चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 314 to 321
श्लोक ( Shlok ) 314 – 317
सोऽप्यन्यच्च मुनेर्शातं स्पष्टमेवमभाषत । श्रेष्ठी वृषभदत्ताख्यस्तस्मिन् राजपुरे प्रिया ॥ ३१४ ॥तस्य पद्मावतीसूनुजिनदत्तस्तयोरभूत् । स कदाचित्पुरे तस्मिनुद्याने प्रीतिवर्धने ॥ ३१५ ॥जिनं सागरसेनाख्यं केवलज्ञानपूजने । भक्तयां वन्दितुमायातस्तञ्च तद्गुरुणा समम् ॥ ३१६ ॥दृष्ट्रा तं तन्त्र तेनामा प्रीतिस्ते समजायत । देहभेदाद्विनान्येन भेदो न युवयोरभूत् ॥ ३१७ ॥
इसके उत्तरमें मन्त्रीने मुनिराजते जो कुछ अन्य बातें मालूम की थीं वे सब स्पष्ट कह सुनाई। उसने कहा कि उसी राजपुर नगर में एक वृषभदत्त नामका सेठ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम पद्मावती था। उन दोनोंके एक जिन-दत्त नामका पुत्र हुआ था। किसी एक समय उसी राजपुर नगरके प्रीतिवर्धन नामक उद्यानमें सागरसेन नामक जिनराज पधारे थे उनके केवलज्ञानकी भक्तिसे पूजा-वन्दना करनेके लिए वह अपने पिताके साथ आया था। आप भी वहाँ पर गये थे इसलिए उसे देखकर आपका उसके साथ प्रेम हो गया था। इतना अधिक प्रेम हो गया था कि शरीरभेदको छोड़ कर और किसी बातकी अपेक्षा आप दोनोंमें भेद नहीं रह गया था ।। ३१४-३१७ ॥
“In response, the minister clearly related all the other details he had gathered from the holy sage. He said, ‘In that very city of Rajapura, there lived a merchant named Vrishabhadatta. His wife’s name was Padmavati. To them, a son named Jina-datta was born. At one time, a Jinendra named Sagarasena arrived at the orchard named Pritivardhana in that same city of Rajapura. Jina-datta had come along with his father to offer prayers and worship out of deep devotion for the Master’s absolute knowledge (Kevala-jnana). You too had gone there, and upon seeing him, an affection grew between you and him. The bond grew so intense that, except for the difference in your physical bodies, there remained no distinction between the two of you in any other respect.’ || 314-317 ||”
श्लोक ( Shlok ) 318 – 321
एवं दिनेषु गच्छत्सु केपुचिद्वणिजां वरः । जिनदत्तमवस्थाप्य स्वस्थाने निकटे मुनेः ॥ ३१८ ॥गुणपालाभिधानस्य लब्धबोधिरदीक्षत । सुव्रताक्षान्तिसान्निध्यं सम्प्राप्यादाय संयमम् ॥ ३१९ ॥पद्मावती च कौलीन्यं सुव्रता सान्वपालयत् । जिनदत्तोऽपि विशेशः पितुः पदमधिष्ठितः ॥ ३२० ॥मनोहरादिरामाभिः कामं कामान्समन्वभूत् । स रत्नद्वीपमर्थार्थ स्वयमेवागमिष्यति ॥ ३२१ ॥
इस प्रकार कितने ही दिन व्यतीत हो जाने पर एक दिन वृषभदत्त सेठ अपने स्थान पर जिनदत्तको बैठाकर आत्मज्ञान प्राप्त होनेसे गुणपाल नामक मुनिराजके निकट दीक्षित हो गया और उसकी स्त्री पद्मावतीने भी सुव्रता नामकी आर्यिकाके पास जाकर संयम धारण कर लिया तथा उत्तम व्रत धारण कर वह अपनी कुलीनता की रक्षा करने लगी । इधर जिनदत्त भी धनका मालिक होकर अपने पिताके पद पर आरूढ़ हुआ और मनोहरा आदि स्त्रियों के साथ इच्छानुसार भोग भोगने लगा। वह जिनदत्त धन कमानेके लिए स्वयं ही इस रत्नद्वीपमें आवेगा ।। ३१८-३२१ ।।
“In this manner, after many days had passed, one day the merchant Vrishabhadatta, having established Jinadatta in his place and attained self-realization, accepted initiation under the holy sage Gunapala. His wife Padmavati also approached an Arya (Aryika) named Suvrata, embraced self-restraint, and began to protect the honor of her noble lineage by observing the highest vows. Meanwhile, Jinadatta became the master of the wealth, succeeded to his father’s position, and began to enjoy pleasures at will with Manohara and his other wives. That very Jinadatta, in order to earn wealth, will come to this Ratnadvipa on his own accord. || 318-321 ||”
श्लोक 322 से 330
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313
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