आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181
समुद्र की तुलना और आश्चर्य
सारथि ने कहा कि गंगा और सिन्धु का जल समुद्र में मिलता है, पर यह तृप्त नहीं होता, जैसे मूर्ख मूर्खों के संग्रह से संतुष्ट नहीं होता। समुद्र के जलचर जीव इसके पुत्र, नदियाँ स्त्रियाँ, और बालू रत्न हैं, फिर भी यह महोदधि कहलाता है, जो आश्चर्यजनक है। सर्प अलातचक्र-से शोभित हैं, और समुद्र चन्द्र-स्पर्श से क्रोधित-सा उछलता है। इसके भीतर देवों के क्रीड़ास्थल और द्वीप किलों-से हैं। समुद्र किनारे के वनों को ताड़न करता प्रतीत होता है और कुलपर्वतों को चुनौती देता है। सर्प और मछलियाँ इसमें भोजन के लिए संघर्ष करती हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
इतो विशति गाङ्गमम्बु शरदम्बुदाच्छच्छवि स्त्रु तं हिमवतोऽमुतश्च सुरसं पयः सैन्धवम् । तथापि न जलागमेन धृतिरस्य पोपूर्यते ध्रुवं न जलसंग्रहैरिह जलाशयो’ द्रायति ॥ १७२॥
इधर हिमवान् पर्वत से निकला हुआ तथा शरऋतु के बादलों के समान स्वच्छ कान्ति को धारण करने वाला गङ्गा नदी का जल प्रवेश कर रहा है और उस ओर सिन्धु नदी का मीठा जल प्रवेश कर रहा है, फिर भी जल के आनेसे इसका संतोष पूरा नहीं होता है, सो ठीक ही है क्योंकि जलाशय (जिसके बीचमें जल है, पक्षमें जड़ आशयवाला मूर्ख) जल (पक्षमें जड़-मूर्ख) के संग्रह से कभी भी संतुष्ट नहीं होता है। भावार्थ- जिस प्रकार जलाशय अर्थात् मूर्ख मनुष्य जल संग्रह अर्थात् मूर्ख मनुष्यों के संग्रहसे संतुष्ट नहीं होता उसी प्रकार जलाशय अर्थात् जलसे भरा हुआ समुद्र या तालाब जल-संग्रह अर्थात् पानी के संग्रह करने से संतुष्ट नहीं होता ।। १७२।।
“The water of the Ganga, emerging from the Himavan mountain and carrying the pure radiance like the clouds of the autumn season, is flowing in, and similarly, the sweet waters of the Sindhu river are entering. Yet, despite the influx of water, it is never fully satisfied. This is indeed fitting, for a reservoir (which is filled with water but, on the sides, has the foolishness of stagnation) is never satisfied by merely the collection of water.
Meaning: Just as a reservoir (symbolizing a foolish person) is never satisfied by the collection of water (representing the gathering of foolish people), similarly, a water-filled ocean or lake is never satisfied merely by the collection of water.” (172)
श्लोक ( Shlok ) 173
व्याप्योदरं चलकुलाचलसंनिकाशाः पुत्रा इवास्य तिमयः पयसा प्रपुष्टाः । कल्लोलकाश्च परिमारहिताः समन्तादन्योन्यघट्टनपराः सममावसन्ति ॥१७३॥
इस समुद्रके उदर अर्थात् मध्यभाग अथवा पेट में व्याप्त होकर पय अर्थात् जल अथवा दूधसे अत्यन्त पुष्ट हुए तथा चलते हुए कुलाचलों के समान बड़े बड़े इसके पुत्रों के समान मगरमच्छ और प्रमाण रहित अनेक लहरें ये सब चारों ओरसे एक दूसरे को धक्का देते हुए एक ही साथ इस समुद्रमें निवास कर रहे हैं ।।१७३।।
“Filling the belly, the middle portion, or the depths of this ocean, and nourished with water or milk, are large crocodiles and countless waves, like moving swarms. These, like the ocean’s sons, push against one another from all directions, living together in this vast sea.” (173)
श्लोक ( Shlok ) 174
आपो धनं धृतरसाः सरितोऽस्य दाराः पुत्रीयिता जलचराः सिकताश्च रत्नम् । इत्यं विभूति लवदुर्ललिप्तो विचित्रं धत्ते महोदधिरिति प्रथि मानमेषः ॥१७४।।
