आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 सुप्रभा और सुलोचना का वर्णन
सुप्रभा ने राजा को पुत्रों से आनंदित किया। उनके हजार पुत्रों में हेमांगद आदि थे। सुप्रभा से सुलोचना और लक्ष्मीमती कन्याएँ उत्पन्न हुईं। सुलोचना लक्ष्मी की तरह मनोहर थी, और धाय सुमित्रा ने उसका पालन किया। उसके चरणकमल रागी थे, और नख चांदनी की तरह कुमुदिनियों को विकसित करते थे। उसके पैरों की अंगुलियाँ कामदेव के वेगों की तरह थीं, और चरणों की शोभा अद्वितीय थी।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
न लक्ष्मीरपि तत्प्रीत्यै सती सा सुप्रजा यथा । सत्फला इव सद्वल्ल्यः पुत्रवत्यः स्त्रियः प्रियाः ॥१३२॥
उत्तम संतान उत्पन्न करनेवाली वह पतिव्रता सुप्रभादेवी जिस प्रकार राजाको आनन्दित करती थी उस प्रकार लक्ष्मी भी उसे आनन्दित नहीं कर सकी थी सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार अच्छे फल देनेवाली उत्तम लताएँ प्रियहोती हैं उसी प्रकार उत्तम पुत्र उत्पन्न करनेवाली स्त्रियाँ भी प्रिय होती हैं ।॥ १३२।।
That devoted queen, Suprabhā—chaste and virtuous—gladdened the king’s heart in a manner even Lakṣmī could not equal. And rightly so; for just as vines that yield excellent fruits are cherished above all, so too are those women most beloved who bring forth noble and worthy sons.132
श्लोक ( Shlok ) 133
तस्यां तन्नाथवंशाग्रगण्यस्येवांशवो रवेः । प्राच्यां ‘दीप्त्याप्तदिक्चक्राः सहस्रमभवन् सुताः ॥१३३॥
जिस प्रकार पूर्व दिशासे अपनी कान्तिके द्वारा समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाली सूर्यकी किरणें उत्पन्न होती हैं उसी प्रकार उस सुप्रभादेवीसे नाथवंशके अग्रगण्य राजा अकम्पनके अपनी दीप्ति अथवा तेजके द्वारा दिशाओंको वश करनेवाले हजार पुत्र उत्पन्न हुए थे ।।१३३॥
Just as from the eastern quarter arise the rays of the sun, illuminating all directions with their resplendence, even so from Queen Suprabhā were born a thousand sons unto King Akampana—foremost scions of the Nātha lineage—who, endowed with brilliance and might, brought all quarters under their sway.133
श्लोक ( Shlok ) 134
हेमाङ्गदसु केतुश्रीसुकान्ताद्या ह्वयैः स तैः । वेष्टितः संव्यदीपिष्ट शक्रः सामानिकैरिव ।॥१३४।।
हेमाङ्गद, सुकेतुश्री और सुकान्त आदि उन पुत्रोंसे घिरा हुआ वह राजा ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि सामानिक देवोंसे घिरा हुआ इन्द्र सुशोभित होता है ।। १३४।।
Surrounded by his sons—Hemāṅgada, Suketuśrī, Sukānta, and others—that king shone with splendour, even as Indra himself appears resplendent amidst the assembly of celestial Sāmānika gods.134
श्लोक ( Shlok ) 135
हिमवत्पद्मयोर्गङ्गासिन्धू इव ततस्तयोः । सुते सुलोचनालक्ष्मीमती चास्तां सुलक्षणे ॥१३५॥
जिस प्रकार हिमवान् पर्वत और पद्म नामकी सरसीसे गङ्गा और सिन्धु ये दो नदियां निकलती हैं उसी प्रकार राजा अकम्पन और रानी सुप्रभाके सुलोचना तथा लक्ष्मीमती ये उत्तम लक्षणोंवाली कन्याएं उत्पन्न हुई थीं ।॥१३५॥
Just as the sacred rivers Gaṅgā and Sindhu spring forth from Mount Himavān and the lotus-laden lake Padma, even so were born unto King Akampana and Queen Suprabhā two daughters of auspicious virtues—Sulocanā and Lakṣmīmatī, radiant in grace and excellence.135
श्लोक ( Shlok ) 136
सुलोचनाऽसौ बालेव लक्ष्मीः सर्वमनोरमा । कलागुणैरभासिष्ट चन्द्रिकेव प्रवर्द्धिता ॥१३६॥
वह बालिका सुलोचना लक्ष्मीके समान सबके मनको आनन्दित करनेवाली थी और अपने कलारूपी गुणोंके द्वारा चांदनीके समान वृद्धिको प्राप्त होती हुई सुशोभित हो रही थी ॥१३६॥
That maiden, Sulocanā, delighted all hearts like the goddess Lakṣmī herself, and adorned with the virtues of manifold arts, she grew in splendour like the moonlight waxing ever brighter with each passing night.136
श्लोक ( Shlok ) 137
सुमत्याख्याऽमलाः शुक्लनिशेवावर्द्धयत् कलाः । धात्री शशाङ्करेखायास्तस्याः सातिमनोहराः ॥१३७॥
