अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
आनेतुं तान्यशक्यानि प्राङ्मयाराध्य देवताम् । तद्वनस्वामिनीं दीर्घ लब्धान्येतानि कानिचित् ॥१६२॥
उत्तरमें देवने कहा कि वे फल नहीं लाये जा सकते। पहले तो मैंने उस वनकी स्वामिनी देवीकी आराधना कर कुछ फल प्राप्त कर लिये थे ॥ १६२ ।।
“In reply, the deity said, ‘Those fruits cannot be brought now. Previously, I had obtained a few fruits only after propitiating the goddess who is the sovereign ruler of that forest.'” (162)
श्लोक ( Shlok ) 163
आसक्तिस्तेषु चेदस्ति देवस्य तद्वनं मया । सह तत्र त्वमायाहि यथेष्टं तानि भक्षय ॥ १६३ ॥
यदि आपकी उन फलोंमें आसक्ति है – आप उन्हें अधिक पसन्द करते हैं तो आप मेरे साथ वहाँ स्वयं चलिये और इच्छानुसार उन फलोंको खाइये ।।१६३॥
“If you have an attachment to those fruits—if you like them so much—then come there with me yourself, and eat those fruits to your heart’s content.” (163)
श्लोक ( Shlok ) 164
इति प्रलम्भनं तस्य विश्वास्य प्रतिपन्नवान् । राजा प्रक्षीणपुण्यानां विनश्यति विचारणम् ॥ १६४ ॥
राजाने उसके मायापूर्ण वचनोंका विश्वास कर उसके साथ जाना स्वीकृत कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका पुण्य क्षीण हो जाता है उनकी विचार-शक्ति नष्ट हो जाती है ।। १६४ ।।
“Trusting his deceptive words, the king agreed to go with him. And this is only fitting, for those whose merit (punya) is exhausted lose their power of judgment.” (164)
श्लोक ( Shlok ) 165 – 167
एतद्राज्यं परित्यज्य रसनेन्द्रियलोलुपः । मत्स्यवत्कि विनष्टेति मन्त्रिभिर्वारितोऽप्यसौ ॥ १६५ ॥तदुक्तमतिलक्ष्याज्ञः पोतेनागाहताम्बुधिम् । तदा रनानि तद्ङ्गेहात् न्यपेतान्यखिलान्यपि ॥ १६६ ॥ सहस्त्रयक्षरक्षाणि प्रत्येकं निधिभिः समम् । तद्विदित्वा वणिग्वैरी नीत्वा मध्येऽम्बुधिं ‘द्विषम् ॥ १६७ ॥
यद्यपि मन्त्रियोंने उस राजाको रोका था कि आप मत्स्यकी तरह रसना इन्द्रियके लोभी हो यह राज्य छोड़-कर क्यों नष्ट होते हो तथापि उस मूर्खने एक न मानी। वह उनके वचन उल्लंघन कर जहाज द्वारा समुद्रमें जा घुसा। उसी समय उसके घरसे जिनमें प्रत्येककी एक-एक हजार यक्ष रक्षा करते थे ऐसे समस्त रत्न निधियोंके साथ-साथ घरसे निकल गये। यह जानकर वैश्यका वेष रखनेवाला शत्रु भूतदेव अपने शत्रु राजाको समुद्रके बीचमें ले गया ।। १६५-१६७ ।।
“Even though the ministers tried to stop the king, saying, ‘Why are you abandoning this kingdom and heading toward ruin, being greedy for the sense of taste like a fish?’, that foolish king did not heed their words at all. Transgressing their advice, he boarded a ship and entered the sea. At that very moment, all the sacred jewels and treasures—each guarded by a thousand Yakshas—departed from his palace. Realizing this, the enemy celestial deity (Bhootadeva), who was disguised as a merchant, led his enemy, the king, into the middle of the ocean.” (165–167)
श्लोक ( Shlok ) 168
स्वप्राग्जन्माकृतिं तस्य प्रकटीकृत्य दुर्वचः । उक्त्वा वैरानुबन्धं च क्रूरश्चित्रवधं व्यधात् ॥ १६८ ॥
वहाँ ले जाकर उस दुष्टने पहले जन्मका अपना रसोइयाका रूप प्रकट कर दिखाया और अनेक दुर्वचन कह कर पूर्वबद्ध, वैरके संस्कारसे उसे विचित्र रीतिसे मार डाला ॥ १६८ ॥
“Having brought him there, that wicked being manifested his form from the previous birth as the cook and, uttering numerous harsh and abusive words, killed him in a grotesque manner due to the deep-seated impressions of their past enmity.” (168)
श्लोक ( Shlok ) 169
सुभौमोऽपि विपद्यान्ते रौद्रध्यानपरायणः । श्वाश्रीं गतिं समापन्नो दौर्मत्यात्किन्न जायते ॥ १६९ ॥
सुभौम चक्रवर्ती भी अन्तिम समय रौद्रध्यानसे मर कर नरकगतिमें उत्पन्न हुआ सो ठीक ही है क्योंकि दुर्बुद्धिसे क्या नहीं होता है ? ।। १६९ ।।
“At his final moment, the Chakravarti Subhauma also died absorbed in Raudra-dhyana (wrathful/cruel meditation) and was reborn in hell. And this is only fitting, for what ruin does a corrupted intellect not bring about?” (169)
श्लोक ( Shlok ) 170
लोभात्सहसूबाहुश्च प्राप तिर्यग्गतिं सतुक् । जमदग्निसुतौ हिंसापरतन्त्रौ गतावधः ॥ १७० ॥
सहस्रबाहु लोभ करनेसे अपने पुत्रके साथ-साथ तिर्यश्च गतिमें गया और हिंसामें तत्पर रहनेवाले जमदग्नि ऋषिके दोनों पुत्र अधोगति – नरकगतिमें उत्पन्न हुए ।। १७० ॥
“Due to his greed, Sahasrabahu, along with his son, went to the animal realm (Tiryancha gati), and both the sons of Sage Jamadagni, who were intent on violence, were reborn in the lower realm—the realm of hell (Naraka gati).” (170)
श्लोक ( Shlok ) 171
तत एव त्यजन्त्येतौ रागद्वेषौ मनीषिणः । तत्त्यागादाप्नुवन्त्यापन्नाप्स्यन्ति च परं पदम् ॥ १७१ ॥
इसीलिए बुद्धिमान् लोग इन राग-द्वेष दोनोंको छोड़ देते हैं क्योंकि इनके त्यागसे ही विद्वान् पुरुष वर्तमानमें परमपद प्राप्त करते हैं, भूतकालमें प्राप्त करते थे और आगामी कालमें प्राप्त करेंगे ॥ १७१ ॥
“For this very reason, wise people abandon both attachment (raga) and aversion (dvesha), because it is solely through their renunciation that learned men attain the supreme state (parampada) in the present, attained it in the past, and will attain it in the future.” (171)
श्लोक 172 से 184
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161
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