी, कुहा, समतोया, कंजा, कपीवती, निविन्ध्या, नदियोंमें श्रेष्ठ जम्बूमती, वसुमती, समुद्र तक जानेवाली शर्करावती, शिप्रा, कृतमाला, परिजा, पनसा, अवन्तिकामा, हस्तिपानी, कागंधुनी, व्याधी, चर्मण्वती, शतभागा, नन्दा, करभवेगिनी, चुल्लितापी, रेवा, सप्तपारा, और कौशिकी इन अगाध जलसे भरी हुई नदियोंको चारों ओरसे घेरकर जिनके किनारे घोड़ोंके खुरोंसे खुद गये हैं ऐसी उन नदियोंको बहुत चौड़ा कर दिया था ।। ६१-६६।।
“The army of Bharata, encircling the rivers — Vishala, Nalika, Sindhu, Para, Nikundari, Bahuvajra, Ramya, Sikatini, Kuha, Samtoya, Kanja, Kapivati, Nividhya, the supreme Jambumati, Vasumati, the Sugary river leading to the sea, Shilpra, Krutmala, Parija, Pansa, Avantika, Hastipani, Kagandhuni, Vyadhi, Charmanvati, Shatbhaga, Nanda, Karabhavagini, Chullitapi, Reva, Saptapara, and Kaushiki — all of which were filled with deep, tumultuous waters, their banks trampled by the hooves of horses, widened the rivers considerably.” (Verses 61-66)
श्लोक 67 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41