आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 148 to 150
श्लोक ( Shlok ) 148
शरदुप हितकान्तिं प्रान्तकान्तारराजीविरचितपरिधानां “सैकतारोहरम्याम् । युवतिमिव गभीरावर्तनाभिं प्रपश्यन् प्रमदमतुलमूहे क्ष्मापतिः स्वःस्रवन्तीम् ॥१४८।।
शरऋतुके द्वारा जिसकी कान्ति बढ़ गई है, किनारे के बनोंकी पंक्ति ही जिसके वस्त्र हैं, जो बालूके टीलेरूप नितम्बोंसे बहुत ही रमणीय जान पड़ती हैं, गंभीर भंवर ही जिसकी नाभि है और इस प्रकार जो एक तरुण स्त्रीके समान जान पड़ती है ऐसी गङ्गा नदीको देखते हुए राजा भरतने अनुपम आनन्द धारण किया था ॥१४८।।
Beholding the Ganga, whose beauty had increased in the autumn season, whose garments were the rows of forests lining her banks, whose sandbanks resembled graceful hips, and whose deep whirlpools formed her navel — appearing like a youthful woman — King Bharata experienced an incomparable joy.”
(Verse 148)
श्लोक ( Shlok ) 149
सरसिजमकरन्दोद्गन्धिराधूतरोधोवनकिसलयमन्दां दोलनोदूढ मान्द्यः । असकृदमर सिन्धोराधुनानस्तरङ्गा नहृत नृपबधूनामध्वखेदं समीरः ॥१४९॥
जो कमलोंकी मकरन्दसे सुगन्धित है, कुछ कुछ कम्पित हुए किनारेके यनके पल्लवोंके धीरे धीरे हिलनेसे जिसका मन्दपना प्रकट हो रहा है और जो गङ्गा नदीकी तरंगोंको बार-बार हिला रहा है ऐसा वहांका वायु रानियोंके मार्गके परिश्रमको हरण कर रहा था ।॥१४९।।
“The breeze there, fragrant with the pollen of lotuses, gently stirred the tender leaves of the trees along the riverbanks, revealing a soothing coolness. It softly rippled the waves of the Ganga again and again, relieving the fatigue of the queens who were traveling that path.”(Verse 149)
श्लोक ( Shlok ) 150
तामाक्रान्तहरिन्मुखां कृतरजोधूति जगत्पावनीम् मासेव्यां द्विजकुञ्जरैरविरतं सन्तापविच्छेदिनीम् । जैनीं कीर्तिमिवाततामपमलां शश्वज्जनानन्दिनीं निध्यायन् विबुधापगां निधिपतिः प्रीतिं परामासवत् ॥१५०।।
वह गङ्गा ठीक जिनेन्द्रदेवकी कीतिके समान थी क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्र देवकी कीर्ति ने समस्त दिशाओं को व्याप्त किया है उसी प्रकार गङ्गा नदीने भी पूर्व दिशाको व्याप्त किया था, जिनेन्द्र भगवान् की कीर्तिने जिस प्रकार रज अर्थात् पापोंका नाश किया है उसी प्रकार गङ्गा नदीने भी रज अर्थात् धूलिका नाश किया था, जिनेन्द्र भगवान्की कीर्ति जिस प्रकार जगत्को पवित्र करती है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी जगत्को पवित्र करती है, जिनेन्द्र भगवान्की कीर्ति जिस प्रकार द्विज कुंजर अर्थात् श्रेष्ठ ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्योंके द्वारा सेवित है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी द्विज कुंजर अर्थात् पक्षियों और हाथियोंके द्वारा सेवित है, जिनेन्द्र भगवान्की कीर्ति जिस प्रकार निरन्तर संसार-भूमण-जन्य संतापको दूर करती है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न संतापको नष्ट करती थी और जिनेन्द्र भगवान्की कीर्ति जिस प्रकार विस्तृत, निर्मल और सदा लोगोंको आनन्द देनेवाली है उसी प्रकार वह गङ्गा नदी भी विस्तृत, निर्मल तथा सदा लोगोंको आनन्द देती थी। इस प्रकार उस गङ्गा नदीको देखते हुए निधियोंके स्वामी भरत महाराज परम प्रीतिको प्राप्त हुए थे ॥१५०।।
“That Ganga was just like the glory of the Jina Lords. Just as the fame of the Jinas spreads in all directions, the Ganga had spread toward the eastern direction. As the Jinas’ glory destroys raja (passions and sins), so too did the Ganga remove raja (dust). The fame of the Jinas purifies the world, and so does the Ganga purify all creation. The glory of the Jinas is served by noble Brahmins, Kshatriyas, and Vaishyas — likewise, the Ganga is served by birds and elephants. Just as the Jinas’ fame dispels the suffering caused by the cycles of rebirth, so the Ganga removes the burning heat caused by the sun’s rays. And just as their glory is vast, pure, and ever delightful to people, so too is the Ganga — wide, clear, and a constant source of joy. Witnessing such a divine river, King Bharata, the lord of treasures, was filled with supreme joy.”
(Verse 150)
इत्यार्ष भगवज्जिन सेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहे भरतराजविग्विजयोद्योगवर्णनं नाम वर्विवशतितमं पर्व ।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहके हिन्दी-भाषानुवादमें भरतराजकी दिग्विजयके उद्योगको वर्णन करनेवाला छब्बीसवां पर्व पूर्ण हुआ ।
“In this way, the twenty-sixth chapter, describing King Bharata’s campaign of world conquest, is concluded in the English translation of the Triṣaṣṭi-Lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the revered Jinseṇa Āchārya.”
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन
पर्व 27 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147