आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 |
श्लोक 222 से 231 योग के तत्त्व
योगवादी से योग, समाधि आदि पूछना चाहिए। योग काय, वचन, मन की क्रिया है। समाधि चित्त का स्थिर होना है। प्राणायाम योग का निग्रह है। धारणा बीजाक्षरों का अवधारण है। आध्यान भावनाओं का चिंतवन है। ध्येय शुद्ध आत्मतत्त्व है। स्मृति तत्त्वों का स्मरण है। ‘अर्हं’ बीज का ध्यान दुःख हरता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
इति तद्वचनं श्रुत्वा भगवान् स्माह गौतमः । यत्स्पृष्टं योगतत्वं वः कथयिष्यामि तत्स्फु टम् ॥ २२२॥
इस प्रकार उन ऋषियों के ये वाक्य सुनकर भगवान् गौतम स्वामी कहने लगे कि आप लोगों ने जो योगशास्त्र का तत्त्व अथवा रहस्य पूछा है उसे मैं स्पष्ट रूप से कहूँगा ।।222।।
Hearing these words of the sages, Bhagavan Gautam Swami began to speak:
“The essence and secrets of the science of yoga (meditation) that you have inquired about—I shall now explain them to you clearly.“( 222)
श्लोक ( Shlok ) 223 – 224
षड्भेद योगवादी यः सोऽनुयोज्यः समाहितैः। योगः कः किं समाधानं प्राणायामश्च कीदृशः ॥२२३॥
का धारणा किमाध्यानं किं ध्येयं कीदृशी स्मृतिः । किं फलं कानि बीजानि प्रत्याहारोऽस्य कीदृशः ॥ २२४॥
जो छह प्रकार से योगों का निरूपण करता है ऐसे योगवादी से विद्वान् पुरुषों को पूछना चाहिए कि योग क्या है समाधान क्या है ? प्राणायाम कैसा है ? धारणा क्या है ? आध्यान (चिंतवन) क्या है ? ध्येय क्या है ? स्मृति कैसी है ? ध्यान का फल क्या है ? ध्यान के बीज क्या हैं ? और इसका प्रत्याहार कैसा है ? ।।223-224।।
The wise should ask a yoga expert—one who explains yoga in six ways—the following questions:
- What is Yoga?
- What is Samadhān (spiritual resolution or concentration)?
- What is the nature of Prāṇāyāma (breath control)?
- What is Dhāraṇā (mental focus or retention)?
- What is Ādhyāna (deep contemplation or reflection)?
- What is the true object of meditation (Dhyeya)?
- What is Smṛti (spiritual remembrance or mindfulness)?
- What is the ultimate fruit of meditation?
- What are the seeds (causes or fundamental elements) of meditation?
- What is Pratyāhāra (withdrawal from distractions)?( 223–224)
श्लोक ( Shlok ) 225
कायवाङ्मनसां कर्म योगो योगविदां मतः । स शुभाशुभभेदेन भिन्नो द्वैविध्यमश्नुते ॥२२५॥
योग के जानने वाले विद्वान् काय, वचन और मन की क्रिया को योग मानते हैं, वह योग शुभ और अशुभ के भेद से दो भेदों को प्राप्त होता है ।।225।।
The wise who understand yoga define it as the activity of the body, speech, and mind.
This yoga is classified into two types based on its nature:
- Shubha Yoga (Auspicious Yoga) – leading to spiritual progress
- Ashubha Yoga (Inauspicious Yoga) – leading to karmic bondage( 225)
श्लोक ( Shlok ) 226
यत्सम्यकपरिणामेषु चित्तस्या धानमञ्जसा । स समाधिरिति ज्ञेयः स्मृतिर्वा परमेष्ठिनाम् ॥२२६॥
उत्तम परिणामों में जो चित्त का स्थिर रखना है यही यथार्थ में समाधि या समाधान कहलाता है अथवा पंच परमेष्ठियों के स्मरण को भी समाधि कहते हैं ।।226।।
To keep the mind steady in a state of pure thoughts is truly called Samādhi (spiritual absorption) or Samādhān (inner resolution).
