भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 231 विवाह समारोह का प्रारंभ
शंख-दुंदुभि बजे, सभी नृत्य करते थे। वारांगनाएँ और नगरवासी पुष्प-अक्षत से आशीष देते थे। दोनों ने रेशमी वस्त्र, चंदन तिलक, और मोती हार धारण किए।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222 – 224
कृतोपशोभे नगरे समन्तादबद्धतोरणे । सुरलोक इवाभाति परां दधति संपदम् ॥ २२२॥
राजवेश्माङ्गणे सान्द्रचन्दनच्छटयोक्षिते । पुष्पोपहारैरागुञ्जदलिभिः कृतरोचिषि ॥२२३॥
सौवर्णकलशेंः पूर्णः पुण्यतोयैः सरत्नकैः । अभ्यषेचि विधानज्ञैर्विधिवत् तद्वधूवरम् ॥२२४।।
उस दिन नगर विशेषरूप से सजाया गया । चारों ओर तोरण लगाये गये तथा और भी अनेक विभूति प्रकट की गयी जिससे वह स्वर्गलोक के समान शोभायमान होने लगा । राजभवन के आंगन में सब ओर सघन चंदन छिड़का गया तथा गुंजार करते हुए भ्रमरों से सुशोभित पुष्प सब ओर बिखेरे गये । इन सब कारण से वह राजभवन का आंगन बहुत ही शोभायमान हो रहा था । उस आंगन में वधू-वर बैठाये गये तथा विधि-विधान के जानने वाले लोगों ने पवित्र जल से भरे हुए रत्नजड़ित सुवर्णमय कलशों से उनका अभिषेक किया ।।222-224।।
On that day, the city was specially decorated. Torans (decorative arches) were put up all around, and many other embellishments were displayed, making it look as splendid as the heavenly realms. In the palace courtyard, fragrant sandalwood was sprinkled all over, and flowers adorned with buzzing bees were scattered, enhancing its beauty. Because of all these arrangements, the courtyard of the royal palace appeared exceedingly radiant. The bride and groom were seated in the courtyard, and those knowledgeable in rituals performed their consecration, bathing them with holy water from gem-studded golden pots. ||222-224||
श्लोक ( Shlok ) 225
सदा महानकध्वानः शङ्गकोलाहलाकुल: । घनाडम्बरमाक्रम्य जजृम्भे नृपमन्दिरे ॥ २२५॥
उस समय राजमंदिर में शंख के शब्द से मिला हुआ बड़े-बड़े दुंदुभियों का भारी कोलाहल हो रहा था और वह आकाश को भी उल्लंघन कर सब ओर फैल गया था ।।225।।
At that time, in the royal temple, the loud sound of large drums, mixed with the sound of conchs, created a tremendous uproar, which seemed to transcend the sky and spread in all directions. ||225||
श्लोक ( Shlok ) 226
कल्याणाभिषवे तस्मिन् श्रीमतीवज्रजङ्घयोः । स नान्त र्वशिकस्तोषनिर्भरं न ननर्त यः ॥२२६॥
श्रीमती और वज्रजंघ के उस विवाहाभिषेक के समय अंतःपुर का ऐसा कोई मनुष्य नहीं था जो हर्ष से संतुष्ट होकर नृत्य न कर रहा हो ।।226।।
During the marriage consecration of Shrimati and Vajrajangha, there was no one in the inner palace who, filled with joy, was not dancing in celebration. ||226||
श्लोक ( Shlok ) 227
वाराङ्गनाः पुरन्ध्यश्च पौरवर्गश्च तत्क्षणम् । पुन्यैः पुष्पाक्षतैः तेषां साशिषं तावलम्भवन् ॥२२७॥
उस समय वारांगनाएँ, कुलवधूएँ और समस्त नगर-निवासी जन उन दोनों वरवधूओं को आशीर्वाद के साथ-साथ पवित्र पुष्प और अक्षतों के द्वारा प्रसाद प्राप्त करा रहे थे ।।227।।
At that time, the courtesans, the brides of noble families, and all the townspeople were showering the bride and groom with blessings, offering sacred flowers and unbroken rice as a form of blessing. ||227||
श्लोक ( Shlok ) 228
श्लक्ष्णपट्टदुकूलानि निष्प्रवाणीनि तौ तदा । क्षीरोदोर्मिमयानीव पर्यधतामनन्तरम् ॥२२८॥
अभिषेक के बाद उन दोनों वर-वधू ने क्षीरसागर की लहरों के समान अत्यंत उज्ज्वल, महीन और नवीन रेशमी वस्त्र धारण किया ।।228।।
After the consecration, both the bride and groom wore extremely bright, fine, and new silken garments, as radiant as the waves of the ocean of milk. ||228||
श्लोक ( Shlok ) 229
प्रसाधनगृहे रम्ये प्राङ्मुखं सुनिवेशितौ । तावलंकारसर्वस्वं भेजतुर्मङ्गलोचितम् ॥२२९॥
तत्पश्चात् दोनों वर-वधू अतिशय मनोहर प्रसाधन-गृह में जाकर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठ गये और वहाँ उन्होंने विवाह मंगल के योग्य उत्तम-उत्तम आभूषण धारण किये ।।229।।
Afterward, the bride and groom went to a beautifully adorned chamber and sat facing the eastern direction. There, they wore the finest and most auspicious jewelry suitable for the wedding ceremony. ||229||
श्लोक ( Shlok ) 230
चन्दनेनानुलिप्तौ तौ ललाटेन ललाटिकाम् । चन्दनद्रवविन्यस्तां दधतुः कौतुकोचिताम् ॥२३०॥
पहले उन्होंने अपने सारे शरीर में चंदन का लेप किया । फिर ललाट पर विवाहोत्सव के योग्य, घिसे हुए चंदन का तिलक लगाया ।।230।।
First, they applied a paste of sandalwood all over their bodies. Then, on their foreheads, they placed a sandalwood mark, ground to a fine powder, suitable for the wedding ceremony. ||230||
श्लोक ( Shlok ) 231
वक्षसा हारयष्टिं तौ हरिचन्दनशोभिना । अधत्तां मौक्तिकैः स्थुलैः धृततारावलिश्रियम् ॥२३१॥
तदनंतर सफेद चंदन अथवा केशर से शोभायमान वक्षःस्थल पर गोल नक्षत्रमाला के समान सुशोभित बड़े-बड़े मोतियों के बने हुए हार धारण किये ।।231।।
Afterward, they adorned their chests, which were decorated with white sandalwood or saffron, with large pearl necklaces that shone like a circle of stars. ||231||
श्लोक 232 से 241
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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