अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 51 to 64
श्लोक ( Shlok ) 51
अथास्मिन्नेव तीर्थेऽभूत्सुभौमो नाम चक्रभृत् । तृतीये जन्मन्यन्त्रैव भरतेऽसौ भुवः पतिः ॥ ५१ ॥
अथानन्तर – इन्हीं अरनाथ भगवान्के तीर्थमें सुभौम नामका चक्रवर्ती हुआ था। वह तीसरे जन्ममें इसी भरतक्षेत्रमें भूपाल नामका राजा था ॥ ५१ ॥
“Thereafter, during the spiritual reign (Teertha) of Lord Aranatha, a Chakravarti (universal monarch) named Subhauma was born. In his third previous birth, he was a king named Bhupala in this very Bharata-kshetra (the region of Bharata).”51
श्लोक ( Shlok ) 52 – 54
भूपालो नाम संग्रामे वलिभिबिंजिगीषुभिः । ‘प्राप्ताभिमानभङ्गः सन् भृशं निविंध संसृतेः ॥ ५२ ॥दीक्षां जैनेश्वरीमादात्सं भूतगुरुसन्निधौ । कदाचित्स तपः कुर्वन्निदानमकरोत्कुधीः ॥ ५३ ॥भूयान्मे चक्रवर्तित्वमिति भोगानुषञ्जनात् । क्षीरं विषेण वा तेन मनसा दूषितं तपः ॥ ५४ ॥
किसी समय राजा भूपाल, युद्धमें विजयकी इच्छा रखनेवाले विजिगीषु राजाओंके द्वारा हार गया। मान भंग होनेके कारण वह संसारसे इतना विरक्त हुआ कि उसने संभूत नामक गुरुके समीप जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। उस दुर्बुद्धिने तपश्चरण करते समय निदान कर लिया कि मेरे चक्रवर्तीपना प्रकट हो । उसने यह सब निदान भोगोंमें आसक्ति रखनेके कारण किया था। इस निदानसे उसने अपने तपको हृदयसे ऐसा दूषित बना लिया जैसा कि कोई विषसे दूधको दूषित बना लेता है ॥ ५२-५४ ॥
“At one time, King Bhupala was defeated by kings desirous of victory (vijigishu) in battle. Disheartened by the loss of his honor, he became so detached from the worldly life that he accepted the Jain initiation (Jaineshwari Diksha) under a spiritual master named Sambhuta.
However, while performing rigorous penance, that foolish-minded king made a Nidana (a binding vow/wish for material reward) that he should attain the status of a Chakravarti (universal monarch) in a future life. He made this vow entirely due to his intense attachment to worldly pleasures. Through this desire, he corrupted his penance from within, just as someone poisons and spoils pure milk with venom.” 52 – 54
श्लोक ( Shlok ) 55
स तथैवाचरन् घोरं तपः स्वास्यायुषः क्षये । समाधाय महाशुक्रे संन्यासेनोदपद्यत ॥ ५५ ॥
वह उसी तरह घोर तपश्चरण करता रहा। आयुके अन्त में चित्तको स्थिरकर संन्याससे मरा जिससे महाशुक्र स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ।॥ ५५ ॥
“He continued to perform severe and rigorous penance in that same manner. At the end of his lifespan, stabilizing his mind, he passed away while maintaining his vows of ascetic renunciation (Sannyasa). As a result of this, he was reborn in the Mahashukra heaven.”55
श्लोक ( Shlok ) 56 – 58
तत्र षोडशवाराशिमानायुः सुखमास्त सः । द्वीपेऽस्मिन् भारते कौशलाख्ये राष्ट्र गुणान्विते ॥५६॥सहस्त्रबाहुरिक्ष्वाकुः साकेतनगराधिपः । राज्ञी तस्याभवञ्चित्रमत्याख्या हृदयप्रिया ॥ ५७ ॥ ‘कन्याकुब्जमहीशस्य पारताख्यस्य सात्मजा । तस्यां सुतः सुपुण्येन कृतवीराधिपोऽभवत् ॥ ५८ ॥
वहाँ सोलह सागर प्रमाण आयुको धारण करनेवाला वह देव सुखसे निवास करने लगा । इधर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें अनेक गुणोंसे सहित एक कोशल नामका देश है। उसके अयोध्या नगरमें इक्ष्वाकुवंशी राजा सहस्रबाहु राज्य करता था। हृदयको प्रिय लगनेवाली उसकी चित्रमती नामकी रानी थी। वह चित्रमती कन्याकुब्ज देशके राजा पारतकी पुत्री थी । उत्तम पुण्यके उद्यसे उसके कृतवीराधिप नामका पुत्र हुआ ।। ५६-५८ ॥