Additionally, the remembrance of the Five Supreme Beings (Panch Parmesthi) is also referred to as Samādhi.( 226)
श्लोक ( Shlok ) 227
प्राणायामो भवेद् योगनिग्रहः शुभभावनः। धारणा श्रुतनिर्दिष्टबीजानामवधारणम् ॥२२७॥
मन, वचन और काय इन तीनों योगों का निग्रह करना तथा शुभभावना रखना प्राणायाम कहलाता है और शास्त्रों में बतलाये हुए बीजाक्षरों का अवधारणा करना धारणा कहलाती है ।।227।।
Controlling the three yogas—mind, speech, and body—while maintaining pure intentions is called Prāṇāyāma (breath and energy regulation).
Holding onto the sacred seed syllables (Bījākṣaras) as prescribed in the scriptures is known as Dhāraṇā (concentration and retention).( 227)
श्लोक ( Shlok ) 228
आध्यानं स्यादनुध्यानमनित्यत्वादिचिन्तनैः । ध्येयं स्यात् परमं तत्वमवाङ् मनसगोचरम् ॥२२८॥
अनित्यत्व आदि भावनाओं का बार-बार चिंतवन करना आध्यान कहलाता है तथा मन और वचन के अगोचर जो अतिशय बलद शुद्ध आत्मतत्त्व है वह ध्येय कहलाता है ।।228।।
Repeated contemplation on impermanence (Anityatva) and similar reflections is called Ādhyāna (deep contemplation).
The supremely pure and powerful essence of the soul, which is beyond the grasp of mind and speech, is known as the true object of meditation (Dhyeya).( 228)
श्लोक ( Shlok ) 229
स्मृतिर्जींवादितत्वानां याथात्स्यानुस्मृतिः स्मृता । गुणानुस्मरणं वा स्यात् सिद्धार्हत्परमेष्टिनाम् ॥२२९॥
जीव आदि तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप का स्मरण करना स्मृति कहलाती है अथवा सिद्ध और अर्हंत परमेष्ठी के गुणों का स्मरण करना भी स्मृति कहलाती है ।।229।।
The remembrance of the true nature of the soul (Jīva) and other fundamental realities (Tattvas) is called Smṛti (spiritual mindfulness).
Alternatively, contemplating the virtues of the Siddhas and Arhant Parmesthis is also known as Smṛti.(229)
श्लोक ( Shlok ) 230
फलं यथोक्तं बीजानिं वक्ष्यमाणान्यनुक्रमात् । प्रत्याहारस्तु तस्योपसंहृतो “चित्तनिर्वृतिः ॥२३०॥
ध्यान का फल ऊपर कहा जा चुका है, बीजाक्षर आगे कहे जायेंगे और मन की प्रवृत्ति का संकोच कर लेने पर जो मानसिक संतोष प्राप्त होता है उसे प्रत्याहार कहते हैं ।।230।।
The fruit of meditation (Dhyana) has already been explained, and the seed syllables (Bījākṣaras) will be described later.
Withdrawing the mind’s tendencies inward and attaining inner contentment is known as Pratyāhāra (withdrawal from distractions).( 230)
श्लोक ( Shlok ) 231
अकारादिहकारान्तरेफमध्यान्तबिन्दुकम् । ध्यायन् परमिदं बीजं मुक्त्यर्थी नावसीदति ॥२३१॥
जिसके आदि में अकार है अंत में हकार है मध्य में रेफ है और अंत में बिंदु है ऐसे अर्हं इस उत्कृष्ट बीजाक्षर का ध्यान करता हुआ मुमुक्षु पुरुष कभी भी दुःखी नहीं होता ।।231।।
The aspiring soul (Mumukshu) who meditates on the supreme seed syllable “Arhaṁ”—
- Which begins with ‘A’ (अ)
- Ends with ‘Ha’ (ह)
- Has ‘Ra’ (र) in the middle
- And concludes with a Bindu (ं)
Such a person never experiences sorrow.( 231)
श्लोक 232 से 242
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