आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन
श्लोक 1 से 11 बाहुबली के प्रति भरत का चिंतन
चक्रवर्ती भरत बाहुबली को वश करने के लिए चिंतित होकर विचार करते हैं कि उनके भाई, एक ही कुल में उत्पन्न होने के कारण स्वयं को अवध्य मानते हैं और उनकी उन्नति से ईर्ष्या करते हैं। वे कहते हैं कि बाहुबली, जो बुद्धिमान, विनयी और बलवान है, फिर भी उनके प्रति विकार क्यों रखता है। भरत मानते हैं कि बाहुबली का अहंकार सामान्य संदेशों से नियंत्रित नहीं हो सकता, क्योंकि वह नीति में चतुर और युद्ध में अजेय है, जैसे सिंह को हरिण की तरह नहीं पकड़ा जा सकता।
श्लोक 12 से 21 बाहुबली के अहंकार का विश्लेषण और दूत प्रेषण
भरत विचार करते हैं कि बाहुबली को शांतिपूर्ण साधनों से भी वश करना कठिन है, क्योंकि वह प्रेम से और अधिक क्रोधित होता है। अन्य राजकुमारों ने वन में जाने की इच्छा जताई, पर बाहुबली का अहंकार कुल को भस्म करने वाली अग्नि-सा है। भरत决定 करते हैं कि पहले कोमल वचनों से उसकी परीक्षा लेंगे, और यदि वह न माने तो आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे। इसके लिए वे एक कुशल दूत को बाहुबली के पास भेजते हैं, जो निःसृष्टार्थ और मंत्र में निपुण है।
श्लोक 22 से 31 दूत का प्रस्थान और मार्ग
दूत अपने सेवक और सामग्री के साथ बाहुबली के पोदनपुर नगर की ओर प्रस्थान करता है। वह मार्ग में यह विचार करता है कि यदि बाहुबली शांतिपूर्ण बात करेगा तो वह भी अनुकूल रहेगा, और यदि युद्ध की बात करेगा तो वह शांति का प्रयास करेगा। दूत पोदनपुर के समीप पहुंचकर वहां के धान के खेतों, किसानों, और मनोहर दृश्यों को देखकर आनंदित होता है। वह खेतों की रक्षा करती स्त्रियों और तोतों को भगाने की उनकी क्रिया को देखता है।
श्लोक 32 से 44 पोदनपुर का सौंदर्य और दूत का प्रवेश
दूत पोदनपुर के बाहरी क्षेत्रों में धान, ईख, और जलाशयों से युक्त मनोहर दृश्य देखता है। वह नगर के गोपुर द्वार को पार कर बाजार और राजा के आंगन में प्रवेश करता है, जहां घोड़े और हाथियों से कीचड़युक्त दृश्य उसे प्रभावित करता है। वहां की समृद्धि और रत्नों की राशि को देखकर वह कृतार्थ अनुभव करता है। दूत द्वारपालों के माध्यम से अपना परिचय देकर बाहुबली के समीप पहुंचता है।
श्लोक 45 से 61 बाहुबली का दर्शन और स्वागत
दूत बाहुबली को एक विशाल पर्वत-से तेजस्वी और विजयलक्ष्मी से युक्त देखता है। बाहुबली का वक्ष चौड़ा, मुकुट उन्नत, और भुजाएं तराजू के दंड-सी हैं। उनकी कान्ति हरित मणि-सी और तेज परमाणुओं से निर्मित-सी प्रतीत होती है। दूत उनकी शोभा से प्रभावित होकर प्रणाम करता है। बाहुबली उसे सत्कार के साथ बिठाते हैं और मंद हास्य के साथ पूछते हैं कि भरत की कुशलता और उनके दिग्विजय के कार्य की स्थिति क्या है।
श्लोक 62 से 71 दूत का संदेश
दूत बाहुबली से कहता है कि उनके वचनों में भरत का उद्देश्य स्पष्ट है। वह स्वयं को केवल संदेशवाहक बताते हुए कहता है कि भरत की आज्ञा, चाहे अच्छी हो या बुरी, स्वीकार करनी चाहिए। वह भरत के इक्ष्वाकु वंश, दिग्विजय, और गंगा-समुद्र तक की विजय का वर्णन करता है। दूत बताता है कि भरत ने देवों, म्लेच्छों, और विद्याधरों को वश में किया, और उनकी सेना ने समस्त दिशाओं पर अधिकार किया।
श्लोक 72 से 81 भरत की महिमा और आह्वान
