आदिपुराण पंचदशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 15 by Acharya Jinasena
भगवान् वृषभदेव के पूर्ण यौवन में उनके शरीर की शोभा असाधारण थी। उनका रूप तपाये हुए स्वर्ण के समान कांतिमान, पसीना-धूलि-मल से रहित, दूध जैसे श्वेत रुधिर वाला, समचतुरस्र संस्थान और वज्रवृषभनाराच संहनन से युक्त था। वे सुंदरता और सुगंध की परम सीमा धारण करते थे, एक हजार आठ लक्षणों से अलंकृत, अप्रमेय, महाशक्तिशाली और प्रिय वचन बोलने वाले थे। उनके काले केशों और मुकुट से सजा शिर मेरु पर्वत के शिखर-सा, कल्पवृक्ष की माला से सजा मस्तक आकाशगंगा-सा, चौड़ा ललाट सरस्वती के उपवन-सा, भौंहें कामदेव के पाश-सी, नेत्र कमल-से, कान चंद्र-सूर्य से अलंकृत आकाश-से, और मुख तीनों लोकों में अनुपम था। उनका कंठ स्वर्ण-स्तंभ-सा, वक्षःस्थल इंद्रच्छद हार से सजा हिमालय-सा, और भुजाएँ कल्पवृक्ष-सी शोभायमान थीं। नख दस अवतारों के दर्पण-से, नाभि सरोवर-सी, जघन शरद् बादलों से युक्त पर्वत-सा, ऊरू लक्ष्मी के झूले के स्तंभ-से, जंघाएँ उज्ज्वल, और चरणकमल तीनों लोकों की लक्ष्मी से शोभित थे। उनका शरीर मेरु पर्वत-सा अभेद्य, वृद्धावस्था-रोग से मुक्त, और मोक्ष का कारण था।
उनके शरीर पर श्रीवृक्ष, शंख, कमल आदि 108 लक्षण और 900 व्यंजन शोभायमान थे, जो ज्योतिषी देवों से भरे आकाश-से थे। वे राग-द्वेष से मुक्त थे, सरस्वती और कीर्ति उन्हें प्रिय थीं, पर लक्ष्मी पर उनका प्रेम मंद था। उनके रूप-लावण्य से लोग आकर्षित थे। नाभिराज ने उनके विवाह की चिंता की, क्योंकि उनका धर्मतीर्थ की ओर झुकाव था। फिर भी, लोक व्यवहार के लिए नाभिराज ने उन्हें विवाह हेतु प्रेरित किया। भगवान् ने पिता के वचन स्वीकार कर विवाह की अनुमति दी। नाभिराज ने इंद्र की सहमति से यशस्वी और सुनंदा नामक कच्छ-महाकच्छ की बहनों से उनका विवाह कराया। यह उत्सव स्वर्ग-मनुष्यलोक में आनंद का कारण बना।
दोनों देवियाँ सुंदर, शांत, और यौवनवती थीं। उनके शरीर की शोभा कमलिनी-सी, कंठ मुक्ताहार से सजा, और नेत्र भ्रमर-युक्त कमल-से थे। वे भगवान् के साथ कीर्ति-लक्ष्मी-सी शोभायमान थीं। यशस्वती ने स्वप्न में पृथ्वी, मेरु, सूर्य-चंद्र आदि देखे, जिनका फल भगवान् ने चक्रवर्ती पुत्र की भविष्यवाणी के रूप में बताया। गर्भावस्था में यशस्वती की शोभा बढ़ी, और नौ मास बाद चैत्र कृष्ण नवमी को भरत नामक पुत्र जन्मा। वह चक्रवर्ती लक्षणों से युक्त, चंद्रमा-सा सौम्य और सूर्य-सा तेजस्वी था। जन्मोत्सव में देवों-मनुष्यों ने हर्ष मनाया, और भरत के नाम से यह क्षेत्र भारतवर्ष कहलाया।
