चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 441 to 454
श्लोक ( Shlok ) 441 – 443
जातजातिस्मृतिर्मूर्छा सहसा समुपागमत् । तद्दशालोकनव्याकुलीकृतास्तत्समीपगाः ॥ ४४१ ॥कुशलाश्चन्दनो शीरशीतलाम्भोनिषेचिताम् । व्यजनापादिताह्लादिपवनाश्वासिताशयाम् ॥ ४४२ ॥तां सम्बोध्य सुखालापैर्विभावितविबोधनाम् । विदधुः किं न कुर्वन्ति कृच्छ्रेषु सुहृदो हिताः ॥ ४४३॥
देखते ही उसे जातिस्मरण हुआ और वह अकस्मात् ही मूच्छित हो गई। उसकी दशा देख, समीप रहनेवाली सखियाँ घबड़ा गईं, उनमें जो कुशल थीं उन्होंने चन्दन तथा खसके ठण्डे जलसे उसे सींचा, पङ्खासे उत्पन्न हुई आनन्ददायी हवासे उसके हृदयको सन्तोष पहुंचाया और मीठे वचनोंसे सम्बोधकर उसे सचेत किया सो ठीक ही है क्योंकि हितकारी मित्रगण कष्टके समय क्या नहीं करते हैं ? अर्थात् सब कुछ करते हैं ।॥४४१-४४३।।
The moment she beheld them, the memory of her former birth arose within her, and she suddenly fell unconscious. Seeing her condition, the companions attending upon her were greatly alarmed. Those who were skilled and resourceful sprinkled her with cool water scented with sandalwood and vetiver, soothed her heart with the refreshing breeze produced by fans, and gently addressed her with sweet and comforting words until she regained consciousness.
And rightly so—for what will devoted and well-wishing friends not do in times of distress? Indeed, they do everything within their power. ॥441–443॥
श्लोक ( Shlok ) 444 – 449
श्रत्वैतत्पितरौ कन्याप्रियामलकसुन्दरीम् । पुत्रीं तिलकशब्दादिचन्द्रिकाया विमूच्छिताम् ॥ ४४४ ॥कन्यां गवेषयेत्वेति तदा जगदतुः शुचा । सापि सम्प्राप्य सल्लापनिपुणा कन्यकां मिथः ।। ४४५ ।।भट्टारिके वदैतचे किं मूर्छाकारणं मम । इति पृष्टवती मूर्छाहेतुं चेच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ४४६ ॥न ह्यस्त्यकथनीयं मे तव प्राणाधिकप्रिये । शृणु चेतः समाधायेत्यसौ सम्यगनुस्मृतिः ॥ ४४७ ॥स्वपूर्वभवसम्बन्धमशेषं प्रत्यपीपदत् । तत्सर्वमवधार्याशु सुधीरलकसुन्दरी ॥ ४४८ ॥तदैवागत्य तन्मूर्छाकारणं प्राग्यथाश्रुतम् । प्रस्पष्टमधुरालापैस्तयोरेवमभाषत ॥ ४४९ ॥
यह समाचार सुनकर उसके माता-पिताने तिलकचन्द्राकी पुत्री और श्रीचन्द्राकी सखी अलकसुन्दरीसे शोकवश कहा कि तू जाकर कन्याकी मूर्च्छाका कारण तलाश कर। माता-पिताकी बात सुनकर बातचीत करनेमें निपुण अलकसुन्दरी भी श्रीचन्द्राके पास गई और एकान्तमें पूछने लगी कि हे भट्टारिकेः ! मुझे बतला कि तेरी मूर्च्छाका कारण क्या है ? इसके उत्तरमें श्रीचन्द्राने कहा कि हे प्राणोंसे अधिक प्यारी सखि ! यदि तू मेरी मूर्च्छाका कारण सुनना चाहती है तो चित्त लगाकर सुन, मेरी ऐसी कोई बात नहीं है जो तुझसे कहने योग्य न हो। इस प्रकार अच्छी तरह स्मरणकर उसने अपने पूर्वभवका समस्त सम्बन्ध अलकसुन्दरीको कह सुनाया। अलकसुन्दरी बड़ी बुद्धिमती थी वह शीघ्र ही सब बातको अच्छी तरह समझकर उसी समय श्रीचन्द्राके माता-पिताके पास गई और स्पष्ट तथा मधुर शब्दोंमें उसकी मूर्च्छाका कारण जैसा कि उसने पहले सुना था इस प्रकार कहने लगी ॥४४४-४४९।।
