आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 233 to 242
श्लोक ( Shlok ) 233
स्वादरेणैव संसिद्धि भाविनीं तस्य सूचयन् । नाथवंशाग्रणीर्मेघस्वरं चानेतुमभ्ययात् ॥२३३॥
इसी प्रकार अपने आदरसे ही मानो उसकी आगे होनेवाली सिद्धिको सूचित करता हुआ नाथवंशका अग्रणी राजा अकंपन जयकुमार को लेनेके लिये उसके सामने गया ।॥ २३३॥
In like manner, King Akampana—the foremost of the noble Nātha lineage—went forth to receive Jayakumāra. By the honor he bestowed upon him, it was as though he himself were foretelling the future triumphs that awaited the prince. ॥233॥
श्लोक ( Shlok ) 234
ततो महीभृतः सर्वे त्रिसमुद्रान्तरस्थिताः । पूरा इव पयोराशिं प्रापुः ‘स्फीतीकृतश्रियः ॥२३४।॥
तदनन्तर जिस प्रकार पूर समुद्रकी ओर जाता है उसी प्रकार तीनों (पूर्व, पश्चिम, दक्षिण) समुद्रोंके बीचके रहनेवाले सब राजा लोग अपनी अपनी शोभा बढ़ाते हुए बनारस आ पहुंचे ॥ २३४।।
Thereafter, just as rivers naturally flow toward the Eastern Sea, in like manner did all the kings dwelling between the three seas—of the east, west, and south—journey to Vārāṇasī, each enhancing its splendor with the grandeur of his own presence. ॥234॥
श्लोक ( Shlok ) 235
स्वयमर्ध पथं गत्वा केषाञ्चित् सर्वसम्पदा । केषाञ्चिद् गमयित्वाऽन्यान् मान्यान् हेमाङगदादिकान् ॥२३५।
राजा अकंपन कितने ही राजाओंके सामने तो अपनी सब विभूतिके साथ स्वयं आधी दूरतक गया था और कितनों हीके सामने उसने मान्य हेमाङ्गद आदिको भेजा था ।॥ २३५॥
King Akampana, in the fullness of his majesty, went forth personally—halfway at least—to receive many of the monarchs himself. For others, he dispatched the esteemed Hēmāṅgada and other worthy dignitaries to extend his honor and welcome. ॥235॥
श्लोक ( Shlok ) 236
ये ये यथा यथा प्राप्ताः पुरीस्तां स्तांस्तथा तथा । आह्वयन्तीं पताकाभिर्वोच्छ्रिताभिरवीविशन् ॥२३६॥
जो राजा जिस जिस प्रकारसे आ रहे थे उन्हें उसी उसी प्रकारसे उसने, अपनी फहराती हुई पताकाओंसे जो मानो बुला ही रही हों ऐसी बनारस नगरीमें प्रवेश कराया था ।। २३६।।
Each king, arriving in his own manner and splendor, was received accordingly by King Akampana and led into the city of Vārāṇasī—whose fluttering banners seemed to beckon them with open arms, as if the city itself were calling them home. ॥236॥
श्लोक ( Shlok ) 237
तदा तं राजगेहस्थं नरविद्याधराधिपै। वृत्तं सुलोचनाऽकार्षीत् पितरं जितचक्रिणम् ॥२३७॥
उस समय सुलोचनाने राजमहलमें विराजमान तथा भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओंसे घिरे हुए अपने पिताको चक्रवर्तीको भी जीतनेवाला बना दिया था । भावार्थ-महलमें इकट्ठे हुए अनेक राजाओंसे राजा अकंपन चक्रवर्तीके समान जान पड़ता था ।।२३७।।
At that time, Sulochanā, seated within the royal palace, caused her father to appear as one who had triumphed even over a Chakravartin—for, surrounded by kings of the earth and lords of the Vidyādharas, King Akampana shone forth with such majesty that he seemed no less than an emperor of the entire world. ॥237॥
श्लोक ( Shlok ) 238
वाराणसी जितायोध्या ‘स्वनाम्नस्तां” निराकरोत् । कन्यारत्नात् परं नान्यदि त्यत्राहुः प्रभृत्यतः । २३८॥