भरत की बाल्यावस्था माता-पिता के लिए आनंददायक थी। वे पिता के समान गुणों से युक्त, तेजस्वी, और विजयलक्ष्मी से शोभित थे। उनके शरीर पर शुभ लक्षण, जैसे चक्र-छत्र, और गुण, जैसे सत्य-दया, विद्यमान थे। वे चक्रवर्ती बल से युक्त, उदयाचल-से शोभायमान, और प्रजा के प्रिय थे। भगवान् वृषभदेव उनके गुणों से संतुष्ट थे।
भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव का यौवन रूप
पूर्ण यौवन अवस्था प्राप्त करने पर भगवान वृषभदेव का शरीर बहुत ही मनोहर हो गया था, जो उचित ही था, क्योंकि जैसे शरद ऋतु में चंद्रमा की सुंदरता बढ़ जाती है, वैसे ही उनका रूप भी असाधारण हो गया था। उनका शरीर तपाये हुए सुवर्ण के समान कांतियुक्त, पसीना और धूलि-मल से रहित, दूध के समान सफेद रुधिर वाला, समचतुरस्र संस्थान से युक्त, वज्रवृषभनाराच संहनन से सुशोभित, सुंदरता और सुगंध की परम सीमा को धारण करने वाला, एक हजार आठ लक्षणों से अलंकृत, अप्रमेय, महाशक्तिशाली, और प्रिय तथा हितकारी वचनों से युक्त था। उनके काले-काले केशों और मुकुट से अलंकृत शिर ऐसे शोभायमान थे मानो नीलमणियों से युक्त मेरु पर्वत का शिखर हो। उनके मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला ऐसी शोभायमान थी मानो हिमगिरि के शिखर पर पड़ी आकाशगंगा हो। उनके चौड़े ललाट की शोभा ऐसी थी मानो सरस्वती के उपवन की शोभा बढ़ा रही हो। उनके ललाटरूपी पर्वत पर भौंहरूपी लताएँ ऐसी शोभायमान थीं मानो कामदेवरूपी मृग को रोकने के लिए दो पाश हों। काली पुतलियों से युक्त उनके नेत्ररूपी कमल भ्रमरों से सुशोभित कमल की पंखुड़ियों जैसे थे। मणिमय कुंडलों से उनके कान ऐसे शोभायमान थे मानो चंद्रमा और सूर्य से अलंकृत आकाश के किनारे हों। उनके मुखरूपी चंद्रमा की कांति तीनों लोक में अद्वितीय थी, क्योंकि जैसे अमृत का संतोष कहीं और नहीं मिलता, वैसे ही उनकी कांति भी अनुपम थी।
श्लोक 12 से 21 शरीर की शोभा
भगवान का मुख मंद हास्य और लाल अधरों से मनोहर था, जो फेनयुक्त कमल की शोभा धारण कर रहा था। उनकी लंबी और ऊँची नाक सरस्वती के अवतरण की प्रणाली सी शोभायमान थी। उनका कंठ मनोहर रेखाओं से युक्त ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने मुखरूपी घर के लिए सुवर्ण का स्तंभ बनाया हो। उनके वक्षःस्थल पर श्रेष्ठ मणि से युक्त हारयष्टि ऐसी शोभायमान थी मानो गुणरूपी क्षत्रियों की सेना हो। जैसे सुमेरु पर्वत झरने धारण करता है, वैसे ही वे इंद्रच्छद हार से शोभायमान थे। उस हार से उनका वक्षःस्थल गंगा से युक्त हिमालय तट सा लगता था। उनका वक्षःस्थल सरोवर सा सुंदर था, जहाँ हार की किरणरूपी जल में लक्ष्मीरूपी हंसी क्रीड़ा करती थी। उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी का घर था, और दोनों कंधे जयलक्ष्मी की अटारियाँ से प्रतीत होते थे। बाजूबंद से स्निग्ध उनकी भुजाएँ शोभारूपी लता से युक्त कल्पवृक्ष सी शोभायमान थीं। उनके हाथों के नख सुखदायक प्रकाश और सीधी अंगुलियों से युक्त थे, जो उनके दस अवतारों में भोगी लक्ष्मी के दर्पण से प्रतीत होते थे।
