आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 |
श्लोक 52 से 61 इंद्र और अप्सराओं का वैभव
ऐरावत पर इंद्र सुशोभित था। इसके बत्तीस मुखों पर सरोवर और अप्सराएँ नृत्य करती थीं। नृत्य हास्य और शृंगार से भरा था। किन्नरियाँ विजयगीत गाती थीं। बत्तीस इंद्रों की सेनाएँ फैलीं। चमर हंसों-से लगते थे। आकाश आभूषणों से चित्रित था।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
इति व्यावर्णितारोह परिणाह वपुर्गुणम् । गजानीकेश्वरश्चक्रे महैरावतदन्तिनम् ॥५२॥
इस प्रकार हाथियों की सेना के अधिपति देव ने जिसके विस्तार आदि का वर्णन ऊपर किया जा चुका है ऐसा बड़ा भारी ऐरावत हाथी बनाया ।।52।।
Thus, the lord of the elephant army, Indra, created the mighty Airavata, whose vastness and other magnificent attributes have been described above. ( 52)
श्लोक ( Shlok ) 53
तमैरावणमारूढः सहस्राक्षोऽद्युतत्तराम्। पद्माकर इवोत्फुल्लपङ्कजो गिरिमस्तके ॥५३॥
जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर पर फूले हुए कमलों से युक्त सरोवर सुशोभित होता है उसी प्रकार उस ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हुआ इंद्र भी अतिशय सुशोभित हो रहा था ।।53।।
Just as a mountain peak is adorned with a lake filled with blooming lotuses, in the same way, Indra, mounted upon Airavata, appeared exceedingly resplendent. (53)
श्लोक ( Shlok ) 54 –56
द्वात्रिंशद्वदनान्यस्य प्रत्यास्यं च रदाष्टकम् । सरः प्रतिरदं तस्मिनब्जिन्येका सरः प्रति ॥५४॥
द्वात्रिंशत्प्रसवास्तस्यां तावत्प्रमितपत्रकाः । तेष्वायतेषु देवानां नर्तक्यस्तत्प्रमाः पृथक् ॥५५॥
नृत्यन्ति सलयं स्मेरवक्त्राब्जा ललितभ्रुवः । पश्चाच्चित्तद्रुमेपूच्चैर्न्यस्यन्त्यः प्रमदाङ्कुरान् ॥५६॥
उस ऐरावत हाथी के बत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुख में आठ-आठ दाँत थे, एक-एक दाँत पर एक-एक सरोवर था, एक-एक सरोवर में एक-एक कमलिनी थी, एक-एक कमलिनी में बत्तीस-बत्तीस कमल थे, एक-एक कमल में बत्तीस-बत्तीस दल थे और उन लंबे-लंबे प्रत्येक दलों पर, जिनके मुखरूपी कमल मंद हास्य से सुशोभित हैं, जिनकी भौंहें अतिशय सुंदर हैं और जो दर्शकों के चित्तरूपी वृक्षों में आनंदरूपी अंकुर उत्पन्न करा रही हैं ऐसी बत्तीस-बत्तीस अप्सराएँ लयसहित नृत्य कर रही थीं ।।54-56।।
Airavata, the mighty elephant, had thirty-two mouths, each adorned with eight teeth. Upon each tooth rested a lake, within each lake bloomed a lotus pond, within each pond blossomed thirty-two lotuses, and each lotus bore thirty-two petals.
On these long and delicate petals, thirty-two celestial nymphs (Apsaras) danced gracefully to rhythmic melodies. Their lotus-like faces shone with gentle smiles, their exquisitely arched eyebrows enhanced their beauty, and their expressions filled the hearts of onlookers with the sprouting joy of divine bliss. ( 54-56)
श्लोक ( Shlok ) 57
तासां सहास्य शृङ्गाररसभावलयान्वितम् । पश्यन्तः कैशिकीप्रायं नृत्तं पिप्रियिरे सुराः ॥५७॥
जो हास्य और शृंगाररस से भरा हुआ था, जो भाव और लय से सहित था तथा जिसमें कैशिकी नामक वृत्ति का ही अधिकतर प्रयोग हो रहा था ऐसे अप्सराओं के उस नृत्य को देखते हुए देव लोग बड़े ही प्रसन्न हो रहे थे ।।57।।
The gods were filled with great joy as they watched the dance of the Apsaras, which was infused with the essence of laughter and romantic sentiment (Shringara Rasa). This dance was enriched with expressions (Bhava) and rhythm (Laya) and predominantly exhibited the Kaishiki Vritti, the graceful and delicate style of performance. ( 57)
श्लोक ( Shlok ) 58
प्रयाणे सुरराजस्य नेटुरप्सरसः पुरः । रक्तकण्ठाश्च किन्नर्यो जगुर्जिंनपतेर्जयम् ॥५८॥
उस प्रयाण के समय इंद्र के आगे अनेक अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और जिनके कंठ अनेक राग रागिनियों से भरे हुए हैं ऐसी किन्नरी देवियाँ जिनेंद्रदेव के विजयगीत गा रही थीं ।।58।।
During that grand procession, numerous Apsaras danced ahead of Indra, while Kinnari goddesses, whose voices were filled with various melodious ragas and raginis, sang victory hymns in praise of Jinendra Deva. ( 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
ततो द्वात्रिंश दिन्द्राणां पूतना बहुकेतनाः । “प्रसस्त्रुर्विलसच्छत्रचामराः प्रततामराः ॥५९॥
तदनंतर जिनमें अनेक पताकाएं फहरा रही थी, जिनमें छत्र और चमर सुशोभित हो रहे थे, और जिनमें चारों ओर देव ही देव फैले हुए थे ऐसी बत्तीस इंद्रों की सेनाएं फैल गयी ।।59।।
Thereafter, the armies of the thirty-two Indras spread out, adorned with waving banners, radiant parasols, and graceful chamars (fly-whisks). Everywhere, divine beings were present, filling the surroundings with their celestial splendor. (59)
श्लोक ( Shlok ) 60 – 61
अप्सरः कुङ्कुमा रक्तकुचचक्राह्वयुग्मके । तद्वक्त्रपङ्कजच्छन्ने लसत्तन्नयनोत्पले ॥६०॥
नभः सरसि हारांशुच्छन्नवारिणि हारिणि । चलन्तश्चामरापीडा हंसायन्ते स्म नाकिनाम् ॥61॥
जिसमें अप्सराओं के केसर से रँगे हुए स्तनरूपी चक्रवाक पक्षियों के जोड़े निवास कर रहे हैं, जो अप्सराओं के मुखरूपी कमलों से ढका हुआ है, जिसमें अप्सराओं के नेत्ररूपी नीले कमल सुशोभित हो रहे हैं और जिसमें उन्हीं अप्सराओं के हारों की किरणरूप ही स्वच्छ जल भरा हुआ हैं ऐसे आकाशरूपी सुंदर सरोवर में देवों के ऊपर जो चमरों के समूह ढोले जा रहे थे वे ठीक हंसों के समान जान पड़ते थे ।।60-61
The celestial sky appeared like a beautiful lake, where:
- The pairs of Chakravaka birds resided in the form of Apsaras’ saffron-stained breasts.
- The lotus flowers covering the lake were the radiant faces of the Apsaras.
- The blue lotuses shining within were their captivating eyes.
- The pure, shimmering water was formed by the lustrous rays of their pearl necklaces.
Amidst this ethereal scene, the fluttering chamars (fly-whisks) carried by the divine beings resembled graceful swans gliding over the lake. ( 60-61)
श्लोक 62 से 71
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