आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51
वन में ऋतुओं की शोभा
अशोक और आम्र वृक्ष फूलों से विद्याधरियों और कोकिलों की शोभा बढ़ाते हैं। चंपक वृक्ष वसंत में कामदेव के दीपक समान खिलते हैं। भौंरे और कोयल कामदेव की सेना के बाजे और नगाड़े प्रतीत होते हैं। माधवी और मालती लताएं वसंत और ग्रीष्म की सुगंध से भौंरों को चंचल करती हैं। वर्षा ऋतु में कदंब और केतकी की सुगंध वायु में फैलती है। मयूर, कोयल, और हंस विभिन्न शब्दों से वन को जीवंत बनाते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
चमरीवालकान् केचित् केचित् कस्तूरिकाण्डकान् । प्रभोरुपायनीकृत्य ददृशुम्लेंच्छ राजकाः ॥४२।।
कितने ही म्लेच्छ राजाओं ने चमरी गायके बाल और कितने ही ने कस्तूरी-मृगकी नाभि भेंट कर भरतके दर्शन किये थे ।।४२।।
“Many Mleccha kings had offered the hair of the Chamari (yak), and many others had presented the navel of the musk deer as gifts in order to behold Bharata.” (Verse 42)
श्लोक ( Shlok ) 43
तत्रान्तपालदुर्गाणां सहस्राणि सहस्रशः । लब्धचक्रधरादेशः सेनानीः समशिश्रियत् ॥४३॥
वहां पर सेनापति ने चक्रवर्ती की आज्ञा प्राप्त कर अन्तपालों के लाखों किले अपने वश किये । ॥४३।।
“There, upon receiving the command of the Chakravarti (Emperor), the commander-in-chief brought under control hundreds of thousands of frontier forts.” (Verse 43)
श्लोक ( Shlok ) 44
अपूर्वरत्नसन्दर्भै “कुप्यसारवनैरपि । अन्तपालाः प्रभोराज्ञां सप्रणामेरमानयन् ॥४४॥
अन्तपालोंने अपूर्व अपूर्व रत्नों के समूह तथा सोना चांदी आदि उत्तम धन भेंट कर भरतेश्वर को प्रणाम किया तथा उसकी आज्ञा स्वीकार की ॥४४।।
“The frontier chiefs offered rare and unparalleled gems, along with gold, silver, and other precious wealth, as tribute. They bowed to King Bharata and accepted his authority.” (Verse 44)
श्लोक ( Shlok ) 45
ततो विदूरमुल्लऊध्य सोऽध्वानं सह सेनया । गङ्गाद्वारमनुप्रापत् स्वमिवालङध्यमर्णवम् ॥४५॥
तदनन्तर सेना के साथ साथ बहुत कुछ दूर मार्गको व्यतीत कर वे गङ्गाद्वार को प्राप्त हुए और उसके बाद ही अपने समान अलंघनीय समुद्रको प्राप्त हुए ।।४५।।
“Thereafter, traversing a long stretch of the path along with the army, they reached Gangadwara (the gateway of the Ganga), and soon after, they arrived at the ocean—unfathomable and impassable like themselves.” (Verse 45)
श्लोक ( Shlok ) 46
बहिः समुद्रमुद्रिक्तं द्वैप्यं निम्नोपगं जलन् । समुद्रस्येव निष्यन्दमब्धेराराद् व्यलोकयत् ।।४६।।
उन्होंने समुद्रके समीप ही, समुद्रसे बाहर उछल उछल कर गहरे स्थानमें इकट्ठे हुए द्वीप सम्बन्धी उस जल को देखा जो कि समुद्रके निष्यन्द के समान मालूम होता था अथवा समुद्र के जलके समान ही निश्चल-स्थायी था अर्थात् उपसमुद्रको देखा, समुद्रका जो जल उछल उछलकर समुद्र के समीप ही द्वीपके किसी गहरे स्थानमें इकट्ठा होता जाता है वही उपसमुद्र कहलाता है। उप-समुद्र द्वीपके भीतर होता है इसलिये उसका जल द्वैप्य कहलाता है। उपसमुद्रका जल ऐसा जान पड़ता था मानो समुद्र का स्वेद ही इकट्ठा हो गया हो ।॥४६।।
They beheld, near the ocean, the water that had gathered
