चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 194 to 201
श्लोक ( Shlok ) 194 – 197
सप्रश्रयं समीक्ष्यैनमन्वर्युक्त मदत्यये । अष्टौ लाभानवाप्यान्ते क्षितेर्भीकारमात्मजम् ॥ १९४ ॥आप्स्यस्याशु त्वमित्याह महीपालः प्रियाप्रियम् । श्रुत्वा शोकप्रमोदाभ्यां तामाविर्भूतचेतसम् ॥१९५॥राशीं राजा समालोक्य सवुक्तया समतर्पयत् । सुखेनैवं तयोः काले याति कश्वित्समागतः ॥ १९६॥देवलोकास्थितिं लेभे देवीगर्भगृहे सुखम् । स पुण्यो राजहंसो वा शारदाब्जसरोवरे ॥ १९७ ॥
और बड़ी विनयके साथ राजाके दर्शन कर स्वप्नों का फल पूछने लगी। इसके उत्तर में राजाने कहा कि तू मेरे मरनेके बाद शीघ्र ही ऐसा पुत्र प्राप्त केरेगी जो आठ लाभोंको पाकर अन्त में पृथिवीका भोक्ता होगा। स्वप्नोंका प्रिय और अप्रिय फल सुनकर रानीका चित्र शोक तथा दुःखसे भर गया। उसकी व्यग्रता देख राजाने उसे अच्छे शब्दोसे संतुष्ट कर दिया। तदनन्तर दोनोंका काल सुखसे व्यतीत होने लगा। इसके बाद किसी पुण्यात्मा देव का जीव स्वर्गसे च्युत होकर रानीके गर्भरूपी गृहमें आया और इस प्रकार सुखसे रहने लगा जिस प्रकार कि शरदऋतुके कमलोंके सरोवरमें राजहंस रहता है ।। १९४-१९७ ।।
“And bowing with great humility upon seeing the king, she began to ask about the fruit of her dreams. In response, the king said, ‘Soon after my death, you will give birth to a son who, after achieving eight major accomplishments, will ultimately rule the earth.’ Hearing the pleasant yet tragic outcome of the dreams, the queen’s heart was filled with grief and sorrow. Seeing her distress, the king comforted her with soothing words. Thereafter, time passed happily for them both. Subsequently, the soul of a meritorious celestial being descended from heaven, entered the womb-palace of the queen, and began to reside there in pure bliss, just like a royal swan dwelling in a lake filled with autumn lotuses. || 194-197 ||”
श्लोक ( Shlok ) 198 – 200
अथान्येधुर्वणिग्वर्यो बास्तब्यस्तत्पुरान्तरे । धनी गन्धोत्कटो नाम शीलगुप्तमहामुनिम् ॥ १९८ ॥मनोहरवनोद्याने शानत्रयविलोचनम् । विलोक्य विनयन्त्रित्वा प्राप्राक्षीद्भगवन्मम ॥ १९९ ॥बहवोऽरुपायुषोऽभूर्वस्तनयाः पापपाकतः । दीर्घायुषो भविष्यन्ति सुता मे किमतः परम् ॥ २०० ॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन उसी नगर में रहनेवाले गन्धोत्कट नामके धनी सेठने मनोहर नामक उद्यानमें तीन ज्ञानके धारी शीलगुप्त नामक मुनिराजके दर्शनकर विनयसे उन्हें नमस्कार किया और पूछा कि हे भगवन् ! पाप कर्मके उदयसे मेरे बहुतसे अल्पायु पुत्र हुए हैं क्या कभी दीर्घायु पुत्र भी होंगे ? ॥ १९८-२०० ॥
“Thereafter, on another day, a wealthy merchant named Gandhotkata, who lived in that very city, visited the sage Sheelagupta—the possessor of three types of knowledge—in the beautiful Manohar garden. Bowing to him with great humility, the merchant asked, ‘O Lord! Due to the ripening of my past sins, I have had many short-lived sons. Will I ever be blessed with a long-lived son?’ || 198-200 ||”
श्लोक ( Shlok ) 201
इति सोऽपि दयालुत्वान्मुनीशः प्रत्यभाषत । बार्ड समुपलप्स्यन्ते त्वया सुचिरजीविनः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार पूछनेपर दयालुतावश मुनिराजने कहा कि हाँ तुम भी चिरंजीवी पुत्र प्राप्त करोगे ।। २०१ ॥
“Upon being asked in this manner, out of compassion, the Muniraj said, ‘Yes, you too will be blessed with a long-lived son.’ || 201 ||”
श्लोक 202 से 212
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193
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