आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 भगवान के गुणों की स्तुति
इंद्रों ने कहा कि भगवान सर्वज्ञ, अविनाशी और जगत् के हितकारी हैं। उनकी गुण-किरणें कर्म-कलंक हटाकर चमकती हैं। वे संसार-लता को शांत परिणाम से उखाड़ते हैं। चार कषायों और कामदेव को उन्होंने तप और चारित्र से जीता। उनका शरीर विकाररहित और शांतिसुख का प्रतीक है, जो तीनों लोकों के गुरु होने को दर्शाता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
त्वमसि विश्वद्दगीश्वर विश्वसृट त्वमसि विश्वगुणाम्बुधिरक्षयः । त्वमसि देव जगद्धितशासनः स्तुतिमतोऽनुगृहाण जिनेश नः ॥१२२॥
हे ईश्वर, आप समस्त संसार के जानने वाले हैं, कर्मभूमिरूप संसार की रचना करने वाले हैं, समस्त गुणों के समुद्र हैं, अविनाशी हैं, और हे देव, आपका उपदेश जगत् के समस्त जीवों का हित करने वाला है, इसीलिए हे जिनेंद्र, आप हम सबकी स्तुति को स्वीकृत कीजिए ।।122।।
O Lord! You are the knower of the entire universe, the creator of the karmic world, an ocean of all virtues, and eternal. O Divine One! Your teachings bring welfare to all living beings in the world. Therefore, O Jinedra, please accept our humble praises. ( 122)
श्लोक ( Shlok ) 123
तव जिनार्क विभान्ति गुणांशवः सकलकर्मकलङ्कविनिःसृताः । घनवियोगविनिर्मलमूर्तयो दिनमणेरिव भासुरभानवः ॥१२३॥
हे जिनेंद्ररूपी सूर्य, जिस प्रकार बादलों के हट जाने से अतिशय निर्मल सूर्य की दैदीप्यमान किरणें सुशोभित होती हैं उसी प्रकार समस्त कर्मरूपी कलंक के हट जाने से प्रकट हुई आपकी गुणरूपी किरणें अतिशय सुशोभित हो रही हैं ।।123।।
O Sun-like Jinedra! Just as the radiant rays of the pure sun shine brilliantly when the clouds disappear, in the same way, the rays of Your virtues, revealed after the removal of all karmic impurities, shine with supreme brilliance. ( 123)
श्लोक ( Shlok ) 124
गुणमणींस्त्वमनन्ततयान्वितान् जिन समुद्वहसेऽतिविनिर्मलान् । जलधिरात्म गभीर जलाश्रितानिव मणीनमलाननणुत्विषः ॥१२४॥
हे जिनेंद्र, जिस प्रकार समुद्र अपने गहरे जल में रहने वाले निर्मल और विशाल कांति के धारक मणियों को धारण करता है उसी प्रकार आप अतिशय निर्मल अनंतगुणरूपी मणियों को धारण कर रहे हैं ।।124।।
O Jinedra! Just as the ocean holds within its depths pure and radiant jewels of immense brilliance, in the same way, You embody countless supremely pure and infinite virtues. ( 124)
श्लोक ( Shlok ) 125
स्वमिनसंसृतिवल्लरिकामिमामतिततामुरुदुःखफलप्रदाम् । जननमृत्युजराकुसुमाचितां शमकरैर्भगवन्नुदपीपटः ॥ १२५॥
हे स्वामिन्, जो अत्यंत विस्तृत है बड़े-बड़े दु:खरूपी फलों को देने वाली है, और जन्म-मृत्यु तथा बुढ़ापारूपी फूलों से व्याप्त है ऐसी इस संसाररूपी लता को हे भगवन्, आपने अपने शांत परिणामरूपी हाथों से उखाड़कर फेंक दिया है ।।125।।
O Lord! This worldly existence is like a vast creeping vine—one that bears the bitter fruits of immense suffering and is covered with the blossoms of birth, death, and old age. But, O Bhagavan, with the tranquil hand of Your pure state of being, You have uprooted and cast it away. ( 125)
श्लोक ( Shlok ) 126
जिनवरमोहमहापृतनेशान् प्रबलतरांश्चतुरस्तु कषायान्। निशिततपोमयतीव्र महांसि “प्रहतिभिराशुतरामजयस्त्वम् ॥ १२६॥
हे जिनवर, आपने मोह की बड़ी भारी सेना के सेनापति तथा अतिशय शूर-वीर चार कषायों को तीव्र तपश्चरणरूपी पैनी और बड़ी तलवार के प्रहारों से बहुत शीघ्र जीत लिया है ।।126।।
O Supreme Jina! You have swiftly conquered the mighty generals of delusion—the immensely powerful four passions—using the sharp and formidable sword of intense ascetic practice. ( 126)