in the deep recesses of an island—surging out from the sea and appearing as if it were the very exudation of the ocean. This water, though collected outside the main body, seemed as steady and vast as the ocean itself. It was the upa-samudra—a secondary sea—
formed by the surging of the ocean’s waves into a deep region of an island. Since this upa-samudra was enclosed within the island,
its water was known as dvaipya (island-bound). That gathered water appeared as though it were the sweat of the mighty ocean itself.(verse 46)
श्लोक ( Shlok ) 47
वर्षारम्भो युगारम्भे योऽभूत् कालानुभावतः । ततः प्रभृति संवृद्धं जलं द्वीपान्तमावृणोत् ॥४७॥
कर्मभूमिरूप युगके प्रारम्भ में जो वर्षा हुई थी तबसे लेकर कालके प्रभावसे बढ़ता हुआ वही जल द्वीपके अन्त भाग तक पहुँच गया था ।॥४७॥
Since the beginning of the age, when the era of action (Karma-Bhūmi) commenced, the rain that had fallen at that time, gradually expanded under the influence of time, and that very water had now reached the innermost regions of the island. (verse 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
अलङ्ध्यत्वातन् मही यस्त्वाद् द्वीपपर्यन्तवेष्टनात् । द्वैप्यमम्बु समुद्रिक्तम गादुपसमुद्रताम् ॥४८॥
जो जल समुद्रसे उछल उछलकर द्वीपमें आया था वह अलंघनीय था, बहुत गहरा था और उसने द्वीप के सब समीपवर्ती भाग को घेर लिया था इसलिये वही उप-समुद्र कहलाने लगा था ।।४८।।
The water that had surged from the ocean into the island was impassable and extremely deep. It had surrounded all the nearby regions of the island, and thus came to be known as the Upa-samudra (the secondary sea).(verse 48)
श्लोक ( Shlok ) 49
पश्यन्नुपसमुद्रं तं गत्वा स्थलपथेन सः । गङ्गोपवनवेद्यन्तर्भागे सैन्यं न्यवीविशत् ।।४९।।
उस उपसमुद्र को देखते हुए भरत ने सुखकर मार्ग से जाकर गङ्गा के उपवन की वेदी के अन्तभाग में सेना का प्रवेश कराया ॥४९॥
While observing that Upa-samudra, Bharata led his army along a pleasant path and entered the innermost part of the sacred grove of the Ganga.(verse 49)
श्लोक ( Shlok ) 50
वेदिकातोरणद्वारमस्ति ‘तत्रोच्छितं महत् । शनैस्तेन प्रविश्यान्तर्वणं सैन्यं न्यविक्षत ॥५०॥
वहां वेदिकामें एक बड़ा भारी तोरणद्वार है जो कि उत्तर द्वार कहलाता है, उसी द्वार से धीरे धीरे प्रवेश कर वन के भीतर सेनाको ठहराया ।। ५० ।।
There, in the sacred grove, is a large and mighty archway known as the Northern Gate. Bharata gradually led the army through that gate and stationed them within the forest.(verse 50)
श्लोक ( Shlok ) 51
तत्र वास्तु वशादस्य किञ्चित सङ्कुचिता यतः । स्कन्धावारनिवेशोऽभूद लङ्व्य व्यूहविस्तृतिः ।।५१।।
वहां चक्रवर्ती के शिविर की जो रचना हुई थी उसकी, उस क्षेत्र के अनुसार, लम्बाई तो अधिक थी परन्तु चौड़ाई कुछ कम थी और उसकी सेनाके विस्तार को कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था ।। ५१ ।।
The camp of the Chakravarti (Emperor) that was set up there was long in length according to the region,but somewhat narrow in width.No one could encroach upon the expanse of his army.(verse 51)
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41