आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
श्लोक 92 से 101 भगवान और देवियों का मिलन
लोगों को लगता था कि इन देवियों ने देवांगनाओं को जीत लिया। भगवान वृषभदेव इनसे कीर्ति और लक्ष्मी से शोभायमान थे, जैसे नदियाँ समुद्र से मिलती हैं। वे रूपवती और कामदेव की पताका सी थीं, जिन्होंने भगवान का मन हरण किया। भगवान ने उनकी इच्छा को प्रसन्न किया। कामदेव उनके सामने अपमानित होने पर भी गुप्त रूप से संचार करता था। वह शरीररहित होकर देवियों में प्रविष्ट हुआ और बाणों से भगवान को घायल करता था। उनके साथ भोगते हुए भगवान का समय उत्सवों में क्षणभर सा बीता। एक दिन यशस्वती ने स्वप्न में ग्रसी पृथ्वी, सुमेरु, चंद्र-सूर्य, हंस-सरोवर, और चंचल समुद्र देखा, और मंगल-पाठ से जागी।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
दृष्ट्वनयोरदो रूपं जनानामत्तिरित्यभूत् । एताभ्यां निर्जिताः सत्यं स्त्रियम्मन्याः सुरस्त्रियः ॥९२॥
इन दोनों के उस सुंदर रूप को देखकर लोगों की यही बुद्धि होती थी कि वास्तव में इन्होंने अपने आपको स्त्री मानने वाली देवांगनाओं को जीत लिया है ।।92।।
Seeing the beautiful form of both of them, people would think that they had truly conquered the celestial nymphs who considered themselves the epitome of femininity. ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93
स ताभ्यां कीर्तिलक्ष्मीभ्यामिव रेजे वरोतमः । ते च तेन महानद्यौ वार्द्धिनेव समीयतुः ॥९३॥
वरों में उत्तम भगवान् वृषभदेव उन देवियों से ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो कीर्ति और लक्ष्मी से ही शोभायमान हो रहे हों और वे दोनों भगवान् से इस प्रकार मिली थीं जिस प्रकार की महानदियां समुद्र से मिलती हैं ।।93।।
Among the best of men, Lord Rishabhadeva appeared resplendent with those divine ladies, as if adorned by Glory and Fortune themselves. And both of them were united with the Lord just as great rivers merge into the ocean. ||93||
श्लोक ( Shlok ) 94
सरूपें सद्युती कान्ते ते मनो जहतुर्विभोः । मनोभुव इवाशेषं जिगीषोर्वैजयन्तिके ॥९४॥
वे देवियाँ बड़ी ही रूपवती थीं, कांतिमती थी, सुंदर थीं और समस्त जगत् को जीतने की इच्छा करने वाले कामदेव की पताका के समान थीं और इसीलिए ही उन्होंने भगवान् वृषभदेव का मन हरण कर लिया था ।।94।।
Those divine ladies were exceedingly beautiful, radiant, and charming, like the banner of Kamadeva, the god of love, who desires to conquer the entire world. For this reason, they had captivated the heart of Lord Rishabhadeva. ||94||
श्लोक ( Shlok ) 95
तयोरपि मनस्तेन रञ्जितं भुषनेशिना। हारयष्टयोरिवारक्त मणिना मध्यमुद्रुचा ॥९५॥
जिस प्रकार बीच में लगा हुआ कांतिमां पद्मरागमणि हारयष्टियों के मध्यभाग को अनुरंजित अर्थात् लाल वर्ण कर देता है उसी प्रकार उत्कृष्ट कांति या इच्छा से युक्त भगवान् वृषभदेव ने भी उन देवियों के मन को अनुरंजित―प्रसन्न कर दिया था ।।95।।
Just as a radiant Padmaraga gem placed in the center enhances the middle portion of a garland of pearls with its red hue, in the same way, the illustrious and charming Lord Rishabhadeva delighted and enchanted the hearts of those divine ladies. ||95||
श्लोक ( Shlok ) 96
बहुशो भग्नमानोऽपि यत्पुरोऽस्य मनोभवः । चचार गूढसंचारं कारणं तत्र चिन्त्यताम् ॥९६॥
