भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण अष्टमं पर्व Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 8 में वज्रजंघ के भोग, वैराग्य, और राज्य संकट, संदेश, यात्रा, और पूर्वभवों का वर्णन है
This section narrates the post-marital life of Vajrajangha and Shrimati, their indulgence in pleasures, the subsequent renunciation of key figures like Vajrabahu and Vajradanta, and the urgent message sent to Vajrajangha regarding the vulnerable state of the kingdom under the young Pundarika, Vajrajangha’s response to the message from Lakshmimati, his preparations and journey to Pundarikini Puri, the encounter with munis who reveal past lives, and the unfolding of karmic histories.
श्लोक 13 से 21 प्रणय और क्रीड़ा
श्रीमती का कटिभाग अन्य पुरुषों को अप्राप्य था। प्रणय-कोप में वह वज्रजंघ के केश खींचती और कर्णोत्पल से ताड़न करती थी, जिससे उसे सुख मिलता था। रति-श्रम को झरोखे की वायु शांत करती थी। श्रीमती का मुख, नेत्र, और स्तन उसे आनंद देते थे। वह उद्यानों और लतागृहों में क्रीड़ा करता था।
श्लोक 22 से 31 जलक्रीड़ा और भोग
वज्रजंघ और श्रीमती नदीतट और बावड़ी में जलक्रीड़ा करते थे। वह पिचकारी से श्रीमती के मुख पर जल डालता था, और उसके स्तन भीगकर शोभायमान होते थे। धारागृह और रत्नमयी छतों पर चाँदनी में क्रीड़ा करते थे। दोनों स्वर्ग से बढ़कर भोगों में समय व्यतीत करते थे।
श्लोक 32 से 41 परिवार और विदाई
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह अमिततेज से हुआ। वज्रदंत ने वधू-वर को धन देकर विदा किया। पुरवासियों ने उनके प्रस्थान पर शोक किया। वज्रजंघ श्रीमती के साथ उत्पलखेटक नगर पहुँचा।
श्लोक 42 से 51 उत्पलखेटक में प्रवेश
नगर में उत्सव हुए। पुरसुंदरियों ने फूल बरसाए, प्रजाजन आशीर्वाद देते थे। वज्रजंघ राजभवन में श्रीमती के साथ सुख से रहा। पंडिता सखी उसे विनोद से प्रसन्न रखती थी। उनके 98 पुत्र हुए।
श्लोक 52 से 61 वज्रबाहु का वैराग्य
वज्रबाहु ने बादल के विलीन होने से वैराग्य पाया। उन्होंने राज्य वज्रजंघ को सौंपकर यमधरमुनि से दीक्षा ली। श्रीमती के 98 पुत्रों ने भी दीक्षा ली। वज्रबाहु ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया। वज्रजंघ भोग भोगता रहा।
श्लोक 62 से 71 वज्रदंत का वैराग्य
वज्रदंत ने कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य पाया। उन्होंने विषयों को विषम, शरीर को क्षणभंगुर, और लक्ष्मी को चंचल माना। भोग संताप देते हैं, आयु नष्ट होती है।
श्लोक 72 से 82 संसार की अनित्यता
वज्रदंत ने यमराज को शत्रु, वृद्धावस्था को सेना, और विषयों को दुःखदायक कहा। संसार में सुख अल्प, दुःख अधिक है। विषय अर्जन, भोग, और वियोग में दुःख देते हैं। उन्होंने राज्य अमिततेज को देना चाहा, पर वह तैयार न हुआ।
श्लोक 83 से 91 वज्रदंत की दीक्षा
वज्रदंत ने राज्य पुंडरीक को सौंपा और गुणधर मुनि से 60,000 रानियों, 20,000 राजाओं, 1,000 पुत्रों, और पंडिता के साथ दीक्षा ली। लक्ष्मीमती और अनुंधरी शोकग्रस्त हुईं। प्रजा पुंडरीक को लेकर नगर लौटी।
