भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 वज्रजंघ की स्मृति और मूर्छा
वज्रजंघ ने कहा कि कुछ घटनाएँ—स्वयंप्रभा का कर्णफूल से ताड़न, पैर की छाप, और कपोल पर पत्र-रचना—चित्र में नहीं हैं। उसने निश्चय किया कि यह स्वयंप्रभा का कौशल है। सोचते हुए वह मूर्छित हो गया। पंडिता और मूर्तियों को भी दुख हुआ। परिचारकों ने उसे सचेत किया, पर उसका चित्त श्रीमती में लगा रहा। उसने पंडिता से चित्र के रचयिता के बारे में पूछा।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
इह प्रव्ययकोपेऽस्याः पाद्योर्निपतन्निह । कर्णोत्पलेन मृदुना ताड्यमानो न दर्शितः ।॥१३२॥
यद्यपि इस चित्र में अनेक बातें दिखला दी गयी हैं; परंतु कुछ बातें छूट भी गयी हैं । जैसे कि एक दिन मैं प्रणय-कोप के समय इस स्वयंप्रभा के चरण पर पड़ा था और यह अपने कोमल कर्णफूल से मेरा ताड़न कर रही थी; परंतु वह विषय इसमें नहीं दिखाया गया है ।।132।।
Although many things have been depicted in this painting, some details have been left out. For example, one day, during a playful moment of love and anger, I had fallen at the feet of Swayamprabha, and she was striking me with her delicate earring; however, that particular incident is not shown here.।।132।।
श्लोक ( Shlok ) 133
सालक्तकपदाङ्गुष्ठमुद्रयाऽस्मदुरःस्थले । वाल्लभ्यलान्छन दत्तं प्रियया नात्र दर्शितम् ।।१३३।।
एक दिन इसने मेरे वक्षःस्थल पर महावर लगे हुए अपने पैर के अँगूठे से छाप लगायी थी । वह क्या थी मानो यह हमारा पति है इस बात को सूचित करने वाला चिह्न ही था । परंतु वह विषय भी यहां नहीं दिखाया गया है ।।133।।
One day, she had marked my chest with the thumb of her foot, adorned with a red stain. It seemed like a symbol, indicating that this person is our husband. However, that detail is also not depicted here.।।133।।
श्लोक ( Shlok ) 134
कपोळफलके चास्याः फलिनीफलसत्विषि । लिखन्नालेख्य पत्राणि नाहमत्र निदर्शितः ॥१३४
मैंने इसके प्रियंगु फाल के समान कांतिमां कपोलफलक पर कितनी ही बार पत्र-रचना की थी, परंतु वह विषय भी इस चित्र में नहीं दिखाया है ।।134।।
I had composed several love poems on her radiant cheeks, resembling the color of a ripe mango. However, that subject is also not shown in this painting.।।134।।
श्लोक ( Shlok ) 135
नूनं स्वयंप्रभाच्चर्याहस्तनैपुण्यमीदृशम् । नान्यस्य स्त्रीजनस्येदृक प्रावीण्यं स्यात् कलाविधौ ॥१३५॥
निश्चय से यह हाथ की ऐसी चतुराई स्वयंप्रभा के जीव की ही है क्योंकि चित्रकला के विषय में ऐसी चतुराई अन्य किसी स्त्री के नहीं हो सकती ।।135।।
Surely, this dexterity of hand belongs to the very soul of Swayamprabha, for such skill in the art of painting cannot belong to any other woman.।।135।।
श्लोक ( Shlok ) 136
इति प्रतर्कयश्चेव पर्याकुल इव क्षणम् । शून्यान्तःकरणोऽध्यासीत् किमप्यामीलितेक्षणः ॥136॥
इस प्रकार तर्क-वितर्क करता हुआ वह राजकुमार व्याकुल की तरह शून्यहृदय और निमीलितनयन होकर क्षण-भर कुछ सोचता रहा ।।136।।
Thus, the prince, engaged in reasoning and argument, remained anxious, with a heart full of emptiness and eyes half-closed, pondering for a moment.।।136।।
श्लोक ( Shlok ) 137
उद्श्रुलोचनश्चायं दशामन्त्या मिवोपयन् । दिष्ठ्या संधारितोऽभ्येत्य तदा सख्येव मूर्च्छया ॥137॥
उस समय उसकी आंखों से आँसू झर रहे थे, वह अंत की मरण अवस्था को प्राप्त हुआ ही चाहता था कि दैव योग से उसी समय मूर्च्छा ने सखी के समान आकर उसे पकड़ लिया, अर्थात् वह मूर्च्छित हो गया ।।137।।
At that moment, tears were flowing from his eyes, and he was on the verge of reaching the final stage of death. However, by divine fate, just then, unconsciousness, like a dear friend, came and seized him—he fell into a faint.।।137।।
श्लोक ( Shlok ) 138
तदवस्थं तमालोक्य नाहमेवोन्मनायिता। चित्रस्थान्यपि रूपाणि प्राया न्प्रायोऽन्तरार्द्रताम् ॥ १३८॥
उसकी वैसी अवस्था देखकर केवल मुझे ही विषाद नहीं हुआ था, किंतु चित्र में स्थित मूर्तियों का अंतःकरण भी आर्द्र हो गया था ।।138।।
Seeing him in such a state, it was not only I who felt sorrow, but even the hearts of the statues in the painting were moved with compassion.।।138।।
श्लोक ( Shlok ) 139
प्रत्याश्वासमथानीतः सोपायं परिचारिभिः । त्वदर्पितमनोवृत्तिः सोऽदर्शत्वन्मयीर्दिशः ॥१३९॥
अनंतर परिचारकों ने उसे अनेक उपायों से सचेत किया किंतु उसकी चित्तवृत्ति तेरी ही ओर लगी रही । उसे समस्त दिशा ऐसी दिखती थीं मानो तुझसे ही व्याप्त हों ।।139।।
Afterward, the attendants tried various methods to revive him, but his mind remained fixated on you. To him, all directions seemed as though they were filled with your presence.।।139।।
श्लोक ( Shlok ) 140
अचिरालब्धसंज्ञश्च पृष्टवानिति मामसौ ।भद्रे केनेदमालेख्ये लिखितं नः पुरेहितम् ॥१४०॥
थोड़ी ही देर बाद जब वह सचेत हुआ तो मुझसे इस प्रकार पूछने लगा कि हे भद्रे, इस चित्र में मेरे पूर्वभव की ये चेष्टाएँ किसने लिखी हैं ? ।।140।।
A little while later, when he regained consciousness, he began to ask me, “O gracious one, who has written these actions of my past life in this painting?” 140
श्लोक ( Shlok ) 141
प्रत्युक्तश्च मयेत्यस्ति स्रीसर्ग स्यैकनायिका । दुहिता मातुलान्यास्ते श्रीमतीति पतिवरा ॥१४१।
मैंने उत्तर दिया कि तुम्हारी मामी की एक श्रीमती नाम की पुत्री है, वह स्त्रियों की सृष्टि की एक मात्र मुख्य नायिका है―वह स्त्रियों में सबसे अधिक सुंदर है और पति-वरण करने के योग्य अवस्था में विद्यमान है―अविवाहित है ।।141।।
I replied, “Your maternal aunt has a daughter named Shrimati. She is the principal heroine of the creation of women—she is the most beautiful among women and is at the stage of being worthy of marriage—she is unmarried.” 141
श्लोक 142 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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