आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 दीक्षा और तप का मार्ग
वृषभदेव कहते हैं कि धर्मरूपी वृक्ष का दयारूपी फूल धारण करने से मुक्तिरूपी फल प्राप्त होता है। तप ही अभिमान की रक्षा करता है और दीक्षा, गुण, और दया से युक्त तपस्वी जीवन ही श्रेष्ठ राज्य है। उनके उपदेश से राजकुमारों में वैराग्य जागता है और वे दीक्षा ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। दीक्षा को राजकन्या की तरह ग्रहण कर वे सुखी होते हैं। तीव्र तप से उनका शरीर कृश, परंतु तप की लक्ष्मी से देदीप्यमान होता है। वे जिनकल्प चारित्र में स्थित होकर तप करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
“तदलं स्पर्द्धया दध्वं यूयं धर्ममहातरोः । दयाकुसुममम्लानि यत्तन्मुक्तिफलप्रदम् ॥१२२॥
इसलिये ईर्ष्या करना व्यर्थ है, तुम लोग धर्मरूपी महावृक्षके उस दयारूपी फूलको धारण करो जो कभी भी म्लान नहीं होता और जिसपर मुक्तिरूपी महाफल लगता है ।॥१२२॥
Therefore, envy is but futile. Let you, instead, embrace the compassion-like flower that blooms upon the great tree of righteousness, which never fades, and upon which the fruit of liberation is borne.122
श्लोक ( Shlok ) 123
पराराधनदैन्योनं परैराराध्यमेव यत् । तद्वो महाभिमानानां तपो मानाभिरक्षणम् ॥१२३।।
जो दूसरोंकी आराधनासे उत्पन्न हुई दीनतासे रहित है बल्कि दूसरे पुरुष ही जिसकी आराधना करते हैं ऐसा तपश्चरण ही महाअभिमान धारण करनेवाले तुम लोगोंके मानकी रक्षा करनेवाला है ।।१२३।।
The practice of austerity, devoid of the humility born of others’ worship, and instead the object of reverence by others—such is the path of penance that shall uphold the dignity of you, who carry the great pride of superiority.123
श्लोक ( Shlok ) 124
दीक्षा रक्षा गुणा भृत्या दयेयं प्राणवल्लभा । इति ज्याय स्तपोराज्यमिदं श्लाघ्यपरिच्छदम् ॥ १२४॥
जिसमें दीक्षा ही रक्षा करनेवाली है, गुण ही सेवक है, और यह दया ही प्राणप्यारी स्त्री है इस प्रकार जिसकी सब सामग्री प्रशंसनीय है ऐसा यह तपरूपी राज्य ही उत्कृष्ट राज्य है ।। १२४।।
The kingdom of penance is the supreme realm, wherein initiation alone serves as the protector, virtues act as servants, and compassion is the beloved queen. In this way, all its components are worthy of praise, making it the most exalted of all dominions.124
श्लोक ( Shlok ) 125
इत्याकर्ण्य विभोर्वाक्यं परं निर्वेदमागताः । महाप्राव्राज्यमास्थाय निष्क्रान्तास्ते गृहाद्वनम् ॥१२५॥
इस प्रकार भगवान्के वचन सुनकर थे सब राजकुमार परम वैराग्यको प्रात हुए और महादीक्षा धारण कर घरसे वनके लिये निकल पड़े ।।१२५।।
Thus, upon hearing the words of the Lord, all the princes were filled with supreme renunciation. Adorning themselves with the great initiation, they left their homes and set forth towards the forest.125
श्लोक ( Shlok ) 126
निर्दिृष्टां गुरुणा साक्षाद्दीक्षां नववधूमिव । नवा इव वराः प्राप्य रेजुस्ते युवपार्थिवाः ॥१२६॥
साक्षात् भगवान् वृषभदेवके द्वारा दी हुई दीक्षाको नई स्त्रीके समान पाकर वे तरुण राजकुमार नये वरके समान बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे ।। १२६।।
Receiving the initiation directly from the Lord Ṛṣabhadeva, the young princes, like newly wedded brides adorned with a fresh husband, shone with unparalleled grace and radiance.126