Upon hearing this news, Śrīcandrā’s parents, overcome with grief, said to Alakasundarī—the daughter of Tilakacandrā and Śrīcandrā’s intimate companion:“Go and discover the cause of the princess’s sudden fainting.”Obeying her parents’ request, Alakasundarī, who was highly skilled in conversation, went to Śrīcandrā. Taking her aside into a private place, she gently asked:“O noble lady, tell me, what was the cause of your fainting?”Śrīcandrā replied:“O dearest friend, more precious to me than life itself! If you wish to know the cause of my fainting, then listen attentively. There is nothing concerning me that I would consider unworthy of sharing with you.”Having thus spoken, she recollected her former existence in full and narrated to Alakasundarī the entire account of her previous birth and all the events connected with it.Alakasundarī was exceedingly intelligent. She quickly understood the whole matter and immediately went to Śrīcandrā’s parents. Then, in clear and gentle words, she began to explain the cause of Śrīcandrā’s fainting exactly as she had heard it from her. ॥444–449॥
श्लोक ( Shlok ) 450 – 454
इतस्तृतीये कन्यैषा बभूव किल जन्मनि । देशे हेमाङ्गदे राजपुरे वैश्यकुलाग्रणीः ॥ ४५० ॥रत्नतेजाः प्रिया तस्य रत्नमाला तयोः सुता । सुरूपानुपमा नाम्ना नाम्नैव न गुणैरपि ॥ ४५१ ॥तस्मिन्नेव पुरे वंशे विशां कनकतेजसः । तनूजश्चन्द्रमालायामभवदुबिंधो विधीः ॥ ४५२ ॥ सुवर्णतेजा नाम्नाभूत्तस्मै प्राक्परिभाषिताम् । पुनस्तदवमानेन तन्मातापितरौ किल ॥ ४५३ ॥ समश्राणयतां वैश्यपुत्राय मणिकारिणे । गुणमित्राय तत्रेयं स्तोकं कालमगात्सुखम् ॥ ४५४ ॥
इस जन्मसे पहले तीसरे जन्मकी बात है तब इसी हेमाङ्गद देशके राजपुर नगर में वैश्यकुल शिरोमणि रत्नतेज नामका एक सेठ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम रत्नमाला था। यह कन्या उन दोनोंकी अनुपमा नामकी अतिशय रूपवती पुत्री थी। अनुपमा केवल नामसे ही अनुपमा नहीं थी किन्तु गुणोंसे भी अनुपमा (उपमा रहित) थी। उसी नगर में वैश्यवंशमें उत्पन्न हुए कनक-तेजकी स्त्री चन्द्रमालासे उत्पन्न हुआ सुवर्णतेज नामका एक पुत्र था जो कि बहुत ही बुद्धिहीन और भाग्यहीन था। अनुपमाके माता पिताने पहले इसी सुवर्णतेजको देनी कही थी परन्तु पीछे उसे दरिद्र और मूर्खताके कारण अपमानितकर जवाहरातका काम जाननेवाले गुणमित्र नामक किसी दूसरे वैश्य-पुत्रके लिए दे दी। अनुपमा उसके पास कुछ समय तक सुखसे रही ॥ ४५०-४५४ ।।
The events I am about to relate occurred three births before the present one. At that time, in the city of Rājapura, in the country of Hemāṅgada, there lived a wealthy merchant named Ratnateja, the foremost ornament of the Vaiśya community. His wife was named Ratnamālā. This maiden was their exceedingly beautiful daughter, Anupamā.Anupamā was not incomparable merely in name; she was equally unparalleled in her virtues and noble qualities.In the same city lived a merchant named Kanakateja. His wife, Candramālā, bore him a son named Suvarṇateja, who was exceedingly lacking in both intelligence and good fortune.Anupamā’s parents had initially promised her in marriage to Suvarṇateja. Later, however, considering him poor and foolish, they rejected and dishonoured him, and instead gave their daughter in marriage to another merchant’s son named Guṇamitra, who was skilled in the art of jewellery. Anupamā then lived happily with him for some time. ॥450–454॥
श्लोक 455 से 472
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73