यद्यपि कामदेव भगवान् वृषभदेव के सामने अनेक बार अपमानित हो चुका था तथापि वह गुप्त रूप से अपना संचार करता ही रहता था । विद्वानों को इसका कारण स्वयं विचार लेना चाहिए ।।96।।
Although Kamadeva had been humiliated many times in the presence of Lord Rishabhadeva, he continued to exert his influence in a subtle manner. Wise men should contemplate the reason for this themselves. ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
नूनमेनं प्रकाशात्मा व्यदूधुं हृदिशयोऽक्षमः । अनङ्गतां तदा भेजे सोपाया हि जिगीषवः ॥97॥
मालूम होता है कि कामदेव स्पष्टरूप से भगवान् को बाधा देने के लिए समर्थ नहीं था इसलिए वह उस समय शरीररहित अवस्था को प्राप्त हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि विजय की इच्छा करने वाले पुरुष अनेक उपायों से सहित होते हैं―कोई-न-कोई उपाय अवश्य करते हैं ।।97।।
It seems that Kamadeva was not capable of directly obstructing the Lord, and therefore, he had assumed a formless state at that time. This is quite natural because those who desire victory always employ various means—one way or another, they always find a strategy. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
अनङ्गत्वेन तन्नूनमेनयोः प्रविशन् वपुः। दुर्गाश्रित इवानङ्गो विव्याधैनं स्वसायकैः ॥९८॥
अथवा कामदेव शरीररहित होने के कारण इन देवियों के शरीर में प्रविष्ट हो गया था और वहाँ किले के समान स्थित होकर अपने बाणों के द्वारा भगवान् को घायल करता था ।।98।।
Or perhaps, being without a body, Kamadeva had entered the bodies of these divine ladies and, stationed there like a fortress, wounded the Lord with his arrows. ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
ताभ्यामिति समं भोगान् भुञ्जानस्य जगद्गुरोः। कालो महानगादेकक्षणवद् सततक्षणैः ॥९९॥
इस प्रकार उन देवियों के साथ भोगों को भोगते हुए जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव का बड़ा भारी समय निरंतर होने वाले उत्सवों से क्षण-भर के समान बीत गया था ।।99।।
In this way, while enjoying pleasures with those divine ladies, the great world teacher, Lord Rishabhadeva, experienced the passage of time as if it were but a fleeting moment, amidst constant festivities. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100 – 101
अथान्यदा महादेवी सौधे सुप्ता यशस्वति । स्वप्नेऽपश्यन् महीं ग्रस्तां मेरुं सूर्य च सोडुपम् ॥१००॥
सरः सहंसमब्धिं च चलद्वीचिकमैक्षत। स्वप्नान्ते च व्यबुद्धासौ पठन् मागधनिःस्वनैः ॥१०१।।
अथानंतर किसी समय यशस्वती महादेवी राजमहल में सो रही थी । सोते समय उसने स्वप्न में ग्रसी हुई पृथ्वी, सुमेरु पर्वत, चंद्रमासहित सूर्य, हंससहित सरोवर तथा चंचल लहरों वाला समुद्र देखा, स्वप्न देखने के बाद मंगल-पाठ पढ़ते हुए बंदीजनों के शब्द सुनकर वह जाग पड़ी ।।100-101।।
Sometime thereafter, the illustrious Queen Mahadevi was sleeping in the royal palace. In her dream, she saw the Earth being swallowed, Mount Sumeru, the Sun along with the Moon, a lake with swans, and the ocean with restless waves. After witnessing this dream, she awakened upon hearing the auspicious chants of the court bards. ||100-101||
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |