राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 595 to 604
श्लोक ( Shlok ) 595 – 604
धन्विनः पातयन्ति स्म गिरीन्वा करिणो यहून् । एकेनैकः शरेणेभमवधीन्मर्मभेदिना ॥ ५९५ ॥स्वीकुर्वन्त्यत एवान्यमर्मज्ञान् विजिगीषवः । प्रघातमूच्छितः कश्चित्प्रवहलोहितो भटः ॥ ५९६ ॥आपतद् गृद्धपक्षानिलोत्थितोऽहन्बहून् पुनः । नीयमानमिवात्मानं वीक्ष्यान्यो देवकन्यया ॥ ५९७ ॥सोत्सवः सहसोदस्थात्सहासो दरमूच्छितः । वाणाङ्किते रणत्तूर्यरणरङ्गे अनिरन्तरम् ॥ ५९८ ॥नृत्यत्कबन्धके सद्यः शरच्छादितमण्डपे । बद्धान्त्रजालमालोऽन्यो “बहलास्त्रास्त्रवार्चितः ॥ ५९९ ॥राक्षसेन विवाहेन वीरलक्ष्मी समाक्षिपत् । डाकिन्यश्चटुलं नेटुरारुवन् भैरवं शिवाः ॥ ६०० ॥ऊर्ध्ववक्त्रवमवह्निविस्फुलिङ्गविभीषणाः । उत्क्षिप्तकर्तिकाजालश्चललोलकपालभृत् ॥ ६०१ ॥अतिपातनिपीतास्त्रमवमीद्राक्षसीगणः । निशातशरनाराचचक्रायुपनिपातनात् ॥ ६०२ ॥निःप्रभं निःप्रतापं च तदाभूदर्कमण्डलम् । स्याद्वादिभिः समाक्रान्तकुवादिकुलवतदा ॥ ६०३ ॥दशाननबलान्यापन् भङ्ग राघवसैनिकैः । इति प्रवृते संग्रामे सुचिरं तद्णाङ्गणे ॥ ६०४ ॥
धनुष धारण करनेवाले कितने ही योद्धा लक्ष्य पर लगाई हुई अपनी दृष्टिके साथ ही साथ शीघ्र पड़नेवाले तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा पर्वतोंके समान बहुतसे हाथियोंको मारकर गिरा रहे थे। किसी एक योद्धाने अपने मर्मभेदी एक ही बाणसे हाथीको मार गिराया था सो ठीक ही है क्योंकि इसीलिए तो विजय-की इच्छा करनेवाले शूरवीर दूसरेका मर्म जाननेवालोंको स्वीकार करते हैं-अपने पक्षमें मिलाते हैं। कोई एक योद्धा चोटले मूच्छित हो खूनसेलथपथ हो गया था तथा आये हुए गृद्ध पक्षियोंके पंखों-की वायुसे उठकर पुनः अनेक योद्धाओंको मारने लगा था। कोई एक अल्प मूर्च्छित योद्धा. अपने आपको देवकन्या द्वारा ले जाया जाता हुआ देख उत्सवके साथ हँसता हुआ अकस्मात् उठ खड़ा हुआ । जो बाणोंसे भरा हुआ है, जिसमें रणके मारू बाजे गूंज रहे हैं, जिसमें निरन्तर शिर रहित धड़ नृत्य कर रहे हैं, और जिसमें बाणोंका मण्डप छाया हुआ है ऐसे युद्ध-स्थलमें जिसकी सब आंतड़ियोंका समूह बँध रहा है और जो बहुतसे खूनके प्रवाहसे पूजित है ऐसे किसी एक योद्धाने राक्षस-विवाह के द्वारा वीर-लक्ष्मीको अपनी ओर खींचा था। उस युद्धस्थलमें ढाकिनियाँ बड़ी चपलताने नृत्य कर रही थीं और शृगाल भयङ्कर शब्द कर रहे थे। वे शृगाल ऊपरकी ओर किये हुए मुखोंसे निकलनेवाले अग्निके तिलगोंसे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ने थे। जिसकी कैंचियोंका समूह ऊपरकी ओर उठ रहा है और जो चञ्चल कपालोंको धारण कर रहा है ऐसा राक्षसियोंका समूह बहुत अधिक पिये हुए खूनको उगल रहा था। अत्यन्त तीक्ष्ण बाण नाराच और चक्र आदि शस्त्रों के पडनेसे उस समय सूर्यका मण्डल भी प्रभाहीन तथा कान्ति रहित हो गया था। जिस प्रकार स्याद्वादियोंके द्वारा आक्रान्त हुआ मिथ्यावादियोंका समूह पराजयको प्राप्त होता है उसी प्रकार उस समय रामचन्द्रजीके सैनिकों के द्वारा आक्रान्त हुई रावणकी सेनाएँ पराजयको प्राप्त हो रही थीं। इस प्रकार उस रणाङ्गणमें संग्राम प्रवृत्त हुए बहुत समय हो गया ।। ५९५-६०४ ॥
“Many archer-warriors, keeping their sight locked onto their targets, were swiftly bringing down numerous mountain-like elephants with their sharp arrows. A certain warrior felled a massive elephant with a single, vitals-piercing arrow; and that is only fitting, for this is precisely why heroes desiring victory welcome those into their ranks who understand the vulnerabilities (vital points) of others.
Another warrior, knocked unconscious by a blow and drenched in blood, was revived by the fanning wind from the wings of descending vultures, only to stand up and begin slaying multiple enemy warriors again. Yet another slightly dazed warrior, perceiving himself being carried away by a celestial nymph (Devakanya), suddenly stood up laughing with celebratory joy.
In that battlefield—resounding with the thunderous beats of war drums, filled with arrows, perpetually crowded with dancing headless torsos, and covered by a canopy of flying arrows—a certain warrior, whose entrails were bound together and who was sanctified by the heavy flow of his own blood, forcibly claimed the Goddess of Heroic Victory (Veera-Lakshmi) through the rite of a Rakshasa marriage.
In that arena of war, Dakinis (demonic spirits) were dancing with great agility, and jackals were making terrifying howling sounds. Those jackals appeared utterly horrific with sparks of fire erupting from their upturned muzzles. A horde of demonesses, their claws raised high and holding trembling skulls, was vomiting the excessive blood they had gorged upon.
Due to the continuous downpour of extremely sharp arrows, iron shafts (Narachas), and discs (Chakras), even the orb of the sun had become dim and lusterless at that time. Just as a gathering of false-believers (Mithyadatis) faces utter defeat when challenged by the proponents of relative pluralism (Syadvadins), similarly, the armies of Ravana, assaulted by the soldiers of Ramachandra, were facing crushing defeat. In this manner, a great deal of time passed as the fierce battle raged on that field of war.” || 595-604 ||
श्लोक 605 से 622
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594
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