भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
श्लोक 232 से 241 वानर और नकुल के पूर्वभव
वानर धन्यपुर में नागदत्त था, माया से बहन के विवाह में ठगी चाही, आर्तध्यान से मरकर वानर हुआ। नकुल सुप्रतिष्ठित नगर में लोलुप हलवाई था, लोभ से ईंटें चुराईं, पुत्र को मारा, राजा ने मार डाला, नकुल बना।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232 – 233
स्वानुजाया विवाहार्थ स्वापणे स्वायतेयकम् । स्वाम्बायामाददानायां सुपरीक्ष्य यथेप्सित्तम् ॥ २३२॥
तत्तस्तद्वञ्चनोपायम जानन्नार्तधीर्मृतः । तिर्यगायुर्वंशेनासौ गोलाङ्गूलत्व मित्यगात् २३३॥
एक दिन इसकी माता, नागदत्त की छोटी बहन के विवाह के लिए अपनी दूकान से इच्छानुसार छाँट-छाँटकर कुछ सामान ले रही थी । नागदत्त उसे ठगना चाहता था परंतु किस प्रकार ठगना चाहिए ? इसका उपाय वह नहीं जानता था इसलिए उसी उधेड़बुन में लगा रहा और अचानक आर्तध्यान से मरकर तिर्यंच आयु का बंध होने से यहां यह वानर अवस्था को प्राप्त हुआ है ।।232-233।।
One day, Nagdatt’s mother was selecting various items from his shop as per her choice for the wedding of Nagdatt’s younger sister. Nagdatt wanted to deceive her, but he did not know how to do so. Therefore, he remained engrossed in that dilemma. Suddenly, due to his intense mental state, he passed away, leading to the bondage of a lower life form, and he was reborn in this monkey state.( 232-233)
श्लोक ( Shlok ) 234
नकुञ्जोऽयं भर्वेन्यस्मिन् सुप्रतिष्टितपसने । अभूत् कादम्बिको नाम्ना लोलुपो धनलोलुपः ॥२३४॥
हे राजन्, यह नकुल (नेवला) भी पूर्वभव में इसी सुप्रतिष्ठित नगर में लोलुप नाम का हलवाई था । वह धन का बड़ा लोभी था ।।234।।
O King, this mongoose was, in a previous birth, a sweet-maker named Lolup in this very renowned city. He was extremely greedy for wealth.( 234)
श्लोक ( Shlok ) 235 – 237
सोऽन्यदा नृपतौ चैत्यगृहनिर्मापणोद्यते । * इष्टका “विष्टिपुरुषैरानाययति लुब्बधीः ॥२३५॥
दत्त्वापूपं निगूढं स्वं मूढः प्रावेशयद् गृहम् । इष्टकास्तत्र कासांचित् भेदेऽपश्यच काञ्चनम् ॥२३६।
तल्लोमादिष्टका भूयोऽप्यानापयितुमुद्यतः । पुरुषैर्वैष्टिकैस्तेभ्यो दस्वापूपादिभोजनम् ॥२३७॥
किसी समय वहाँ का राजा जिनमंदिर बनवा रहा था और उसके लिए वह मजदूरों से ईटें बुलाता था । वह लोभी मूर्ख हलवाई उन मजदूरों को कुछ पुआ वगैरह देकर उनसे छिपकर कुछ ईंटें अपने घर में डलवा लेता था । उन ईंटों के फोड़ने पर उनमें से कुछ में सुवर्ण निकला । यह देखकर इसका लोभ और भी बढ़ गया । उस सुवर्ण के लोभ से उसने बार-बार मजदूरों को पुआ आदि देकर उनसे बहुत-सी ईटें अपने घर डलवाना प्रारंभ किया ।।235-237।।
Once, the king of that place was constructing a Jin temple and had bricks brought by the laborers for the construction. The greedy and foolish sweet-maker secretly bribed the laborers with sweets like puas and had some bricks delivered to his house. When he broke those bricks, he found gold inside some of them. Seeing this, his greed intensified. Driven by the lure of gold, he repeatedly gave sweets to the laborers and had a large number of bricks brought to his house.( 235-237)
श्लोक ( Shlok ) 238
स्वसुताग्राममन्येद्युः स गच्छन् पुत्रमात्मनः । न्ययुङक्त पुत्रकाहारं दत्वाऽऽनाय्यास्त्वयेष्टकाः ॥२३८
एक दिन उसे अपनी पुत्री के गाँव जाना पड़ा । जाते समय वह पुत्र से कह गया कि हे पुत्र, तुम भी मजदूरों को कुछ भोजन देकर उनसे अपने घर ईटें डलवा लेना ।।238।।
One day, he had to visit his daughter’s village. Before leaving, he instructed his son, “Dear son, you too should offer some food to the laborers and have bricks delivered to our house.”( 238)
श्लोक ( Shlok ) 239
इत्युक्त्वास्मिन् गते पुत्रः तत्तथा नाकरोदतः । स निवृत्य सुतं पृष्ट्वा रुष्टोऽसौ दुष्टमानसः ॥ २३९॥
यह कहकर वह तो चला गया परंतु पुत्र ने उसके कहे अनुसार घर पर ईटें नहीं डलवायी । जब वह दुष्ट लौटकर घर आया और पुत्र से पूछने पर जब उसे सब हाल मालूम हुआ तब वह पुत्र से भारी कुपित हुआ ।।239।।
Saying this, he left. However, the son did not have any bricks delivered to the house as instructed. When the wicked man returned home and learned everything upon questioning his son, he became extremely furious with him.( 239)
श्लोक ( Shlok ) 240
शिरः पुत्रस्य निर्भिद्य लकुटोपलताडनैः । चरणौ स्वौ च निर्वेदाद् बभञ्ज किल मूढधीः ॥२४०॥
उस मूर्ख ने लकड़ी तथा पत्थरों की मार से पुत्र का शिर फोड़ डाला और उस दुःख से दुःखी होकर अपने पैर भी काट डाले ।।240।।
That foolish man struck his son with wood and stones, smashing his head. In his anguish and remorse, he also cut off his own legs.( 240)
श्लोक ( Shlok ) 241
राज्ञा च घातितो मृत्वा नकुलस्वमुपागमत् । अप्रत्याख्यानलोपभेन नीतः सोऽयं दशाभिमाम् ॥241
अंत में वह राजा के द्वारा मारा गया और मरकर इस नकुल पर्याय को प्राप्त हुआ है । वह हलवाई अप्रत्याख्यानावरण लोभ के उदय से ही इस दशा तक पहुँचा है ।।241।।
श्लोक 242 से 252
In the end, he was executed by the king and, after death, was reborn in this mongoose form. It was due to the rise of his unrestrained greed (Apratyakhyanavarana Lobha) that he ended up in this state.( 241)
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231