अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 294 to 301
श्लोक ( Shlok ) 294
ललजिह्वाशताध्युग्रमारुह्य तमहिं विभीः । कुमारः क्रीडयामास ‘मातृपर्यङ्कवत्तदा ॥ २९४ ॥
जो लहलहाती हुई सौ जिह्वाओंसे अत्यन्त भयंकर दिख रहा था ऐसे उस सर्पपर चढ़कर कुमार महावीरने निर्भय हो उस समय इस प्रकार क्रीड़ा की जिस प्रकार कि माताके पलंगपर किया करते थे ॥ २९४ ॥
Climbing atop that serpent—which appeared utterly terrifying with its hundred flickering tongues—the young prince Mahavira played without a trace of fear, just as playfully as he would upon his mother’s bed. || 294 ||
श्लोक ( Shlok ) 295
विजम्भमाणहर्षाम्भोनिधिः सङ्गमकोऽमरः । स्तुत्वा भवान्महावीर इति नाम चकार सः ॥ २९५ ॥
कुमारकी इस क्रीड़ाते जिसका हर्षरूपी सागर उमड़ रहा था ऐसे उस संगम देवने भगवान्की स्तुति की और ‘महावीर’ यह नाम रक्खा ।। २९५ ।।
Upon witnessing this playful act of the Prince, the deity Sangama—whose ocean of joy was overflowing—praised the Lord and bestowed upon Him the name Mahavira (The Great Hero). || 295 ||
श्लोक ( Shlok ) 296 – 297
त्रिंशच्छरद्भिस्तस्यैवं कौमारमगमद् वयः । ततोऽन्येद्युर्मतिज्ञानक्षयोपशमभेदतः ॥ २९६ ॥समुत्पन्नमहाबोधिः स्मृतपूर्वभवान्तरः । लौकान्तिकामरैः प्राप्य प्रस्तुतस्तुतिभिः स्तुतः ॥ २९७ ॥
इस प्रकार तीस वर्षोंमें भगवान्का कुमार काल व्यतीत हुआ। तदनन्तर दूसरे ही दिन मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमविशेषसे उन्हें आत्मज्ञान प्रकट हो गया और पूर्वभवका स्मरण हो उठा। उसी समय स्तुति पढ़ते हुए लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति की ।। २९६-२९७ ॥
In this manner, thirty years of the Lord’s youth (Kumara Kala) passed away. Subsequently, on the very next day, due to the specific destruction-cum-appeasement (kshayopashama) of his Mati-Jnanavarana (mind-veiling) karma, self-realization dawned upon Him, and He recalled His previous births. At that very moment, reciting hymns of praise, the Laukantika deities arrived and offered their prayers to Him. || 296-297 ||
श्लोक ( Shlok ) 298 – 301
सकलामरसन्दोहष्कृतनिष्क्रमणक्रियः । स्ववाक्प्रीणितसद्धन्धुसम्भावितविसर्जनः ॥ २९८ ॥चन्द्रप्रभाख्यशिबिकामधिरूढो दृढव्रतः । ऊढां परिवृद्वैतॄणां ततो विद्याधराधिपैः ॥ २९९ ॥ ततश्चानिमिषाधीशैश्चलच्चामरसंहतिः । प्रभ्रमद्ममरारावैः कोकिलालापनैरपि ॥ ३०० ॥आह्वयद्वा प्रसूनौयैः प्रहसद्वा प्रमोदतः । पल्लवैरनुरागं वा स्वकीयंर्य सम्प्रकाशयत् ॥ ३०१ ॥
समस्त देवोंके समूहने आकर उनके निष्क्रमण कल्याणकी क्रिया की, उन्होंने अपने मधुर वचनोंसे बन्धुजनोंको प्रसन्नकर उनसे विदा ली । तदनन्तर व्रतोंको दृढ़तासे पालन करनेवाले वे भगवान् चन्द्रप्रभा नामकी पालकीपर सवार हुए। उस पालकीको सबसे पहले भूमिगोचरी राजाओंने, फिर विद्याधर राजाओंने और फिर इन्द्रोंने उठाया था। उनके दोनों ओर चामरोंके समूह ढुल रहे थे। इस प्रकार वे षण्ड नामके उस वनमें जा पहुँचे जो कि भ्रमण करते हुए भ्रमरोंके शब्दों और कोकिलाओंकी कमनीय कूकसे ऐसा जान पड़ता था मानो बुला ही रहा हो, फूलोंके समूहसे ऐसा जान पड़ता था मानो हर्षसे हँस ही रहा हो, और लाल-लाल पल्लवोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो अपना अनुराग ही प्रकट कर रहा हो ।। २९८-३०१ ।।
The entire assembly of deities arrived and performed the rituals of His Nishkramana Kalyanaka (the auspicious ceremony of renunciation). With His sweet and gentle words, the Lord comforted His relatives and took leave of them. Thereafter, firmly resolved to observe His vows, the Lord ascended the palanquin named Chandraprabha. That palanquin was lifted first by the kings of the earth, then by the Vidyadhara kings, and finally by the Indras. On both His sides, pairs of fly-whisks (chamaras) were waving elegantly.
In this manner, He arrived at the grove named Shanda, which, with the buzzing of wandering bees and the sweet cooing of cuckoos, seemed as if it were calling out to Him; with its clusters of blooming flowers, it seemed as if it were laughing with joy; and with its bright red tender leaves, it seemed as if it were manifesting its deep affection. || 298-301 ||
श्लोक 302 से 311
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293
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