उस समय अयोध्याको भी जीतनेवाली वाराणसी नगरी अपने नामसे ही उसका तिरस्कार कर रही थी। क्योंकि उस स्वयंवरके समय से ही लेकर इस संसारमें कन्यारत्नके सिवाय और कोई उत्तम रत्न नहीं है, यह बात प्रसिद्ध हुई है। भावार्थ कदाचित् कोई कहे कि चक्रवर्तीकी राजधानी होनेसे चौदह रत्न अयोध्यामें ही रहते हैं इसलिये वही उत्कृष्ट नगरी हो सकती है न कि वाराणसी भी; तो इसका उत्तर यह है कि संसारमें सर्वोत्कृष्ट रत्न कन्यारत्न है जो कि उस समय वाराणसीमें ही रह रहा था अतः उत्कृष्ट रत्नका निवास होनेसे वाराणसीने अयोध्याका तिरस्कार कर दिया था ।। २३८॥
At that time, the city of Vārāṇasī, resplendent with unmatched glory, seemed to disdain even Ayodhyā—triumphing over it by name and by renown. For from the moment of that svayamvara, it became widely proclaimed in the world that no gem excels the jewel of maidenhood. And though one might argue that Ayodhyā, being the seat of a Chakravartin, is the abode of the fourteen celestial jewels—yet Vārāṇasī, graced with the presence of the supremely rare kanyāratna, the maiden-gem, had rightfully surpassed it. ॥238॥
श्लोक ( Shlok ) 239
तान् स्वयंवरशालायामर्ककीर्तिपुरस्सरान्। निवेश्य प्रीणयामास कृताभ्यागतसत्क्रियः ॥२३९॥
अतिथियोंका सत्कार करनेवाले राजा अकम्पनने उन अर्ककीति आदि राजाओंको स्वयंवरशालामें ठहराकर प्रसन्न किया था ॥२३९।।
King Akampana, ever gracious in his hospitality, delighted the assembled monarchs—such as Arka-kīrti and others—by lodging them with honor and reverence in the splendid hall of the svayamvara. ॥239॥
श्लोक ( Shlok ) 240 – 242
पुरोपार्जितसद्धर्मात् सर्वमेतत्ततः पुरा । धर्म एव समभ्यर्च्य इति सञ्चित्य विद्वरः ॥२४०॥ कृत्वा जैनेश्वरी पूजां दीनानाथवनीपकान्। अनर्थिनः समर्थ्याशु सर्वत्यागोत्सवोद्यतः ॥२४१॥ तां लक्ष्मीमक्षयां मत्वा सफलां चाप्तसद् व्याम् । स तदाभूत् क्षतेरेकभोग्यः क्षितिरिवात्मनः ॥२४२॥
यह सब पहले उपार्जन किये हुए समीचीन धर्मसे ही होता है इसलिये सबसे पहले धर्म ही पूजा करनेके योग्य है ऐसा विचारकर विद्वानोंमें श्रेष्ठ राजा अकंपन श्री जिनेन्द्र-देवकी पूजाकर तथा दीन, अनाथ और याचकोंको अयाचक बनाकर सबका त्याग करनेरूप उत्सवके लिये शीघ्र ही तयार हो गया। वह अच्छे कामोंमें खर्च की हुई लक्ष्मीको क्षयरहित और सफल मानने लगा तथा जिस प्रकार उसकी पृथिवी उसके उपभोग करनेके योग्य थी उसी प्रकार उस समय वह समस्त पृथिवीके उपभोग करने योग्य हो गया था। भावार्थ-पृथिवीके सब लोग उसके राज्यका उपभोग करने लगे थे ।। २४०-२४२।।
“All this,” thought the wise and noble King Akampana, “is but the fruit of righteous conduct earned in former days.” Thus, deeming Dharma alone to be worthy of highest veneration, he—foremost among the learned—first worshipped the glorious Lord Jina. Then, by fulfilling the needs of the poor, the helpless, and the supplicants—so that none remained in want—he swiftly prepared for the grand festival of renunciation.
He held that wealth spent in noble deeds is never lost, but ever fruitful; and just as the earth was his to rule, in that moment, he himself became fit to be enjoyed by all the earth.
In other words, all the people of the world partook of the blessings of his righteous and generous reign. ॥240–242॥
श्लोक 243 से 251
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232
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