आदिपुराण पर्व 7 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 7 by Acharya Jinasena
पर्व 7 में वज्रदंत का उपदेश, पूर्वभव वर्णन, श्रीमती और वज्रजंघ का मिलन, विवाह और पूजा का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 318)
चक्रवर्ती वज्रदंत ने अपनी शोकाकुल पुत्री श्रीमती को बुलाकर सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि वह शोक न करे, क्योंकि अवधिज्ञान से उन्हें उसके पति ललितांग का वृत्तांत मालूम है। उन्होंने श्रीमती को स्नान करने, अलंकार धारण करने और सखियों संग भोजन करने को कहा, यह भविष्यवाणी करते हुए कि उसका पति शीघ्र मिलेगा। वज्रदंत ने यशोधर के केवलज्ञान महोत्सव के समय प्राप्त अवधिज्ञान से अपने, श्रीमती और उसके पति के पूर्वजन्मों का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि पाँच भव पहले वह पुंडरीकिणी नगरी में अर्धचक्रवर्ती के पुत्र चंद्रकीर्ति थे। मित्र जयकीर्ति संग राज्य सुख भोगा। गृहस्थ रहते हुए अणुव्रत लिए, फिर गुरु चंद्रसेन से संन्यास लेकर माहेंद्र स्वर्ग में देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र बलभद्र श्रीवर्मा हुए, और जयकीर्ति उनके भाई नारायण विभीषण बने। पिता श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत पालकर स्वर्ग में ललितांगदेव बनीं। विभीषण की मृत्यु पर ललितांग ने वज्रदंत को शोक त्यागने का उपदेश दिया। इसके बाद वज्रदंत ने युगंधर मुनि से दीक्षा ली, तप कर अवधिज्ञान प्राप्त किया और अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया।
ललितांग आगे गंधर्वपुर में महीधर बने। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर ने विद्याएँ सिद्ध कीं। वज्रदंत ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश देकर वैराग्य उत्पन्न किया। महीधर ने दीक्षा ली और प्राणत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में अजितंजय बने, जिन्हें पिहितास्रव नाम मिला। वज्रदंत ने उन्हें विषयों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने दीक्षा ली और श्रीमती को पूर्वभव में व्रत दिए थे। वज्रदंत ने बताया कि अंतिम ललितांग श्रीमती का पति है, जो अब मनुष्यलोक में है।
श्रीमती ने पिता के उपदेश से पूर्वभव स्मरण किया। वज्रदंत ने पंडिता से ललितांग की खोज कराई। पंडिता ने चित्रपट लेकर महापूत जिनालय में वज्रजंघ को पाया, जो ललितांग का जीव था। वज्रजंघ ने चित्रपट देखकर स्वयंप्रभा संग अपने पूर्वभव को पहचाना और मूर्च्छित हो गया। सचेत होने पर उसने पंडिता से श्रीमती के बारे में पूछा। पंडिता ने बताया कि श्रीमती उसकी खोज में है। वज्रजंघ ने अपना चित्रपट देकर पंडिता को विदा किया।
