चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 242 to 250
श्लोक ( Shlok ) 242 – 245
तन्त्र गन्धोत्कटः स्वस्य स्वयं शिशुशवं तदा । गच्छन्निक्षिप्य गम्भीरमाकर्ष्यार्भकसुस्वरम् ॥ २४२ ॥जीव जीवेति जीवन्धराख्यां वा भाविनीं वदन् । सत्यं मुनिसमादिष्टमिति तुष्टोऽवगम्य तम् ॥ २४३ ॥करौ प्रसार्य सस्नेहं बालं समुदतिष्ठिपत् । देवी तत्स्वरमाकर्ण्य बुध्वा गन्धोत्कटाह्वयम् ॥ २४४ ॥ अवबोध्य तमात्मानं भद्र त्वं तनयं मम । वर्धयान्यैरविज्ञातमिति तस्मै समर्पयत् ॥ २४५ ॥
इतनेमें ही गन्धोत्कट सेठ, अपने मृत पुत्रका शव रखनेके लिए वहाँ स्वयँ पहुँचा। बह शवको रख कर जब जाने लगा तब उसने किसी बालकका गम्भीर शब्द सुना। शब्द सुनते ही उसने ” जीव जीव ” ऐसे आशीर्वादात्मक शब्द कहे मानो उसने आगे प्रचलित होने वाले उस पुत्रके ‘जीवन्धर’ इस नामका ही उच्चारण किया हो। मुनिराजने जो कहा था वह सच निकला यह जान कर गन्धोत्कट बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। उसने दोनों हाथ फैला कर बड़े स्नेहप्ते उस बालकको उठा लिया । विजया देवीने गन्धोत्कटकी आवाज सुनकर ही उने पहिचान लिया था । इसलिए उसने अपने आपका परिचय देकर उसने कहा कि हे भद्र, तू मेरे इस पुत्रका इस तरह पालन करना जिस तरह कि किसीको इसका पता न चल सके। यह कह कर उसने वह पुत्र गन्धोत्कट के लिए सौंप दिया ।। २४२-२४५ ।।
“Just then, the merchant Gandhotkata arrived at that very place on his own to discard the corpse of his stillborn son. Having placed the corpse down, as he was about to leave, he heard the deep cry of a newborn child. Upon hearing the sound, he uttered the blessing, ‘Jiva, Jiva‘ (Live, Live!), as if he were pronouncing the very name ‘Jivandhara’ by which the son would be known in the future. Realizing that what the Muniraj had foretold had come true, Gandhotkata was immensely gratified. Extending both his hands, he lifted the infant with great affection. Queen Vijaya had recognized Gandhotkata by his voice alone. Therefore, revealing her identity, she said to him, ‘O noble one! Bring up this son of mine in such a manner that no one may ever come to know of his true origin.’ Saying this, she handed the child over to Gandhotkata. || 242-245 ||”
श्लोक ( Shlok ) 246 – 248
सोऽपि तं प्रतिगृह्वीवं करोमीति कृतत्वरः । गत्वा गृहं स्वकान्तायै नन्दायै तत्प्रवृत्तकम् ॥ २४६ ॥किमप्यप्रतिपाद्यास्यै क्रुध्यन्निव गतस्मृते । सप्राणसपरीक्ष्यैव भवत्या तदपत्यकम् ॥ २४७ ॥ विसर्जनाय मद्धस्ते निर्विचारं समर्पितम् । आयुष्मान्पुण्यवानेष गृहाणेति वितीर्णवान् ॥ २४८ ॥
सेठ गन्धोत्कटने भी ‘मैं ऐसा ही करूंगा’ यह कह कर वह पुत्र ले लिया और शीघ्रताके साथ घर आकर अपनी नन्दा नामकी स्त्रीके लिए दे दिया। देते समय उसने स्त्रीके लिए उक्त समाचार तो कुछ भी नहीं बतलाया परन्तु कुछ कुपित-सा होकर कहा कि हे मूर्खे ! वह बालक जीवित था, तू ने बिना परीक्षा किये ही श्मशानमें छोड़ आनेके लिए मेरे हाथमें विचार किये बिना ही रख दिया था। ले, यह बालक चिरजीवी है और पुण्यवान् है, यह कह कर उसने वह पुत्र अपनी स्त्रीको दिया था ।। २४६-२४८ ॥
श्लोक ( Shlok ) 249
प्रत्यैच्छत्साऽपि सन्तुष्टा कराभ्यां बालभास्करम् । विराजितं पराजित्य बालं लोलत्रिलोचना ॥ २४९ ॥
सुनन्दा सेठानीने संतुष्ट हो कर वह बालक दोनों हाथोंसे ले लिया। वह बालक प्रातः कालके सूर्यको पराजित कर सुशोभित हो रहा था और सेठानी की आँखें उसे देख-देख कर सतृष्ण हो रही थीं ॥ २४९ ॥
“Full of joy, the merchant’s wife Sunanda received the child with both hands. Outshining the morning sun, the infant shone with great splendor, and the eyes of the merchant’s wife gazed upon him with deep, longing affection. || 249 ||”
श्लोक ( Shlok ) 250
तस्यान्यदा वणिग्वर्यः कृतमङ्गलसत्क्रियः । अन्नप्राशनपर्यन्ते व्यधाज्जीवन्धराभिधाम् ॥ २५० ॥
किसी एक दिन उस सेठने अनेक माङ्गलिक क्रियाएं कर अन्नप्राशन संस्कारके बाद उस पुत्रका ‘जीवन्धर’ नाम रक्खा ॥ २५० ॥
“One auspicious day, after performing numerous sacred rituals and the Annaprashana ceremony (the child’s first tasting of solid food), the merchant named the son ‘Jivandhara.’ || 250 ||”
श्लोक 251 से 261
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