आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 चमर और दुंदुभि का वैभव
चमरों की संख्या चौंसठ थी, जो चक्रवर्ती से राजा तक घटती थी। ये चंद्रमा-सी कांति से स्पर्धा करते थे। दुंदुभि मधुर शब्द करते थे, जिन्हें मयूर प्रेम से देखते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
सुधामलाङ्गी रुचिरा बिरेजे सा चामराणां वतिरुल्लसन्ती । क्षीरोदफेनावकीरुच्च लन्ती मरुद्विधूतेव समिद्धकान्तिः ॥५२॥
अमृत के समान निर्मल शरीर को धारण करने वाली और अतिशय दैदीप्यमान वह ढुरती हुई चमरों की पंक्ति ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो वायु से कंपित तथा दैदीप्यमान कांति को धारण करने वाली हिलती हुई समुद्र के फेन की पंक्ति ही हो ।।52।।
That row of fly-whisks, possessing a body as pure as nectar and radiating immense brilliance, appeared magnificent as it swayed. It seemed as if it were a shimmering line of ocean foam, trembling under the touch of the wind.52
श्लोक ( Shlok ) 53
लक्ष्मी परामाप परा पतन्ती शशाङ्कपीयूषसमानकान्तिः । “सिषेविषुस्तं जिनमाव्र जन्ती पयोधिवेलेव सुचामराली ॥५३॥
चंद्रमा और अमृत के समान कांति वाली ऊपर से पड़ती हुई वह उत्तम चमरों की पंक्ति बड़ी उत्कृष्ट शोभा को प्राप्त हो रही थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो जिनेंद्र भगवान् की सेवा करने की इच्छा से आती हुई क्षीरसमुद्र की बेला ही हो ।।53।।
That excellent row of fly-whisks, radiating a luster like the moon and nectar, descended from above with supreme brilliance. It appeared as if the waves of the Ocean of Milk itself were approaching, eager to serve Lord Jina.53
श्लोक ( Shlok ) 54
पतन्ति हंसाः किमु मेघमार्गात् किमुत्पतन्तीश्वरतो यशांसि । विशङ्क्य मानानि सुरैरितीशः पेतुः समन्तात् सितचामराणि ॥५४॥
क्या ये आकाश से हंस उतर रहे हैं अथवा भगवान् का यश ही ऊपर को जा रहा है इस प्रकार देवों के द्वारा शंका किये जाने वाले वे सफेद चमर भगवान् के चारों ओर ढुराये जा रहे थे ।।54।।
Are these swans descending from the sky, or is it the glory of the Lord rising upward? As the gods wondered in this way, those white fly-whisks were being gracefully waved around the Lord. 54
श्लोक ( Shlok ) 55
यक्षैरुदक्षिप्यत चामराली दक्षैः सलीलं कमलायताक्षैः । न्यक्षेपि भर्तु र्विंतता वलक्षा तरङ्गमालेव मरुद्भिरब्धेः ॥५५॥
जिस प्रकार वायु समुद्र के आगे अनेक लहरों के समूह उठाता रहता है उसी प्रकार कमल के समान दीर्घ नेत्रों को धारण करने वाले चतुर यक्ष भगवान् के आगे लीलापूर्वक विस्तृत और सफेद चमरों के समूह उठा रहे थे अर्थात् ऊपर की ओर ढोर रहे थे ।।55।।
Just as the wind continuously raises countless waves before the ocean, in the same way, the skillful Yakshas, with their long lotus-like eyes, were playfully lifting and waving the expansive white fly-whisks before the Lord.55
श्लोक ( Shlok ) 56
जितेन्द्र भक्त्या सुरनिम्नगेव तद्व्याजमेत्याम्बरतः पतन्ती । सा निर्बभौ चामरपङ्क्तिरुच्चैर्ज्योस्नेव भव्योरुकुमुद्वतीनाम् ॥५६॥
अथवा वह ऊँची चमरों की पंक्ति ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थी मानो उन चमरों का बहाना प्राप्त कर जिनेंद्र भगवान् की भक्तिवश आकाशगंगा ही आकाश से उतर रही हो अथवा भव्य जीवरूपी कुमुदिनियों को विकसित करने के लिए चाँदनी ही नीचे की ओर आ रही हो ।।56।।
Or perhaps that lofty row of fly-whisks appeared so magnificent as if, under their guise, the celestial river (Milky Way) itself was descending from the sky out of devotion to Lord Jina. Or maybe it was the moonlight flowing downward to blossom the lotus-like souls of the noble beings.56
