आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 भरत का शरीर (मध्य और ऊपरी भाग)
भरत का कंठ हार से शंख सा शोभायमान था। उसका वक्षस्थल रत्नद्वीप सा था। हार लक्ष्मी के झूले की लता सी थी। बाजूबंद से उसकी भुजाएँ विजयलक्ष्मी की अधीन थीं। उसके बाहुदंड पृथ्वी नापने के दंड से थे। उसका हस्त-तल शुभ लक्षणों से शोभायमान था। यज्ञोपवीत से वह हिमालय सा था। उसका ऊपरी भाग आभूषणों से हँसता सा था। उसका अधोभाग भी ऊपरी भाग सा था। पुनरुक्ति से उसका वर्णन दोषरहित था।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 192
कण्ठे हारलतारम्ये काप्यस्य श्रीरभूद् विभोः । प्रत्यग्रोद्भिन्नमुक्त्तोघ कम्बुग्रीवोपमोचिता ॥१९२॥
राजकुमार भरत के हाररूपी लता से सुंदर कंठ में कोई अनोखी ही शोभा थी । वह नवीन फूले हुए पुष्पों के समूह से सुशोभित शंख के कंठ को उपमा देने योग्य हो रही थी ।।192।।
Prince Bharata’s neck, adorned with a garland-like creeper, possessed an extraordinary beauty. It was so magnificent that it could only be compared to the neck of a conch, decorated with a cluster of freshly bloomed flowers. ॥192॥
श्लोक ( Shlok ) 193
कण्ठाभरणरत्नांशु संभृतं तदुरःस्थलम् । रत्नद्वीपश्रियं बभ्रे हारवल्लीपरिष्कृतम् ॥ १९३॥
कंठाभरण में लगे हुए रत्नों की किरणों से भरा हुआ उसका वक्षस्थल हाररूपी वेल से घिरे हुए रत्नद्वीप की शोभा धारण कर रहा था ।।193।।
His chest, illuminated by the rays of the gemstones embedded in his neck ornament, shone brilliantly—resembling a jewel island, encircled by a garland-like creeper. ॥193॥
श्लोक ( Shlok ) 194
स बभार भुजस्तम्भपर्यन्तपरिलम्बिनीम्। लक्ष्मीदेव्या इवान्दोलवल्लरी हारवल्लरीम् ॥ १९४॥
वह अपनी भुजारूप खंभों के पर्यंत भाग में लटकती हुई जिस हाररूपी लता को धारण कर रहा था वह ऐसी मालूम होती थी मानो लक्ष्मीदेवी के झूला की लता (रस्सी) ही हो ।।194।।
The garland-like creeper that hung down to the ends of his pillar-like arms appeared as if it were the very ropes of Goddess Lakshmi’s divine swing. ॥194॥
श्लोक ( Shlok ) 195
जयश्रीर्भुजयोरस्य बबन्ध प्रेमनिघ्नताम् । केयूरकोटिसंघट्टकिणीभूतांसपीठयोः ॥ १९५॥
उसकी दोनों भुजाओं के कंधों पर बाजूबंद के संघट्टन से भट्टें पड़ी हुई थीं और इसलिए ही विजयलक्ष्मी ने प्रेमपूर्वक उसकी भुजाओं की अधीनता स्वीकृत की थी ।।195।।
The impressions left on his shoulders by the pressure of his armlets enhanced their majesty, and perhaps that is why Goddess Vijayalakshmi (Goddess of Victory) lovingly accepted servitude under his mighty arms. ॥195॥
श्लोक ( Shlok ) 196
बाहुदण्डेऽरय भूलोकमानदण्ड इवायते । कुलशैलास्थया नूनं तेने लक्ष्मीः परां धृतिम् ।।१९६।।
उसके बाहुदंड पृथिवी को नापने के दंड के समान बहुत ही लंबे थे और उन्हें कुलाचल समझकर उन पर रहने वाली लक्ष्मी परम धैर्य को विस्तृत करती थी ।।196।।
His arms, long like the measuring staff of the Earth, stretched with great majesty. Seeing them as mighty mountain peaks, Goddess Lakshmi resided upon them, spreading supreme patience and grace. ॥196॥