श्लोक 22 से 31 शरीर का मध्य और निचला भाग
महाराज नाभिराज के पुत्र भगवान वृषभदेव की नाभि लक्ष्मीरूपी हंसी से सेवित और आवर्त से युक्त सरोवर सी शोभायमान थी। करधनी और वस्त्र से युक्त उनका जघनभाग बिजली और शरद बादलों से युक्त पर्वत के नितंब सा शोभायमान था। उनकी सुवर्ण-कांतियुक्त ऊरुएँ लक्ष्मी के झूले के स्तंभ से प्रतीत होती थीं। उनकी जंघाएँ कामदेवरूपी हाथी के लिए अर्गल सी थीं, जो लक्ष्मी द्वारा उज्ज्वल की गई सी लगती थीं। उनके चरणकमल तीनों लोकों की लक्ष्मी के आलिंगन से सौभाग्य के गर्व से शोभायमान थे, जिनकी कोई उपमा नहीं थी। पैरों के नख से शिर के केशों तक उनकी कांति ऐसी थी मानो अनन्य गति से उनके शरीर में प्रकट हुई हो। उनका शरीर स्वाभाविक रूप से सुंदर, वज्रमय हड्डियों से युक्त, और अभेद्य था, जो मेरु की कांति को प्राप्त था। उनका वज्रवृषभनाराच संहनन वज्रमयी हड्डियों और कीलों से युक्त था। वात, पित्त, कफ से उत्पन्न व्याधियाँ उनके शरीर में स्थान नहीं पाती थीं, जैसे वायु मेरु को नहीं हिला सकती। उनके शरीर में न बुढ़ापा, न खेद, न असमय मृत्यु थी; वे सुख में पूजित थे।
श्लोक 32 से 44 शरीर और लक्षण
भगवान का परमौदारिक शरीर मोक्ष का मूल कारण था और अत्यंत शोभायमान था। उनका समचतुरस्र संस्थान हीनाधिकता से रहित था। उनकी रूप-संपत्ति और भोग सामग्री प्रसिद्ध थी, जैसे कल्पवृक्ष आभरणों से दैदीप्यमान होते हैं। जैसे सुमेरु के मणिमय तट से ज्योतिषी देव शोभायमान होते हैं, वैसे ही उनके निर्मल शरीर से सामुद्रिक लक्षण शोभायमान थे। वे आभूषणों से कल्पवृक्ष और लक्षणों से फूलों से सुशोभित थे। उनके शरीर में श्रीवृक्ष, शंख, कमल, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चमर, छत्र, सिंहासन, पताका, मीन, कुंभ, कच्छप, चक्र, समुद्र, सरोवर, विमान, भवन, हाथी, मनुष्य, स्त्रियाँ, सिंह, बाण, धनुष, मेरु, इंद्र, देवगंगा, पुर, गोपुर, चंद्रमा, सूर्य, घोड़ा, तालवृंत, बाँसुरी, वीणा, मृदंग, मालाएँ, रेशमी वस्त्र, दूकान, कुंडल, चित्र-विचित्र आभूषण, उपवन, खेत, रत्नद्वीप, वज्र, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, कामधेनु, वृषभ, चूड़ामणि, निधियाँ, कल्पलता, सुवर्ण, जंबूद्वीप, गरुड़, नक्षत्र, तारे, राजमहल, ग्रह, सिद्धार्थ वृक्ष, आठ प्रातिहार्य, और आठ मंगलद्रव्य सहित 108 लक्षण और 900 व्यंजन विद्यमान थे।
श्लोक 45 से 61 लक्षणों की महिमा और विवाह चिंता
इन लक्षणों से व्याप्त उनका शरीर ज्योतिषी देवों से भरे आकाश सा शोभायमान था। उनके निर्मल शरीर के स्पर्श से इन लक्षणों के अंतर्लक्षण शुभ थे। रागद्वेषरहित भगवान के मन में लक्ष्मी कठिनाई से स्थान पा सकी, क्योंकि वे वीतराग थे। उन्हें सरस्वती और कीर्ति प्रिय थीं, पर लक्ष्मी पर उनका प्रेम कम था। उनके रूप-यौवन से आकृष्ट लोगों के नेत्र भौंरे से दूसरी जगह रमण नहीं करते थे। एक दिन नाभिराज ने उनकी यौवन अवस्था देखकर विवाह की चिंता की। उन्होंने सोचा कि ये सुंदर हैं, पर इनका चित्त हरण करने वाली स्त्री कौन होगी, और इनका विषयराग मंद होने से विवाह कठिन है। उनका धर्मतीर्थ में उद्योग है, अतः वे परिग्रह छोड़कर दीक्षा लेंगे। फिर भी, तपस्या की काललब्धि तक लोकव्यवहार के लिए योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए। ऐसी कुलीन स्त्री उनके निर्मल मन में निवास करे। यह निश्चय कर नाभिराज ने भगवान से कहा कि आप जगत के अधिपति हैं, अतः उपकार करें। आप ब्रह्मा और स्वयंभू हैं; हम निमित्त मात्र हैं। आप गर्भ में कमल पर उत्पन्न हुए, अतः शरीररहित हैं। मैं निमित्त पिता हूँ, फिर भी आपसे कहता हूँ कि सृष्टि की ओर बुद्धि लगाएँ।
श्लोक 62 से 71 विवाह प्रस्ताव
नाभिराज ने कहा कि आप आदिपुरुष हैं, अतः लोग आपका अनुगमन करेंगे। किसी इष्ट कन्या से विवाह करें, ताकि प्रजा की संतति नष्ट न हो। इससे धर्म बढ़ेगा, अतः विवाहरूपी धर्म स्वीकार करें। इसे गृहस्थ धर्म मानें, क्योंकि संतान रक्षा आवश्यक है। यदि आप मुझे गुरु मानते हैं, तो मेरे वचनों का उल्लंघन न करें। यह कहकर नाभिराज चुप हुए, और भगवान ने हँसकर ओम कहकर विवाह स्वीकार किया। उनकी स्वीकृति पिता की चतुराई, प्रजा उपकार की इच्छा, या कर्म नियोग थी। नाभिराज ने हर्ष से विवाह उत्सव किया। उन्होंने इंद्र की अनुमति से सुशील, सुंदर, सती कन्याओं की याचना की। कच्छ-महाकच्छ की बहनें, यशस्वी और सुनंदा, शांत और यौवनवती थीं, जिनसे भगवान का विवाह हुआ। देवों ने उत्सव मनाए।
श्लोक 72 से 81 विवाह का आनंद
नाभिराज और परिवार पुत्रवधुओं से संतुष्ट हुए, क्योंकि लौकिक धर्म प्रिय होता है। मरुदेवी विवाह से संतुष्ट हुईं, जैसा पुत्र विवाह में स्त्रियों को प्रेम होता है। जैसे चंद्र कला से समुद्र बेला बढ़ती है, वैसे ही मरुदेवी विवाह संपदा से बढ़ीं। सभी आनंदित हुए, क्योंकि लोग भोग स्वामी को भोगते देख अनुसरण करते हैं। विवाह ने मनुष्यलोक और स्वर्ग में प्रीति विस्तृत की। भगवान की देवियाँ उत्कृष्ट ऊरुओं, जंघाओं और कोमल चरणों से युक्त थीं; उनका कटिभाग नीचा होने पर भी संसार को जीतने वाला था। उनका कृश उदर और रोमराजि कामदेव के मद की धारा सी थी। उनकी नाभि रस की कूपिका या रोमराजि की पाल सी थी। उनके स्तन कमलिनियों से शोभायमान थे, जिन पर चूचुक भौंरे से थे। उनके मुक्ताहार तप के फलस्वरूप कंठ और कुच के सुख को प्राप्त थे।