हे प्रभो, इस समुद्रके जल ही धन हैं, रस अर्थात् जल अथवा श्रंगार या स्नेहको धारण करने वाली नदियां ही इसकी स्त्रियां हैं, मगरमच्छ आदि जलचर जीव ही इसके पुत्र हैं और बालू ही इसके रत्न हैं इस प्रकार यह थोड़ी सी विभूतिको धारण करता है तथापि महोदधि इस भारी प्रसिद्धिको धारण करता है यह आश्चर्य की बात है। भावार्थ-इस श्लोकमें कविने समुद्रकी दरिद्र अवस्थाका चित्रण कर उसके महोदधि नामपर आश्चर्य प्रकट किया है। दरिद्र अवस्थाका चित्रण इस प्रकार है। हे प्रभो, इस समुद्रके पास आजीविका के योग्य कुछ भी धन नहीं है। केवल जल ही इसका धन है अर्थात् दूसरोंको पानी पिला पिला-कर ही अपना निर्वाह करता है, इसकी नदीरूप स्त्रियोंका भी बुरा हाल है वे बेचारी रस-जल धारण करके अर्थात् दूसरेका पानी भर भरकर ही अपनी आजीविका चलाती हैं। पुत्र हैं परन्तु वे सब जलचर अर्थात् (जडचर) मूर्ख मनुष्योंके नौकर हैं अथवा मूर्ख होनेसे नौकर हैं अथवा पानीमें रहकर शेवाल बीनना आदि तुच्छ कार्य करते हैं, इसके सिवाय कुल परम्परा से आई हुई सोना-चाँदी रत्न आदिकी संपत्ति भी इसके पास कुछ नहीं है-बालू ही इसके रत्न हैं, यद्यपि इसमें अनेक रत्न पैदा होते हैं परन्तु वे इसके निजके नहीं हैं उन्हें दूसरे लोग ले जाते हैं इसलिये दूसरे के ही समझना चाहिये इस प्रकार यह बिलकुल ही दरिद्र है फिर भी महो-दधि (महा + उ + दधि) अर्थात् लक्ष्मीका बड़ा भारी निवासस्थान इस नामको धारण करता हैं यह आश्चर्य की बात है। आश्चर्यका परिहार ऊपर लिखा जा चुका है ।।१७४।।
“O Lord, the water of this ocean itself is its wealth, the rivers that carry water or nourish with milk and love are its women, the crocodiles and other aquatic creatures are its sons, and the sand is its jewels. In this way, it holds a small portion of wealth, yet the vast ocean carries this great fame — this is truly astonishing.
Meaning: In this verse, the poet depicts the ocean’s impoverished state and expresses wonder at its title ‘Maha-Odhi’ (great ocean). The depiction of its poverty is as follows:
‘O Lord, this ocean has nothing that can be considered real wealth. Its wealth is only water — it sustains itself by providing water to others. Its river-like women are also in a poor state, they carry water from others to survive. Its sons, though numerous, are mere water creatures, serving foolish human beings or engaging in menial tasks like picking shells from the water. Beyond that, the ocean has no treasure of gold, silver, or jewels passed down by tradition — its only jewels are the sand. Although many gems are born within, they are not its own; others take them away, so they belong to others. Thus, this ocean is truly poor, yet it bears the name ‘Maha-Odhi’ (the great abode of Lakshmi), which is a great wonder.’ This is indeed a remarkable thing.” (174)
श्लोक ( Shlok ) 175
निःश्वासधूममलिनाः फणमण्डलान्त “सुव्य क्तरत्नरुचयः परितो भ्रमन्तः । व्यायच्छमानतनवो रुषितै रकस्मादत्रोल्मुकश्रियममी दधते फणीन्द्राः ॥१७५।।
जो निःश्वास के साथ निकलते हुए धूम से मलिन हो रहे हैं, जिनके फणाओंके मध्यभाग में रत्नों की कान्ति स्पष्ट रूपसे प्रकट हो रही है, जो चारों ओर गोलाकार घूम रहे हैं, जिनके शरीर बहुत लम्बे हैं, और जो अकस्मात् ही क्रोध करने लगते हैं ऐसे ये सर्प इस समुद्र में अलातचक्र की शोभा धारण कर रहे हैं ।। १७५।।
“These serpents, emitting a smoky exhalation, becoming sullied, with the radiance of jewels clearly visible in the center of their hoods, moving in circular motions, with long bodies, and who suddenly become angry, are adorning this ocean with the splendor of a spinning wheel of fire.” (175)
श्लोक ( Shlok ) 176
‘पादैरयं जलनिधिः शिशिरैरपीन्दोरास्पृश्यमानसलिलः सहसा खमुद्यम् ।रोषादियोच्चलति मुक्तगभीरभाषो वेलाच्छलेन” न महान् सहतेऽभिभूतिम् ॥१७६।।
इस समुद्र का जल चन्द्रमा के शीतल पादों अर्थात् पैरों से (किरणोंसे) स्पर्श किया जा रहा है, इसलिये ही मानो यह क्रोधसे गम्भीर शब्द करता हुआ ज्वार की लहोंके छल से बदला चुकानेके लिए अकस्मात् आकाश की ओर उछल कर दौड़ रहा है सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुष तिरस्कार नहीं सह सकते ।। १७६।।
“The water of this ocean is being touched by the cool feet, that is, the rays, of the moon. Therefore, it seems as if, in anger, it is making deep sounds, suddenly leaping toward the sky, rushing to take revenge for the trickery of the rising tides. This is indeed fitting, for great souls cannot endure insult.” (176)