श्लोक ( Shlok ) 127
मनसिजशत्रुमजय्यमलक्ष्यं विरतिमयी शितहेतिततिस्ते । समरभरे विनिपातयति स्म त्वमसि ततो भुवनैकगरिष्ठः ॥१२७॥
हे भगवन्, जो किसी के द्वारा जीता न जा सके और जो दिखाई भी न पड़े ऐसे कामदेवरूपी शत्रु को आपके चारित्ररूपी तीक्ष्ण हथियारों के समूह ने मार गिराया है इसलिए तीनों लोकों में आप ही सबसे श्रेष्ठ गुरु हैं ।।127।।
O Bhagavan! The enemy in the form of desire, which cannot be conquered by anyone and remains invisible, has been vanquished by the sharp weapons of Your pure conduct. Therefore, in all three worlds, You alone are the supreme and most revered Guru. ( 127)
श्लोक ( Shlok ) 128
जितमदनस्य तवेश महत्त्वं वपुरिदमेव हि शास्ति मनोज्ञम् । न विकृतिभाग्न कटाक्षनिरीक्षा परमविकारमनाभरणोद्घम् ॥१२८॥
हे ईश्वर, जो न कभी विकारभाव को प्राप्त होता है, न किसी को कटाक्षों से देखता है, जो विकाररहित है और आभरणों के बिना ही सुशोभित रहता है ऐसा यह आपका सुंदर शरीर ही कामदेव को जीतने वाले आपके माहात्म्य को प्रकट कर रहा है ।।128।।
O Lord! Your beautiful body, which is never tainted by impurity, never glances at anyone with desire, remains free from all defects, and shines without the need for ornaments, itself reveals the greatness of Your victory over desire. (128)
श्लोक ( Shlok ) 129
प्रविकुरुते हृदि यस्य मनोजः स विकुरुते स्फुटरागपरागः । विकृतिरनङ्गजितस्तव नाभूद विभवभवान्भुवनैकगुरुस्तत् ॥१२९ll
हे संसाररहित जिनेंद्र, कामदेव जिसके हृदय में प्रवेश करता है वह प्रकट हुए रागरूपी पराग से युक्त होकर अनेक प्रकार की विकारयुक्त चेष्टाएँ करने लगता है परंतु कामदेव को जीतने वाले आपके कुछ भी विकार नहीं पाया जाता है इसलिए आप तीनों लोकों के मुख्य गुरु हैं ।।129।।
O Jinedra, free from worldly bondage! When desire enters someone’s heart, it gives rise to the pollen of attachment, leading to various impure actions. But in You, the conqueror of desire, no trace of impurity is ever found. Therefore, You are the supreme Guru of all three worlds. ( 129)
श्लोक ( Shlok ) 130
स किल विनृत्यति गायति वल्गत्यपलापति प्रहसत्यपि मूढः । मदनवसो जितमन्मथ ते तु प्रशमसुखं वपुरेव निराह ॥१३०॥
हे कामदेव को जीतने वाले जिनेंद्र, जो मूर्ख पुरुष कामदेव के वश हुआ करता है वह नाचता है, गाता है, इधर-उधर घूमता है, सत्य बात को छिपाता है और जोर-जोर से हँसता है परंतु आपका शरीर इन सब विकारों से रहित है इसलिए यह शरीर ही आपके शांतिसुख को प्रकट कर रहा है ।।130।।
O Jinedra, conqueror of desire! A foolish person under the sway of desire dances, sings, wanders aimlessly, hides the truth, and laughs excessively. But Your body remains free from all such impurities. Thus, Your very being reflects the bliss of absolute peace. ( 130)
श्लोक ( Shlok ) 131
विरहितमानमत्सर तवेदं वपुरपराग मस्तक लिपङ्कम् । तव भुवनेश्वरत्वमपरागं प्रकटयति स्फुटं निकृतिहीनम् ॥१३१॥
हे मान और मात्सर्यभाव से रहित भगवन् कर्मरूपी धूलि से रहित, कलहरूपी पंक को नष्ट करने वाला, रागरहित और छलरहित आपका वह शरीर आप तीनों लोकों के स्वामी हैं इस बात को स्पष्टरूप से प्रकट कर रहा है ।।131।।
O Bhagavan, free from pride and envy! Your body, untouched by the dust of karma, free from the mire of conflict, devoid of attachment and deception, clearly reveals that You are the supreme Lord of all three worlds. ( 131)
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121