अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 397 to 413
श्लोक ( Shlok ) 397– 405
तदित्यादाय वन्दित्वा गतस्तस्य कदाचन । व्याधावसाध्ये सम्भूते काकमांसस्य भक्षणात् ॥ ३९७ ॥शान्तिरस्येति निर्दिष्टे भिषग्भिः स वनेचरः । प्रयान्त्वमी मम प्राणाः किं कृत्यमिव तैश्चलैः ॥ ३९८ ॥व्रतं तपोधनाभ्याशे गृहीतं धर्ममिच्छता । कृतसङ्कल्पभङ्गस्य कुतस्तत्पुरुषव्रतम् ॥ ३९९ ॥पापेनानेन मांसेन नाद्य प्राणिणिषाम्यहम् । इति नैच्छत्तदुक्त ं तच्छ्रुत्वा तन्मैथुनः पुरात् ॥ ४०० ॥सारसौख्यात्समागच्छन् शूरवीराभिधानकः । महागहनमध्यस्थन्यग्रोधपृथिवीरुहः ॥ ४०१ ॥अधस्ताद्योषितं काञ्चिद्रुदतीमभिवीक्ष्य सः । रोदिषीत्थं कुतो ब्रूहीत्यब्रवीत्साप्युवाच तम् ॥४०२ ॥शृणु चित्तं समाधाय वनयक्षी वसाम्यहम् । वने खदिरसारस्ते मैथुनो व्याधिपीडितः ॥ ४०३ ॥ काकमांसनिवृत्त्यासौ पतिर्मम भविष्यति । गच्छंस्त्वं तं परित्यक्तमांसं भोजयितुं पुनः ॥ ४०४ ॥ नरके घोरदुःखानां भाजनं कर्तुमिच्छसि । ततो मे रोदनं तस्मात्त्यज भद्र तवाग्रहम् ॥ ४०५ ॥
तदनन्तरवह भील व्रत लेकर चला गया। किसी एक समय उस भीलको असाध्य बीमारी हुई तब वैद्योंने बतलाया कि कौआ का मांस खानेसे यह बीमारी शान्त हो सकती है। इसके उत्तर में भील ने दृढ़ता-के साथ उत्तर दिया कि मेरे ये प्राण भले ही चले जावें? मुझे इन चञ्चल प्राणोंसे क्या प्रयोजन है, मैंने धर्मकी इच्छासे तपस्वी- मुनिराजके समीप व्रत ग्रहण किया है। जो गृहीत व्रतका भङ्ग कर देता है उससे पुरुष व्रत कैसे हो सकता है ? मैं इस पापरूप मांसके द्वारा आज जीवित नहीं रहना चाहता । इस प्रकार कहकर उसने कौआका मांस खाना स्वीकृत नहीं किया। यह सुनकर उसका साला शूरवीर जो कि सारसौख्य नामक नगरसे आया था कहने लगा कि जब मैं यहाँ आ रहा था तब मैंने. सघन वनके मध्यमें स्थित वट वृक्ष के नीचे किसी स्त्रीको रोती हुई देखा। उसे रोती देख, मैंने पूछा कि तू क्यों रो रही है? इसके उत्तर में वह कहने लगी कि तू चित्त लगाकर सुन। मैं वनकी यक्षी हूँ और इसी वनमें रहती हूँ। तेरा बहनोई खदिरसार रोगसे पीड़ित है और कौआका मांस त्याग करनेसे वह मेरा पति होगा ! पर अब तू उसे त्याग किया हुआ मांस खिलानेके लिए जा रहा है और उसे नरक गतिके भयंकर दुःखोंका पात्र बनाना चाहता है। मैं इसीलिए रो रही हूं। हे भद्र ! अब तू अपना आग्रह छोड़ दे ॥ ३९७-४०५ ॥
“Thereafter, having formally accepted the vow, the tribal hunter (Bhila) departed. Sometime later, the hunter contracted an incurable malady, whereupon the physicians declared that his ailment could only be alleviated by consuming the flesh of a crow. In response, the hunter resolutely countered, saying, ‘Let these breaths of mine depart if they must! What use have I for this transient life? Driven by a yearning for righteousness, I accepted this vow in the presence of the ascetic master. How can one who breaks a solemnly adopted vow be deemed a true man? I refuse to sustain my life today through such sinful flesh.’ Expressing himself thus, he absolutely refused to consent to the consumption of the crow’s flesh.
