आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 रचना की चुनौतियाँ और कवि की भूमिका
दुर्जनों द्वारा निंदा को स्वीकार किया गया है, पर गुणों को ग्रहण न करने की प्रार्थना की गई है, ताकि रचना निर्दोष रहे। अज्ञानी की निंदा या स्तुति हास्यास्पद होती है, और महापुरुष छोटे उपद्रवों से विचलित नहीं होते। कवि का परिश्रम केवल कवि ही समझ सकता है। रचना की स्तुति और निंदा दोनों ही कवि की कीर्ति को बढ़ाती हैं, जैसे अर्जुन के बाण खोटे संस्कारों को दुख देते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
सज्जने दुर्जनः कोपं काम कर्तुमिहार्हति । “तद्वैरिणामनाथानां गुणानामाश्रयो यतः ॥२२॥
इस संसारमें दुर्जन पुरुष सज्जनोंपर इच्छानुसार क्रोध करनेके योग्य हैं क्योंकि वे उन दुष्टोंके शत्रु स्वरूप, अनाथ गुणोंके आश्रयभूत हैं। भावार्थ चूंकि सज्जनोंने दुर्जनोंके शत्रुभृत, अनाथ गुणोंको आश्रय दिया है इसलिये वे सज्जनोंपर यदि क्रोध करते हैं तो उचित ही है ।। २२ ।।
In this world, the wicked indeed have reason to be wrathful toward the virtuous—for the noble stand as guardians of the forsaken virtues that are enemies to the vile. In essence: since the virtuous shelter those orphaned virtues that the wicked oppose, their anger toward the righteous is but a natural consequence. ॥22॥
श्लोक ( Shlok ) 23
यथा स्वानुगमर्हन्ति सदा स्तोतुं कवीश्वराः । तथा निन्दितुमस्वानुवृत्तं कुकवयोऽपि माम् ॥२३॥
जिस प्रकार कवीश्वर लोग अपने अनुकूल चलनेवालेकी सदा स्तुति करनेके योग्य होते हैं उसी प्रकार कवि भी अपने अनुकूल नहीं चलनेवाले मेरी निन्दा करनेके योग्य हैं। भावार्थ-उत्तम कवियोंके मार्गपर चलनेके कारण जहां वे मेरी प्रशंसा करेंगे वहां कुकवियोंके मार्गपर न चलने-के कारण वे मेरी निन्दा भी करेंगे ॥२३॥
Just as exalted poets ever praise those who walk in harmony with their path, so too am I worthy of reproach from poets whose ways I do not follow. In essence: as I tread the path of noble poets, their praise may be my due; yet for not aligning with lesser bards, their censure too is but expected. ॥23॥
श्लोक ( Shlok ) 24
कविरेव कवेर्वेत्ति काम काव्यपरिश्रमम् । वन्ध्या स्तनन्धयोत्पत्तिवेदनामिव नाकविः ॥२४॥
कवि ही कविके काव्य करनेके परिश्रमको अच्छी तरह जान सकता है, जिस प्रकार वंध्या स्त्री पुत्र उत्पन्न करनेकी वेदनाको नहीं जानती उसी प्रकार अकवि कविके परिश्रमको नहीं जान सकता ॥ २४।।
Only a poet can truly comprehend the labour of poetic creation—just as a barren woman knows nothing of the pain of childbirth, so too can a non-poet never grasp the toil of a poet. ॥24॥
श्लोक ( Shlok ) 25
गृहाणेहास्ति चेद्दोष स्वं धनं न निषिध्यते । खलासि प्रार्थितो भूयस्त्वं गुणान्न ममाग्रहीः ॥२५॥
रे दुष्ट, यदि मेरे इस ग्रन्थमें दोष हों तो उन्हें तू ग्रहण कर, क्योंकि वह तेरा ही धन है उसके लिये तुझे रुकावट नहीं है, परन्तु मैं तुझसे यह फिर भी प्रार्थना करता हूं कि तू मेरे गुणोंका ग्रहण मत कर । भावार्थ-दुर्जनोंके द्वारा दोष ग्रहण किये जानेपर रचना निर्दोष हो जावेगी और निर्दोष होनेसे सबको रुचिकर होगी परन्तु गुण ग्रहण किये जानेपर वह निर्गुण हो जानेसे किसीको रुचिकर नहीं होगी अतः यहाँ आचार्यने दुर्जन पुरुषसे कहा है कि तू मेरी इस रचनाके दोष ग्रहण कर क्योंकि वह तेरा धन है परन्तु गुणोंपर हाथ नहीं लगाना ।। २५।।
O wicked one! If there be any faults in this composition of mine, then take them—they are your rightful wealth, and none shall hinder you in claiming them. But this alone I implore of you: touch not my virtues.
