श्रीवर्मा का वैराग्य और ललितांग का जन्म
श्रीवर्मा ने युगंधर मुनि से 5,000 राजाओं के साथ दीक्षा ली, सिंहनिष्क्रीडित और सर्वतोभद्र तप कर अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया। ललितांग च्युत होकर गंधर्वपुर में वासव और प्रभावती का पुत्र महीधर बना। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर विद्याओं में निपुण हुआ।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 22 to 32
श्लोक ( Shlok ) 22
ततो युगन्धरस्याम्ते रीक्षां जैनेश्वरीमहम् । नृपैर्दशसहस्रामितैः सार्द्धमुपादिषि ।॥२२।।
तत्पश्चात् मैंने श्री युगंधर मुनि के समीप पाँच हजार राजाओं के साथ जिनदीक्षा ग्रहण की ।।22।।
“After that, I, along with five thousand kings, received Jain initiation in the presence of Shri Yugandhar Muni.” (22)
श्लोक ( Shlok ) 23 – 24
यथाविधि तपस्तपवा सिंहनिष्कोडितं तपः । सुदुधरं महोदक्कं सर्वतोभद्रमप्यदः ॥२३॥
‘त्रिज्ञानबिमलालोकः कालान्ते प्रापमिन्द्रताम् । कल्पेऽच्युते ह्यनल्पों द्वाविंशत्यन्धिजीवितः ॥२४
और अत्यंत कठिन, किंतु उत्तम फल देनेवाले सिंहनिष्क्रीडित तथा सर्वतोभद्र नामक तप को विधिपूर्वक तपकर मति श्रुत अवधिज्ञानरूपी निर्मल प्रकाश को प्राप्त किया । फिर आयु के अंत में मरकर अनल्प ऋद्धियों से युक्त अच्युत नामक सोलहवें स्वर्ग में इंद्र पदवी प्राप्त की । वहाँं मेरी आयु बाईस सागर प्रमाण थी ।।23-24।।
“Then, I diligently practiced the extremely difficult yet highly rewarding penances called Siṁha-Niṣkrīḍita and Sarvatobhadra according to prescribed methods. As a result, I attained the pure light of Mati Jñāna, Śruta Jñāna, and Avadhi Jñāna. At the end of my lifespan, I passed away and was reborn with immense divine powers in the sixteenth heaven called Achyuta, where I attained the position of Indra. My lifespan there was equivalent to twenty-two Sāgaras.” (23-24)
श्लोक ( Shlok ) 25
दिव्याननुभवन् भोगान् तन्त्र कल्पे महाद्युतौ । गत्वा च जननीस्नेहात् ललिताङ्गमपूजयम् ।।२५।।
अत्यंत कांतिमान उस अच्युत स्वर्ग में मैं दिव्य भोगों को भोगता रहा । किसी दिन मैंने माता के स्नेह से ललितांग के समीप जाकर उसकी पूजा की ।।25।।
“In the exceedingly radiant Achyuta heaven, I continued enjoying divine pleasures. One day, driven by maternal affection, I approached Lalitāṅga and offered my reverence to him.” (25)
श्लोक ( Shlok ) 26
श्रीतिवर्द्धनमारोप्य विमानमतिभास्वरम् । नीस्वास्मस्कल्पमेवास्य कृतवानस्मि सरिक्रयाम् ।।२६।।
मैं उसे अत्यंत चमकीले प्रीतिवर्धन नाम के विमान में बैठाकर अपने स्वर्ग (सोलहवाँ स्वर्ग) ले गया और वहाँ उसका मैंने बहुत ही सत्कार किया ।।26।।
“I seated him in the extremely radiant celestial vehicle named Prītivardhana and took him to my heaven (the sixteenth heaven), where I honored him greatly.” (26)
श्लोक ( Shlok ) 27
स नो मातृचरस्तस्मिन् कस्पेऽनल्पसुखोदये । भोगाननुभवन् दिष्यामसकृच्च मयार्चितः ।।२७।।
इस प्रकार मेरी माता का जीव ललितांग, अत्यंत सुख संयुक्त स्वर्ग में दिव्य भोगों को भोगता हुआ जब तक विद्यमान रहा तब तक मैंने कई बार उसका सत्कार किया ।।27।।
“In this way, the soul of my mother, Lalitāṅga, continued enjoying divine pleasures in the heavenly abode filled with immense happiness. Throughout that time, I honored him on many occasions.” (27)
श्लोक ( Shlok ) 28 – 29
ललिताङ्गस्ततश्च्युत्वा जम्बूद्वीपस्य पूर्वके । विदेहे मङ्गलावत्यां रौप्यस्यामेरुदक्तटे ।।२८।।
गन्धर्वपुरनाथस्य वासवस्य खगेशिनः । सुनुरासीत् प्रभावस्य देव्यां नाम्ना महीधरः ।।२९।।
तदनंतर ललितांगदेव वहाँ से चयकर जंबूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में मंगलावती देश के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में गंधर्वपुर के राजा वासव विद्याधर के घर उसकी प्रभावती नाम की महादेवी से महीधर नाम का पुत्र हुआ ।।28-29।।
Afterward, Lalitāṅgadeva reincarnated from there and was born as Mahīdhara, the son of King Vāsava Vidyādhara of Gandharvapura, located on the northern range of Vijayārdha Mountain in the auspicious land of Maṅgalāvatī in the eastern Videha region of Jambūdvīpa. His mother was the great queen Prabhāvati.” (28-29)
श्लोक ( Shlok ) 30 – 32
महीधरे निजं राज्यमारं निक्षिप्य वासवः । निकटेऽरिश्रयाख्यस्य तप्त्या मुक्तावलीं तपः ॥३०।।
निर्वाणमगमत् पद्मावत्यायों च प्रभावती । समाश्रित्य तपस्तप्त्वा परं रत्नावलीमसौ ।।३१।।
अच्युतं कल्पमासाद्य प्रतीन्द्रपद्मागभूत् । महीधरोऽपि संसिद्धविधोऽभूद्दद्भुतोदयः ।।३२।।
राजा वासव अपना सब राज्यभार महीधर पुत्र के लिए सौंपकर तथा अरिंजय नामक मुनिराज के समीप मुक्तावली तप तपकर निर्वाण को प्राप्त हुए । रानी प्रभावती पद्यावती आर्यिका के समीप दीक्षित हो उत्कृष्ट रत्नावली तप तपकर अच्युत स्वर्ग में प्रतींद्र हुई और तब तक इधर महीधर भी अनेक विद्याओं को सिद्ध कर आश्चर्यकारी विभव से संपन्न हो गया ।।30-32।।
“King Vāsava entrusted the entire responsibility of his kingdom to his son Mahīdhara. He then practiced the Muktaavali penance under the guidance of Muni Arinjaya and attained Nirvana. Queen Prabhāvati took initiation under Āryikā Padmāvatī and performed the exalted Ratnāvali penance, after which she was reborn as a goddess in the Achyuta heaven. Meanwhile, Mahīdhara mastered numerous sciences and became endowed with astonishing prosperity and divine powers.” (30-32)
श्लोक 33 से 41
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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