भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104
श्लोक 105 से 118 संदेश प्राप्ति और प्रस्थान का निर्णय
चिंतागति और मनोगति राजमंदिर पहुँचे, वज्रजंघ को प्रणाम कर भेंट और पत्र सौंपा। वज्रजंघ ने पत्र पढ़कर वज्रदंत और उनके पुत्रों की दीक्षा पर विस्मय किया। उन्होंने पुंडरीक के राज्यभार और लक्ष्मीमती की सहायता की माँग को समझा। श्रीमती को दुःख हुआ, पर वज्रजंघ ने उसे समझाया और पुंडरीकिणी पुरी जाने का निश्चय किया। विद्याधरों को सम्मानित कर आगे भेजा और प्रस्थान की तैयारी शुरू की।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 105 to 118
श्लोक ( Shlok ) 105
द्वाःस्यैः प्रणोयमानौ च प्रविश्य नृपमन्दिरम । महानृपसभासीनं वज्रजङ्गमदर्शताम् ॥१०५॥
जब वे दोनों भाई राजमंदिर के समीप पहुंचे तब द्वारपाल उन्हें भीतर ले गये । उन्होंने राजमंदिर में प्रवेश कर राजसभा में बैठे हुए वज्रजंघ के दर्शन किये ।।105।।
When the two brothers reached near the royal temple, the gatekeeper led them inside. They entered the royal temple and beheld Vajrajangha seated in the royal assembly. 105.
श्लोक ( Shlok ) 106
कृतप्रणामौ तौ तस्य पुरो रत्नकरण्डकम् । निचिक्षिपतुरन्तस्थपत्रकं सदुपायनम् ॥१०६॥
उन दोनों विद्याधरों ने उन्हें प्रणाम किया और फिर उनके सामने, लायी हुई भेंट तथा जिसके भीतर पत्र रखा हुआ है ऐसा रत्नमय पिटारा रख दिया ।।106।।
The two Vidyadharas bowed to him and then placed before him the gift they had brought — a jewel-studded casket containing a letter inside. 106.
श्लोक ( Shlok ) 107
“तदुन्मुद्रथ तदन्तस्थं गृहीत्वा कार्यपत्रकम् । निरुप्य विस्मितश्च कवर्त्तिप्रावज्यनिर्णयात् ॥१०७॥
महाराज वज्रजंघ ने पिटारा खोलकर उसके भीतर रखा हुआ आवश्यक पत्र ले लिया । उसे देखकर उन्हें चक्रवर्ती के दीक्षा लेने का निर्णय हो गया और इस बात से वे बहुत ही विस्मित हुए ।।107।।
King Vajrajangha opened the casket and took out the important letter inside. Upon reading it, he learned about the decision of the Chakravarti to take renunciation, which left him greatly astonished. 107.
श्लोक ( Shlok ) 108
अहो चक्रधरः पुण्यभागी साम्राज्यवैभवम । त्वक्त्वा दीक्षामुपायंस्त विविक्ताङ्गी वधूमिव ॥१०८॥
वे विचारने लगे कि अहो, चक्रवर्ती बड़ा ही पुण्यात्मा है जिसने इतने बड़े साम्राज्य के वैभव को छोड़कर पवित्र अंग वाली स्त्री के समान दीक्षा धारण की है ।।108।।
He began to ponder, “Ah! The Chakravarti is truly a great soul, who has renounced the immense splendor of such a vast empire and embraced renunciation, pure and noble like a virtuous woman.” 108.
श्लोक ( Shlok ) 109
अहो पुण्यधनाः पुत्राश्चक्रिणोऽचिन्त्यसाहसाः । “अवमत्याधिराज्यं ये समं पित्रा दिदीक्षिरे १०९॥
अहो चक्रवर्ती के पुत्र भी बड़े पुण्यशाली और अचिंत्य साहस के धारक हैं जिन्होंने इतने बड़े राज्य को ठुकराकर पिता के साथ ही दीक्षा धारण की है ।।109।।
“Ah! The sons of the Chakravarti are also truly fortunate and possess unimaginable courage, as they too have renounced such a vast kingdom and embraced renunciation alongside their father.” 109.
श्लोक ( Shlok ) 110 –111
पुण्डरीकस्तु संफुलपुण्डरीकाननद्युतिः । राज्ये निवेशितो धुर्ये’ रूढभारे स्तनन्धयः ॥110॥
“मामी च ‘सन्निधानं मे प्रतिपालयति द्रुतम। तद्राज्यप्रशमायेति दुबोधः कार्यसम्भवः ॥१११
फूले हुए कमल के समान मुख की कांति का धारक बालक पुंडरीक राज्य के इन महान् भार को वहन करने से लिए नियुक्त किया गया है और मामी लक्ष्मीमती कार्य चलाना कठिन है यह समझकर राज्य में शांति रखने के लिए शीघ्र ही मेरा सन्निधान चाहती है अर्थात् मुझे बुला रही हैं ।।110-111।।
“The young Pundarika, whose face radiates like a blooming lotus, has been appointed to bear the great burden of the kingdom. Aunt Lakshmimati, realizing that managing affairs is challenging, desires my immediate presence to maintain peace in the kingdom, essentially summoning me.” 110-111.
