आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 बाहुबली का अभिमान और स्वतंत्रता
बाहुबली कहते हैं कि वे शांति या अहंकार से वश नहीं हो सकते। वे भरत को केवल बड़ा भाई होने के कारण प्रशंसनीय नहीं मानते, जैसे बूढ़ा हाथी सिंह के समान नहीं। प्रेम और विनय कुटुंब में ही संभव हैं, पर विरोध होने पर नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि तलवार की धमकी के साथ प्रणाम करना अनुचित है। वृषभदेव ने दोनों को “राजा” कहा, पर भरत का “राजराज” होना व्यर्थ है। बाहुबली स्वधर्म में राजा बने रहना चाहते हैं और भरत का दिया राज्य तुच्छ मानते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
लोहस्येवोपतप्तस्य मृदुता न मनस्विनः । दण्डोऽप्यनुनयग्राह्ये सामजे न मृगद्विषि ॥१०२॥
जिस प्रकार लोहा तपानेसे नर्म नहीं होता उसी प्रकार तेजस्वी मनुष्य कष्ट देनेसे नर्म नहीं होता इसलिये उसके साथ दण्डका प्रयोग करना निरर्थक है क्योंकि अनुनय विनय कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही दण्ड चल सकता है सिंहपर नहीं। विशेष लोहा गर्म अवस्था में नर्म हो जाता है इसलिये यहाँ लोहाका उदाहरण व्यतिरेकरूपसे मानकर ऐसा भी अर्थ किया जा सकता है कि जिस प्रकार तपा हुआ लोहा नर्म हो जाता है उस प्रकार तेजस्वी मनुष्य कष्ट में पड़कर नर्म नहीं होता इसलिये उसपर दण्डका प्रयोग करना व्यर्थ है। अरे, दण्ड भी प्रेम पुचकार कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही चल सकता है न कि सिंहपर भी ॥१०२॥
Just as iron is not softened by mere heating, so too is a resolute and radiant man unyielding to suffering; therefore, to chastise him is in vain. For punishment avails only upon the tame elephant, not the lion.
Alternatively, considering iron softened when molten hot, yet even then, a brilliant soul remains unmoved by adversity—thus chastisement proves fruitless. Verily, discipline may reach only the docile elephant, never the sovereign lion.102
श्लोक ( Shlok ) 103
ततो व्यत्यासयन्नेनानुपायाननु पायवित् । स्वयं प्रयोगवैगुण्यात् सीदत्येव न मादृशः ० ॥१०३॥
इसलिये इन साम दाम आदि उपायोंका विपरीत प्रयोग करनेवाले और इसलिये ही उपाय न जाननेवाले आप जैसे लोग इन चारों उपायोंके प्रयोगका ज्ञान. न होनेसे स्वयं दुःखी होते हैं ।॥ १०३॥
Therefore, those who misuse the means of conciliation, gifts, and the like—those who are ignorant of these stratagems—become themselves the sufferers, for their lack of understanding in the proper use of these four measures bringeth only woe.103
श्लोक ( Shlok ) 104
साम्नाऽपि दुष्करं साध्या वयमित्युपसंहृते । ‘तत्रोत्सेकं प्रयुञ्जानो व्यक्तं मुग्धायते भवान् ॥१०४॥
हे दूत, हम लोग शान्तिसे भी वश नहीं किये जा सकते यह निश्चय होनेपर भी आप हमारे साथ अहंकारका प्रयोग कर रहे हैं, इससे स्पष्ट मालूम होता है कि आप मूर्ख हैं ।॥१०४।।
O envoy, knowing full well that we cannot be subdued by peace, yet you persist in bearing arrogance towards us—this plainly reveals that you are indeed a fool.104
श्लोक ( Shlok ) 105
वयमाधिक इत्येव न श्लाघ्यो भरताधिपः । जरन्नपि गजः कक्षां गाहते कि हरेः शिशोः ॥१०५॥
भरतेश्वर उमरमें बड़े हैं इतने ही से वे प्रशंसनीय नहीं कहे जा सकते क्योंकि हाथी बूढ़ा होनेपर भी क्या सिंहके बच्चेकी बराबरी कर सकता है ? ॥ १०५॥
Bharateshvara is advanced in years, yet for this alone he cannot be deemed worthy of praise—just as an aged elephant, though venerable, cannot match the prowess of a lion’s cub.105
श्लोक ( Shlok ) 106
प्रणयः प्रश्रयश्चेति सङ्गतेषु सनाभिषु । तेष्वेवासङ्गतेष्वङ्ग तद्द्वयस्य हता गतिः ।॥१०६।।
हे दूत, प्रेम और विनय ये दोनों परस्पर मिले हुए कुटुम्बी लोगोंमें ही संभव हो सकते हैं, यदि उन्हीं कुटुम्बियोंमें विरोध हो जावे तो उन दोनों हीकी गति नष्ट हो जाती है। भावार्थ-जब तक कुटुम्बियोंमें परस्पर मेल रहता है तब तक प्रेम और विनय दोनों ही रहते हैं और ज्योंही उनमें परस्पर विरोध हुआ त्यों ही दोनों नष्ट हो जाते हैं ।॥ १०६।।
O envoy, love and humility flourish only among those united as kin; but should discord arise within these families, both are swiftly undone.
