आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
इत्यनङ्गातुरा काचित् सन्दिशन्ती सखीं मिथः । भुजोपरोधमाश्लेषि पत्या प्रत्यग्रखण्डिता ॥२०२॥
इस प्रकार कामदेवसे पीड़ित होकर कोई स्त्री अपनी सखीसे संदेश कह ही रही थी कि इतनेमें उस नवीन विरहिणी स्त्रीको पास ही छिपे हुए उसके पतिने दोनों भुजाओंसे पकड़कर परस्पर आलिंगन किया ॥ २०२॥
Thus, while the lovelorn young woman, tormented by Kāma, was still uttering her message to her confidante, lo! her husband—who had been hidden nearby—suddenly clasped her in a close embrace with both his arms.202
श्लोक ( Shlok ) 203
राज्ये मनोभवस्यास्मिन् स्वैरं रंरम्यतामिति । कामिनीकलकाञ्चीभिरुदघोषोव घोषणा ॥२०३॥
उस समय मनोहर शब्द करती हुई स्त्रियोंकी करधनियां मानो यही घोषणा कर रही थीं कि आप लोग कामदेव-के इस राज्यमें इच्छानुसार क्रीड़ा करो ॥ २०३॥
At that moment, the melodious tinkling of the girdles adorning the women seemed to proclaim aloud: “O all of you! Sport and revel freely as you please in this sovereign realm of Kāma!”203
श्लोक ( Shlok ) 204
कर्णोत्पलनिलीनालिकुलकोलाहलस्वनैः । उपजेपे किमु स्त्रीणां कर्णजाहे मनोभुवा ॥२०४॥
उन स्त्रियोंके कर्णफूलके कमलोंमें छिपे हुए भ्रमरोंके समूह कोलाहल कर रहे थे और उससे ऐसा जान पड़ता था कि कामदेव स्त्रियोंके कानों के समीप लगकर कुछ गुप्त बातें ही कर रहा हो ॥२०४।।
The swarms of bees hidden within the lotus-shaped earrings of those women were humming aloud, so that it seemed as though Kāma himself were whispering secret words into the ears of the fair ones.204
श्लोक ( Shlok ) 205
स्तनाङ्गरागसम्मर्दी परिरम्भोऽतिनिर्दयः । ववृधे कामिवृन्देषु रभसश्च कचग्रहः ॥२०५।।
उस समय कामी लोगोंके समूहमें स्त्रियोंके स्तनोंपर लगे हुए लेपको मर्दन करनेवाला और अत्यन्त निर्दय आलिंगन वढ़ रहा था तथा वेगपूर्वक केशोंकी पकड़ा-पकड़ी भी बढ़ रही थी । २०५।।
t that time, among the throngs of passionate lovers, fierce embraces grew ever more intense, pressing the unguents smeared upon the breasts of the women, while the impetuous grasping and tugging of hair increased without restraint.205
श्लोक ( Shlok ) 206
आरक्तकलुषा दृष्टिर्मुखमापार्ट लाधरम् । रतान्ते कामिनामासीत् सीत्कृतं वाऽसकृत्कृतम् ॥२०६॥
संभोगके बाद कामी लोगोंके नेत्र कुछ कुछ लाल और कलुषित हो गये थे, मुख कुछ कुछ गुलाबी अधरोंसे युक्त हो गया था तथा उससे सी सी शब्द भी बार बार हो रहा था ॥ २०६॥
After union, the eyes of the passionate ones had turned slightly red and clouded, their faces bore the tint of lips flushed with love, and from their mouths arose again and again a faint sighing sound—sī sī—soft and weary.206
श्लोक ( Shlok ) 207
पुष्पसम्मर्दसुरभिरास्त्रस्तजघनांशुकाम् । सम्भोगावसतौ शय्या मियुनान्यधिशेरत ॥२०७॥
संभोग-क्रियाके समाप्त होनेपर स्त्री और पुरुष दोनों ही उस शय्यापर सो गये जो कि फूलोंके संमर्दसे सुगन्धित हो रही थी और जिसपर खुलकर अधोवस्त्र पड़े हुए थे ॥२०७॥
Upon the consummation of their union, both woman and man sank into slumber upon that bed, fragrant from the gentle pressing of flowers and adorned with garments loosely cast aside. 207
श्लोक ( Shlok ) 208
कैश्चिद् वीरभटैर्भाविरणारम्भकृतोत्सवैः । प्रियोपरोधान्मन्देच्छैरप्यासेवि रतोत्सवः ॥२०८॥
जिन्हें होनेवाले युद्धके प्रारम्भमें बड़ा आनन्द आ रहा था ऐसे कितने ही शूरवीर योद्धाओंने इच्छा न रहते हुए भी अपनी प्यारी स्त्रियोंके आग्रहसे संभोग सुखका अनुभव किया था ॥२०८॥
Many a valiant warrior, on the brink of battle and filled with joy for the coming strife, yet unwilling, had nevertheless yielded to the entreaties of their beloved wives and partaken in the pleasures of union.208
श्लोक ( Shlok ) 209
केचित् कीर्त्यङ्गनासङ्गमुखसङ्गकृतस्पृहाः । प्रियाङ्गनापरिष्वङ्गम् ङ्गीचक्रुर्न मानिनः ॥ २०९॥
कीतिरूपी स्त्री के समागमसे उत्पन्न होनेवाले सुखमें जिनकी इच्छा लग रही है ऐसे कितने ही मानी योद्धाओं ने अपनी प्यारी स्त्रियोंका आलिंगन स्वीकार नहीं किया था ॥ २०९।।
Amidst the bliss born of union with the Kīti-like woman, many a valorous warrior, though inclined, refrained from embracing their beloved wives.209
श्लोक ( Shlok ) 210
निर्जितारिभटैर्भोग्या प्रिया मास्माभिरन्यथा । इति जातिभटाः केचिन्न भेजु शयनान्यपि ॥२१०॥
‘जब हम लोग शत्रुके योद्धाओंको जीत लेंगे तभी प्रियाका उपभोग करेंगे अन्यथा नहीं’ ऐसी प्रतिज्ञा कर कितने ही स्वाभाविक शूरवीर शय्याओंपर ही नहीं गये थे ॥ २१०।।
“Only when we have vanquished the enemy warriors shall we indulge in our beloveds; until then, never.” Thus vowed many a resolute hero, who therefore refrained from retiring to their beds.210
श्लोक ( Shlok ) 211
शरतल्पगतानल्प सुखसङ्कल्पतः परे । नाभ्यनन्दन् प्रियातल्पमनल्पेच्छा भटोत्तमाः ॥२११॥
बड़ी बड़ी इच्छाओंको धारण करने-वाले कितने ही उत्तम शूरवीरोंने बाणोंकी शय्यापर सोनेसे प्राप्त हुए भारी सुखका संकल्प किया था इसलिये ही उन्होंने प्यारी स्त्रियोंकी शय्यापर सोना अच्छा नहीं समझा था ।।२११॥
Bearing mighty desires within their hearts, many noble warriors resolved that the profound bliss attained upon the bed of arrows far surpassed that of resting beside their beloved wives; thus, they deemed it better not to sleep in their consorts’ embrace.211
श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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