आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 209 प्रजा सत्कार और जलक्रीड़ा
प्रजा का मधुर सत्कार। बावड़ियों, सरयू में जलक्रीड़ा। मेघकुमार धारागृह से सेवा। नंदन वन में वनक्रीड़ा, पवनकुमार धूलि मुक्त करते। देवकुमारों संग सुखपूर्वक क्रीड़ा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 202 to 209
श्लोक ( Shlok ) 202
अतन्द्रितं च देवीभिः न्यस्यमानं गृहाङ्गणे । रत्नचूर्णैर्बलिं चित्रं सानन्दमवलोकयम् ॥२०२॥
कभी घर के आंगन में आलस्यरहित देवियों के द्वारा बनायी हुई रत्नचूर्ण की चित्रावलि को आनंद के साथ देखते थे ।।202।।
“Once, in the courtyard of the house, they joyfully admired the artistic designs made from gem powder by tireless goddesses.”
श्लोक ( Shlok ) 203
संभावयन् कदाचिच्च प्रकृती र्द्रष्टुमागताः । वीक्षितैर्मधुरैः स्निग्धैः स्मितैः सादरभाषितैः ॥ २०३॥
कभी बावड़ियों के जल में देवकुमारों के साथ-साथ आनंदसहित जलक्रीड़ा का विनोद करते हुए क्रीड़ा करते थे ।।204।।
“Once, they joyfully played water sports along with the divine princes in the water of the stepwells.”
श्लोक ( Shlok ) 204
कदाचिद् दीर्घिकाम्भस्सु समं सुरकुमारकैः । जलक्रीडाविनोदेन रममाणः ससंमदम् ॥२०४॥
कभी बावड़ियों के जल में देवकुमारों के साथ-साथ आनंदसहित जलक्रीड़ा का विनोद करते हुए क्रीड़ा करते थे ।।204।।
“At times, they joyfully indulged in playful water sports along with the divine princes in the waters of the stepwells.”
श्लोक ( Shlok ) 205
सारवं जलमासाद्य सारवं हंसकूजितैः । । तारवैर्यंन्त्रकैः क्रीडन् जलास्फालकृतारवैः ॥ २०५
कभी हंसों के शब्दों से शब्दायमान सरयू नदी का जल प्राप्त कर उसमें पानी के आस्फालन से शब्द करने वाले लकड़ी के बने हुए यंत्रों से जलक्रीड़ा करते थे ।।205।।
“At times, they engaged in water sports in the rippling waters of the Sarayu River, resonating with the calls of swans, using wooden instruments that splashed water with sound.”
श्लोक ( Shlok ) 206
जलकेलिविधावेनं भक्त्या मेघकुमारकाः । भेजुर्धारागृहीभूव स्फुरद्धाराः समन्ततः ॥ २०६॥
जलक्रीड़ा के समय मेघकुमार जाति के देव भक्ति से धारागृह (फव्वारा) का रूप धारण कर चारों ओर से जल की धारा छोड़ते हुए भगवान की सेवा करते थे ।।206।।
“During the water sports, the divine beings of the Meghakumar lineage, out of devotion, took the form of fountains, releasing streams of water from all sides in service of the Lord.”
श्लोक ( Shlok ) 207
कदाचिन्नन्दनस्पर्द्धितरुशोमाञ्चिते वने । वनक्रीडां समातन्वन् वयस्यै रन्वितः सुरैः ॥२०७॥
कभी नंदनवन के साथ स्पर्धा करने वाले वृक्षों की शोभा से सुशोभित नंदन वन में मित्ररूप हुए देवों के साथ-साथ वनक्रीड़ा करते थे ।।207।।
“At times, they enjoyed forest sports in the Nandanvana, adorned with trees rivaling the beauty of the divine garden, along with the gods who had assumed the form of friends.”
श्लोक ( Shlok ) 208
वनक्रीडाविनोदेऽस्य विरजीकृतभूतलाः । मन्दं दुधुवुरुद्यानपादपान पवनामराः ॥२०८॥
वनक्रीड़ा के विनोद के समय पवनकुमार जाति के देव पृथ्वी को धूलिरहित करते थे और उद्यान के वृक्षों को धीरे-धीरे हिलाते थे ।।208।।
“During the joyful forest play, the divine beings of the Pavanakumar lineage made the earth dust-free and gently swayed the trees of the garden.”
श्लोक ( Shlok ) 209
इति कालोचिताः क्रीडा विनोदांश्च स निर्विंशन् । आसांचक्रे सुख देवः समं देवकुमारकैः ।।२०९
इस प्रकार देवकुमारों के साथ अपने-अपने समय के योग्य क्रीड़ा और विनोद करते हुए भगवान वृषभदेव सुखपूर्वक रहते थे ।।209।।
“Thus, Lord Rishabhadev joyfully lived, engaging in delightful sports and pastimes with the divine princes, each according to their appropriate time.”
श्लोक 210 से 213
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201