अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 302 to 311
श्लोक ( Shlok ) 302 – 304
नाथः षण्डवनं प्राप्य स्वयानादवरुह्य सः । श्रेष्ठः षष्ठोपवासेन “स्वप्रभापटलाघृते ॥ ३०२॥निविश्योदङ्मुखो वीरो रुन्द्ररनशिलातले । दशम्यां मार्गशीर्षस्य कृष्णायां शशिनि श्रिते ॥ ३०३ ॥हस्तोत्तरर्क्षयोर्मध्यं भागं चापास्तलक्ष्मणि । दिवसावसितौ धीरः संयमाभिमुखोऽभवत् ॥ ३०४ ॥
अतिशय श्रेष्ठ भगवान् महावीर, षण्डवनमें पहुँचकर अपनी पालकीसे उतर गये और अपनी ही कान्तिके समूहसे घिरी हुई रत्नमयी बड़ी शिलापर उत्तरकी ओर मुँहकर तेलाका नियम ले विराजमान हो गये। इस तरह मंगसिर वदी दशमीके दिन जब कि निर्मल चन्द्रमा हस्त और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्रके मध्यमें था, तब संध्याके समय अतिशय धीर-वीर भगवान् महावीरने संयम धारण किया ।। ३०२-३०४ ।।
Upon reaching the Shanda grove, the extraordinarily glorious Lord Mahavira descended from His palanquin. Seating Himself facing the north upon a large, gem-studded rock that was enveloped by the aura of His own radiance, He took the vow of a three-day fast (tela). Thus, on the tenth day of the dark fortnight of the month of Margashirsha (Mangsir Vadi Dashami), when the pure moon was positioned between the Hasta and Uttara Phalguni constellations, the exceptionally patient and valorous Lord Mahavira embraced the life of self-restraint (Samyama) at the time of dusk. || 302-304 ||
श्लोक ( Shlok ) 305
वस्त्राभरणमाल्यानि स्वयं शक्रः समाददे । मुक्तान्येतेन पूतानि मत्वा माहात्म्यमीदृशम् ॥ ३०५ ॥
भगवान्ने जो वस्त्र, आभरण तथा माला, आदि उतारकर फेंक दिये थे उन्हें इन्द्रने स्वयं उठा लिया सो ठीक ही है क्योंकि भगवान्का माहात्म्य ही ऐसा था ।। ३०५ ॥
The clothes, ornaments, garlands, and other articles that the Lord had discarded and cast away were personally picked up by Indra himself. And this is only fitting, for such was the divine majesty of the Lord. || 305 ||
श्लोक ( Shlok ) 306
अङ्गरागोऽङ्गलग्नोऽस्य सगन्धोऽहं कथं मया । मोच्योऽयमिति मत्वेव स्थितः शोभां समुद्वहन् ॥ ३०६ ॥
उस समय भगवान्के शरीर में जो सुगन्धित अङ्गराग लगा हुआ था वह सोच रहा था कि मैं इन उत्तम भगवान्को कैसे छोड़ दूं ? ऐसा विचारकर ही वह मानो उनके शरीर में स्थित रहकर शोभाको प्राप्त हो रहा था ।। ३०६ ।।
At that time, the fragrant unguent applied to the Lord’s body was pondering, “How can I possibly leave this supreme Lord?” As if driven by this very thought, it remained lingering upon His body, attaining magnificent splendor. || 306 ||
श्लोक ( Shlok ) 307
मलिनाः कुटिला मुग्धैः पूज्यास्त्याज्या मुमुक्षुभिः । केशाः क्लेशसमास्तेन यना मूलात्समुद्धताः ॥ ३०७॥
मलिन और कुटिल पदार्थ अज्ञानी जनोंके द्वारा पूज्य होते हैं परन्तु मुमुक्षु लोग उन्हें त्याज्य समझते हैं ऐसा जानकर ही मानो उन तरुण भगवान् ने मलिन और कुटिल (काले और घुंघुराले) केश जड़से उखाड़कर दूर फेंक दियेथे ।। ३०७ ॥
“Impure and crooked things are worshipped by the ignorant, but those desirous of liberation (mumukshu) look upon them as objects to be renounced.” Realizing this truth, as it were, the youthful Lord plucked out His impure and crooked (dark and curly) hair from the roots and cast them far away. || 307 ||
श्लोक ( Shlok ) 308 – 309
सुराधीशः म्वहस्तेन तान्प्रतीक्ष्य महामणि । ज्वलत्पटलिकामध्ये विन्यस्याभ्यर्च्य मानितान् ॥ ३०८ ॥विचिन्त्रकरवस्त्रेण पिधाय विधुतान्सुरैः । स्वयं गत्वा समं क्षीरवारिराशौ न्यवेशयत् ॥ ३०९ ॥
इन्द्र ने वे सब केश अपने हाथसे उठा लिये, मणियोंके देदीप्यमान पिटारेमें रखकर उनकी पूजा की, आदर सत्कार किया, अनेक प्रकारकी किरण रूपी वस्त्रसे उन्हें लपेटकर रक्खा और फिर देवोंके साथ स्वयं जाकर उन्हें क्षीरसागर में पधरा दिया ॥ ३०८-३०९ ॥
Indra personally picked up all those strands of hair with his own hands, placed them inside a radiant, gem-studded casket, and worshipped them with profound honor and reverence. Wrapping the casket in a cloth woven, as it were, from multifarious rays of light, he then proceeded along with the deities to reverently submerge it into the Kshira Sagara (the Ocean of Milk). || 308-309 ||
श्लोक ( Shlok ) 310
तपोलक्ष्म्या निगूढोऽभूद्धाढं बाढममूढधीः । अभ्येत्य मोक्षलक्ष्मीष्टशम्फल्येव विदग्धया ॥ ३१० ॥
मोक्षलक्ष्मीकी इष्ट और चतुर दूतीके समान तपोलक्ष्मीने स्वयं आकर उनका आलिङ्गन किया था ॥ ३१० ॥
Like a beloved and clever messenger of the Goddess of Liberation (Moksha-Lakshmi), the Goddess of Asceticism (Tapo-Lakshmi) came forward herself and embraced Him. || 310 ||
श्लोक ( Shlok ) 311
अन्तर्ग्रन्थपरित्यागात्तस्य नैर्मन्थ्यमाबभौ । भोगिनोऽन्यस्य निर्मोकत्यागवन्नावभासते ॥ ३११॥
अंतरङ्ग परिग्रहोंका त्याग कर देनेसे उनका निर्मन्थपना अच्छी तरह सुशोभित हो रहा था सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार साँपका केवल कांचली छोड़ना शोभा नहीं देता उसी प्रकार केवल बाह्य परिग्रहका छोड़ना शोभा नहीं देता ।। ३११ ॥
By renouncing all internal attachments (antaranga parigraha), His state of absolute possessionlessness (nirgranthapana) shone forth with true splendor. And this is only fitting; just as a snake does not look beautiful or transformed by merely shedding its outer skin, in the same way, the mere renunciation of external possessions (bahya parigraha) without internal detachment brings no true spiritual glory. || 311 ||
श्लोक 312 से 322
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301
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