श्लोक 92 से 104 लक्ष्मीमती का संदेश
लक्ष्मीमती ने राज्य की रक्षा के लिए वज्रजंघ को संदेश भेजा। उन्होंने चिंतागति और मनोगति को बुलाकर कहा कि वज्रदंत दीक्षित हो गए, पुंडरीक बालक है, राज्य संकट में है। दोनों विद्याधर आकाशमार्ग से उत्पलखेटक पहुँचे।
श्लोक 105 से 118 संदेश प्राप्ति और प्रस्थान का निर्णय
चिंतागति और मनोगति राजमंदिर पहुँचे, वज्रजंघ को प्रणाम कर भेंट और पत्र सौंपा। वज्रजंघ ने पत्र पढ़कर वज्रदंत और उनके पुत्रों की दीक्षा पर विस्मय किया। उन्होंने पुंडरीक के राज्यभार और लक्ष्मीमती की सहायता की माँग को समझा। श्रीमती को दुःख हुआ, पर वज्रजंघ ने उसे समझाया और पुंडरीकिणी पुरी जाने का निश्चय किया। विद्याधरों को सम्मानित कर आगे भेजा और प्रस्थान की तैयारी शुरू की।
श्लोक 119 से 135 प्रस्थान की तैयारियाँ
मंत्री, सेनापति आदि ने वज्रजंघ को घेरा। उसने उसी दिन प्रस्थान किया। कर्मचारियों में कोलाहल हुआ। वज्रजंघ ने सेवकों को हथिनियाँ, घोड़े, पालकियाँ, दासियाँ, सेना के लिए डेरे, भोजनशाला, और सुरक्षा की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछा।
श्लोक 136 से 151 सेना का प्रस्थान और मार्ग
चौक सैनिकों से भर गया। छत्रों और पताकाओं से आकाश ढक गया। धूल और मद से पृथ्वी शांत हुई। सेना नदी समान शोभायमान हुई। भ्रमर हाथियों के मद में लीन हुए। मार्ग में वृक्ष सत्कार करते दिखे। सेना शष्प सरोवर पर पहुँची।
श्लोक 152 से 161 शष्प सरोवर पर विश्राम
सरोवर पीला और शीतल था, हरे वनों से घिरा। लहरें और पक्षी सेना को बुलाते थे। सेना तट पर ठहरी। निर्बल प्राणी डरकर भागे। सैनिकों ने वृक्षों को कल्पवृक्ष-सा सजाया। स्त्रियाँ स्नान करती शोभायमान हुईं। तंबू वनलक्ष्मी के भवन समान लगे।
श्लोक 162 से 171 सेना का ठहराव और मुनियों का आगमन
घोड़े और हाथी शोभायमान हुए। वज्रजंघ डेरे में पहुँचे। दमधर और सागरसेन मुनि वहाँ आए। वज्रजंघ ने उनकी कांति देखकर पादप्रणाम किया और श्रीमती के साथ भोजनशाला में उनकी सेवा की।
श्लोक 172 से 184 मुनियों की पूजा और पूर्वभव
वज्रजंघ ने मुनियों को आहार दिया, जिससे पंचाश्चर्य (रत्न-पुष्पवर्षा आदि) हुए। कंचुकी ने बताया कि मुनि उनके पुत्र हैं। वज्रजंघ ने धर्म सुना और पूर्वभव पूछा। दमधर मुनि ने बताया कि वज्रजंघ चौथे भव में श्रीषेण का पुत्र था, दीक्षा ली पर भोगों में मृत्यु पाई, फिर महाबल और ललितांगदेव हुआ, अब वज्रजंघ है।
श्लोक 185 से 201 श्रीमती और मंत्रियों का पूर्वभव
श्रीमती धातकीखंड में गृहस्थ पुत्री थी, फिर निर्नामिका हुई, उपवास किए, स्वयंप्रभा बनी, अब श्रीमती है। वज्रजंघ ने मंत्रियों का पूर्वभव पूछा। दमधर ने बताया कि मतिवर प्रभाकरी नगरी में अतिग्रंथ राजा था, नरक गया, व्याघ्र हुआ। प्रीतिवर्धन ने मुनिदान के लिए नगर सजाया, जिससे मुनि वहाँ आए।
श्लोक 202 से 211 मतिवर के पूर्वभव और सिंह की समाधि