श्लोक ( Shlok ) 57
इत्याततोषैः स्फुरदक्षयक्षै प्रवीज्यमानानि शशाङ्क भांसि । रेजुर्जगन्नाथगुणोत्करैर्वा र्स्पर्धा वितन्वन्त्यधिचामराणि ॥५७॥
इस प्रकार जिन्हें अतिशय संतोष प्राप्त हो रहा है और जिनके नेत्र प्रकाशमान हो रहे हैं ऐसे यक्षों के द्वारा ढुराये जाने वाले वे चंद्रमा के समान उज्ज्वल कांति के धारक चमर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भगवान् के गुणसमूहों के साथ स्पर्धा ही कर रहे हों ।।57।।
Thus, waved by the Yakshas, whose hearts were filled with immense joy and whose eyes shone with radiance, those fly-whisks, possessing a brilliance like the moon, appeared so resplendent as if they were competing with the divine virtues of the Lord.57
श्लोक ( Shlok ) 58
लसत्सुधारांशिविनिर्मलानि तान्यप्र मेयद्युतिकान्तिभाञ्जि । विभोर्जंगत्प्राभवमद्वितीयं शशंसुरुच्चैश्चमरीरुहाणि ॥५८॥
शोभायमान अमृत की राशि के समान निर्मल और अपरिमित तेज तथा कांति को धारण करने वाले वे चमर भगवान् वृषभदेव के अद्वितीय जगत् के प्रभुत्व को सूचित कर रहे थे ।।58।।
Resplendent like a mass of nectar, pure and possessing boundless radiance and brilliance, those fly-whisks signified the unparalleled sovereignty of Lord Rishabhadeva over the entire world.58
श्लोक ( Shlok ) 59
लक्ष्मीसमालिङ्गितवक्षसोऽस्य श्रीवृक्षचिन्ह दधतो जिनेशः । प्रकीर्णकानाममितद्युतीनां धीन्द्राश्चतुःषष्टिमुदाहरन्ति ॥५९॥
जिनका वक्षःस्थल लक्ष्मी से आलिंगित है और जो श्रीवृक्ष का चिह्न धारण करते हैं ऐसे श्रीजिनेंद्रदेव के अपरिमित तेज को धारण करने वाले उन चमरों की संख्या विद्वान् लोग चौंसठ बतलाते हैं ।।59।।
The wise describe the number of those fly-whisks as sixty-four, which bore immense radiance, just like Lord Shri Jinendra, whose chest is embraced by Goddess Lakshmi and who bears the mark of the sacred Śrīvṛkṣa.59
श्लोक ( Shlok ) 60
जिनेश्वराणामिति चामराणि प्रकीर्तितानीह सनातनानाम् । अर्धार्धमानानि भवन्ति तानि चक्रेश्वराद् यावदसौ सुराजा ।।६०।।
इस प्रकार सनातन भगवान् जिनेंद्रदेव के चौंसठ चमर कहे गये हैं और वे ही चमर चक्रवर्ती से लेकर राजा पर्यंत आधे-आधे होते हैं अर्थात् चक्रवर्ती के बत्तीस, अर्धचक्री के सोलह, मंडलेश्वर के आठ, अर्धमंडलेश्वर के चार, महाराज के दो और राजा के एक चमर होता है ।।60।।
Thus, the sixty-four fly-whisks of the eternal Lord Jinendra are described. These same fly-whisks are distributed in halves among rulers, starting from a universal monarch (Chakravarti) down to a king. A Chakravarti possesses thirty-two, an Ardhachakri has sixteen, a Mandaleshwar holds eight, an Ardhmandaleshwar has four, a Maharaja is honored with two, and a Raja is bestowed with one fly-whisk60
श्लोक ( Shlok ) 61
सुरदुन्दुभयो मधुरध्वनयो निनदन्ति सदा स्म नमोविवरे । जलदागमशक्तिभिरुन्मदिभिः शिखिभिः परिवीक्षितपद्धतयः ॥६१।।
इसी प्रकार उस समय वर्षाऋतु की शंका करते हुए मदोन्मत्त मयूर जिनका मार्ग बड़े प्रेम से देख रहे थे ऐसे देवों के दुंदुभी मधुर शब्द करते हुए आकाश में बज रहे थे ।।61।।
At that time, the celestial drums of the gods resounded sweetly in the sky, making an enchanting sound. Intoxicated peacocks, mistaking it for the arrival of the rainy season, gazed at the sky with great delight.61
श्लोक 62 से 71
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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