For if the flaws are taken by the wicked, the work shall stand purified and thus become pleasing to all; but should the virtues fall into the hands of the unworthy, they shall lose their splendour and charm no one. Therefore, let the faults be yours—your due—yet spare the virtues. ॥25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
गुणागुणानभिज्ञेन कृता निश्वाऽथवा स्तुतिः । जात्यन्धस्येव धृष्टस्य रूपे हासाय केवलम् ॥२६॥
जिस प्रकार जन्मके अन्धे किसी धृष्ट पुरुषके द्वारा की हुई किसीके रूपकी स्तुति या निन्दा उसकी हँसीके लिये होती है उसी प्रकार गुण और दोषों के विषय में अजानकार पुरुषके द्वारा की हुई स्तुति या निन्दा केवल उसकी हँसीके लिये होती है ॥ २६॥
Just as the praise or censure of someone’s beauty by a blind man—born sightless—is but a cause for laughter, so too is the praise or blame of virtues and faults by one ignorant of their true nature merely a source of amusement. ॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27
अथवा सोऽनभिज्ञेऽपि निन्दतु स्तौतु वा कृतिम् । विदग्धपरिहासानामन्यथा क्वास्तु विश्रमः ॥२७॥
अथवा वह अजानकार मनुष्य भी मेरी रचनाकी निन्दा या स्तुति करे क्योंकि ऐसा न करनेसे चतुर पुरुषोंको हास्यका स्थान कहाँ प्राप्त होगा। भावार्थ जो मनुष्य उस विषयका जानकार न होकर भी किसीकी निन्दा या स्तुति करता है चतुर मनुष्य उसकी हँसी ही करते हैं ।॥ २७॥
Or let even that ignorant man offer praise or censure of my composition—for were he to remain silent, how then would the wise find occasion for laughter?
In essence: when one unskilled in a subject ventures to commend or condemn it, the discerning take delight not in his judgment, but in the folly of it. ॥27॥
श्लोक ( Shlok ) 28
गणयन्ति महान्तः किं क्षुद्रोपद्रवमल्पवत् । दाह्यं तृणाग्निना तूलं पत्युस्तापोऽपि नाम्भसाम् ॥२८॥
महापुरुष क्या तुच्छ मनुष्योंके समान छोटे छोटे उपद्रवोंको गिना करते हैं ? अर्थात् नहीं। तृण की आगसे रुई जल सकती है परन्तु उससे समुद्रके जलको संताप नहीं हो सकता ।।२८।।
Do the great ever concern themselves with petty troubles, like ordinary men? Surely not. A flame of dry grass may consume a wisp of cotton, yet it cannot bring even the faintest warmth to the waters of the vast ocean. ॥28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
काष्ठजोऽपि दहत्यग्निः काष्ठं तं तत्तु वर्द्धयेत् । प्रदीपायितमेताभ्यां सदसद्भावभासने ॥२ ९ ॥
काठ से उत्पन्न हुई अग्नि काठको जला देती है परन्तु काठ उसे बढ़ाता ही है, ये दोनों उदाहरण अच्छे और बुरे भावोंको प्रकट करने के विषयमें दीपकके समान आचरण करते हैं ।॥ २९॥
Fire, though born of wood, consumes the very wood that gave it life—yet the wood, in turn, only nourishes it further. In like manner, both praise and blame serve as lamps, revealing the nature of noble and ignoble emotions alike. ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30
स्तुतिनिन्दे कृति श्रुत्वा करोतु गुणदोषयोः । ते तस्य कुरुतः कीर्तिम् अकर्तुरपि सत्कृतेः ॥३०॥
दुष्ट पुरुष मेरी रचनाको सुनकर गुणोंकी स्तुति और दोषोंकी निन्दा करें क्योंकि यद्यपि वे उत्तम रचना करना नहीं जानते तथापि मेरी रचनाकी स्तुति अथवा निन्दा ही उनकी कीर्ति को करनेवाली होगी ॥३०॥
Let the wicked hear my composition and either praise its virtues or condemn its flaws—for though they know not how to craft noble works themselves, yet even their praise or blame of my creation shall become the very means by which their own renown is spoken. ॥30॥
श्लोक ( Shlok ) 31
सत्कवेरर्जुनस्येव शराः शब्दास्तु योजिताः । कर्ण दुस्संस्कृतं प्राप्य तुदन्ति हृदयं भृशम् ॥३१॥
उत्तम कविके वचन ठीक अर्जुनके बाणोंके समान होते हैं क्योंकि जिस प्रकार अर्जुनके बाण काममें लानेपर खोटे संस्कारवाले कर्ण (कर्ण नामका राजा) को पाकर उसके हृदयको दुःख पहुँचाते थे उसी प्रकार उत्तम कवि के वचन काममें लानेपर खोटे सँस्कारवाले कर्ण (श्रवण इन्द्रिय) को पाकर हृदयको अत्यन्त दुःख पहुँचाते हैं ।॥३१॥
The words of a noble poet are like the arrows of Arjuna—for just as Arjuna’s shafts, when loosed in battle, pierced the heart of Karṇa, who bore impure samskāras, so too do the verses of a great poet, when employed, strike deep sorrow into the hearts of ears tainted by base impressions.
In essence: the refined utterances of the wise trouble only those whose inner dispositions are impure, just as divine weapons find their mark in the unworthy. ॥31॥
श्लोक 32 से 46
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
Download PDF