दूत कहता है कि भरत ने विजयार्ध पर्वत और समुद्रों तक विजय प्राप्त की, और उनका यश पर्वतों पर कमल-सा सुशोभित है। गंगा-सिंधु के देवताओं ने उनकी पूजा की, और लक्ष्मी उनकी दासी-सी है। भरत का राज्य बाहुबली के बिना अधूरा है, और वे चाहते हैं कि बाहुबली उनके साथ साम्राज्य का उपभोग करें। दूत जोर देता है कि बाहुबली का प्रणाम न करना भरत के चक्रवर्तीपन को फीका करता है।
श्लोक 82 से 91 बाहुबली से प्रणाम की अपील
दूत कहता है कि शत्रु का प्रणाम न करना उतना दुख नहीं देता, जितना भाई का अहंकार। वह बाहुबली से अनुरोध करता है कि वे भरत को प्रणाम कर उनकी आज्ञा स्वीकार करें, क्योंकि यह समृद्धि और यश देगा। दूत चेतावनी देता है कि भरत की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले शत्रुओं को चक्ररत्न नष्ट करता है। बाहुबली, दूत के वचनों को सुनकर, मंद हास्य के साथ गंभीर वचन कहते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि दूत ने भरत की साधु वृत्ति और नीति का उचित प्रदर्शन किया।
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का दूत को उत्तर और दुष्टता का खंडन
बाहुबली दूत को स्वतंत्र और भरत का अंतरंग कहकर उसकी चतुरता की प्रशंसा करते हैं, परंतु उसका दूसरों के मर्म को भेदना अनुचित मानते हैं। वे कहते हैं कि अपनी प्रशंसा और दूसरों में दोष निकालना दुष्टों का कार्य है। दुष्टता को वे आकाश की बेल-सी नीरस और फलहीन बताते हैं, जो केवल मूर्खों का आश्रय है। बाहुबली साम, दाम, दंड, और भेद के अनुचित प्रयोग को असफलता का कारण मानते हैं, क्योंकि तेजस्वी पुरुष पर ये उपाय निष्फल हैं, जैसे गर्म घी में पानी डालना या सिंह पर दंड चलाना।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली का अभिमान और स्वतंत्रता
बाहुबली कहते हैं कि वे शांति या अहंकार से वश नहीं हो सकते। वे भरत को केवल बड़ा भाई होने के कारण प्रशंसनीय नहीं मानते, जैसे बूढ़ा हाथी सिंह के समान नहीं। प्रेम और विनय कुटुंब में ही संभव हैं, पर विरोध होने पर नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि तलवार की धमकी के साथ प्रणाम करना अनुचित है। वृषभदेव ने दोनों को “राजा” कहा, पर भरत का “राजराज” होना व्यर्थ है। बाहुबली स्वधर्म में राजा बने रहना चाहते हैं और भरत का दिया राज्य तुच्छ मानते हैं।
श्लोक 112 से 121 स्वाभिमान और यश की रक्षा
बाहुबली कहते हैं कि स्वयं की भुजाओं से अर्जित फल ही प्रशंसनीय है, न कि दूसरों की कृपा से प्राप्त ऐश्वर्य। जो राजा दूसरों की आज्ञा से लक्ष्मी धारण करता है, वह “राजा” शब्द को व्यर्थ करता है। अपमानित विभूति धारण करना पशु के समान है। अभिमान की रक्षा यश को सुशोभित करती है। बाहुबली दूत की स्तुति को निंदा का रूप मानते हैं, जो पंडितों द्वारा नीरस वस्तु को भी पुष्ट करने जैसा है। वे भरत की दिग्विजय को वचनाडंबर और कुम्हार की चाल बताते हैं।
श्लोक 122 से 131 भरत की निंदा और यश की महत्ता
बाहुबली कहते हैं कि भरत की चक्रवर्ती वृत्ति भिक्षुक की भांति दीनता को दर्शाती है। वे उसके दिग्विजय को विश्वासयोग्य मात्र बताते हैं, क्योंकि वह उपवास और तप के बिना कैसे संभव था। वे भरत को पाप की धूल से कलंकित और कुल को अपमानित करने वाला मानते हैं। उसका पराक्रम म्लेच्छों के सामने कमजोर था। बाहुबली यश को अमर धन मानते हैं, जो रक्षा योग्य है, जबकि रत्न मृत्यु के साथ नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि भरत कुल की पृथ्वी छीनना चाहता है, जो अनुचित है।
