आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 इंद्र की स्तुति (भाग 2)
अभिषेक से संसार, मेरु, क्षीरसागर पवित्र। जलकण यश समूह। स्वाभाविक सुगंध-कांति, भक्ति से पूजा। मेरु से सूर्य सा तेजस्वी। ब्रह्म-विष्णु-महेश स्वरूप। संस्कार से दैदीप्यमान। प्रत्यक्ष परं ज्योति, पुराणपुरुष। आत्मा-गुणों से नमस्कार योग्य।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
अस्नातपुतगात्रोऽपि स्नपितोऽस्यद्य मन्दरे । पवित्रयितुमेबैतज् जगदेनोमलीमसम् ॥३२॥
। हे देव, यद्यपि आप बिना स्नान किये ही पवित्र हैं तथापि मेरु पर्वत पर जो आपका अभिषेक किया गया है वह पापों से मलिन हुए इस जगत् को पवित्र करने के लिए ही किया गया है ।।32।।
O Lord, although You are inherently pure without the need for a ritual bath, the sacred anointment performed upon You on Mount Meru is solely to purify this world, which is tainted by sin. ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33
युष्मज्ञ्जन्माभिषेकेण वयमेव न केवलम् । नीताः पवित्रतां मेरुः क्षीराब्धिस्तज्जलान्यपि ॥३३॥
हे देव, आपके जन्माभिषेक से केवल हम लोग ही पवित्र नहीं हुए हैं किंतु यह मेरु पर्वत, क्षीरसमुद्र तथा उन दोनों के वन (उपवन और जल) भी पवित्रता को प्राप्ति हो गये हैं ।।33।।
O Lord, not only have we been sanctified by Your consecration at birth, but even Mount Meru, the Ocean of Milk, and their surrounding forests and waters have also attained purity. ॥33॥
श्लोक ( Shlok ) 34
दिङ्मुखेपूल्लसन्ति स्म युष्मत्स्नानाम्बुशीकराः । जगदानन्दिनः सान्द्रा यशसामिव राशयः ॥३४॥
हे देव, आपके अभिषेक के जलकण सब दिशाओं में ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो संसार को आनंद देने वाला और घनीभूत आपके यश का समूह ही हो ।।34।।
O Lord, the droplets of Your consecration water shone in all directions as if they were the condensed essence of Your boundless glory, spreading joy throughout the world. ॥34॥
श्लोक ( Shlok ) 35
अविलिप्तसुगन्धिस्त्वमविभूषितसुन्दरः । भक्तैरभ्यर्चितोऽस्माभिर्भूषणैः सानुलेपनैः ॥३५॥
हे देव, यद्यपि आप बिना लेप लगाये ही सुगंधित हैं और बिना आभूषण पहने ही कदर हैं तथापि हम भक्तों ने भक्तिवश ही सुगंधित द्रव्यों के लेप और आभूषणों से आपकी पूजा की है ।।35।।
O Lord, though You are naturally fragrant without any external application and resplendent without ornaments, we, Your devotees, have adorned You with fragrant pastes and jewels solely out of our deep devotion. ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
लोकाधिकं दधद्धाम प्रादुरासीस्त्वमात्मभूः । मेरोर्गर्भादिव क्ष्मायास्तव देव समुद्भवः ॥३६॥
हे भगवन᳭ आप तेजस्वी हैं और संसार में सबसे अधिक तेज धारण करते हुए प्रकट हुए हैं इसलिए ऐसे मालूम होते हैं मानो मेरु पर्वत के गर्भ से संसार का एक शिखामणि―सूर्य ही उदय हुआ हो ।।36।।
O Bhagavan, You are radiant and have manifested with the greatest brilliance in the world. Thus, You appear as if the supreme jewel of the universe—the Sun itself—has risen from the very heart of Mount Meru. ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
सद्योजातश्रुतिं बिभ्रत् स्वर्गावतरणेऽच्युतः । त्वमद्य वामतां धत्से कामनीयकमुद्वहन् ॥३७॥
हे देव, स्वर्गावतरण के समय आप ‘सद्योजात’ नाम को धारण कर रहे थे, ‘अच्युत’ (अविनाशी) आप हैं ही और आज सुंदरता को धारण करते हुए ‘वामदेव’ इस नाम को भी धारण कर रहे हैं अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं ।।37।।
O Lord, at the time of Your divine descent, You bore the name Sadyojāta (newly born), and You are inherently Achyuta (imperishable). Now, radiating supreme beauty, You also embody the name Vāmadeva. Thus, You are the very essence of Brahma, Vishnu, and Mahesh. ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
यथा शुद्धाकरोद्भूतो मणिः संस्कारयोगतः । दीप्यतेऽधिकमेव त्वं जातकर्माभिसंस्कृतः ॥३८॥
जिस प्रकार शुद्ध खानि से निकला हुआ मणि संस्कार के योग से अतिशय दैदीप्यमान हो जाता है उसी प्रकार आप भी जन्माभिषेकरूपी जातकर्मसंस्कार के योग से अतिशय दैदीप्यमान हो रहे हैं ।।38।।
Just as a pure gemstone, when extracted from its mine and refined, becomes extraordinarily radiant, in the same way, O Lord, You shine with supreme brilliance through the sacred birth consecration ritual. ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
आरामं तस्य पश्यन्ति न तं पश्यन्ति केचन । इत्यसद् यत्परं ज्योतिः प्रत्यक्षोऽसि त्वमद्यनः ॥३९
हे नाथ, यह जो ब्रह्माद्वैतवादियों का कहना है कि सब लोग परं ब्रह्म की शरीर आदि पर्यायें ही देख सकते हैं उसे साक्षात् कोई नहीं देख सकते वह सब झूठ है क्योंकि परं ज्योतिःस्वरूप आप आज हमारे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहे हैं ।।39।।
O Lord, the claim of the Brahmādvaitavādīs that the Supreme Brahman can only be perceived through its bodily manifestations and not directly seen is false, for today, You—the Supreme Divine Light—are visibly present before our very eyes. ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
त्वामामनन्ति योगीन्द्राः पुराणपुरुषं पुरुम् । किवं पुराणमित्यादि पठन्तः स्तवविस्तरम् ॥४०॥
हे देव, विस्तार से आपकी स्तुति करने वाले योगिराज आपको पुराणपुरुष, पुरु, कवि और पुराण आदि मानते हैं ।।40।।
O Lord, the great yogis who praise You in detail regard You as the Eternal Being (Puranapurusha), the Supreme (Puru), the Wise (Kavi), and the Ancient One (Purana). ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
पूतात्मने नमस्तुभ्यं नमः ख्यातगुणाय ते । नमो भीतिभिदे” तुभ्यं गुणानामेकभूतये ॥४१॥
हे भगवन् आपकी आत्मा अत्यंत पवित्र है इसलिए आपको नमस्कार हो, आपके गुण सर्वत्र प्रसिद्ध हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप जन्म-मरण का भय नष्ट करने वाले हैं और गुणों के एकमात्र उत्पन्न करने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।41।।
O Bhagavan, Your soul is supremely pure—salutations to You. Your virtues are renowned everywhere—salutations to You. You are the destroyer of the fear of birth and death and the sole source of all virtues—salutations to You. ॥41॥
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31