जिस प्रकार शुक्ल पक्षकी रात्रि चन्द्रमाकी रेखाओंकी अत्यन्त मनोहर कलाओंको बढ़ाती है उसी प्रकार सुमित्रा नामकी धाय उस सुलोचनाकी अतिशय मनोहर कलाओंको बढ़ाती थी उसके शरीरका लालन पालन करती थी ।।१३७॥
Just as the nights of the bright fortnight enhance the moon’s enchanting phases, so did the nurse named Sumitrā lovingly nourish Sulocanā, fostering the exquisite blossoming of her graceful qualities and tending with care to the adornment of her tender frame.137
श्लोक ( Shlok ) 138
अभूद् रागी स्वयं रागस्त त्क्रमाब्जं समाश्रितः। रागाय कस्य वा न स्यात् स्वोचितस्थानसंश्रयः ॥१३८ ॥
राग अर्थात् लालिमा उस सुलोचनाके चरण-कमलोंका आश्रय पाकर स्वयं रागी अर्थात् राग करनेवाला अथवा लाल गुणसे युक्त हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि अपने योग्य स्थानका आश्रय किसके रागके लिये नहीं होता ? ॥१३८ ।।
The hue of crimson—Rāga itself—having taken refuge at the lotus-feet of Sulocanā, became imbued with its own nature, becoming truly rāgī, or one possessed of beauty and passion. And rightly so—for what does not grow lovelier when it rests in its most fitting abode?138
श्लोक ( Shlok ) 139
नखेन्दुचन्द्रिका तस्याः शश्वत्कुवलयं किल । विश्वमाह्लादय च्चित्रमनुवृत्त्या क्रमाब्जयोः ॥१३९॥
आश्चर्य है कि उसके नखरूपी चन्द्रमाकी चांदनी दोनों चरण-कमलोंके अनुकूल रहकर भी समस्त कुवलय अर्थात् कुमुदिनियोंको अथवा पृथ्वीमण्डल के आनन्दको निरन्तर विकसित करती रहती थी। भावार्थ-चांदनी कभी कमलोंके अनुकूल नहीं रहती, वह उन्हें निमीलित कर देती है परन्तु सुलोचनाके नखरूपी चन्द्रमाकी चांदनी उसके चरणकमलोंके अनुकूल रहकर भी कुवलय-नीलकमल (पक्षमें महीमण्डल) को विकसित करती थी यह आश्चर्यकी बात थी ॥१३९।।
Wondrous indeed it was, that the moonlight-like radiance of her toenails—though in harmony with her lotus-like feet—continued ever to awaken and blossom the kuvalayas, the blue lotuses, symbols of earthly joy. A marvel truly, for moonlight, though fair, customarily causes the lotus to close—yet here, it nourished and unfolded delight in full bloom upon the earth.139
श्लोक ( Shlok ) 140
रेजुरङ्गुलयस्तस्याः क्रमयोर्न खरोचिषा । इयन्त इति मद्वेगाः स्मरेणेव निवेशिताः ॥१४०॥
उसके दोनों पैरोंकी अंगुलियां नखोंकी किरणोंसे ऐसी अच्छी जान पड़ती थीं मानो मेरे वेग इतने ही हैं यही समझकर कामदेवने ही स्थापन की हों । भावार्थ-अभिलाषा चिन्ता आदि कामके दश वेग हैं और दोनों पैरोंकी अंगुलियां भी दश हैं इसलिये वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो कामदेवने अपने वेगोंकी संख्या बतलानेके लिये ही उन्हें स्थापित किया हो ॥ १४०॥
The toes of her delicate feet, adorned with the radiant glow of her nails, appeared so exquisitely formed that it seemed as though Kāma himself had placed them there—declaring, “Behold, these are the very ten urges of desire!” For just as desire manifests in tenfold impulses—longing, thought, anxiety, and the like—so too did her ten toes seem a graceful embodiment of those subtle stirrings of the heart.140
श्लोक ( Shlok ) 141
नताशेषो जयः स्नेहादमंसीत्ते’ ततस्तयोः । या श्रीः क्रमाब्जयोस्तस्याः सा किमस्ति सरोरुहे ॥१४१॥
जिसे सब लोग नमस्कार करते हैं ऐसा जयकुमार भी जिन्हें बड़े स्नेहसे नमस्कार करेगा ऐसे उसके दोनों चरणकमलोंमें जो शोभा थी वह क्या कमलोंमें हो सकती है ? अर्थात् नहीं ।॥१४१।।
Such was the splendour of her lotus-like feet, that even Jayakumāra—before whom all others bowed in reverence—would himself offer salutations to them with the deepest affection. Could such divine beauty ever reside in mere earthly lotuses? Assuredly not.141
श्लोक 142 से 151
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भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
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