श्लोक 82 से 91 देवियों की शोभा
एकावली से वे सखी सी शोभायमान थीं, जो कंठ और स्तनों को स्पर्श करती थी। नक्षत्रमाला उनके स्तनों के बीच हँसती सी लगती थी। उनकी भुजलताएँ नखों की किरणों से शोभायमान थीं। उनके मुखरूपी चंद्रमा मंद हास्य से चाँदनी बढ़ाते थे। उनके नेत्र भ्रमरों से युक्त कमल से शोभायमान थे। उनकी भौंहें कामदेव के धनुष से सुंदर थीं। उनके कान नीलकमल कर्णभूषणों से शोभायमान थे। उनके ललाट के अलक सुवर्णपट्टक पर इंद्रनील से लगते थे। उनके केशपाश काले साँपों से सफेद साँपों को उगलते से प्रतीत होते थे। वे मधुर और आभूषणों से उज्ज्वल कल्पलताएँ सी थीं।
श्लोक 92 से 101 भगवान और देवियों का मिलन
लोगों को लगता था कि इन देवियों ने देवांगनाओं को जीत लिया। भगवान वृषभदेव इनसे कीर्ति और लक्ष्मी से शोभायमान थे, जैसे नदियाँ समुद्र से मिलती हैं। वे रूपवती और कामदेव की पताका सी थीं, जिन्होंने भगवान का मन हरण किया। भगवान ने उनकी इच्छा को प्रसन्न किया। कामदेव उनके सामने अपमानित होने पर भी गुप्त रूप से संचार करता था। वह शरीररहित होकर देवियों में प्रविष्ट हुआ और बाणों से भगवान को घायल करता था। उनके साथ भोगते हुए भगवान का समय उत्सवों में क्षणभर सा बीता। एक दिन यशस्वती ने स्वप्न में ग्रसी पृथ्वी, सुमेरु, चंद्र-सूर्य, हंस-सरोवर, और चंचल समुद्र देखा, और मंगल-पाठ से जागी।
श्लोक 102 से 111 बंदीजनों का मंगल-पाठ
बंदीजन यशस्वती देवी को जागने के लिए मंगल-पाठ पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा कि हे कल्याणकारी देवी, तुम कमलिनी सी शोभायमान हो, अतः जागो। तुमने पृथ्वी, मेरु, समुद्र, सूर्य, चंद्र और सरोवर जैसे शुभ स्वप्न देखे, जो तुम्हारे आनंद के लिए हों। चंद्रमारूपी हंस और तारारूपी हंसियाँ अस्त हो रही हैं। चंद्रमा कांतिहीन हो गया है, मानो चकवियों की ईर्ष्या से दूषित हुआ हो। रात्रि नक्षत्रों को लपेटकर भाग रही है। चंद्रमा अस्त और सूर्य उदित हो रहा है, जो संसार की विचित्रता दिखाते हैं। तारे सूर्य से कांतिहीन होकर विलीन हो रहे हैं। चकवा चकवी को ढूँढ रहा है, और हंस मृणाल से खुजलाकर शयन चाहता है।
श्लोक 112 से 121 यशस्वती का जागरण और स्वप्न निवेदन
कमलिनी विकसित और कुमुदिनी मुरझा रही है। कुरर पक्षियाँ नूपुर सा शब्द कर रही हैं। पक्षी कोलाहल के साथ मंगल-पाठ पढ़ते हुए उड़ रहे हैं। दीपक प्रातःकाल में मंद पड़ रहे हैं। कुब्जक और वामन आदि यशस्वती की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बंदीजनों ने कहा कि हे भगवान की प्रिय, शय्या छोड़ो। मंगल-पाठ और दुंदुभियों से यशस्वती जागी। उसने स्नान कर भगवान वृषभदेव के पास स्वप्नों का फल पूछने पहुँची। वह सिंहासन पर बैठी, लक्ष्मी सी शोभायमान हुई। उसने स्वप्न भगवान को बताए।