श्लोक ( Shlok ) 112
इति निश्चितलेखार्थः कृतधीः कृत्य कोविदः । स्वयं निर्णीतमर्थ तं श्रीमती मप्यबोधयत् ।।११२॥
इस प्रकार कार्य करने में चतुर बुद्धिमान् वज्रजंघ ने पत्र के अर्थ का निश्चय कर स्वयं निर्णय कर लिया और अपना निर्णय श्रीमती को भी समझा दिया ।।112।।
Thus, the wise and skillful Vajrajangha discerned the meaning of the letter and made his own decision, which he also explained to Shrimati. 112.
श्लोक ( Shlok ) 113
वाचिकेन च संवादं लेखार्यस्य विभावयन् । प्रस्थाने पुण्डरीकिण्या मतिभाधात् स धीधनः ॥११३॥
पत्र के सिवाय उन विद्याधरों ने लक्ष्मीमती का कहा हुआ मौखिक संदेश भी सुनाया था जिससे वज्रजंघ को पत्र के अर्थ का ठीक-ठीक निर्णय हो गया था । तदनंतर बुद्धिमान् वज्रजंघ ने पुंडरीकिणी पुरी जाने का विचार किया ।।113।।
Apart from the letter, the Vidyadharas also conveyed Lakshmimati’s verbal message, which helped Vajrajangha clearly understand the true meaning of the letter. Thereafter, the wise Vajrajangha decided to go to Pundarikini city. 113.
श्लोक ( Shlok ) 114
श्रीमतीं च समाश्वास्य तदवारकर्णनाकुलाम् । तया समं समालोच्य प्रयाणं निश्चिचाय सः ॥११४॥
पिता और भाई के दीक्षा लेने आदि के समाचार सुनकर श्रीमती को बहुत दुःख हुआ था परंतु वज्रजंघ ने उसे समझा दिया और उसके साथ भी गुण-दोष का विचार कर साथ-साथ वहाँ जाने का निश्चय किया ।।114।।
Shrimati was deeply saddened upon hearing the news of her father and brother taking renunciation. However, Vajrajangha consoled her and, after weighing the pros and cons, decided to accompany her to the place. 114.
श्लोक ( Shlok ) 115
विसृज्य च पुरो दूतमुख्यौ तौ कृतसत्क्रियौ । स्वयं तदनुमार्गेण प्रयाणायोद्यतो नृषः ॥११५॥
तदनंतर खूब आदर-सत्कार के साथ उन दोनों विद्याधर दूतों को उन्होंने आगे भेज दिया और स्वयं उनके पीछे प्रस्थान करने की तैयारी की ।।115।।
Thereafter, with great respect and hospitality, they sent the two Vidyadhara messengers ahead and began preparing to depart after them. 115.
श्लोक ( Shlok ) 116 – 117
ततो मतिवरानन्दौ धनमित्रोऽप्यकम्पनः । महामन्त्रिपुरोधोऽग्रन्थश्रेष्ठिसेनाधिनायकाः ॥११६॥
प्रधानपुरुषाश्चान्ये प्रयाणोद्यतबुद्धयः । परिवव्रुर्नरेन्द्रं तं शतक्रतुमिवामराः ॥११७॥
तदनंतर मतिवर, आनंद, धनमित्र और अकंपन इन चारों महामंत्री, पुरोहित, राजसेठ और सेनापतियों ने तथा और भी चलने के लिए उद्यत हुए प्रधान पुरुषों ने आकर राजा वज्रजंघ को उस प्रकार घेर लिया था जिस प्रकार कि कहीं जाते समय इंद्र को देव लोग घेर लेते हैं ।।116-117।।
Thereafter, the four great ministers — Mativara, Ananda, Dhanamitra, and Akampana — along with the chief priest, royal merchant, commanders, and other prominent figures ready to accompany him, gathered around King Vajrajangha, just as the gods surround Indra when he sets out on a journey. 116-117.
श्लोक ( Shlok ) 118
तस्मिन्नेवान्हि सोऽह्नाय प्रस्थानमकरोत् कृती । महान् प्रयाणसंक्षोमस्तदाभूत न्नियोगिनाम् ।।११८।।
उस कार्यकुशल वज्रजंघ ने उसी दिन शीघ्र ही प्रस्थान कर दिया । प्रस्थान करते समय अधिकारी कर्मचारियों में बड़ा भारी कोलाहल हो रहा था ।।118।।
The efficient Vajrajangha set out promptly the same day. As he departed, there was great commotion among the officials and attendants. 118.
श्लोक 119 से 135
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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