श्लोक ( Shlok ) 197
शङ्खचक्रगदाकूर्मझषादिशुमलक्षणैः । रेजे हस्ततलं तस्य नमस्स्थलमिवोडुभिः ।।१९७।।
जिस प्रकार अनेक नक्षत्रों से आकाश शोभायमान होता है उसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, कूर्म और मीन आदि शुभ लक्षणों से उसका हस्त-तल शोभायमान था ।।197।।
Just as the sky shines brilliantly with countless stars, in the same way, his palms radiated auspiciousness, adorned with divine symbols such as the conch (shankha), discus (chakra), mace (gada), tortoise (kurma), and fish (meen). ॥197॥
श्लोक ( Shlok ) 198
अंसावलम्बिना ब्रह्मसूत्रेणासौ दधे श्रियम् । हिमाद्रिरिव गाङ्गेम स्त्रोतसोत्संगसंगिना॥१९८॥
कंधे पर लटकते हुए यज्ञोपवीत से वह भरत ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि ऊपर बहती हुई गंगा नदी के प्रवाह से हिमालय सुशोभित रहता है ।।198।।
With the sacred thread (Yajnopavita) gracefully resting on his shoulder, Bharata appeared as majestic and resplendent as the Himalayas, adorned by the flowing currents of the celestial Ganga. ॥198॥
श्लोक ( Shlok ) 199
हसन्निवाधरं कायमूर्ध्वंकायोऽस्य दिद्युते। कटकाङ्गदकेयूरहाराद्यैः स्वैर्विभूषणैः ॥१९९॥
उसके शरीर का ऊपरी भाग कड़े, अनंत, बाजूबंद और हार आदि अपने-अपने आभूषणों से ऐसा दैदीप्यमान हो रहा था मानो अपने अधोभाग की ओर हँस ही रहा हो ।।199।।
The upper part of his body, adorned with bracelets, armlets, arm bands, and necklaces, shone so brilliantly that it seemed as if it were smiling down upon the lower half of his body. ॥199॥
श्लोक ( Shlok ) 200
वर्णिते पूर्वकायेऽस्य कायो व्यावर्णितोऽधरः। यथोपरि तथाधश्च ननु श्रीः कल्पपादपे ॥ २००॥
राजकुमार भरत के शरीर के ऊपरी भाग का जैसा कुछ वर्णन किया गया है वैसा ही उसके नीचे के भाग का वर्णन समझ लेना चाहिए क्योंकि कल्पवृक्ष की शोभा जैसी ऊपर होती है वैसी ही उसके नीचे भी होती है ।।200।।
Just as the upper part of Prince Bharata’s body has been described in all its splendor, the lower half should be understood to be equally magnificent. After all, just like the Kalpavriksha (divine wish-fulfilling tree), its grandeur remains the same from top to bottom. ॥200॥
श्लोक ( Shlok ) 201
पुनरुक्तं तथाप्यस्य क्रियते वर्णनादरः। पङ्क्तिभेदे महान् दोषः स्यादित्युद्देशमात्रतः ॥२०१॥
यद्यपि ऊपर लिखे अनुसार उसके अधोभाग का वर्णन हो चुका है तथापि उद्देश के अनुसार पुनरुक्त रूप से उसका वर्णन फिर भी किया जाता है क्योंकि वर्णन करते-करते समूह में से किसी एक भाग का छोड़ देना भी बड़ा भारी दोष है ।।201।।
Although the lower half of his body has already been described as per the previous verses, it will still be recounted again for the sake of completeness. For, in the art of praise and description, leaving out even a single aspect from the whole would be considered a grave flaw. ॥201॥
श्लोक 202 से 211
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