चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 151 to 162
श्लोक ( Shlok ) 151 – 155
दृष्ट्वा भवानहो नागदत्त कस्मात्समागतः । क वा गतं त्वयेत्येष तुष्टः पृष्टो महीभुजा ॥ १५१ ॥ भागयाचनयात्रादि सर्वमामूलतोऽब्रवीत् । तदाकर्ण्य नृपः क्रुध्वा प्रवृत्तः श्रेष्ठिनिग्रहे ॥ १५२ ॥ न युक्तमिति निर्बन्धान्नागदत्तेन वारितः । दत्वा श्रष्ठिपदं तस्मै सारवित्तसमन्वित्तम् ॥ १५३ ॥ विवाहविधिना पद्मलतामपि समर्पयत् । अथात्मसंसदि व्यक्तमवनीन्द्रोऽभ्यधादिदम् ॥ १५४ ॥ पश्य पुण्यस्य माहात्म्यं राक्षसाद्यन्तरायतः । व्यपेत्यायं महारत्नान्यात्मीकृत्यागतः सुखम् ॥ १५५ ॥
उसे देखकर महाराजने पूछा कि अहो नागदत्त ! तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ चले गये थे ? राजाकी बात सुनकर नागदत्त बड़ा संतुष्ट हुआ। उसने अपना हिस्सा मांगने और उसके लिए यात्रा करने आदिके सब समाचार आदिसे लेकर अन्ततक कह सुनाये। उन्हें सुनकर राजा बहुत ही कुपित हुआ और सेठका निग्रह करनेके लिए तैयार हो गया परन्तु ऐसा करना उचित नहीं है यह कह कर आग्रहपूर्वक नागदत्तने राजाको मना कर दिया । राजाने बहुत-सा अच्छा धन देकर नागदत्तको सेठका पद दिया और विधिपूर्वक विवाहकर वह पद्मलता कन्या भी उसे सौंप दी। तदनन्तर राजाने अपनी सभामें स्पष्ट रूपसे कहा कि देखो, पुण्यका कैसा माहात्म्य है ? यह नागदत्त राक्षस आदि अनेक विघ्नो से बचकर और श्रेष्ठ रत्नोंको अपने आधीन कर सुखपूर्वक यहाँ आ गया है ।॥१५१-१५५ ।।
Upon seeing him, the king asked, “O Nagadatta! Where are you coming from, and where had you gone?” Hearing the king’s words, Nagadatta felt highly satisfied. From beginning to end, he narrated the entire account of asking for his share, embarking on the journey for it, and everything that followed. Hearing this, the king became furious and prepared to punish the merchant, but Nagadatta earnestly dissuaded the king, saying that doing so was not proper.
Bestowing a vast amount of fine wealth, the king appointed Nagadatta to the position of the chief merchant (Seth) and, performing the marriage rites according to the law, handed the maiden Padmalata over to him as well. Thereafter, the king declared clearly in his court, “Look at the magnificent power of merit (punya)! Surviving numerous obstacles such as demons (rakshasas), and bringing superb gems under his possession, this Nagadatta has returned here in perfect happiness.” || 151-155 ||
श्लोक ( Shlok ) 156 – 158
पुण्याज्जलायते वह्निर्विषमप्यमृतायते । मित्रायन्ते द्विषः पुण्यात्पुण्याच्छाम्यन्ति भीतयः ॥ १५६ ॥ दुर्विधाः सधनाः पुण्यात् पुण्यात्स्वर्गश्च लभ्यते । तस्मात्पुण्यं विचिन्वन्तु हतापत्सम्पदेषिणः ॥ १५७ ॥ जिनोक्तधर्मशास्त्रानुयानेन विहितक्रियाः । इति सभ्याश्च तद्वाक्यं बहवश्चेतसि व्यधुः ॥ १५८ ॥