श्लोक 132 से 141 युद्ध की चुनौती
बाहुबली भरत को तुलापुरुष कहकर उसकी लोभपूर्ण इच्छा का तिरस्कार करते हैं। वे कहते हैं कि स्वतंत्र पुरुष कुल की स्त्रियों और भुजाओं से अर्जित पृथ्वी को छोड़कर कुछ भी दे सकते हैं। वे भरत को चुनौती देते हैं कि वह बिना पराजित किए पृथ्वी का उपभोग नहीं कर सकता। युद्ध को कसौटी मानकर वे दूत को संदेश देते हैं कि दोनों का भविष्य युद्ध में तय होगा। बाहुबली दूत को युद्ध की तैयारी का संदेश देकर विदा करते हैं। उनकी सेना में योद्धा उत्साहित होकर युद्ध की चर्चा करते हैं।
श्लोक 142 से 151 युद्ध की तैयारी
बाहुबली की सेना में योद्धा युद्ध को स्वामी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर मानते हैं। वे कहते हैं कि सेवकों का पालन समय पर कार्य सिद्ध करने के लिए होता है। वे यश और विजय की कामना करते हैं, युद्ध को उत्सव मानते हैं। योद्धा बाणों की छाया में विश्राम, शत्रु के व्यूह भेदन, और मृत्यु के बाद भी विजय की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। वे शस्त्र और टोपियां संभालते हैं। दिन समाप्त हो जाता है, मानो योद्धाओं के तिरस्कार से भयभीत होकर भाग गया हो।
श्लोक 152 से 161 सूर्यास्त का प्रतीकात्मक वर्णन
सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें लाल होकर अस्ताचल की शिखर पर वृक्षों की कोपलों-सी दिखती हैं, मानो वह गिरने से बचने के लिए सहारा ले रहा हो। सूर्य पश्चिम दिशा में डूबता है, जैसे पाप के भय से उसे सहारा न मिला हो। वह पाताल में छिप जाता है, मानो बीते दिन को खोजने गया हो। दिशाएं अंधकार से शोकाकुल हो जाती हैं, और कमलिनियां सूर्य के वियोग में मुरझा जाती हैं। सायंकाल का लाल प्रकाश दावानल-सा प्रतीत होता है, जो युद्ध की आगामी उग्रता का प्रतीक है।
श्लोक 162 से 171 संध्या का सौंदर्य और रात्रि का आगमन
संध्या, सूर्य द्वारा छोड़े जाने पर लालिमा से युक्त होकर अग्नि में प्रवेश करती-सी प्रतीत होती है। यह सिन्दूर और जवाकुसुम-सी लालिमा पश्चिम दिशा में मूंगों के बगीचे-सी शोभती है। संध्या की लाली चकवियों के मन को संताप देती है, मानो प्रेमी स्त्रियों का अनुराग एकत्रित हो। सूर्य के पीछे चलती संध्या सती-सी लगती है। चकवा-चकवियां नियति के कारण बिछड़ते हैं, और गाढ़ अंधकार फैलने से संसार में तेजस्वी के अभाव में अंधेरा छा जाता है। रात्रि तारों से युक्त नीलवस्त्रधारी अभिसारिणी-सी सुशोभित होती है।
श्लोक 172 से 181 चंद्रोदय और उसका प्रभाव
लोग अंधकार में व्याकुल होकर सोना बेहतर समझते हैं। घरों में दीपक अंधकार को भेदने वाली सुइयों-से प्रतीत होते हैं। चंद्रमा किरणों से अंधकार नष्ट कर, दूध-सा संसार को नहलाता है। वह राजा-सा अनुराग और किरणों से युक्त मंडल धारण करता है। चंद्रमा हरिण चिह्न के साथ अंधकार को भगाता है, जैसे सिंह के सामने हाथी भागते हैं। उसकी चांदनी आकाशरूपी समुद्र के प्रवाह-सी और हंसों से युक्त सरोवर-सी लगती है। चंद्रमा अमृतमय किरणों से विश्व को प्रकाशित करता है, पर स्वाभाविक कलंक से मुक्त नहीं होता।
श्लोक 182 से 191 रात्रि में कामदेव का प्रभुत्व