“There, possessing a lifespan of sixteen Sagara (an immense cosmic unit of time), that celestial being began to live in great happiness. Meanwhile, here in the Bharata-kshetra of this Jambu-dvipa, there is a region named Kosala, endowed with numerous virtues. In its capital city of Ayodhya, King Sahasrabahu of the Ikshvaku dynasty was ruling. He had a beloved, heart-pleasing queen named Chitramati. This Chitramati was the daughter of King Parata of the Kanyakubja country. Due to the rise of supreme meritorious karma (Punya), a son named Kritaviradhipa was born to them.”56 – 58
श्लोक ( Shlok ) 59 – 64
तन्त्र प्रवर्द्धमानेऽस्मिन्निदमन्यदुदीर्यते । सहस्त्रभुजभूभतुः पितृव्याच्छतबिन्दुतः ॥ ५९ ॥पारताख्य महीशस्य श्रीमत्त्यस्तनयः स्वसुः । जमदग्निः सरामान्तः कौमारे मातृमृत्युतः ॥ ६० ॥ “निर्वेगात्तापसो भूत्वा पञ्चाग्नितपसि स्थितः । दृढग्राहिमहीशस्य विप्रेण हरिशर्मणा ॥ ६१ ॥ अभूदखण्डितं सख्यमेवं काले प्रयात्यसौ । दृढग्राही तपो जैनमग्रहीद् ब्राह्मणोऽपि च ॥ ६२ ॥ तापसव्रतमन्तेऽभूज्ज्योतिर्लोके द्विजोत्तमः । दृढग्राही च सौधर्मे सोऽवधिज्ञानचक्षुषा ॥ ६३ ॥मिथ्यात्वाज्ज्योतिषां लोके समुत्पन्नं द्विजोत्तमम् । विज्ञाय जैनसद्धर्म तं ग्राहयितुमागमत् ॥ ६४ ॥
जो दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और कही जाती है जो इस प्रकार है- राजा सहस्त्रबाहुके काका शतबिन्दुसे उनकी श्रीमती नामकी स्त्रीके जमदग्नि नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था। श्रीमती राजा पारतकी बहिन थी । कुमार अवस्थामें ही जमदग्निकी माँ मर गई थी इसलिए विरक्त होकर वह तापस हो गया और पञ्चाग्नि तप तपने लगा। इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और है। एक दृढ़ग्राही नामका राजा था। उसकी हरिशर्मा नामके ब्राह्मणके साथ अखण्ड मित्रता थी। इस प्रकार उन दोनोंका समय बीतता रहा। किसी एक दिन दृढ़ग्राही राजाने जैन तप धारण कर. लिया और हरिशर्मा ब्राह्मणने भी तापसके व्रत ले लिये। हरिशर्मा ब्राह्मण आयुके अन्तमें मरकर ज्योतिर्लोकमें उत्पन्न हुआ-ज्यौतिषी देव हुआ और दृढ़ग्राही सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ। उसने अवधिज्ञानरूपी नेत्रसे जाना कि हमारा मित्र हरिशर्मा ब्राह्मण मिथ्यात्वके कारण ज्योतिष लोकमें उत्पन्न हुआ है अतः वह उसे समीचीन जैनधर्म धारण कराने के लिए आया ।। ५९-६४ ।।
“He began to grow day by day. Another story related to this is told as follows: King Sahasrabahu’s paternal uncle, Satabindu, had a son named Jamadagni from his wife, Shrimati. Shrimati was the sister of King Parata. Jamadagni’s mother died while he was still a child; therefore, becoming detached from worldly life, he became an ascetic (tapas) and began performing the Panchagni (five-fire) penance.
There is yet another story connected to this. There was a king named Dridhagrahi. He shared an unbroken, lifelong friendship with a Brahmin named Harisharma. In this manner, their time passed. One day, King Dridhagrahi accepted the Jain ascetic vows (Jain tapa), while Harisharma the Brahmin took the vows of a non-Jain ascetic (tapasa). At the end of his lifespan, Harisharma the Brahmin died and was reborn in the Jyotirloka (the stellar realm) as a Jyotishi deva (astral celestial being), while Dridhagrahi was reborn as a deva in the Saudharma heaven. Through his eye of clairvoyance (Avadhijnana), Dridhagrahi learned that his friend Harisharma the Brahmin, due to his false belief (Mithyatva), had been born in the lower stellar realm; hence, he came to him to guide him into adopting the right Jain faith (Samicina Jainadharma).”59 – 64
श्लोक 65 से 83
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