पंडिता ने श्रीमती को समाचार सुनाया और चित्रपट दिखाया। श्रीमती प्रसन्न हुई। वज्रदंत ने वज्रबाहु और उनके परिवार का स्वागत किया। वज्रबाहु ने श्रीमती का हाथ वज्रजंघ के लिए माँगा। वज्रदंत ने सहमति दी, यह कहते हुए कि दोनों का प्रेम जन्मांतरों से चला आ रहा है। विवाह की तैयारियाँ हुईं। विश्वकर्मा ने रत्नजड़ित मंडप बनाया। शुभ मुहूर्त में श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह संपन्न हुआ। दोनों ने आभूषण धारण किए और रत्नवेदी पर बैठे। पाणिग्रहण के साथ विवाह पूर्ण हुआ।
सभी ने इस विवाह की प्रशंसा की और पूर्वजन्म के पुण्य को इसका कारण माना। अगले दिन वज्रजंघ और श्रीमती ने महापूत चैत्यालय में जिनपूजा की। वज्रजंघ ने जिनेंद्र की स्तुति की, उनके गुणों का स्मरण किया और मोक्ष की कामना की। फिर पुंडरीकिणी नगरी में प्रवेश कर राज्याभिषेक प्राप्त किया। बत्तीस हजार राजाओं ने उनका सम्मान किया। श्रीमती संग वह दीर्घकाल तक सुख भोगते रहे।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 7
श्लोक 1 से 11 वज्रदंत का श्रीमती को उपदेश
चक्रवर्ती वज्रदंत ने शोकग्रस्त श्रीमती को बुलाकर उपदेश दिया कि शोक और मौन छोड़कर स्नान, अलंकार, भोजन करे और सखियों से बात करे, क्योंकि उसका पति शीघ्र मिलेगा। यशोधर के केवलज्ञानोत्सव से उन्हें अवधिज्ञान मिला, जिससे वे श्रीमती, स्वयं, और उसके पति के पूर्वभव जानते हैं। पाँचवें भव में वे पुंडरीकिणी नगरी में चंद्रकीर्ति थे, जयकीर्ति उनका मित्र था। गृहस्थ के रूप में राज्य भोगकर समाधि से माहेंद्र स्वर्ग में देव बने।
श्लोक 12 से 21 चंद्रकीर्ति और जयकीर्ति का पुनर्जन्म
माहेंद्र स्वर्ग में वे और जयकीर्ति सामानिक देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र श्रीवर्मा (बलभद्र) और विभीषण (नारायण) बने। श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत कर स्वर्ग में ललितांगदेव बनी। विभीषण की मृत्यु पर ललितांगदेव ने श्रीवर्मा को शोक छोड़ने का उपदेश दिया।
श्लोक 22 से 32 श्रीवर्मा का वैराग्य और ललितांग का जन्म
श्रीवर्मा ने युगंधर मुनि से 5,000 राजाओं के साथ दीक्षा ली, सिंहनिष्क्रीडित और सर्वतोभद्र तप कर अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया। ललितांग च्युत होकर गंधर्वपुर में वासव और प्रभावती का पुत्र महीधर बना। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर विद्याओं में निपुण हुआ।
श्लोक 33 से 41 महीधर का वैराग्य और अजितंजय का जन्म
वज्रदंत (अच्युत इंद्र) ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश दिया कि वह उनकी माता का जीव है और भोगों से विरक्त हो। महीधर ने राज्य पुत्र को सौंपकर जंगनंदन मुनि से दीक्षा ली, कनकावली तप कर प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में जयवर्मा और सुप्रभा का पुत्र अजितंजय हुआ।
श्लोक 42 से 54 अजितंजय का चक्रवर्तित्व और पिहितास्रव
जयवर्मा ने दीक्षा ले अभिनंदन मुनि से मोक्ष प्राप्त किया। सुप्रभा ने रत्नावली व्रत कर स्वर्ग गयी। अजितंजय चक्रवर्ती बना और अभिनंदन की वंदना से पिहितास्रव नाम पाया। वज्रदंत ने उसे भोगों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने मंदिरस्थविर से दीक्षा ली और श्रीमती को व्रत दिए थे।
