आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151श्लोक 152 से 161 नाट्यशालाओं का संगीत
नाट्यशालाओं में वीणा और मृदंग बजते थे। ये सफेद बादलों-सी थीं। किन्नर संगीत से चित्त आकर्षित होता था। धूपघटों से सुगंध फैलती थी। धुआँ मेघों-सा लगता था। भ्रमर सुगंध सूँघते थे। मृदंग और पुष्पवर्षा से वर्षाकाल प्रतीत होता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
गायन्ति जिनराजस्य विजयं ताः स्म सस्मिताः । तमेवाभिनयन्त्योऽमूः चिक्षिषुः पौष्पमञ्जलिम् ॥ १५२॥
उन नाट्यशालाओं में इकट्ठी हुई वे देवांगनाएँ जिनेंद्रदेव की विजय के गीत गा रही थीं और उसी विजय का अभिनय करती हुई पुष्पांजलि छोड़ रही थीं ।।152।
In those grand theater halls, the assembled celestial maidens sang songs of victory in honor of Jinendra Bhagwan. As part of their performance, they enacted his triumph while gracefully offering showers of flowers. ||152||
श्लोक ( Shlok ) 153
समं वीणानिनादेन मृदङ्गध्वनिरुच्चरन्। व्यतनोत् प्रावृडारम्भशङ्कां तत्र शिखण्डिनाम् ॥१५३॥
उन नाट्यशालाओं में वीणा की आवाज के साथ-साथ जो मृदंग की आवाज उठ रही थी वह मयूरों को वर्षाऋतु के प्रारंभ होने की शंका उत्पन्न कर रही थीं ।।153।।
In those grand theater halls, the sound of the veena blended harmoniously with the resonance of the mridang, creating such a rhythmic symphony that peacocks began to wonder if the monsoon season had begun. ||153||
श्लोक ( Shlok ) 154
शरदभ्रनिभे तस्मिन् द्वितये नाट्यशालयोः । विद्यद्विलासमातेनुर्नृत्यन्त्यः सुरयोषितः ॥ १५४॥
वे दोनों ही नाट्यशालाएँ शरद्ऋतु के बादलों के समान सफेद थीं इसलिए उनमें नृत्य करती हुई वे देवांगनाएँ ठीक बिजली की शोभा फैला रही थीं ।।154।।
Both of those theater halls were as white as the autumn clouds, and thus, the dancing celestial maidens within them spread a radiance akin to flashing lightning. ||154||
श्लोक ( Shlok ) 155
किन्नराणां कलक्वाणैः सोद्गानैरुपवीणितैः। तत्रासक्तिं परां भेजुः प्रेक्षिणां चित्तवृत्तयः ॥१५५॥
उन नाट्यशालाओं में किन्नर जाति के देव उत्तम संगीत के साथ-साथ मधुर शब्दों वाली वीणा बजा रहे थे जिससे देखने वालों की चित्तवृत्तियाँ उनमें अतिशय आसक्ति को प्राप्त हो रही थी ।।155।।
In those theater halls, the Kinnara deities were playing veenas with sweet melodies, harmonizing with exquisite music. This enchanting performance captivated the minds and hearts of all who beheld it. ||155||
श्लोक ( Shlok ) 156
ततो धूपघटौ द्वौ द्वौ वीथीनामु भयोर्दिशोः । धूपधूमैर्न्यंरुन्धातां प्रसरद्भिर्नभोङ्गणम् ॥१५६॥
उन नाट्यशालाओं से कुछ आगे चलकर गलियों के दोनों ओर दो-दो धूपघट रखे हुए थे जो कि फैलते हुए धूप के धुएँ से आकाशरूप आँगन को व्याप्त कर रहे थे ।।156।।
Beyond those theater halls, on both sides of the streets, there were two incense burners each. Their rising fragrant smoke spread across the sky-like courtyard, filling the air with divine aroma. ||156||
श्लोक ( Shlok ) 157
तद्धूपधूमसंरुद्धं नभो वीक्ष्य नभोजुषः। प्रावृट्पयोधराशङ्कामकालेऽपि व्यतानिषुः ॥१५७॥
उन धूपघटों के धुएँ से भरे हुए आकाश को देखकर आकाश में चलने वाले देव अथवा विद्याधर असमय में ही वर्षाऋतु के मेघों की आशंका करने लगे थे ।।157।।
Seeing the sky filled with the smoke from those incense burners, the celestial beings and Vidyadharas moving through the heavens began to mistakenly assume that unseasonal rain clouds had gathered. ||157||
श्लोक ( Shlok ) 158
दिशः सुरभयन्धूपो मन्दानिलवशोत्थितः। स रेजे पृथिवीदेव्या मुखामोद इवोच्छ् वसन् ॥१५८॥
मंद-मंद वायु के वश से उड़ा हुआ और दिशाओं को सुगंधित करता हुआ वह धूप ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो उच्छ्वास लेने से प्रकट हुई पृथिवी देवी के मुख की सुगंधि ही हो ।।158।।
The incense smoke, carried gently by the soft breeze and spreading its fragrance across all directions, appeared as if it were the natural fragrance of Goddess Earth’s breath, exhaled in a deep sigh. ||158||
श्लोक ( Shlok ) 159
तदामोदं समा घ्राय श्रेणयो मधुलेहिनाम् । दिशां मुखेषु वितता वितेनुरलक श्रियम् ॥१५९॥
उस धूप की सुगंधि को सूँघकर सब ओर फैली हुई भ्रमरों की पंक्तियाँ दिशारूपी स्त्रियों के मुख पर फैले हुए केशों की शोभा बढ़ा रहे थे ।।159।।
The rows of bees, drawn to the fragrance of the incense, fluttered in all directions, enhancing the beauty of the disheveled hair of the lady-like directions with their presence. ||159||
श्लोक ( Shlok ) 160
इतो धूपघटामोदमितश्च सुरयोषिताम् । सुगन्धिमुखनिःश्वासमलिनो जघ्रुराकुलाः ॥१६०॥
एक ओर उन धूपघटों से सुगंधि निकल रही थी और दूसरी ओर देवांगनाओं के मुख से सुगंधित निश्वास निकल रहा था सो व्याकुल हुए भ्रमर दोनों को ही सूँघ रहे थे ।।160।।
On one side, the fragrance was emanating from the incense burners, and on the other, the scented breath was escaping from the mouths of the celestial maidens. The restless bees, enchanted by both, fluttered around, eagerly inhaling their sweet aromas. ||160||
श्लोक ( Shlok ) 161
मन्द्रध्वानैर्मृदङ्गानां स्तनयित्विनु विडम्बिभिः । पतन्त्या पुष्पवृष्टया व सदात्रासीद् घनागमः ॥१६१॥
वहाँ पर मेघों की गर्जना को जीतने वाले मृदंगों के शब्दों से तथा पड़ती हुई पुष्पवृष्टि से सदा वर्षाकाल विद्यमान रहता था ।।161।।
There, the continuous sounds of the mridangas, which surpassed the roar of clouds, and the constant showers of flowers created an everlasting atmosphere of the monsoon season. ||161||
श्लोक 162 से 171
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151