आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 पुरोहित का परामर्श
पुरोहित भरत की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उनकी वाणी में माधुर्य और सरलता अद्वितीय है। वे स्वीकार करते हैं कि वे केवल शास्त्रज्ञ हैं, परंतु भरत जैसे राजा को राजनीति की समझ में कोई समकक्ष नहीं। पुरोहित बताते हैं कि चक्ररत्न तब तक नहीं रुकता जब तक दिग्विजय पूर्ण न हो। वे संकेत देते हैं कि भरत ने बाहरी शत्रुओं को जीत लिया, परंतु घर के भीतर (अंतर्मंडल) अभी शुद्धता की आवश्यकता है। विशेष रूप से, उनके भाई उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहे, जो चक्र के रुकने का कारण हो सकता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
अस्ति माधुर्यमस्त्योजस्तदस्ति पदसौष्ठवम् । अस्त्यर्थानुगमोऽन्यत्कि यन्नास्ति त्वद्वचोमये ॥३२॥
जो माधुर्य, जो ओज, जो पदोंका सुन्दर विन्यास और जो अर्थकी सरलता आपके वचनों में नहीं है वह क्या किसी दूसरी जगह है ? अर्थात् नहीं है ॥३२॥
“The sweetness, the radiance, the beautiful arrangement of words, and the simplicity of meaning that are not present in your speech—where else could they possibly be found? Verily, they are nowhere else.” ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33
शास्त्रज्ञा वयमेकान्तात् नाभिज्ञाः कार्ययुक्तिषु । शास्त्रप्रयोगवित् कोऽन्यस्त्वत्समो राजनीतिषु ॥३३॥
हम लोग तो केवल शास्त्र को जाननेवाले हैं कार्य करने की युक्तियों में अभिज्ञ नहीं हैं परन्तु राजनीतिमें शास्त्र के प्रयोग को जाननेवाला आपके समान दूसरा कौन है ? अर्थात् कोई नहीं है ।॥३३॥
“We are but scholars of the scriptures, not versed in the strategies of action. Yet, who else, if not you, possesses the knowledge of applying the scriptures in matters of governance? Indeed, there is no one else.” ॥33॥
श्लोक ( Shlok ) 34
त्वमादिराजो रार्जाषस्तद्विद्यास्त्व “दुपक्रमम् । तद्विदस्तत्प्रयुञ्जाना न जिह्रीमः कथं वयम् ॥३४॥
आप राजाओंमें प्रथम राजा हैं और राजाओंमें ऋषिके समान श्रेष्ठ होनेसे राजर्षि हैं यह राजविद्या केवल आपसे ही उत्पन्न हुई है इसलिये उसे जाननेवाले हम लोगआपके ही सामने उसका प्रयोग करते हुए क्यों न लज्जित हों ।॥ ३४।।
You are the foremost of kings, and, being superior to other kings, akin to a sage, you are a Rajarishi. This royal knowledge has originated solely from you, and thus, how could we, who apply it before you, fail to feel humbled?” ॥34॥
श्लोक ( Shlok ) 35
तथापि त्वत्कृतोऽस्मासु सत्कारोऽनन्यगोचरः । तनोति गौरवं लोके ततः स्मो वक्तुमुद्यताः ॥३५॥
तथापि आपके द्वारा किया हुआ हमारा असाधारण सत्कार लोकमें हमारे गौरवको बढ़ा रहा है इसलिये ही में कुछ कहनेके लिये तैयार हुआ हूँ ।॥ ३५॥
“Nevertheless, the extraordinary honor you have bestowed upon us enhances our glory in the world, and it is for this reason alone that I am now prepared to speak.” ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
इत्यनुश्रुतमस्माभिर्देव दैवज्ञशासनम् । नास्ति चक्रस्य विश्रान्तिः सावशेषे दिशां जये ॥३६॥
हे देव, हम लोगोंने निमित्तज्ञानियोंका ऐसा उपदेश सुना है कि जबतक दिग्विजय करना कुछ भी बाकी रहता है तब तक चक्ररत्न विश्राम नहीं लेता अर्थात् चक्रवर्तीकी इच्छाके विरुद्ध कभी भी नहीं रुकता है ।॥ ३६॥