श्लोक ( Shlok ) 177
नाकौकसां धृतरसं सहकामिनीभि राक्रीडनानि” “सुमनोहरकाननानि ।द्वीपस्थलानि रुचिराणि सहस्रशोऽस्मिन् सन्त्यन्त सन्त्यन्तरीपमिव दुर्गनिवेशनानि ॥१७७।।
इस समुद्रके जलके भीतर अपनी देवांगनाओं के साथ बड़े वेगसे आते हुए देवोंके हजारों क्रीड़ा करनेके स्थान हैं, हजारों मनोहर वन हैं और हजारों सुन्दर द्वीप हैं तथा वे सब ऐसे जान पड़ते हैं मानो इसके भीतर बने हुए किले ही हों ॥ १७७।।
“Within the waters of this ocean, there are thousands of playing grounds of gods, coming swiftly with their celestial nymphs. There are thousands of beautiful forests and thousands of charming islands, all of which appear as if they are fortresses built within the ocean.” (177)
श्लोक ( Shlok ) 178
अयमनि भृतवेलो रुद्धरोधोऽन्तरालैरनिलबलविलोलैर्भूरिकल्लोलजालैः । तटवनमभिहन्ति व्यक्तमस्मै प्ररुप्यन् मम किल बहिरस्मान्नास्ति वृत्तिर्मुधेति ॥१७८॥
ज्वार-भाटाओं से चंचल हुआ यह समुद्र इस वनके बाहर मेरा जाना नहीं हो सकता है इसलिये इसपर प्रकट क्रोध करता हुआ अपने किनारे के वनको वायु के वेगसे अतिशय चंचल और पृथिवी तथा आकाश के मध्य भागको रोकनेवाली अनेक लहरों के समूहसे व्यर्थ ही ताड़न कर रहा है ॥ १७८।।
“This ocean, made restless by the tides, says, ‘I cannot pass beyond this forest.’ Therefore, in apparent anger, it is futilely striking its shore with numerous waves, which, driven by the force of the wind, are extremely restless and seem to block the space between the earth and the sky.” (178)
श्लोक ( Shlok ) 179
अविगणितमहत्त्वा यूयमस्मान् स्वपादैरभिहथ किमलङ्घ्यं वो वृथा तौङ्ग्यमेतत् । वयमिव किमलङ्घ्याः कि गभीरा इतीत्थं परिवदति ‘विरावेर्नृन मब्धिः कुलाद्रीन ॥१७९॥
हे प्रभो, यह गरजता हुआ समुद्र ऐसा जान पड़ता है मानो अपने ऊंचे शब्दोंसे कुल पर्वतों को यही कह रहा है कि हे कुलपर्वतो, तुम्हारी ऊँचाई बहुत है इसीलिए क्या तुम अपने पैरों अर्थात् अन्त के भागोंसे हम लोगोंकी ताड़ना कर रहे हो ? तुम्हारी यह व्यर्थ की ऊंचाई क्या उल्लंघन करने के अयोग्य है? क्या तुम हमारे समान अलंध्य अथवा गंभीर हो ? ॥ १७९॥
“O Lord, this roaring ocean seems to be saying to the great mountains with its thunderous words, ‘O great mountains, your height is indeed vast, but is that why you strike us with your feet, that is, your lower parts? Is your futile height incapable of being surpassed? Are you as unyielding or as profound as us?'” (179)
श्लोक ( Shlok ) 180
अत्रायं भुजगशिशुर्बिलाभिशङ्की व्यात्तास्यं तिमिमभिधावति प्रहृष्टः । तं सोऽपि स्वगलबिलावलग्न लग्नं स्वान्त्रास्था विहितदयो न जेगिलीति ॥१८०॥
इधर यह सांप का बच्चा अपना बिल समझ कर प्रसन्न होता हुआ, मुख फाड़े हुए मच्छ के मुखमें दौड़ा जा रहा है और वह भी अपने गले रूप बिल में लगे हुए इस सांपके बच्चेको अपने अन्तरेंगमें संचित हुई निर्दयताके कारण निगल रहा है ॥१८०॥
“On the other side, the snake’s offspring, thinking of its hole, is joyfully rushing into the mouth of the fish, which, with its throat — its own hole — filled with cruelty, is swallowing the snake’s offspring.” (180)
श्लोक ( Shlok ) 181
एष महा मणिरश्मिविकीर्ण तोयममुप्य घृतामिषशङ्कः । मीनगणोऽनुसरन् सहतास्माद् वह्निभिया पुनरप्यपयाति ॥१८१॥
इधर यह मछलियों का समूह पद्मराग मणि की किरणों से व्याप्त हुए इस समुद्रके जल को मांस समझकर उसे लेनेके लिये दौड़ता है और फिर अकस्मात् ही अग्नि समझकर वहांसे लौट आता है ।। १८१॥
“On the other hand, the group of fish, perceiving the water of this ocean, imbued with the rays of ruby-like jewels, as flesh, rushes to seize it, but then, suddenly recognizing it as fire, turns back.” (181)
श्लोक 182 से 191
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आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171