रात्रि में स्त्रियां चंदन, मालाएं, और आभूषणों से सजी कल्पलताओं-सी महलों की छतों पर जाती हैं। चंद्रमा की किरणें कामदेव को प्रेरित करती हैं, जो विजयी शस्त्रों-सा स्त्रियों के मन में प्रवेश करता है। तरुणियां बिना मदिरा के काम से विह्वल हो जाती हैं। कुछ स्त्रियां पति की गोद में, कुछ सखी के वचनों से दुखी, और कुछ चकवी-सी तड़पती हैं। गीत और भ्रमरों की गुंजन कामदेव के पूर्वरंग-सी प्रतीत होती है।
श्लोक 192 से 201 प्रेम और विरह का चित्रण
कामदेव नवविवाहिताओं को भी पति के समीप ले जाता है। कुछ स्त्रियां पति के अन्यत्र जाने से संतापग्रस्त होकर चंदन या पंखे से संतुष्ट नहीं होतीं। धैर्यशील स्त्रियां कामदेव के बाण सहन करती हैं। कुछ स्त्रियां सखियों से पति के व्यवहार पर चर्चा करती हैं, कुछ ताना देती हैं कि पति की प्रीति अयोग्य स्थान पर संताप देगी। सखियां संदेश ले जाती हैं, और स्त्रियां चंद्रमा, चंदन, और पंखे से संतापग्रस्त होकर पति के पास जाने की इच्छा व्यक्त करती हैं।
श्लोक 202 से 211 प्रेम और युद्ध की समानता
स्त्रियां आलिंगन में पति के साथ संभोग का आनंद लेती हैं, उनकी करधनियां कामदेव के राज्य में क्रीड़ा की घोषणा करती हैं। भ्रमरों की गुंजन गुप्त बातों-सी लगती है। संभोग में स्तनों का मर्दन और केशों की पकड़ बढ़ती है। संभोग के बाद नेत्र लाल और मुख गुलाबी हो जाता है। योद्धा युद्ध की तैयारी के बीच स्त्रियों के आग्रह पर संभोग करते हैं, पर कुछ यश और विजय की कामना में इसे त्याग देते हैं। वे बाणों की शय्या पर सुख की आकांक्षा रखते हैं।
श्लोक 212 से 221 रात्रि का अंत और प्रभात
योद्धा युद्ध कथाओं में रत होकर रात्रि बीतने का भान नहीं करते। संभोग और युद्ध का रस समान माना जाता है, दोनों में प्रहार और निर्दयता समान होती है। रात्रि समाप्त होकर प्रभात में बदल जाती है। पश्चिम दिशा स्त्री-सी क्रीड़ा को रोकने की चेतावनी देती है। सूर्योदय के साथ अंधकार विलीन हो जाता है, और सूर्य पूर्व दिशा का आलिंगन करता है। वह चकवियों और कमलों की शोभा बढ़ाता है, चांदनी को नष्ट करता है।
श्लोक 222 से 231 सूर्योदय और प्रकृति का जागरण
सूर्य किरणों से अंधकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओं को प्रकाशित करता है। वह राजा-सा कमल विकसित करता है। बाहुबली जागते हैं, और बंदीजन मंगलपाठ पढ़कर उन्हें प्रेरित करते हैं। वे सूर्योदय को विजयलक्ष्मी की प्राप्ति से जोड़ते हैं। चकवा-चकवियां मिलते हैं, चंद्रमा कुमुदिनियों के साथ आलिंगन करता है। प्रकृति पक्षियों की बोली और कमलों की शोभा से जीवंत हो उठती है। प्रभात की लालिमा सिन्दूर और महावर-सी दिशाओं को अलंकृत करती है।
श्लोक 232 से 241 चंद्रमा का अस्त और जिनेन्द्र की स्तुति
चंद्रमा अंधकाररूपी हाथियों को भेदकर अस्ताचल में छिपता है, मानो सिंह-सा गुहा में प्रवेश करता हो। सूर्योदय के साथ हंस, सारस, और चकवियां सरोवरों में लौटते हैं। प्रभात की हवा वृक्षों को हिलाती और कमलों के पराग को फैलाती है। बंदीजन बाहुबली को जिनेन्द्र की स्तुति से प्रेरित करते हैं। वे वृषभदेव की जय-जयकार करते हैं, जिन्होंने कामदेव को जीता, पाप धोया, और जिनके चरण इंद्रों द्वारा पूजित हैं। उनकी आत्मा मुक्तिरूपी सुख देती है।
श्लोक 242 से 249 बाहुबली का युद्ध के लिए प्रस्थान