श्लोक 122 से 131 स्वप्न फल और गर्भ
भगवान ने कहा कि सुमेरु से चक्रवर्ती पुत्र, सूर्य से प्रताप, चंद्र से कांति, सरोवर से पवित्र लक्षण, पृथ्वी ग्रसने से पृथ्वी का पालन, और समुद्र से संसार पार करने वाला ज्येष्ठ पुत्र होगा। यशस्वती हर्ष से बढ़ी। अतिगृद्ध का जीव, जो व्याघ्र, देव, सुबाहु, और अहमिंद्र था, यशस्वती के गर्भ में आया। वह गर्भ से सूर्य और प्रतिकूल छाया सहन नहीं करती थी। भगवान उसे मयूर सा उत्सुकता से देखते थे।
श्लोक 132 से 141 यशस्वती की गर्भावस्था
यशस्वती रत्नमयी भूमि सी शोभायमान थी। वह मंद गति से चलती थी, मानो पृथ्वी पर मुहर लगाती हो। गर्भ में भी उसकी वलीभंग नहीं हुई, जो पुत्र के अभंग दिग्विजय को सूचित करती थी। उसके स्तन काले हुए, जो शत्रु नाश का संकेत था। दोहला, आलस्य, और मिट्टी की सुगंध जैसे चिह्न भगवान को प्रसन्न करते थे। नौ माह बाद उसने तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। चैत्र कृष्ण नवमी, मीन लग्न, ब्रह्मयोग, धन चंद्रमा, और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 142 से 151 पुत्र का जन्म और उत्सव
पुत्र भुजाओं से पृथ्वी आलिंगन कर उत्पन्न हुआ, जो चक्रवर्ती होने का संकेत था। वह चंद्र सा सौम्य और सूर्य सा तेजस्वी था। मरुदेवी और नाभिराज हर्षित हुए। स्त्रियाँ आशीर्वाद दे रही थीं। नगाड़े, तुरही, शंख आदि बजे। फूल बरसे, सुगंधित वायु बही। देवों ने जय-जय और चिरंजीव शब्द कहे। नृत्य करने वाली स्त्रियाँ ताल पर नृत्य करने लगीं।
श्लोक 152 से 161 नगर का उत्सव और भरत नामकरण
गलियाँ चंदन जल से शोभायमान थीं। आकाश में इंद्रधनुष और तोरण शोभायमान थे। सुवर्ण कलश रखे गए। अयोध्या उत्सव से भर गई। भगवान ने दान बरसाया, कोई दरिद्र नहीं रहा। बालक भगवान से उदित चंद्रमा सा था। बंधुओं ने उसे भरत नाम दिया। इतिहासकारों ने कहा कि यह क्षेत्र भरत के नाम से भारतवर्ष कहलाया। भरत कुमुदों में आनंद बढ़ाता और अंधकार नष्ट करता था। वह दूध उगलकर यश बाँटता था।
श्लोक 162 से 171 भरत का विकास
भरत की मंद मुसकान आदि लीलाएँ माता-पिता को हर्षित करती थीं। उसके गुण उसकी सुंदरता के साथ बढ़ते थे। भगवान ने उसके अन्नप्राशन, चौल, और उपनयन संस्कार किए। भरत ने युवावस्था प्राप्त की। उसका गमन, शरीर, और हास्य पिता सा था। उसकी वाणी, कला, और विद्या भी पिता समान थी। प्रजा ने कहा कि आत्मा ही पुत्र है। वह सज्जनों को मान्य और कामदेव सा था। वह पिता के मन को प्रेम से अधीन करता था। उसका शरीर विजयलक्ष्मी से दैदीप्यमान था।
श्लोक 172 से 181 भरत का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