Thus, so long as harmony prevails, love and humility endure, yet the moment strife takes root, both are lost.106
श्लोक ( Shlok ) 107
ज्येष्ठः प्रणम्य इत्येतत्काममस्त्वन्यदा सदा । मूर्ध्यारोपितखड्गस्य प्रणाम इति कः क्रमः ॥१०७।।
बड़ा भाई नमस्कार करने योग्य है यह बात अन्य समयमें अच्छी तरह हमेशा हो सकती है परन्तु जिसने मस्तकपर तलवार रख छोड़ी है उसको प्रणाम करना यह कौन-सी रीति है ? ।।१०७॥
Aeldest brother is indeed deserving of salutation—this truth holds well at all times;But what manner of custom is it to bow before one who lays a sword upon thy head?107
श्लोक ( Shlok ) 108
दूत नो दूयते चित्तमन्योत्सेकानु वर्णनैः। तेजस्वी भानुरेवैकः किमन्योऽप्यस्त्यतः परम् ॥१०८॥
हे दूत, दूसरे के अहंकारके अनुसार प्रवृत्ति करनेसे हमारा चित्त दुःखी होता है, क्योंकि संसारमें एक सूर्य ही तेजस्वी है। क्या उससे अधिक और भी कोई तेजस्वी है ।॥ १०८॥
O envoy, to act in accordance with another’s pride brings sorrow to our heart, for in this world there is but one sun that shines with brilliance—who else could surpass its radiance?108
श्लोक ( Shlok ) 109
राजोक्तिर्मयि तस्मिश्च संविभक्ताऽदिवेधसा। राजराजः स इत्यद्य “स्फोटो गण्डस्य मूर्धनि ।॥१०९॥
आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवने ‘राजा’ यह शब्द मेरे लिये और भरतके लिये दोनोंके लिये दिया है, परन्तु आज भरत ‘राजराज’ हो गया है सो यह कपोल के ऊपर उठे हुए गूमड़े के समान व्यर्थ है ।॥१०९।।
आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवने ‘राजा’ यह शब्द मेरे लिये और भरतके लिये दोनोंके लिये दिया है, परन्तु आज भरत ‘राजराज’ हो गया है सो यह कपोल के ऊपर उठे हुए गूमड़े के समान व्यर्थ है ।॥१०९।।
The Primeval Lord Brahmā, the venerable Ṛṣabhadeva, bestowed the title Rājā—“King”—upon both myself and Bharata alike. Yet now Bharata hath assumed the lofty style of Rājarāja—“King of Kings”—
but such elevation is as vain as a swelling upon the brow: a mere blemish, signifying nothing.109
श्लोक ( Shlok ) 110
कामं स राजराजोऽस्तु रत्नैर्यातोऽतिगृध्नुताम् । वयं राजा न इत्येव सौराज्ये स्वे व्यवस्थिताः ।११०।
अथवा रत्नोंके द्वारा अत्यन्त लोभको प्राप्त हुआ वह भरत अपने इच्छानुसार भले ही ‘राजराज’ रहा आवे, हम अपने धर्मराज्यमें स्थिर रहकर राजा ही बने रहेंगे ॥११०।।
Or let Bharata, swayed by his boundless greed for riches, assume the grand title of Rājarāja as he so desires—
we, steadfast in our righteous kingdom, shall remain content as Rājā alone.110
श्लोक ( Shlok ) 111
बालानिव छलादस्मान् आहूय प्रणमय्य च । पिण्डीखण्ड इवाभाति महीखण्डस्तदर्पितः ॥ १११॥
वह भरत बालकोंके समान छलसे हम लोगोंको बुला-कर और प्रणाम कराकर कुछ पृथिवी देना चाहता है तो उसका दिया हुआ पृथिवीका टुकड़ा खलीके टुकड़ेके समान तुच्छ मालूम होता है ।।१११।।
That Bharata, like a child employing deceit, seeks to summon us with flattery and homage, only to offer a fragment of land—
but such a gift appeareth as worthless as a morsel thrown to a beggar: a paltry thing, devoid of honor.111
श्लोक 112 से 121
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
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