जिनेन्द्र वृषभदेव, जिन्होंने बिना युद्ध के कामदेव को जीता, सदा जयवंत रहते हैं। उनके आठ प्रातिहार्य तीनों लोकों की विजय के चिह्न हैं। बाहुबली को बंदीजन युद्ध में विजय की प्रेरणा देते हैं, कहते हैं कि उनकी भुजाएं भरत से श्रेष्ठ हैं। वे समय नष्ट न करने और जिनेन्द्र को नमस्कार करने का आह्वान करते हैं। बाहुबली शय्या छोड़कर, विशाल पराक्रमी सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं, जैसे ऐरावत गंगा तट छोड़ता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ चक्रधरस्यासीत् किञ्चित् चिन्ताकुलं मनः । दो ‘र्बलिन्यनुनेतव्ये यूनि दोर्दर्पशालिनि ॥१॥
अथानन्तर भुजाओंके गर्वसे शोभायमान युवा बाहुबलीको वश करनेके लिये चक्रवर्ती-का मन कुछ चिन्तासे आकुल हुआ ।।१।।
Then, thereafter, the sovereign’s mind grew somewhat perturbed with anxious thought—how might he bring under control the youthful, mighty-armed hero, radiant with the pride of his formidable strength?1
श्लोक ( Shlok ) 2
अहो भातृगणोऽस्माकं नाभिनन्दति नन्दथुम् । सनाभित्वादवध्यत्वं मन्यमानोऽयमात्मनः ॥२॥
वह विचारने लगा कि यह हमारे भाइयोंका समूह एक ही कुलमें उत्पन्न होनेसे अपने आपको अवध्य मानता हुआ हमारे आनन्द का अभिनन्दन नहीं करता है अर्थात् हमारे आनन्द-वैभवसे ईर्ष्या रखता है ॥२॥
He began to reflect: “This band of our kinsmen, born of the same noble lineage, deems itself invincible and, in its pride, offers no rejoicing at our triumph. Rather, it harbors envy toward the splendor of our joy and glory.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
अवध्यं शतमित्यास्था नूनं भातृ शतस्थ मे । यतः प्रणामविमुखं गतवन्नः प्रतीपताम् ॥३॥
हमारे भाइयोंके समूहका यह विश्वास है कि हम सौ भाई अवध्य हैं इसीलिये ये प्रणाम करनेसे विमुख होकर मेरे शत्रु हो रहे हैं ।।३।।
“This band of my brothers holds firm the belief that we, a hundred strong, are invincible. And thus, turning away from the gesture of reverence, they set themselves against me as foes.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
न तथाऽस्मादृशां खेदो भवत्यप्रणते द्विषि । दुगर्विते यथा ज्ञातिवर्गेऽन्तर्गेहवर्तिनि ॥४॥
किसी शत्रुके प्रणाम न करनेपर मुझे वैसा खेद नहीं होता जैसा कि घरके भीतर रहनेवाले मिथ्याभिमानी भाइयोंके प्रणाम नहीं करनेसे हो रहा है ।।४।।
No slight from a foe pains me as deeply as this—the refusal of homage by my own brothers, dwelling within the household, deluded by vain pride.4
श्लोक ( Shlok ) 5
मुखैरनिष्टवाग्वह्निदीपितै रतिधूमिताः । दहन्त्यलातवच्च स्वाः प्रातिकूल्यानिलेरिताः ॥५॥
अनिष्ट वचन-रूपी अग्निसे उद्दीपित हुए मुखोंसे जो अत्यन्त धूम सहित हो रहे हैं और जो प्रतिकूलतारूपी वायुसे प्रेरित हो रहे हैं ऐसे ये मेरे निजी भाई अलातचक्रकी तरह मुझे जला रहे हैं ।।५।।
With faces inflamed by the fire of harsh words, veiled in dense smoke and stirred by the winds of hostility, these very brothers of mine now burn me like the whirling fire-wheels of destruction.5
श्लोक ( Shlok ) 6 – 7
प्रतीपवृत्तयः कामं सन्तु वान्ये कुमारकाः । बाल्यात् प्रभृति येऽस्माभिः स्वातत्र्येणोपलालिताः ॥६॥ युवा तु दोर्बली प्राज्ञः क्रमज्ञः प्रश्रयी पटुः । कथं नाम गतोऽस्मासु विक्रियां सुजनोऽपि सन् ॥७॥