भरत का बलिष्ठ शरीर तेज से शोभायमान था। उसका मुकुट मेरु शिखर सा था। उसका शिर लक्ष्मी के लिए छत्र सा था। काले केश इंद्रनील टोपी से लगते थे। उसकी कुटिलता केशों में सीमित थी। उसका मुखकमल दाँतों और सुगंध से शोभायमान था। उसका मुख चंद्रमा सा सुखद, गोल, और कांतियुक्त था। दाँतों की चाँदनी और कर्णभूषण से वह शोभायमान था। उसका मुख सूर्य, चंद्र, और कमल के गुणों से युक्त था। वह संकोचरहित और अनुपम था।
श्लोक 182 से 191 भरत का चेहरा
भरत का मुख लक्ष्मी से हारकर वन-जल में प्रस्थान करता सा था। उसका ललाट सूर्य किरणों से बना सा था। उसके कपोल चंद्रमा को पराजित करते थे। उसकी भौहें कामदेव की पताकाएँ सी थीं। उसके नीलकमल नेत्र दिशाओं को चित्रित करते थे। उसके कटाक्ष उसके कानों का उल्लंघन करते थे। उसके अर्धनेत्रों से स्त्रियाँ आसक्त होती थीं। कुंडलों से वह शास्त्र-अर्थ तुलना करता सा था। उसकी नाक कामदेव की अग्नि नाली सी थी। उसका अधरोष्ठ अमृत से सींचा सा था।
श्लोक 192 से 201 भरत का शरीर (मध्य और ऊपरी भाग)
भरत का कंठ हार से शंख सा शोभायमान था। उसका वक्षस्थल रत्नद्वीप सा था। हार लक्ष्मी के झूले की लता सी थी। बाजूबंद से उसकी भुजाएँ विजयलक्ष्मी की अधीन थीं। उसके बाहुदंड पृथ्वी नापने के दंड से थे। उसका हस्त-तल शुभ लक्षणों से शोभायमान था। यज्ञोपवीत से वह हिमालय सा था। उसका ऊपरी भाग आभूषणों से हँसता सा था। उसका अधोभाग भी ऊपरी भाग सा था। पुनरुक्ति से उसका वर्णन दोषरहित था।
श्लोक 202 से 211 भरत का अधोभाग
भरत की नाभि लावण्य की कूपिका थी। उसका जघन भाग इंद्रधनुष से युक्त मेरु सा था। उसके ऊरू कामदेव के खंभे से थे। उसकी जंघाएँ गोल और मनोहर थीं। उसके चरण कमल से थे, जहाँ लक्ष्मी निवास करती थी। उसके पैर कमल की शोभा पर हँसते थे। चरणों में चक्र आदि चिह्न थे। उसके चरण ही पृथ्वी पर आक्रमण करते थे। वह चरम शरीरी और दिग्विजयी था। उसकी भुजाओं में चक्रवर्ती बल था।
श्लोक 212 से 221 भरत के गुण
भरत के रूप में गुणरूपी संपदा थी। गुणों ने उसके सुंदर शरीर को स्वीकृत किया। सत्य, शौच, क्षमा आदि आत्मिक गुण और कांति, लावण्य आदि शारीरिक गुण उसके थे। वह गुणों से और सुशोभित था। वह दिव्य, तेजस्वी, और लक्ष्मी पुंज सा था। उसकी रूपसंपदा से लोग पुण्य की प्रशंसा करते थे। अभ्युदय पुण्य से प्राप्त होता है। पुण्य संचय आवश्यक है।
श्लोक 222 से 224 भरत की महिमा और पिता का संतोष
भरत चंद्रमा सा आनंद बढ़ाता और दुःख शांत करता था। वह उदयाचल सा सुवर्णमय, उदार, और दिग्विजयी था। भगवान वृषभदेव उसके मुख, वचन, और आलिंगन से संतोष प्राप्त करते थे।
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