श्लोक 55 से 71 ललितांग और युगंधर का परिचय
वज्रदंत ने बताया कि 22वाँ ललितांग (महाबल) श्रीमती का पति था, जो स्वयंबुद्ध के उपदेश से देव बना और अब मनुष्यलोक में है। अच्युत स्वर्ग में उन्होंने ब्रह्मेंद्र, लांतव इंद्रों, और ललितांग-स्वयंप्रभा को युगंधर का चरित्र सुनाया। वत्सकावती देश के सुसीमा नगर में प्रहसित और विकसित विद्वान् थे, जो अजितंजय के मंत्री अमितमति के पुत्र और मित्र थे। दोनों ने मतिसागर मुनि से जीवतत्त्व पूछा और अभाव का तर्क दिया।
श्लोक 72 से 82 जीवतत्त्व का निरूपण
मतिसागर ने प्रहसित और विकसित के तर्क का खंडन किया कि अनुपलब्धि से जीव का अभाव नहीं सिद्ध होता, क्योंकि सूक्ष्म, दूरवर्ती पदार्थ भी उपलब्ध नहीं होते, पर उनका अस्तित्व है। पितामह को न देखने पर भी उनका सद्भाव मानते हैं। जीव शब्द संज्ञावाचक है, अतः जीव का अस्तित्व है। दोनों ने तप कर महाशुक्र स्वर्ग में इंद्र और प्रतींद्र बने, फिर पुंडरीकिणी में महाबल और अतिबल बने।
श्लोक 83 से 91 महाबल का आध्यात्मिक पथ
महाबल ने अतिबल की मृत्यु पर समाधिगुप्त से दीक्षा ली, प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से प्रभाकरी नगरी में महासेन और वसुंधरा का पुत्र जयसेन बना, चक्रवर्ती हुआ, दीक्षा ली, और ग्रैवेयक में अहमिंद्र बना। फिर रत्नसंचय नगर में अजितंजय और वसुमती का पुत्र युगंधर बना, जो तीर्थंकर हुआ।
श्लोक 92 से 102 युगंधर की महिमा और श्रीमती का जवाब
युगंधर ने 66 सागर तक सुख भोगकर अरहंत पद पाया। वे तीर्थंकर हैं, जो भव्यों को विकसित करते हैं। उनके चरित्र से कई जीव सम्यग्दर्शी बने। श्रीमती ने कहा कि वह पिहितास्रव की पूजा और विहार याद करती है, पर ललितांग के जन्म का पता नहीं। वज्रदंत ने बताया कि वे अच्युत से च्युत हो वज्रदंत बने।
श्लोक 103 से 111 वज्रदंत का श्रीमती को आश्वासन
वज्रदंत ने श्रीमती को बताया कि जब उनकी आयु में 50,000 पूर्व वर्ष बाकी थे, वे स्वर्ग से च्युत हुए। श्रीमती और ललितांग भी च्युत होकर इस देश में राजपुत्र और राजपुत्री बने। तीसरे दिन श्रीमती का ललितांग (वज्रजंघ) से मिलन होगा, और पंडिता आज समाचार लाएगी। ललितांग उनकी बुआ का पुत्र है। वज्रदंत मामी को लाने गए, तभी पंडिता प्रसन्न मुख से आई और श्रीमती से बोली।
श्लोक 112 से 121 पंडिता की खोज और वज्रजंघ का आगमन
पंडिता ने श्रीमती को बताया कि उसका मनोरथ पूर्ण हुआ। वह चित्रपट लेकर महापूत जिनalay गई, जहाँ मूर्ख लोग अर्थ न समझ सके। वासव और दुर्दांत ने झूठ बोला कि वे श्रीमती के पति हैं, पर गूढ़ प्रश्नों में चुप हो गए। फिर वज्रजंघ आया, जिनमंदिर की पूजा कर चित्रशाला में प्रवेश किया। उसने चित्रपट को देखा और कहा कि यह उसका पूर्वभव लगता है।
श्लोक 122 से 131 वज्रजंघ का चित्रपट विश्लेषण