“O Divine One, we have heard from the wise that as long as there remains any task of conquest, the divine discus does not rest; it never ceases contrary to the will of the sovereign.” ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
ज्वलर्चिः करालं वो जैत्रमस्त्रमिदं ततः । संस्तम्भितमिवातर्क्य पुरद्वारि विलम्बते ॥३७॥
जो जलती हुई ज्वालाओं से भयंकर है ऐसा वह आपका विजयी शस्त्र नगरके द्वारपर गुप्त रीतिसे रोके हुएके समान अटक कर रह गया है ॥३७॥
“That victorious weapon of yours, which is more fearsome than the blazing flames, has become halted, as if it were secretly restrained at the city gate, unable to proceed.” ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
अरिर्मित्रमर्मित्र मित्रमित्रमिति श्रुतिः । श्रुतिमात्रे स्थिता देव प्रजास्त्वय्यनुशासति ॥३८॥
हे देव, आपके प्रजाका शासन करते हुए शत्रु, मित्र, शत्रुका मित्र, और मित्रका मित्र ये शब्द केवल शास्त्रमें ही रह गये हैं अर्थात् व्यवहारमें न आपका कोई मित्र है और न कोई शत्रु ही है सब आपके सेवक हैं ।। ३८ ।।
“O Divine One, while ruling over your subjects, the terms ‘enemy,’ ‘friend,’ ‘enemy’s friend,’ and ‘friend’s friend’ remain confined to the scriptures; in practice, you have neither friend nor foe—everyone is but your servant.” ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
तथाप्यस्त्येव जेतव्यः पक्षः कोऽपि तवाधुना । योऽन्तर्गृहै कृतोत्थानः क्रूरो रोग इवोदरे ॥३९॥
तथापि अब भी कोई आपके जीतने योग्य रह गया है और वह उदर में किसी भयंकर रोगके समान आपके घरमें ही प्रकट हुआ है ॥३९॥
“Yet, even now, there remains one who is worthy of your conquest, and he has appeared within your very household, like a dreadful ailment manifesting in the belly.” ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
बहिर्मण्डलमेवासीत् परिक्रान्तमिदं त्वया । अन्तर्मण्डलसंशुद्धिर्म नाग्नाद्यापि जायते ॥४०॥
आपके द्वारा यह बाह्यमण्डल ही आक्रान्त-पराजित हुआ है परन्तु अन्तर्मण्डल की विशुद्धता तो अब भी कुछ नहीं हुई है। भावार्थ-यद्यपि आपने बाहरके लोगोंको जीत लिया है तथापि आपके घरके लोग अब भी आपके अनुकूल नहीं हैं ।॥४०॥
“The external realm has indeed been overpowered and subdued by your might, yet the purity of the inner realm remains unachieved. The meaning is clear—though you have triumphed over those outside, the people within your household still do not align with your will.” ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
जितजेतव्यपक्षस्य न नम्ना भातरस्तव । व्युत्थिताश्च सजातीया विघाताय न नु प्रभोः ॥४१॥
यद्यपि आपने समस्त शत्रु पक्षको जीत लिया है तथापि आपके भाई आपके प्रति नम्र नहीं हैं-उन्होंने आपके लिये नमस्कार नहीं किया है। वे आपके विरुद्ध खड़े हुए हैं और सजातीय होने के कारण आपके द्वारा विघात करने योग्य भी नहीं हैं ।॥४१॥
“Although you have conquered all opposing forces, your brothers have not shown humility towards you—they have not bowed in respect. They stand in opposition to you, and due to their kinship, they cannot be easily subdued by your hand.” ॥41॥
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
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