पिहितास्रव मुनि ने प्रीतिवर्धन के घर आहार लिया। राजा ने दान दिया, जिससे रत्नवर्षा हुई। सिंह (अतिगृंध्र का जीव) ने यह देखकर जाति-स्मरण पाया, शांत हुआ, और समाधि में बैठ गया। मुनि ने प्रीतिवर्धन को बताया कि यह सिंह भविष्य में चक्रवर्ती और मोक्ष पाएगा। राजा ने सेवा की, मुनि ने नमस्कार मंत्र सुनाया। सिंह ने 18 दिन उपवास कर दिवाकरप्रभ देव बना। प्रीतिवर्धन के सहयोगी भी शांत हुए।
श्लोक 212 से 221 मंत्रियों के पूर्वभव
सेनापति, मंत्री, पुरोहित ने दान की अनुमोदना की, उत्तरकुरु में आर्य हुए, फिर स्वर्ग में देव बने—कनकाभ, प्रभंजन, प्रभाकर। ये ललितांगदेव के परिवार में थे। सिंह का जीव मतिवर, प्रभाकर का अकंपन, कनकप्रभ का आनंद, और प्रभंजन का धनमित्र बना। वज्रजंघ और श्रीमती धर्म से प्रभावित हुए। वज्रजंघ ने चार जानवरों के निर्भय होने का कारण पूछा।
श्लोक 222 से 231 सिंह और सूकर के पूर्वभव
मुनि ने बताया कि सिंह हस्तिनापुर में उग्रसेन था, क्रोधी, राजा के भंडार लूटा, मार खाकर व्याघ्र हुआ। सूकर विजय नगर में हरिवाहन था, मान से माता-पिता का अनादर किया, खंभे से टकराकर सूकर बना।
श्लोक 232 से 241 वानर और नकुल के पूर्वभव
वानर धन्यपुर में नागदत्त था, माया से बहन के विवाह में ठगी चाही, आर्तध्यान से मरकर वानर हुआ। नकुल सुप्रतिष्ठित नगर में लोलुप हलवाई था, लोभ से ईंटें चुराईं, पुत्र को मारा, राजा ने मार डाला, नकुल बना।
श्लोक 242 से 252 भविष्य और पुंडरीकिणी यात्रा
चारों जानवरों ने दान देखकर जाति-स्मरण पाया, भोगभूमि की आयु बाँधी। वज्रजंघ आठवें भव में वृषभनाथ, श्रीमती श्रेयान्स राजा बन मोक्ष पाएँगे। वज्रजंघ हर्षित हुआ, मुनियों को नमस्कार कर डेरे लौटा। मुनि आकाशमार्ग से गए। वज्रजंघ ने शष्प सरोवर पर समय बिताया, फिर पुंडरीकिणी पहुँच लक्ष्मीमती और अनुंधरी को सांत्वना दी, राज्य निष्कंटक किया।
श्लोक 253 से 257 उत्पलखेटक में वापसी
वज्रजंघ ने प्रजा को अनुरक्त कर पुंडरीक को सिंहासन पर बैठाया, व्यवस्था मंत्रियों को सौंपी, और उत्पलखेटक लौटा। नगरवासियों ने उसकी प्रशंसा की। वह श्रीमती के साथ भोग भोगता, जैन धर्म का पालन करता रहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 1 to 12
वज्रजंघ और श्रीमती का भोग जीवन
विवाह के बाद वज्रजंघ ने चक्रवर्ती भवन में श्रीमती के साथ भोगोपभोगों का आनंद लिया। श्रीमती के स्पर्श और सौंदर्य से उसे प्रसन्नता मिलती थी। वह उसके मुख-कमल से कभी तृप्त न होता था। उसके कटाक्ष और मधुर भाषण ने उसका चित्त वश में किया। वह उसके पतली कमर, त्रिवलि-युक्त उदर, और नितंब पर रमण करता था। श्रीमती की भुजाओं और शरीर ने उसकी पांचों इंद्रियों को संतुष्ट किया।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ तत्रावसद्दीर्घ स कालं चक्रिमन्दिरे । निश्योत्सवे महाभोगसंपदा सोपभोगया ॥१॥
विवाह हो जाने के बाद वज्रजंघ ने, जहाँ नित्य ही अनेक उत्सव होते रहते थे ऐसे चक्रवर्ती के भवन में उत्तम-उत्तम भोगोपभोग संपदाओं के द्वारा भोगोपभोगों का अनुभव करते हुए दीर्घकाल तक निवास किया था ।।1।।
After the marriage, Vajrajangha resided for a long time in the palace of the emperor, where numerous celebrations were constantly held. He enjoyed the finest luxuries and pleasures offered by abundant riches.
