आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 231 ध्वजाओं की शोभा
वस्त्र ध्वजाएँ लहरों-सी थीं। मयूर साँप की काँचली निगलते थे। कमल आकाश में खिलते थे। भ्रमर कमलों पर भ्रमित होते थे। हंस द्रव्यलेश्या दिखाते थे। गरुड़ आकाश उल्लंघन करते थे। सिंह हाथियों को जीतना चाहते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
स्रग्ध्वजेषु स्त्रजो दिव्याः सौमनस्यों ललम्बिरे । भव्यानां सौमनस्याय कल्पितास्त्रिदिवाधिपैः ॥२२२॥
मालाओं के चिह्न वाली ध्वजाओं पर फूलों की बनी हुई दिव्यमालाएँ लटक रही थीं और वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो भव्य-जीवों का सौमनस्य अर्थात् सरल परिणाम दिखलाने के लिए ही इन्होंने उन्हें बनाया हो ।।222।।
The flags bearing garland symbols had divine floral garlands hanging from them, appearing as if they were created to symbolize the harmony and pure intentions of noble souls. ॥222॥
श्लोक ( Shlok ) 223
श्लक्ष्णांशुकध्वजा रेजुः पवनान्दोलितोत्थिताः । व्योमाम्बुधेरिवोद्भूतास्तरङ्गास्तुङ्गमूर्तयः ॥२२३॥
वस्त्रों के चिह्न वाली ध्वजाएँ महीन और सफेद वस्त्रों की बनी हुई थी तथा वे वायु से हिल-हिलकर उड़ रही थीं जिससे ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो आकाशरूपी समुद्र की उठती हुई बड़ी ऊँची लहरें ही हो ।।223।।
The flags bearing cloth symbols were made of fine, white fabric, fluttering and soaring in the wind. They appeared so magnificent, as if they were the towering waves of the ocean-like sky. ॥223॥
श्लोक ( Shlok ) 224
बर्हिध्वजेषु बर्हालि लीलयोत्क्षिप्य बर्हिणः । रेजुर्ग्रस्तांशुकाः सर्पबुद्धयेव ग्रस्तकृतयः ॥ २२४॥
मयूरों के चिह्न वाली ध्वजाओं में जो मयूर बने हुए थे वे लीलापूर्वक अपनी पूंछ फैलाये हुए थे और साँप की बुद्धि से वस्त्रों को निगल रहे थे जिससे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो साँप की काँचली ही निगल रहे हो ।।224।।
The flags bearing peacock symbols had peacocks gracefully spreading their tails, playfully swallowing the fabric with serpent-like intent. This made them appear as if they were devouring the shedding skin of a snake. ॥224॥
श्लोक ( Shlok ) 225
पद्मध्वजेषु पद्मानि सहस्त्रदलसंस्तरैः । नभःसरसि फुल्लानि सरोजानीव रेजिरे ॥ २२५॥
कमलों के चिह्न वाली ध्वजाओं में जो कमल बने हुए थे वे अपने एक हजार दलों के विस्तार से ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाशरूपी सरोवर में कमल ही फूल रहे हों ।।225।।
The lotus-emblazoned flags displayed lotuses with their thousand-petaled blossoms fully spread, appearing as if lotuses were blooming in the vast lake of the sky. ॥225॥
श्लोक ( Shlok ) 226
अधः प्रतिमया तानि संक्रान्तानि महीतले । भ्रमरान् मोहयन्ति स्म पद्मबुद्धनानु पातिनः ॥२२६॥
रत्नमयी पृथ्वी पर उन ध्वजाओं में बने हुए कमलों के जो प्रतिबिंब पड़ रहे थे वे कमल समझकर उन पर पड़ते हुए भ्रमरों को भ्रम उत्पन्न करते थे ।।226।।
The reflections of the lotuses from those flags, cast upon the gem-studded ground, created an illusion for the bees, making them mistake the reflections for real lotuses as they hovered over them. ॥226॥
श्लोक ( Shlok ) 227
तेषां तदातनी शोभां दृष्ट्वा नान्यत्र भाविनीम् । कञ्जान्युत्सृज्य कार्त्स्न्येंन न लक्ष्मीस्तेषु पदं दधे ॥२२७॥
उन कमलों की दूसरी जगह नहीं पायी जाने वाली उस समय की शोभा देखकर लक्ष्मी ने अन्य समस्त कमलों को छोड़ दिया था और उन्हीं में अपने रहने का स्थान बनाया था । भावार्थ―वे कमल बहुत ही सुंदर थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी अन्य सब कमलों को छोड़कर उन्हीं में रहने लगी हो ।।227।।
Seeing the unparalleled beauty of those lotuses at that moment, Goddess Lakshmi abandoned all other lotuses and chose to reside within them.
