अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 514 to 521
श्लोक ( Shlok ) 514
विप्रस्त्वं षट्द्ममावादी न चार्वाको न मां प्रति । प्रयोगोऽनभ्युपेतत्वादित्युक्तिर्घटते न ते ॥ ५१४ ॥
इसके सिवाय एक बात यह भी विचारणीय है कि हे प्रिय ! तुम प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव इन छह प्रमाणोंको मानने वाले मीमांसक हो, केवल प्रत्यक्षको मानने वाले चार्वाक नहीं हो अतः तुम्हारा मेरे प्रति यह कहा जाना कि अनुमानका प्रयोग मुझे स्वीकृत नहीं है। संगत नहीं बैठता ॥ ५१४ ॥
“‘Moreover, one more point is worth considering, my dear friend! You are a Mimamsaka who accepts six means of valid knowledge—namely, direct perception (Pratyaksha), inference (Anumana), verbal testimony (Shabda), comparison (Upamana), postulation (Arthapatti), and non-apprehension (Abhava); you are not a Charvaka who accepts only direct perception. Therefore, your statement to me that you do not accept the application of inference is completely inconsistent.’” [514]
श्लोक ( Shlok ) 515
साध्यसाधनसम्बन्धो हेतुश्चाध्यक्षगोचरः । ऊहाद्वयाप्तिः कथं न स्यात्प्रयोगस्त्वां प्रति प्रमा ॥ ५१५ ॥
साध्य-साधनके सम्बन्धको हेतु कहते हैं वह प्रत्यक्षका विषय है और अविनाभाव सम्बन्धसे उसकी व्याप्तिका ज्ञान होता है फिर आप अनुमानको प्रमाण क्यों नहीं मानते ॥ ५१५ ॥
“‘The logical reason (Hetu) is defined as the relationship between the major term (Sadhya—what is to be proven) and the middle term (Sadhana—the means of proof). This relationship is an object of direct perception (Pratyaksha), and its universal concomitance (Vyapti) is known through the relationship of invariable concomitance (Avinabhava). Such being the case, why do you not accept inference (Anumana) as a valid source of knowledge?’” [515]
श्लोक ( Shlok ) 516
क्वाचित्कव्यभिचाराच्चे प्रत्यक्षेऽपि न सोऽस्ति किम् । नानुमानं प्रमेत्यार्य मुच्यतामयमाग्रहः ॥ ५१६ ॥
यदि यह कहा जाय कि अनुमानमें कदाचित् व्यभिचार (दोष) देखा जाता है तो यह व्यभिचार क्या प्रत्यक्षमें भी नहीं होता ? अवश्य होता है। इसलिए हे आर्य ! ‘अनुमान प्रमाण नहीं हैं’ यह आग्रह छोड़िये ।। ५१६ ।।
“‘If it is argued that a fallacy (Vyabhichara) is occasionally observed in inference (Anumana), then does such fallacy not occur in direct perception (Pratyaksha) as well? It certainly does! Therefore, O noble one, abandon this stubborn insistence that “inference is not a valid source of knowledge.”’” [516]
श्लोक ( Shlok ) 517 – 519
प्रत्यक्षमविसंवादि प्रमाणमिति चेत्कुतः । अनुमानेऽपि तन्नेष्टमनिष्टं किं क्षितीशिभिः ॥ ५१७॥ अस्तु साङ्ख्यादिवादानामप्रामाण्यं विरोधतः । दृष्टेन तेन संवादसिद्धेर्वादस्य नार्हतः ॥ ५१८ ॥ इत्यार्हतोक्तं तत्तथ्यं श्रुत्वा सर्व द्विजात्मजः । त्वद्द्रुहीतो ममाप्यस्तु धर्मोऽद्य प्रभृतीति सः ॥५१९॥
यदि यह कहा जाय कि प्रत्यक्ष विसंवादरहित है इसलिए प्रमाणभूत है तो अनुमानमें भी तो विसंवादका अभाव रहता है उसे. भी प्रमाण क्यों नहीं मानते हो । युक्तिकी समानता रहते हुए एकको प्रमाण माना जाय और दूसरेको अप्रमाण माना जाय यदि यही आपका पक्ष है तो फिर राजाओंकी क्या आवश्यकता ? अथवा सांख्य आदि दर्शनोंमें अप्रामाणिकता भले ही रहे क्योंकि उनमें विरोध देखा जाता है परन्तु अरहन्त भगवान्के दर्शनमें अप्रामाणिकता नहीं हो सकती क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाणसे उसका संवाद देखा जाता है । इस प्रकार साथके जैनी-श्रावकके द्वारा कहे हुए समस्त यथार्थ त्तत्वको सुनकर ब्राह्मणने कहा कि जिस धर्मको आपने ग्रहण किया है वही धर्म आजसे मेरा भी हो ॥ ५१७-५१९ ॥
“‘If it is argued that direct perception (Pratyaksha) is authoritative because it is non-contradictory (Visamvada-rahita), then inference (Anumana) also lacks contradiction; why do you not accept it too as authoritative? If it is your stance that despite the logical reasoning being identical, one is accepted as authoritative while the other is rejected as unauthoritative, then what is even the need for a king to adjudicate?
Furthermore, let unauthoritativeness remain in philosophies like Samkhya, because contradictions are clearly observed in them; however, there can be no unauthoritativeness in the philosophy of the Lord Arihant, because its alignment (Samvada) with direct perception is clearly evident.’
Hearing all the absolute truths thus expounded by his companion, the Jain Shravak, the Brahmin said, ‘From this day forward, the very path of righteousness (Dharma) that you have adopted shall be my Dharma as well.'” [517-519]
श्लोक ( Shlok ) 520
तदाज्ञयाऽग्रहीद्धर्मं निर्मलं जिनभाषितम् । सद्वचो हितमन्ते स्यादातुरायेव भेषजम् ॥ ५२०॥
श्रावककी आज्ञासे उस ब्राह्मणने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ निर्मल धर्म ग्रहण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार औषधि, बीमार मनुष्यका हित करती है उसी प्रकार सज्जन पुरुषके वचन भी अन्तमें हित ही करते हैं ।। ५२० ।।
“Following the guidance of the Shravak, that Brahmin accepted the pure path of righteousness (Dharma) expounded by Lord Jinendra. And this is only fitting; for just as medicine benefits a sick person, the words of righteous and noble men ultimately bring about absolute well-being.” [520]
श्लोक ( Shlok ) 521
अथ तौ सह गच्छन्तावटवीगहनान्तरे । पापोदयात्परिभ्रष्टमार्गों दिङ्मूढताङ्गतौ ॥ ५२१ ॥
अथानन्तर वे दोनों ही साथ-साथ जाते हुए किसी सघन अटवीके बीचमें पापके उदयसे मार्ग भूल कर दिशाभ्रान्त हो गये ।। ५२१ ।।
“Thereafter, as the two were traveling along together, due to the rise of their past demeritorious karma (Papa-ke-udaya), they lost their way amidst a dense forest and became completely disoriented regarding the directions.” [521]
श्लोक 522 से 531
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513
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