राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691 | श्लोक 692 से 701
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 702 to 711
श्लोक ( Shlok ) 702 – 703
तद्वियोगेन शोकाग्निसन्तप्तहृदयो वलः । कथं कथमपि ज्ञानात्सन्धार्यात्मानमात्मना ॥ ७०२ ॥कृत्वा शरीरसंस्कारमनुजस्य यथाविधिः । सर्वान्तःपुरदुःखं च प्रशमय्य प्रसन्नवाक् ॥७०३॥
लक्ष्मणके वियोगसे उत्पन्न हुई शोक-रूपी अग्निसे जिनका हृदय सन्तप्त हो रहा है ऐसे रामचन्द्रजीने ज्ञानके प्रभावसे किसी तरह अपने आप आत्माको सुस्थिर किया, छोटे भाई लक्ष्मणका विधि पूर्वक शरीर संस्कार किया और प्रसन्नतापूर्ण वचन कहकर समस्त अन्तःपुरका शोक शान्त किया ।। ७०२-७०३ ॥
“Ramachandraji—whose heart was deeply tormented by the fire of grief born from his separation from Lakshmana—somehow stabilized his soul through the power of spiritual wisdom. He then performed the formal, scriptural funeral rites for his younger brother Lakshmana and calmed the sorrow of the entire inner palace (Antahpura) with his reassuring and soothing words.”702 – 703
श्लोक ( Shlok ) 704
सर्वप्रकृतिसान्निध्ये पृथिवी असुन्दरीसुते । ज्येष्ठे राज्यं विधायोच्चैः सपहं केशवात्मजे ॥७०४॥
फिर उन्होंने सब प्रजाके सामने पृथिवीसुन्दरी नामकी प्रधान रानीसे उत्पन्न हुए लक्ष्मणके बड़े पुत्रके लिए राज्य देकर अपने ही हाथसे उसका पट्ट बाँधा ॥ ७०४ ।।
“Then, in the presence of all the citizens, he handed over the kingdom to Lakshmana’s eldest son—born of the chief queen, Prithivisundari—and tied the royal turban (Patta) upon his head with his own hands.”
श्लोक ( Shlok ) 705 – 706
अष्टौ विजयरामाद्याः सीतायाः सात्त्विकाः सुताः । लक्ष्मीमनभिवाञ्च्छत्सु तेषां ज्येष्ठेषु सप्तसु ॥७०५॥दत्वाजितञ्जयाख्याय यौवराज्यं कनीयसे । मिथिलामर्पयित्वास्मै त्रिनिर्वेदपरायणः ॥७०६॥
सात्त्विक वृत्तिको धारण करनेवाले सीताके विजयराम आदिक आठ पुत्र थे। उनमें से सात बड़े पुत्रोंने राज्यलक्ष्मी लेना स्वीकृत नहीं किया इसलिए उन्होंने अजितञ्जय नामके छोटे पुत्रके लिए युवराज पद देकर मिथिला देश समर्पण कर दिया और स्वयं संसार, शरीर तथा भोगोंसे विरक्त हो गये ।। ७०५-७०६ ॥
“Sita had eight sons, including Vijayarama and others, who all possessed a noble and virtuous disposition (Sattvik Vritti). Among them, the seven elder sons refused to accept the royal fortune and sovereignty.”
“Therefore, they appointed the youngest son, named Ajitanjaya, to the position of Crown Prince (Yuvaraja) and handed over the kingdom of Mithila to him. Following this, they themselves became completely detached from worldly existence (Samsara), the physical body, and sensory pleasures.”705 – 706
श्लोक ( Shlok ) 707 – 708
साकेतपुरमभ्येत्य वने सिद्धार्थनामनि । वृषभस्वामिनिष्क्रान्तितीर्थभूमौ महौजसः ॥७०७॥शिवगुप्ताभिधानस्य समीपे केवलेशिनः । संसारमोक्षयोर्हेतुफले सम्यक् प्रबुद्धवान् ॥७०८॥
विरक्त होते ही वे अयोध्या नगरीके सिद्धार्थ नामक उस वनमें पहुँचे जो कि भगवान् वृषभदेवके दीक्षाकल्याणकका स्थान होनेसे तीर्थस्थान हो गया था। वहाँ जाकर उन्होंने महाप्रतापी शिवगुप्त नामके केवलीके समीप संसार और मोक्षके कारण तथा फलको अच्छी तरह समझा ॥ ७०७-७०८ ।।
“Immediately upon attaining detachment, they arrived at the Siddhartha forest of Ayodhya city, which had become a sacred pilgrimage site (Tirthasthana) owing to it being the auspicious place of Lord Vrishabhadeva’s initiation into monkhood (Diksha Kalyanaka).”
“Having gone there, they approached the highly glorious Omniscient Sage (Kevali) named Shivagupta, and thoroughly understood from him the true causes and fruits of both worldly bondage (Samsara) and ultimate liberation (Moksha).”707 – 708
श्लोक ( Shlok ) 709 – 711
निदानशल्यदोषेण चतुर्थी नारकी भुवम् । केशवः प्राप्त इत्येतद्बुध्वाऽस्मादेव” शुद्धधीः ॥७०९॥निरस्ततद्गतस्नेहविधिराभिनिबोधिकात् । वेदात्प्रादुर्भवद्बोधिः सुग्रीवाणुमदादिभिः ॥७१०॥ विभीषणदिभिश्चामा भूमिपैः पञ्चभिः शतैः । अशीतिशतपुत्रैश्च सह संयममाप्तवान् ॥७११॥
जब उन्हें इन्हीं केवली भगवान् से इस बातका पता चला कि लक्ष्मण निदान नामक शल्यके दोषसे चौथे नरक गया है तब उनकी बुद्धि और भी अधिक निर्मल हो गई । तदनन्तर जिन्होंने लक्ष्मणका समस्त स्नेह छोड़ दिया है और आभिनिबोधिक-मतिज्ञानसेजिन्हें रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई है ऐसे रामचन्द्रजीने सुग्रीव, अणुमान् और विभीषण आदि पाँच सौ राजाओं तथा एक सौ अस्सी अपने पुत्रोंके साथ संयम धारण कर लिया ॥ ७०९-७११ ।।
“When they learned from this very Omniscient Lord (Kevali Bhagavan) that Lakshmana had descended into the fourth hell due to the spiritual blemish of Nidana (desiring future worldly rewards), their intellect became even more pure and clear.”
“Thereafter, Ramachandraji—having completely cast away all attachment for Lakshmana and having attained the Three Jewels (Ratnatraya: Right Faith, Knowledge, and Conduct) through the clarity of sensory-based knowledge (Abhinibodhika-Matijnana)—embraced structural self-restraint (Sanyama / monkhood) along with five hundred kings, including Sugriva, Hanuman, and Vibhishana, as well as one hundred and eighty of his own sons.”709 – 711
श्लोक 712 से 721
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691 | श्लोक 692 से 701
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