जिन्हें हमने बालकपनसे ही स्वतन्त्रतापूर्वक खिला-पिलाकर बड़ा किया है ऐसे अन्य कुमार यदि मेरे विरुद्ध आचरण करनेवाले हों तो खुशीसे हों परन्तु बाहुबली तरुण, बुद्धिमान्, परिपाटी-को जाननेवाला, विनयी, चतुर और सज्जन होकर भी मेरे विषयमें विकारको कैसे प्राप्त हो गया ? ॥६-७।।
If the other princes—whom we have nourished freely since their childhood—choose to act against me, so be it; let them, if they must. But how has this mighty-armed youth, endowed with wisdom, versed in propriety, humble, discerning, and noble of heart—how has he come to harbor discord against me?6 – 7
श्लोक ( Shlok ) 8
कथं च सोऽनु नेतव्यो बली मानधनोऽधुना। जयाङ्गं यस्य दोर्दर्पः श्लाघ्यते रणमूर्द्धनि ॥८॥
जो अतिशय बलवान् है, मानरूपी धनसे युक्त है, और विजयका अङ्ग स्वरूप जिसकी भुजाओंका बल युद्धके अग्रभागमें बड़ा प्रशंसनीय गिना जाता है ऐसे इस बाहुबलीको इस समय किस प्रकार अपने अनुकूल बनाना चाहिये ।।८।।
He, who is exceedingly powerful, enriched with the wealth of honor, whose valorous arms are hailed as the very emblem of victory in the forefront of battle—how, then, at this juncture, might such a one as Bāhubali be won over to my side?8
श्लोक ( Shlok ) 9
सोऽयं भुजबली बाहुबलशाली मदोद्धतः । महानिव गजो माद्यन् दुर्ग्रहोऽनुनयैर्विना ॥९॥
जो भुजाओंके बलसे शोभाय-मान है और अभिमानरूपी मदसे उद्धत हो रहा है ऐसा यह बाहुबली किसी मदोन्मत्त बड़े हाथी-के समान अनुनय अर्थात् शान्तिसूचक कोमल वचनोंके बिना वश नहीं हो सकता ।।९।।
This Bāhubali, resplendent in the strength of his arms and swollen with the pride of arrogance, is like a mighty elephant maddened by rut—he cannot be brought under control without gentle words of conciliation, the soft speech that heralds peace.9
श्लोक ( Shlok ) 10
न स सामान्यसन्देशैः प्रह्वीभवति दुर्मदी। ग्रहो दुष्ट इवाविष्टो मन्त्रविद्याचणैर्विना ॥१०॥
यह अहंकारी बाहुबली सामान्य संदेशों से वश नहीं हो सकता क्योंकि शरीर में घुसा हुआ दुष्ट पिशाच मन्त्रविद्यामें चतुर पुरुषों के बिना वश नहीं हो सकता ।।१०।।
This proud Bāhubali cannot be subdued by mere ordinary messages, just as a wicked spirit lodged within the body cannot be expelled save by those well-versed in the sacred science of incantations.10
श्लोक ( Shlok ) 11
शेषक्षत्रिययूनां च तस्य चास्त्यन्तरं महत् । मृगसामान्य मानायैर्धर्तुं किं शक्यते हरिः ॥११॥
शेष क्षत्रिय युवाओंमें और बाहुबलीमें बड़ा भारी अन्तर है, साधारण हरिण यदि पाशसे पकड़ लिया जाता है तो क्या उससे सिह भी पकड़ा जा सकता है ? अर्थात् नहीं। भावार्थ-हरिण और सिहमें जितना अन्तर है उतना ही अन्तर अन्य कुमारों तथा बाहुबली में है ।।११।।
There is a vast gulf between the other Kshatriya youths and Bāhubali. Can the lion be captured by the same snare that ensnares the common deer? Surely not.
—Even so, the difference between the other princes and Bāhubali is as great as that between the timid deer and the mighty lion.11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
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