इसलिए कहना पड़ता है कि पुण्यसे अग्नि जल हो जाती है, पुण्यसे विष भी अमृत हो जाता है, पुण्यसे शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, पुण्यसे सब प्रकारके भय शान्त हो जाते हैं, पुण्यसे निर्धन मनुष्य भी धनवान् हो जाते हैं और पुण्यसे स्वर्ग भी प्राप्त होता है इसलिए आपत्तिरहित सम्पदाकी इच्छा करने वाले पुरुषोंको श्रीजिनेन्द्रदेवके कहे हुए धर्मशास्त्र के अनुसार सब क्रियाएं कर पुण्यका बन्ध करना चाहिये ! राजाका यह उपदेश सभाके सब लोगोंने अपने हृदय में धारण किया ॥ १५६-१५८ ॥
“Therefore, it must be said that through merit (punya), fire turns into water, through merit, even poison becomes nectar, through merit, enemies become friends, through merit, all kinds of fears are pacified, through merit, even a destitute person becomes wealthy, and through merit, even heaven is attained. Consequently, those who desire adversity-free prosperity must perform all actions according to the sacred scriptures taught by Lord Jinendra to accumulate merit!” Every person in the assembly took this discourse of the king to heart. || 156-158 ||
श्लोक ( Shlok ) 159 – 160
अथ श्रीनागदत्तोऽपि सञ्जतानुशयं तदा । क्षमस्व मे कुमारेति प्रणमन्तं सपुत्रकम् ॥ १५९ ॥ सभार्य श्रष्ठिनं मैवमित्युत्थाप्य प्रियोक्तिभिः । सन्तोष्य जिनपुजाञ्च प्राक्प्रोक्तामकरोत्कृती ॥ १६० ॥
तदनन्तर सेठको भी बहुत पश्चात्ताप हुआ वह उसी समय ‘हे कुमार ! क्षमा करो’ यह कहकर अपने अन्य पुत्रों तथा स्त्री सहित प्रणाम करने लगा परन्तु नागदत्तने उसे ऐसा नहीं करने दिया और उठाकर प्रिय वचनोंसे उसे सन्तुष्ट कर दिया । तदनन्तर उस बुद्धिमान्ने यात्राके पहले कही हुई जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की ॥ १५९-१६० ।।
Thereafter, the merchant (Seth) also felt deep remorse. Exclaiming, “O youth, please forgive us!”, he, along with his other sons and wife, prostrated before Nagadatta. However, Nagadatta did not allow him to do so; he lifted him up and comforted him with affectionate words. Afterward, that wise man performed the worship of Lord Jinendra, just as he had vowed before setting out on his journey. || 159-160 ||
श्लोक ( Shlok ) 161 – 162
एवं श्रावकसद्धर्ममधिगम्य परस्परम् । जातसौहार्दचित्तानां दानपूजादिकर्मभिः ॥ १६१ ॥काले गच्छति जीवान्ते सन्न्यासविधिमाश्रितः । श्रीनागदत्तः सौधर्मकल्पेऽनल्पामरोऽभवत् ॥ १६२ ॥
इस प्रकार सबने श्रावकका उत्तम धर्म स्वीकृत किया, सबके हृदयों में परस्पर मित्रता हो गई और दान पूजा आदि उत्तम कार्योंसे सबका समय व्यतीत होने लगा। आयुके अन्त में नागदत्तने संन्यास पूर्वक प्राण छोड़े जिससे वह सौधर्म स्वर्गमें बड़ा देव हुआ ॥ १६१-१६२ ॥
In this manner, everyone embraced the excellent dharma of a Shravaka (a Jain layman), mutual friendship was established in the hearts of all, and their time began to pass in performing noble deeds such as charity and worship. At the end of his lifespan, Nagadatta relinquished his life after adopting the vow of sannyasa (holy ritual fasting/asceticism), by virtue of which he was reborn as a magnificent celestial being in the Saudharma heaven. || 161-162 ||
श्लोक 163 से 171
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73