(Meaning: The lotuses were so exquisitely beautiful that it seemed as if Lakshmi had forsaken all other lotuses and made these her home.) ॥227॥
श्लोक ( Shlok ) 228
हंसध्वजेष्व भुर्हंसाश्चञ्च्वा ग्रसितवाससः । निजां प्रस्तारयन्तो वा द्रव्यलेश्यां तदात्मना ॥२२८॥
हंसों की चिह्न वाली ध्वजाओं में जो हंसों के चिह्न बने हुए थे वे अपने चोंच से वस्त्र को ग्रस रहे थे और ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो उसके बहाने अपनी द्रव्यलेश्या का ही प्रसार कर रहे हो ।।228।।
The flags bearing swan symbols had swans depicted on them, appearing to grasp the fabric with their beaks. They looked magnificent, as if, under the guise of holding the fabric, they were actually expressing their pure karmic disposition (Dravya Leshya). ॥228॥
श्लोक ( Shlok ) 229
गरुत्मध्वजदण्डाग्राण्यध्यासीना विनायकाः । रेजुः स्वैः पक्षविक्षेपैर्लिलङ्घयिषवो नु खम् ।।२२९॥
जिन ध्वजाओं में गरुड़ों के चिह्न बने हुए थे उनके दंडों के अग्रभाग पर बैठे हुए गरुड़ अपने पंखों के विक्षेप से ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो आकाश को ही उल्लंघन करना चाहते हो ।।229।।
The flags bearing Garuda symbols had Garudas perched at the tops of their poles, spreading their wings wide. They appeared magnificent, as if they were ready to soar and conquer the sky itself. ॥229॥
श्लोक ( Shlok ) 230
बभुर्नीलमणिक्ष्मास्था गरुडाः प्रतिमागताः। समाक्रष्टुमिवाहीन्द्रान् प्रविशन्तो रसातलम् ॥२३०॥
नीलमणिमयी पृथ्वी में उन गरुड़ के जो प्रतिबिंब पड़ रहे थे उनसे वे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो नागेंद्रों को खींचने के लिए पाताल लोक में ही प्रवेश कर रहे हों ।।230।।
The reflections of those Garudas on the sapphire-studded ground appeared so striking, as if they were descending into the Netherworld (Pātāla Loka) to seize the mighty serpent kings (Nāgendras). ॥230॥
श्लोक ( Shlok ) 231
मृगेन्द्र केतनाग्रेषु मृगेन्द्राः क्रमदित्सया । कृतयत्ना विरेजुस्ते जेतुं वा सुरसामजान् ॥२३१॥
सिंहों के चिह्न वाली ध्वजाओं के अग्रभाग पर जो सिंह बने हुए थे वे छलांग भरने की इच्छा से ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो देवों के हाथियों को जीतने के लिए ही प्रयत्न कर रहे हैं ।।231।।
The lion-emblazoned flags had lions depicted at their tops, appearing poised to leap forward. They looked magnificent, as if they were ready to conquer the celestial elephants of the gods. ॥231॥
श्लोक 232 से 241
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221