आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 प्रजारक्षा
आत्मरक्षा न करने वाला क्षत्रिय अपमृत्यु से दुखदायी संसार में पड़ता है। बुद्धिमान क्षत्रिय को दोनों लोकों में आत्मरक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए। प्रजारक्षा राजा का मौलिक गुण है। जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों की रक्षा करता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। अपराधी प्रजा को अंगछेदन जैसे कठोर दंड न देकर, अनुरूप दंड से नियंत्रित करना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
तस्मिन्नेव भवे शक्तः कृत्वा कर्मपरिक्षयम् । सिद्धिमाप्नोत्यशक्तस्तु त्रिदिवाग्रमवाप्नुयात् ॥१३२॥
जो समर्थ है वह उसी भवमें कर्मोंका क्षय कर मोक्षको प्राप्त होता है और जो असमर्थ है वह स्वर्गके अग्रभाग अर्थात् सर्वार्थसिद्धिको प्राप्त होता है ।। १३२॥
He who is fully capable attains liberation in that very birth by annihilating all karmas; and he who is yet incapable ascends to the highest realm of the heavens—Sarvārthasiddhi, the abode of complete fulfillment.132
श्लोक ( Shlok ) 133
ततश्च्युतः परिप्राप्तमानुष्यः परमं तपः । कृत्वान्ते निर्वृति याति निर्द्धूताखिलबन्धनः ॥१३३॥
वह वहांसे च्युत हो मनुष्यपर्याय प्राप्त कर और परम तपश्चरण कर आयुके अंतमें समस्त कर्म-बंधनको नष्ट करता हुआ निर्वाणको प्राप्त होता है ॥ १३३॥
Falling from that celestial state, he is reborn in human form, where, through the practice of supreme austerities, he destroys all karmic bonds at the end of his life—thus attaining final liberation, Nirvāṇa.133
श्लोक ( Shlok ) 134
क्षत्रियो यस्त्वनात्मज्ञः कुर्यान्नात्मानुपालनम् । विषशस्त्रादिभिस्तस्य दुर्मृ तिर्ध्रु वभाविनी ॥१३४॥
आत्माका स्वरूप न जाननेवाला जो क्षत्रिय अपने आत्माकी रक्षा नहीं करता है उसकी विष, शस्त्र आदिसे अवश्य ही अपमृत्यु होती है ॥१३४।।
The Kshatriya who, in ignorance of the true nature of the soul, fails to safeguard his own self, surely meets with an untimely death—struck down by poison, weapons, or other such calamities.134
श्लोक ( Shlok ) 135
दुर्मृतश्च दुरन्तेऽस्मिन् भवावर्ते दुरुतरे । पतित्वाऽमुत्र दुःखानां दुर्गतौ भाजनं भवेत् ॥१३५॥
और अपमृत्युसे मरा हुआ प्राणी दुःखदायी तथा कठिनाईसे पार होने योग्य इस संसाररूप आवर्तमें पड़कर परलोकमें दुर्गतियोंके दुःखका पात्र होता है ।॥१३५॥
And the being who meets an untimely death is cast into the turbulent whirl of worldly existence—full of sorrow and hardship—and becomes subject to the torments of woeful destinies in the world beyond.135
श्लोक ( Shlok ) 136
ततो मतिमताऽऽत्मीयविनिपातानुरक्षण । विधेयोऽस्मिन् महायत्नो लोकद्वय हितावहे ।।१३६॥
इसलिये बुद्धिमान् क्षत्रियको दोनों लोकोंमें हित करनेवाले, आत्मा के इस विघ्नबाधाओंसे रक्षा करने-में महाप्रयत्न करना चाहिये ।।१३६।।
Therefore, the wise Kshatriya must exert himself with utmost effort to protect the soul from all hindrances and afflictions, and to secure its true welfare in both this world and the world beyond. 136
श्लोक ( Shlok ) 137
कृतात्मरक्षणश्चैव प्रजानामनुपालने । राजा यत्तं प्रकुर्वीत राज्ञां मौलो ह्ययं गुणः ॥१३७॥
इस प्रकार जिसने आत्माकी रक्षा की है ऐसे राजाको प्रजाका पालन करनेमें प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि यह राजाओंका मौलिक गुण है ।। १३७।।
Thus, the king who has safeguarded his own soul must earnestly strive to protect his subjects, for such compassionate guardianship is the fundamental virtue of kingship.137
श्लोक ( Shlok ) 138
कथं च पालनीयास्ताः प्रजाश्चेत्तत्प्रपञ्चतः । पुष्टं गोपालदृष्टान्तमूरीकृत्य विवृण्महे ॥१३८॥
उस प्रजाका किस प्रकार पालन करना चाहिये यदि आप यह जानना चाहते हैं तो हम ग्वालिये-का सुदृढ़ उदाहरण लेकर विस्तारके साथ उसका वर्णन करते हैं ।॥ १३८ ॥
If you seek to know how such subjects ought to be protected, then let us illustrate it in detail by drawing upon the steadfast and noble example of the cowherd.138
श्लोक ( Shlok ) 139
गोपालको यथा यत्नाद् गाः संरक्षत्यतन्द्रितः । क्ष्मायालश्च प्रयत्नेन तथा रक्षेन्निजाः प्रजाः ॥१३९॥
जिस प्रकार ग्वालिया आलस्यरहित होकर बड़े प्रयत्नसे अपनी गायोंकी रक्षा करता है उसी प्रकार राजाको बड़े प्रयत्नसे अपनी प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ।। १३९।।
Just as the cowherd, free from all sloth, diligently protects his cows with great care and effort, even so must the king strive earnestly to safeguard his subjects. 139
श्लोक ( Shlok ) 140 –141
तद्यथा यदि गौः कश्चिदपराधी स्वगोकुले । तमङ्गच्छेदनाद्युग्रदण्डैस्तीव्रमयोजयन् ॥१४०।।पालयेवनुरूपेण दण्डेनेव नियन्त्रयन् । यथा गोपस्तथा भूपः प्रजाः स्वाः प्रतिपालयेत् ॥१४१॥
आगे इसीका खुलासा करते हैं-यदि अपनी गायोंके समूहमें कोई गाय अपराध करती है तो वह ग्वालिया उसे अंगछेदन आदि कठोर दण्ड नहीं देता हुआ अनुरूप दण्डसे नियन्त्रण कर जिस प्रकार उसकी रक्षा करता है उसी प्रकार राजाको भी अपनी प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥१४०-१४१।।
Now this shall be further explained—If any cow within his herd commits a fault, the cowherd does not inflict upon her cruel punishments such as maiming or mutilation. Instead, he disciplines her with suitable measures and still ensures her protection. In the same manner, the king too must safeguard his subjects, correcting them with appropriate discipline while preserving their well-being.140 –141
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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