श्लोक ( Shlok ) 2
श्रीमतीस्तनसंस्पर्शात् तन्मुखाब्जविलोकनात् । तस्यासीन्महती प्रीतिः प्रेम्णे वस्त्विष्टमाश्रितम् ॥२॥
वहां श्रीमती के स्तनों का स्पर्श करने तथा मुखरूपी कमल के देखने से उसे बड़ी प्रसन्नता होती थी सो ठीक ही है क्योंकि इष्ट वस्तु के आश्रय से सभी को प्रसन्नता होती है ।।2।।
He derived great pleasure from touching Shrimati’s breasts and gazing at her lotus-like face, which is only natural, as everyone finds joy in the presence of their desired object.
श्लोक ( Shlok ) 3
तन्मुखान्जाद् रसामोदा वाहरन्नातृपन् नृपः मधुव्रत इवाम्भोजात् कामसेवा न तृप्तये ॥३॥
जिस प्रकार भौंरा कमल से रस और सुवास को ग्रहण करता हुआ कभी संतुष्ट नहीं होता उसी प्रकार राजा वज्रजंघ भी श्रीमती के मुखरूपी कमल से रस और सुवास को ग्रहण करता हुआ कभी संतुष्ट नहीं होता था । सच है, कामसेवन से कभी संतोष नहीं होता ।।3।।
ust as a bumblebee, while drawing nectar and fragrance from a lotus, is never satisfied, in the same way, King Vajrajangha was never content while drawing charm and sweetness from Shrimati’s lotus-like face. Indeed, it is true—desires are never fully satisfied.
श्लोक ( Shlok ) 4
मुखेन्दुमस्याः सोऽपश्य निर्निमेषोत्कया शा । कान्तिमद्दशनज्योतिज्योत्स्नया सततोज्ज्वलम् ।।४।।
श्रीमती का मुखरूपी चंद्रमा चमकीले दाँतों की किरणरूपी चाँदनी से हमेशा उज्जवल रहता था इसलिए वज्रजंघ उसे टिमकाररहित लालसापूर्ण दृष्टि से देखता रहता था ।।4।।
Shrimati’s moon-like face always shone brightly with the radiance of her gleaming teeth, which resembled moonlight. Therefore, Vajrajangha gazed at her with a longing, unwavering, and desire-filled gaze.
श्लोक ( Shlok ) 5
अपाङ्गवीक्षितै लीलास्मितैश्च कलभाषितैः । मनो बबन्ध सा तस्य “स्वस्मिन्नत्यन्तभासुरैः ॥५॥
श्रीमती ने अत्यंत मनोहर कटाक्षावलोकन, लीलासहित मुसकान और मधुर भाषणों के द्वारा उसका चित्त अपने अधीन कर लिया था ।।5।।
Shrimati captivated his heart completely through her enchanting glances, playful smiles, and sweet words.
श्लोक ( Shlok ) 6
त्रिवलीवीच्चिरम्यऽसौ नाभिकावर्त्तशोभिनि । उदरे कृशमध्याया रेमे नद्या इव ह्र्दे।।६।।
श्रीमती की कमर पतली थी और उदर किसी नदी के गहरे कुंड के समान था । क्योंकि कुंड जिस प्रकार लहरों से मनोहर होता है उसी प्रकार उसका उदर भी त्रिवलि से (नाभि के नीचे रहने वाली तीन रेखाओं से) मनोहर था और कुंड जिस प्रकार आवर्त से शोभायमान होता है उसी प्रकार उसका उदर भी नाभिरूपी आवर्त से शोभायमान था । इस तरह जिसका मध्य भाग कृश है ऐसी किसी नदी के कुंड के समान श्रीमती के उदर प्रदेश पर वह वज्रजंघ रमण करता था ।।6।।
Shrimati’s waist was slender, and her abdomen resembled the deep pool of a river. Just as a pool is charming with its ripples, her abdomen was delightful with the three delicate folds below the navel. Similarly, just as a pool is adorned by its whirlpool, her abdomen was graced by her navel, resembling a whirl. Vajrajangha delighted in this enchanting region of Shrimati’s body, akin to a beautiful river’s pool.