वज्रजंघ ने चित्र की प्रशंसा की—यह मनोहर, रेखाओं से सुसंगत, और उसके पूर्वभव (ललितांग और स्वयंप्रभा) को दर्शाता है। उसने ऐशान स्वर्ग, श्रीप्रभविमान, कल्पवृक्ष, सरोवर, और स्वयंप्रभा के साथ क्रीड़ा देखी। स्वयंप्रभा का प्रणय-कोप, ताड़न, और नम्रता चित्रित थी, साथ ही अच्युत इंद्र से भेंट और पिहितास्रव की पूजा भी।
श्लोक 132 से 141 वज्रजंघ की स्मृति और मूर्छा
वज्रजंघ ने कहा कि कुछ घटनाएँ—स्वयंप्रभा का कर्णफूल से ताड़न, पैर की छाप, और कपोल पर पत्र-रचना—चित्र में नहीं हैं। उसने निश्चय किया कि यह स्वयंप्रभा का कौशल है। सोचते हुए वह मूर्छित हो गया। पंडिता और मूर्तियों को भी दुख हुआ। परिचारकों ने उसे सचेत किया, पर उसका चित्त श्रीमती में लगा रहा। उसने पंडिता से चित्र के रचयिता के बारे में पूछा।
श्लोक 142 से 151 पंडिता का वज्रजंघ को जवाब
पंडिता ने बताया कि श्रीमती, वज्रदंत की पुत्री, ने चित्र बनाया। वह सुंदर, यौवनवती, और दुर्लभ है। उसके कटाक्ष, मुख, चरण, और कर्णफूल की प्रशंसा की। श्रीमती वज्रजंघ को खोज रही है। वज्रजंघ ने कहा कि कर्मों का उदय अद्भुत है, जो जन्मांतर से मिलन कराता है।
श्लोक 152 से 162 चित्रों का आदान-प्रदान और श्रीमती की प्रसन्नता
वज्रजंघ ने अपना चित्र पंडिता को देकर चित्रपट लिया, जो रेखाओं और भावों से स्पष्ट था। वह चला गया, और पंडिता श्रीमती के पास आई। श्रीमती ने चित्र देखकर सुख की साँस ली, जैसे चातकी मेघ, हंसी किनारा, या कोयल आमवन देखकर प्रसन्न होती है। उसकी आकुलता दूर हुई।
श्लोक 163 से 173 पंडिता का श्रीमती को आश्वासन
पंडिता ने कहा कि श्रीमती शीघ्र वज्रजंघ से मिलेगी। वज्रजंघ का चित्त उसमें लगा था; वह दरवाजे पर रुका, स्खलित हुआ, और कामज्वर के लक्षण दिखाए। वह वज्रदंत का भानजा है, गुणी और योग्य वर है। श्रीमती लक्ष्मी-सरस्वती से श्रेष्ठ है, और उसके साथ सुख भोगेगी।
श्लोक 174 से 181 वज्रदंत और वज्रबाहु का मिलन
पंडिता ने श्रीमती को सुखी किया, पर वह वज्रजंघ की प्राप्ति तक निराकुल न हुई। वज्रदंत वज्रबाहु को ले आए। दोनों ने प्रीति से कुशल पूछी। वज्रदंत ने अतिथियों का सत्कार किया, जिससे वज्रबाहु प्रसन्न हुआ।
श्लोक 182 से 191 वज्रदंत और वज्रबाहु का संवाद
वज्रदंत ने वज्रबाहु से कहा कि वे जो चाहें ले लें। वज्रबाहु ने कहा कि उनके पास सब है; वज्रदंत की प्रीति ही पर्याप्त है। धन नष्ट होता है, पर स्नेह अमर है। वे परोपकारी पुरुषों की तरह धन धारण करते हैं।
श्लोक 192 से 201 श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह प्रस्ताव
वज्रबाहु ने धन न माँगकर श्रीमती को वज्रजंघ के लिए माँगा, जो भानजा, उच्चकुलजात, और योग्य है। वज्रदंत ने स्वीकार किया कि दोनों का प्रेम जन्मांतर से है, और उनका समागम चंद्र-चाँदनी समान होगा।
श्लोक 202 से 211 विवाह की स्वीकृति और उत्साह
वज्रदंत ने कहा कि श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह पहले से नियत था। वज्रबाहु अत्यंत प्रसन्न हुआ, वसुंधरा को हर्ष हुआ, और सभी ने विवाह की प्रशंसा की। दोनों सुंदर थे, मानो कामदेव और रति। नगर और राजमहल शोभायमान हुए। विश्वकर्मा ने रत्न-सुवर्ण से मंडप बनाया, जिसमें सुवर्ण खंभे और रत्न तलकुंभ थे।
