आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
मध्याह्न की गर्मी और प्रकृति
जंगली हाथी और शूकर गर्मी से सरोवरों में शरण लेते थे। हंस मृणाल से ढके और चकवा शेवाल से नीले कुरते सा प्रतीत होता था। राजहंस कमल के छत्र तले गोते लगाते थे। सूर्य की तीव्रता नदियों के किनारों पर हंसों को असंतोष देती थी। सूर्य, मध्यस्थ होकर भी संतापकारी था। रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें कमल पर ओस सी शोभा बढ़ाती थीं, मानो मोती पिघलकर तरल हो गए हों।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
वन्याः स्तम्बेरमा भेजुः सरसीरवगाहितुम् । मदस्त्रुतिषु तप्तासु मुक्ता मधुकरव्रजैः ॥९२॥
मद का प्रवाह गर्म हो जाने से जिन्हें भ्रमरों के समूह ने छोड़ दिया है ऐसे जंगली हाथी अवगाहन करने के लिये सरोवरों की ओर जाने लगे ।॥९२॥
“As the flow of nectar became warm, these wild elephants, abandoned by groups of bees, began to head towards the ponds for a bath.” (92)
श्लोक ( Shlok ) 93
शाखाभङ्गैः कृतच्छायाः प्रयान्तो गजयूथपाः । “शाखोद्धारमिवातन्वन् खरांशोः करपीडिताः ॥९३॥
सूर्य की किरणों से पीड़ित हुए हाथी वृक्षोंकी डालियां तोड़ तोड़कर अपने ऊपर छाया करते हुए जा रहे थे और उनसे ऐसे मालूम होते थे मानो शाखाओं का उद्धार ही कर रहे हों ।॥९३॥
“Afflicted by the sun’s rays, the elephants were breaking off tree branches and using them to shade themselves as they moved along—appearing as if they were rescuing the branches themselves.” (93)
श्लोक ( Shlok ) 94
यूथं वनवराहाणामुपर्युपरि पुञ्जितम् । तदा प्रविश्य ‘वेशन्तमधिशिश्ये सकर्दमम् ॥९४॥
उस समय जंगली शूकरोंका समूह कीचड़ सहित छोटे छोटे तालाबोंमें प्रवेश कर परस्पर एक दूसरेके ऊपर इकट्ठे हो शयन कर रहे थे ।।९४।।
“At that time, groups of wild boars entered the muddy little ponds and lay piled atop one another, resting together.” (94)
श्लोक ( Shlok ) 95
मृणालैरङ्गमावेष्टय स्थिता हंसा विरेजिरे । प्रविष्टाः शरणायेव शशाङ्ककरपञ्जरम् ॥९५॥
अपने शरीरको मृणालके तन्तुओं से लपेट-कर बैठे हुए हंस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो अपनी रक्षा करनेके लिये चन्द्रमाकी किरणोंसे बने हुए पिंजड़े में ही घुस गये हों ।॥ ९५।।
“The swans, sitting with their bodies wrapped in lotus fibers, appeared so graceful—as if they had entered a cage woven from moonbeams to protect themselves.” (95)
श्लोक ( Shlok ) 96
चक्रवाकयुवा भेजे घनं शैवलमाततम् । सर्वाङ्गलग्नमुष्णालुर्विनीलमिव कञ्चुकम् ॥९६॥
जो उष्णता सहन करने में असमर्थ है ऐसे किसी तरुण चकवाने अपने सर्व शरीरमें लगे हुए, मोटे मोटे तथा विस्तृत शेवाल को धारण कर रक्खा था और उससे वह ऐसा मालूम होता था मानो नीले रंगका कुरता ही धारण कर रहा हो ।।९६।।
“A young chakravāka bird, unable to bear the heat, had clinging all over its body thick and broad strands of algae, making it appear as though it were wearing a blue-colored tunic.” (96)
श्लोक ( Shlok ) 97
पुण्डरीका तपत्रेण कृतच्छायोऽब्जिनीवने । राजहंसस्तदा भेजे हंसीभिः सह मज्जनम् ॥९७।।
जिसने कमलिनियोंके वनमें सफेद कमलरूप छत्रसे छाया बना ली है ऐसा राजहंस उस मध्याह्न के समय अपनी हंसियोंके साथ जलमें गोते लगा रहा था ।। ९७।।
“That royal swan, which had created shade with a white lotus held like a parasol in the forest of lotuses, was diving into the water along with its companions during the midday heat.” (97)
श्लोक ( Shlok ) 98
विसभङ्गैः कृताहारा मृणालैरवगुण्ठिताः । विसिनीपत्रतल्पेषु शिश्यिरे हंसशावकाः ॥९८॥
जिन्होंने मृणालके टुकड़ों का आहार किया है और मृणालके तन्तुओंसे ही जिनका शरीर ढका हुआ है ऐसे हंसोंके बच्चे कमलिनी के पत्र रूपी शय्या पर सो रहे थे ।। ९८।।
“The young swans, having fed on pieces of lotus stalks and wrapped in lotus fibers, were sleeping on the leaf-bed of a lotus plant.” (98)
श्लोक ( Shlok ) 99
इति शारदिके तीव्र तन्वाने तापमातपे । पुलिनेषु प्रतप्तेषु न हंसा धृतिमादधुः ॥९९॥
इस प्रकार शरऋतु का घाम तीव्र संताप फैला रहा था और उससे तपे हुए नदियोंके किनारों पर हंसों को संतोष नहीं हो रहा था ।। ९९।।
“In this way, the autumn sun was spreading intense heat, and even on the riverbanks, the heat-stricken swans were unable to find relief.” (99)
श्लोक ( Shlok ) 100
मध्यस्थोऽपि तदा तीव्र तताप तरणिर्भुवम् । नूनं तीव्रप्रतापानां माध्यस्थ्यमपि तापकम् ॥१००॥
उस समय सूर्य यद्यपि मध्यस्थ था, आकाशके बीचोंबीच स्थित था, पक्षपात रहित था तथापि वह पृथित्रीको बहुत ही संतप्त कर रहा था सो ठीक ही है क्योंकि तीव्र प्रतापी पदार्थोंका मध्यस्थ रहना भी संताप करनेवाला होता है ।॥१००॥
“At that time, although the sun was in the middle of the sky—neutral and centered—it was greatly scorching the earth. And rightly so, for even when intensely powerful entities remain impartial and in the middle, they still cause suffering.” (100)
श्लोक ( Shlok ) 101
स्वेदबिन्दुभिराबद्धजालकानि’ नृपस्त्रियः । वदनान्यृहुरब्जिन्यः पद्मानीवाम्बुशीकरैः ॥१०१॥
जिस प्रकार कमलिनियां (कमलकी लताएं) जलकी बूंदोंसे सुशोभित कमलोंको धारण करती हैं उसी प्रकार महाराज भरतकी स्त्रियां पसीने की बूंदोंसे जिनपर मोतियोंका जाल-सा बन रहा है ऐसे अपने मुख धारण कर रही थीं ॥१०१।।
“Just as lotus creepers bear beautiful lotuses adorned with dewdrops, in the same way, the women of King Bharata bore their faces, upon which droplets of sweat shimmered like a net of pearls.” (101)
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91