श्लोक ( Shlok ) 7
नितम्बपुलिने तस्याः स चिरं धृतिमातनोत् । काञ्चीविहङ्गविरुते” रम्ये हंसयुवायितः ।।७।।
तरुण हंस के समान वह वज्रजंघ, करधनीरूपी पक्षियों के शब्द से शब्दायमान उस श्रीमती के मनोहर नितंबरूपी पुलिन पर चिरकाल तक क्रीडा करके संतुष्ट रहता था ।।7।।
Like a young swan, Vajrajangha found joy and contentment as he played for a long time on Shrimati’s enchanting hip region, which resembled a charming riverbank, resonating with the melodious sounds of her girdle, akin to the calls of birds.
श्लोक ( Shlok ) 8
तरस्तनांशु कमाहृत्य तत्र व्यापारयन् करम् । मदेम इव सोऽभासीत् पद्मिन्याः कुड्मलं स्पृशन् ।।८।।
स्तनों से वस्त्र हटाकर उन पर हाथ फेरता हुआ वज्रजंघ ऐसा शोभायमान होता था जैसा कि कमलिनी के कुड्मल (बौडी) का स्पर्श करता हुआ मदोन्मत्त हाथी शोभायमान होता है ।।8।।
Removing the cloth from her breasts and gently caressing them, Vajrajangha appeared as splendid as an intoxicated elephant touching the buds of a lotus plant.
श्लोक ( Shlok ) 9
स्तनचक्राह्वेये तस्याः श्रीखण्डद्रवकर्दमे । उरःसरसि रेमेऽसौ सत्कुचांशुकशेवले ।।९।।
जो स्तनरूपी चक्रवाक पक्षियों से सहित है, चंदनद्रवरूपी कीचड़ से युक्त है और स्तनवस्त्र (कंचुकी) रूपी शेवाल से शोभित है ऐसे उस श्रीमती के वक्ष:-स्थलरूपी सरोवर में वह वज्रजंघ निरंतर क्रीडा करता था ।।9।।
Vajrajangha constantly played in Shrimati’s chest-like lake, adorned with breast-like Chakravaka birds, enriched with sandalwood paste resembling mud, and beautified by her breast cloth resembling waterweeds.
श्लोक ( Shlok ) 10
मृदुबाहुलते कण्ठे गाढमासज्य सुन्दरी । कामपाशायिते तस्य मनोऽबध्नान् मनस्विनी ।। 10।।
The beautiful and affectionate Shrimati, like the bonds of desire itself, wrapped her soft vine-like arms around Vajrajangha’s neck, captivating his heart and bringing him completely under her sway.
The beautiful and affectionate Shrimati, like the bonds of desire itself, wrapped her soft vine-like arms around Vajrajangha’s neck, captivating his heart and bringing him completely under her sway.
श्लोक ( Shlok ) 11 – 12
मृदुपाणितले स्पर्श रसगन्धौ मुखाम्बुजे । शब्दमालपिते तस्याः तनौ रूपं निरूपयन् ।।११।।
सुचिरं तर्पयामास “सोऽक्षग्राममशेषतः । सुखमैन्द्रिग्यिकं प्रेप्सोः गतिर्नात पराङ्गिनः ।।१२।।
वह वज्रजंघ श्रीमती की कोमल बाहुओं के स्पर्श से स्पर्शन इंद्रिय को, मुखरूपी कमल के रस और गंध से रसना तथा घ्राण इंद्रिय को, संभाषण के समय मधुर शब्दों को सुनकर कर्ण इंद्रिय को और शरीर के सौंदर्य को निरखकर नेत्र इंद्रिय को तृप्त करता था । इस प्रकार वह पाँचों इंद्रियों को सब प्रकार से चिरकाल तक संतुष्ट करता था सो ठीक ही है इंद्रियसुख चाहने वाले जीवों को इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है ।।11-12।।
Vajrajangha satisfied his senses for a long time through Shrimati’s enchanting presence. The touch of her soft arms pleased his sense of touch, the sweetness and fragrance of her lotus-like face delighted his taste and smell, her sweet words enchanted his ears, and the beauty of her body captivated his eyes. Indeed, this was natural, as there is no other way for beings seeking sensory pleasures to find fulfillment.
श्लोक 13 से 21
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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