श्लोक ( Shlok ) 127
या कचग्रहपूर्वेण प्रणयेनाति भूमिगा । तया पाणिगृहीत्येव दीक्षया ते धृतिं दधुः ॥१२७॥
उनकी वह दीक्षा किसी राजकन्याके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार राजकन्या कचग्रह अर्थात् केश पकड़कर बड़े प्रणय अर्थात् प्रेमसे समीप आती है उसी प्रकार वह दीक्षा भी कचग्रह अर्थात् केश लोंचकर बड़े प्रणय अर्थात् शुद्ध नयोंसे उनके समीप आई हुई थी इस प्रकार राज-कन्याके समान सुशोभित होनेवाली दीक्षाके दोनों हाथ पाकर (पक्षमें पाणिग्रहण संस्कार कर) वे राजकुमार अन्तःकरणमें सुखको प्राप्त हुए थे ।।१२७।।
That initiation seemed as though a royal maiden had drawn near—for just as a princess, in deep affection, grasps the hair in a gesture of intimate union, so too did that vow approach them, plucking their locks with sacred intent. Thus, receiving both hands of this maiden-like initiation—as in a wedding rite—the princes were inwardly filled with joy, their hearts illumined with bliss.127
श्लोक ( Shlok ) 128
तपस्तीव्रमथासाद्य ते चकासुर्नृ पर्षयः । स्वतेजोरुद्धविश्वाशा ग्रीष्ममर्काशवो यथा ॥१२८॥
अथानन्तर जिन्होंने अपने तेजसे समस्त दिशाओंको रोक लिया है ऐसे वे राजर्षि तीव्र तपश्चरण धारण कर ग्रीष्म ऋतुके सूर्यकी किरणोंके समान अतिशय देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १२८॥
Thereafter, those royal sages—having embraced intense austerities—shone with a brilliance like that of the summer sun’s rays, their spiritual radiance arresting all the quarters of the sky.128
श्लोक ( Shlok ) 129
तेऽतितीव्रैस्तपोयोगैस्तनूभूतां तनु दधुः । तपोलक्ष्म्या समुत्कीर्णामिव दीप्तां तपोगुणैः ॥१२९॥
वे राजर्षि जिस शरीरको धारण किये हुए थे वह तीव्र तपश्चरणसे कृश होनेपर भी तपके गुणोंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो-रहा था और ऐसा मालूम होता था मानो तपरूपी लक्ष्मीके द्वारा उकेरा ही गया हो ।।१२९।।
Though emaciated by the rigors of their severe austerities, the bodies of those royal sages radiated with a sublime glow born of penance. They seemed as though sculpted by the very hand of the Goddess of Austerity herself.129
श्लोक ( Shlok ) 130
स्थिताः सामयिके वृत्ते जिनकल्पविशेषिते । ते तेपिरे तपस्तीव्रं ज्ञानशुद्धयुपबृं हितम् ॥१३०॥
वे लोग जिनकल्प नामके सामायिक चारित्रमें स्थित हुए और ज्ञानकी विशुद्धि से बढ़ा हुआ तीव्र तपश्चरण करने लगे ॥ १३०॥
They entered the Jinakalpa path of moment-to-moment conduct, upholding pure restraint, and—strengthened by the clarity of true knowledge—undertook intense austerities with ever-deepening resolve.130
श्लोक ( Shlok ) 131
वैराग्यस्य परां कोटीमारूढास्ते युगेश्वराः । स्वसाच्चक्रुस्तपोलक्ष्मी राज्यलक्ष्म्यामनुत्सुकाः ॥१३१॥
वैराग्यकी चरम सीमाको प्राप्त हुए उन तरुण राजर्षियों ने राज्यलक्ष्मीसे इच्छा छोड़कर तपरूपी लक्ष्मीको अपने वश किया था ।।१३१॥
Having reached the pinnacle of renunciation, those youthful royal sages turned away from the charms of regal fortune and brought under their command the Goddess of Austerity herself.131
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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