Hearing this, his courageous brother-in-law, who had journeyed from the city named Sarasaukhya, began to speak: ‘While I was traveling to this place, I beheld a woman weeping bitterly beneath a banyan tree situated in the dense jungle. Seeing her weep, I inquired, “Why art thou lamenting so?” In reply, she told me, “Listen with undivided attention. I am the resident deity (Yakshi) of this forest. Thy brother-in-law Khadirasara is afflicted by this disease; by virtue of his unwavering renunciation of crow’s flesh, he is destined to become my husband [in the celestial realm] upon his death! However, thou art now journeying to make him consume that forbidden flesh, thereby intending to render him a fit recipient for the horrific agonies of hellish existence. It is for this reason alone that I weep. Therefore, O noble one, abandon thy insistence at once!”‘ || 397–405 ||”
श्लोक ( Shlok ) 406 – 409
इति तद्देवताप्रोक्तमवगम्याटवीपतिः । सम्प्राप्यातुरमालोक्य भिषक्कथितमौषधम् ॥ ४०६ ॥ त्वया मयोपनोदार्थमुपयोक्तव्यमित्यसौ । जगाद सोऽपि तद्वाक्यमनिच्छन्नेवमब्रवीत् ॥ ४०७ ॥ त्वं मे प्राणसमो बन्धुर्मा जिजीवयिषुः स्निहा । ब्रवीष्येवं हितं नैवं जीवितं व्रतभञ्जनात् ॥ ४०८ ॥दुर्गतिप्राप्तिहेतुत्वादिति तद्वतनिश्चितम् । ज्ञात्वा यक्षीप्रपञ्चं तं शूरवीरोऽप्य रोधयत् ॥ ४०९ ॥
इस प्रकार देवीके वचन सुनकर शूरवीर, बीमार-खदिरसारके पास पहुँचा और उसे देखकर कहने लगा कि वैद्यने जो औषधि बतलाई है वह और नहीं तो मेरी प्रसन्नताके लिए ही तुझे खाना चाहिये । खदिरसार उसकी बात अस्वीकृत करता हुआ कहने लगा कि तू प्राणोंके समान मेरा भाई है। स्नेह वश मुझे जीवित रखनेके लिए ही ऐसा कह रहा है परन्तु व्रत भंगकर जीवित रहना हितकारी नहीं है क्योंकि व्रत भंग करना दुर्गतिकी प्राप्तिका कारण है। जब शूरवीरको निश्चय हो गया कि यह अपने व्रतमें दृढ़ है तब उसने उसे यक्षीका वृत्तान्त बतलाया ॥ ४०६-४०९ ॥
“In this manner, having heard the words of the deity, the courageous brother-in-law arrived at the side of the ailing Khadirasara, and looking at him, said, ‘Even if not for any other reason, thou must consume the remedy prescribed by the physician solely for the sake of my happiness.’ Refusing to assent to his words, Khadirasara replied, ‘Thou art a brother to me, dear as my own life. It is purely out of affection and the desire to keep me alive that thou speakest thus; nevertheless, surviving at the cost of breaking a vow is never beneficial, for the violation of a vow is the direct cause of descending into an untoward destiny (Durgati).’ When the brother-in-law became fully convinced that the hunter was absolutely unyielding in his vow, he finally disclosed to him the entire episode of the Yakshi. || 406–409 ||”
श्लोक ( Shlok ) 410 – 413
तद्भुत्तान्तं विचार्यासौ श्रावकव्रतपञ्चकम् । समादायाखिलं जीवितान्ते सौधर्मकल्पजः ॥ ४१० ॥देवोऽभवदनिर्देश्यः शूरवीरोऽपि दुःखितः । परलोकक्रियां कृत्वा स्वावासं समुपव्रजन् ॥ ४११ ॥वटद्रुमसमीपस्थो यक्षि किं मे स मैथुनः । पतिस्तवाभवनेति यक्षीमाहावदच्च सा ॥ ४१२ ॥समस्तव्रतसम्पन्नो व्यन्तरत्वपराङ्मुखः । अभूत्सौधर्मकल्पेऽसौ पतिर्मम कथं भवेत् ॥ ४१३ ॥
यक्षीके वृत्तान्तका विचारकर खदिरसारने श्रावकके पांचों व्रत धारण कर लिये जिससे आयु समाप्त होनेपर वह सौधर्मस्वर्गमें अनुपम देव हुआ। इधर शूरवीर भी बहुत दुखी हुआ और पारलौकिक क्रिया करके अपने घर की ओर चला। मार्गमें वह उसी वटवृक्षके समीप खड़ा होकर उस यक्षीसे कहने लगा कि हे यक्षि ! क्या हमारा वह बहनोई तेरा पति हुआ है ? इसके उत्तर में यक्षीने कहा कि नहीं, वह समस्त व्रतोंसे सम्पन्न हो गया था अतः व्यन्तर योनिसे पराङ्मुख होकर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ है वह मेरा पति कैसे हो सकता था ।। ४१०-४१३ ।।
“Contemplating upon the episode of the Yakshi, Khadirasara formally adopted the five minor vows of a layman (Anuvratas); consequently, upon the exhaustion of his lifespan, he was reborn as a celestial being of incomparable splendor in the Saudharma heaven. Meanwhile, deeply grieved, the courageous brother-in-law performed the final funerary rites and departed toward his home. Along the way, he halted near that very same banyan tree and addressed the Yakshi, inquiring, ‘O Yakshi! Has that brother-in-law of ours indeed become thy husband?’
In response, the Yakshi replied, ‘No. Having become fully endowed with the entirety of the householder’s vows, he turned away from rebirth in the lower peripatetic deity class (Vyantara-yoni) and was instead enhaloed as a radiant god in the high Saudharma heaven. How then could he have possibly become my consort?’ || 410–413 ||”
श्लोक 414 से 422
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