आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 मेरु की नव शोभा
मेरु जल से अपरिचित सा, मृणाल सा सफेद, चाँदी पर्वत सा। अमृत, स्फटिक, लक्ष्मी महल संदेह। बूँदें छत्र सा, हार-कमल सा यश प्रवाह। कर्णफूल सा, स्वर्ग तक फैला। तारे मोती सा, ओले सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
विश्वगाप्लावितो मेरुर पृप्लबैरामहीतलम् । अज्ञातपूर्वतां भेजे मनसाशायिनामपि ।।१५२।।
वह मेरुपर्वत ऊपर से लेकर नीचे पृथिवीतल तक सभी ओर जलप्रवाह से तर हो रहा था इसलिए प्रत्यक्ष ज्ञानी देवों को भी अज्ञातपूर्व मालूम होता था अर्थात् ऐसा जान पड़ता था जैसे उसे पहले कभी देखा ही न हो ।।152।।
Mount Meru, drenched from its peak to the earth’s surface by the flowing streams of water, appeared unfamiliar even to the all-seeing gods, as if they had never seen it before. ॥152॥
श्लोक ( Shlok ) 153
न मेरुरयमुत्फुल्लन मेरुतरुराजितः । राजतो गिरिरेष स्यादुल्लसद्भिसपाण्डरः ॥१५३॥
उस समय वह पर्वत शोभायमान मृणाल के समान सफेद हो रहा था और फूले हुए नमेरु वृक्षों से सुशोभित था इसलिए यही मालूम होता था कि वह मेरु नहीं है किंतु कोई दूसरा चाँदी का पर्वत है ।।153।।
At that time, the mountain appeared as white as a radiant lotus stem and was adorned with blooming Nameru trees. Thus, it seemed not like Mount Meru, but rather as if it were another silver mountain. ॥153॥
श्लोक ( Shlok ) 154
पीयूषस्यैव राशिर्नुं स्फाटिको नु शिलोच्चयः । सुधाधवलितः किं नु प्रासादस्त्रि जगच्छ्रियः ।।१५४।।
वितर्कमिति तन्वानो गिरिराजे पयःप्लवः । व्यानशे ‘विश्वदिक्कान्तो दिक्कान्ताः स्नपयन्निव ॥१५५l
क्या यह अमृत की राशि है ? अथवा स्फटिकमणि का पर्वत है ? अथवा चूने से सफेद किया गया तीनों जगत् की लक्ष्मी का महल है―इस प्रकार मेरु पर्वत के विषय में वितर्क पैदा करता हुआ बहु जल का प्रवाह सभी दिशा के अंत तक इस प्रकार फैल गया मानो दिशारूपी स्त्रियों का अभिषेक ही कर रहा हो ।।154-155।।
“Is this a vast reservoir of nectar? Or a mountain of crystal gems? Or perhaps the grand palace of the goddess of the three worlds, whitened with lime?”—such thoughts arose as the immense stream of water spread to the farthest ends of all directions, appearing as if it were consecrating the direction-personified maidens. ॥154-155॥
श्लोक ( Shlok ) 156
ऊर्ध्वमुच्चलिताः केचित् शीकरा विश्वदिग्गगताः । श्वेतच्छत्रश्रियं मेरोरातेनुर्विधुनिर्मलाः ॥१५६।।
चंद्रमा के समान निर्मल उस अभिषेकजल की कितनी ही बूँदें ऊपर को उछलकर सब दिशाओं में फैल गयी थी जिससे ऐसी जान पड़ती थीं मानो मेरु पर्वत पर सफेद छत्र की शोभा ही बढ़ा रही हों ।।156।।
Countless droplets of the consecration water, as pure as the moon, leaped upward and spread in all directions. This made it appear as if they were enhancing the splendor of a white royal umbrella over Mount Meru. ॥156॥
श्लोक ( Shlok ) 157
हारनीहारकह्लार कुमुदाम्भोजसत्विषः । प्रावर्त्तन्त पयःपूरा यशः पूरा इवार्हतः ॥१५७॥
हार, बर्फ, सफेद कमल और कुमुदों के समान सफेद जल के प्रवाह सब ओर प्रवृत्त हो रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो जिनेंद्र भगवान् के यश के प्रवाह ही हों ।।157।।
The streams of water, white like garlands, snow, white lotuses, and kumuda flowers, were flowing in all directions. They appeared as if they were the very streams of the glory of Lord Jina. ॥157॥
श्लोक ( Shlok ) 158
गगनाङ्गणपुष्पोपहारा हारामलत्विषः । दिग्वधूकर्णपुरास्ते बभुः स्नपनाम्बुशीकराः ।।१५८ ।।
हार के समान निर्मल कांति वाले वे अभिषेकजल के छींटे ऐसे मालूम होते थे मानो आकाशरूपी आँगन में फूलों के उपहार ही चढ़ाये गये हों अथवा दिशारूपी स्त्रियों के कानों के कर्णफूल ही हों ।।158।।
The droplets of the consecration water, as radiant and pure as garlands, appeared as if floral offerings had been placed in the courtyard of the sky or as if they were the earrings adorning the direction-personified maidens. ॥158॥
श्लोक ( Shlok ) 159
शीकरैराक्रिरन्नाकमालोकान्तविसर्पिभिः । ज्योतिर्लोकमनुप्राप्य जजृम्भे सोऽम्भसां प्लवः ।॥१५९।।
वह जल का प्रवाह लोक के अंत तक फैलने वाली अपनी बूँदों से ऊपर स्वर्ग तक व्याप्त होकर नीचे की ओर ज्योतिष्पटल तक पहुंचकर सब ओर वृद्धि को प्राप्त हो गया था ।।159।।
That stream of water, with its droplets spreading to the very ends of the world, extended upward to heaven and downward to the celestial sphere, expanding in all directions. ॥159॥
श्लोक ( Shlok ) 160
स्नानपूरे निमग्नाङ्गयस्तारास्तरलरोचिषः । मुक्ताफलश्रियं भेजुर्विप्रकीर्णाः समन्ततः ॥१६०॥
उस समय आकाश में चारों ओर फैले हुए तारागण अभिषेक के जल में डूबकर कुछ चंचल प्रभा के धारक हो गये थे इसलिए बिखरे हुए मोतियों के समान सुशोभित हो रहे थे ।।160।।
At that time, the stars spread across the sky, immersed in the consecration water, gained a slightly flickering radiance. As a result, they appeared resplendent, like scattered pearls. ॥160॥
श्लोक ( Shlok ) 161
तारकाः क्षणमध्यास्य स्नानपूरं विनिस्सृताः । पयोलवस्त्रुतो रेजुः करकाणामिवालयः ।॥१६१।।
वे तारागण अभिषेकजल के प्रवाह में क्षण-भर रहकर उससे बाहर निकल आये थे परंतु उस समय भी उनसे कुछ-कुछ पानी चू रहा था इसलिए ओलों की पंक्ति के समान शोभायमान हो रहे थे ।।161।।
The stars, having been immersed for a moment in the stream of consecration water, emerged from it, yet droplets still dripped from them. Thus, they shone brilliantly, resembling a row of hailstones. ॥161॥
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151