श्लोक 212 से 221 विवाह मंडप का वर्णन और पूजा
मंडप में स्फटिक दीवारें, नील रत्न भूमि, मोती मालाएँ, पद्मराग वेदी, और सफेद शिखर थे। गोपुर-द्वार और भीतरी दरवाजा रत्नों से बना था। वज्रदंत ने महापूत चैत्यालय में कल्पवृक्ष पूजा की। शुभ मुहूर्त में नगर सजा, चंदन-पुष्प बिखरे, और वधू-वर का अभिषेक हुआ।
श्लोक 222 से 231 विवाह समारोह का प्रारंभ
शंख-दुंदुभि बजे, सभी नृत्य करते थे। वारांगनाएँ और नगरवासी पुष्प-अक्षत से आशीष देते थे। दोनों ने रेशमी वस्त्र, चंदन तिलक, और मोती हार धारण किए।
श्लोक 232 से 241 वर-वधू का अलंकरण
दोनों ने पुष्पमाला, कर्णभूषण, कड़े, करधनी, और नुपूर पहने। लक्ष्मीमती और वसुंधरा ने उन्हें सजाया। रत्न-वेदी पर बैठे, वे मेरु तट समान शोभायमान हुए।
श्लोक 242 से 251 पाणिग्रहण और उत्सव
नगाड़े बजे, वारांगनाएँ गीत-नृत्य करती थीं। वज्रदंत ने शृंगार धारण किया। वज्रजंघ ने श्रीमती का पाणिग्रहण किया; दोनों के स्पर्श से संताप दूर हुआ। श्रीमती कल्प-लता समान शोभायमान हुई।
श्लोक 252 से 261 विवाह की प्रशंसा
श्रीमती और वज्रजंघ रति-कामदेव समान थे। लोग श्रीमती को लक्ष्मीमती कहते थे। दर्शक आनंदित हुए, वज्रदंत और वसुंधरा की प्रशंसा की। दोनों के पूर्व पुण्य का फल यह विवाह था।
श्लोक 262 से 271 पुण्य और धर्म की महिमा
लोगों ने कहा कि धर्म, तप, दान, और पूजा से यह फल मिला। अरहंत पूजा संपदा देती है। वज्रजंघ ने अगले दिन दीपक जलाकर महापूत चैत्यालय में पूजा की।
श्लोक 272 से 281 वज्रजंघ की जिन पूजा
वज्रजंघ और श्रीमती ने चैत्यालय की प्रदक्षिणा दी। वज्रजंघ ने ईर्यापथशुद्धि, मुनि दर्शन, और जिन प्रतिमा की पूजा की। उसने जिनेंद्र की स्तुति की—वे कर्म-विजेता, गुणों से युक्त, और भक्ति से कल्याणकारी हैं।
श्लोक 282 से 291 जिन गुणों की स्तुति
वज्रदंत ने कहा कि जिन धर्मोपदेश से चातकों को आनंदित करते हैं, मोक्षमार्ग दिखाते हैं, वैभव छोड़ मुक्ति पाते हैं, और तप से कर्म नष्ट करते हैं। उनकी दया से संसार नहीं बढ़ता।
श्लोक 292 से 301 जिन प्रातिहार्यों का वर्णन
जिन के प्रातिहार्य—अशोकवृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्य ध्वनि, चमर, सिंहासन, भामंडल, दुंदुभि, छत्र—शोभायमान हैं। ये वैराग्य को नहीं रोकते।
श्लोक 302 से 311 जिन चरणों की शक्ति
जिन चरणों के स्मरण से हाथी, सिंह, अग्नि, सर्प, लुटेरे, समुद्र, रोग, और बंधन शांत होते हैं।
श्लोक 312 से 318 स्तुति समापन और राज्य
वज्रजंघ ने जिन को तीनों लोकों का स्वामी, गुरु, और तीर्थंकर कहा। भक्ति की याचना की। मुनियों की पूजा कर, श्रीमती के साथ पुंडरीकिणी नगरी में प्रविष्ट हुआ। 32,000 राजाओं ने उसका राज्याभिषेक किया। वह भोग भोगता रहा।
पर्व 8
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