भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122
श्लोक 123 से 133 श्रीमती का पूर्वभव स्मरण
श्रीमती ने पंडिता से कहा कि देवों के आगमन से पूर्वभव स्मृत हुआ। उसने धातकीखंड के गंधिला देश में पाटली ग्राम के वैश्य नागदत्त और सुमति की पुत्री निर्नामा के रूप में जन्म लिया था। चारणचरित वन में पिहितास्रव मुनि से पूछा कि वह दरिद्र कुल में क्यों जन्मी। मुनि ने उसकी कथा सुनाई।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 123 to 133
श्लोक ( Shlok ) 123
किंतु तेऽद्य पुरो नाहं जिहेम्यार्ता लपन्त्यलम् । जननीनिर्विशेषा त्वं चिरं परिचिता च मे ॥ १२३॥
किंतु आज मैं तुम्हारे सामने कहती हुई लज्जित नहीं होती हूँ उसका कारण भी है कि मैं इस समय अत्यंत दुःखी हो रही हूँ और: आप हमारी माता के तुल्य तथा चिरपरिचिता हैं ।।123।।
“However, today I do not feel ashamed to say this in front of you, and there is a reason for that — I am extremely distressed at this moment, and you are like a mother to us as well as a long-time acquaintance.”123
श्लोक ( Shlok ) 124
तद् वक्ष्ये शृणु सौम्याङ्गि महतीयं कथा मम । मया प्राग्जन्मचरितं स्मृतं देवागमेक्षणात् ॥१२४॥
इसलिए हे मनोहरांगि, सुन, मैं कहती हूँ । यह मेरी कथा बहुत बड़ी है । आज देवों का आगमन देखने से मुझे अपने पूर्वभव के चरित्र का स्मरण हो आया है ।।124।।
“Therefore, O beautiful one, listen as I speak. This is a very significant story of mine. Today, upon seeing the arrival of the gods, I was reminded of the events of my previous life.”124
श्लोक ( Shlok ) 125
तस्कीदृशं कथा वेति सर्व वक्ष्ये सविस्तरम् । स्वप्नानुभूतमिव मे स्मृतौ तत्प्रतिभासते ॥१२५॥
वह पूर्वभव का चरित्र कैसा है अथवा वह कथा कैसी है ? इन सब बातों को मैं विस्तार के साथ कहती हूँ । वह सब विषय मेरी स्मृति में अनुभव किये के समान स्पष्ट प्रतिभासित हो रहा है ।।125।।
“What is the nature of that past life, or what kind of story is it? I will narrate all of this in detail. All these events are appearing in my memory as vividly as if I have experienced them firsthand.”125
श्लोक ( Shlok ) 126 –130
अहं पूर्वभवेऽभूवं धातकीखण्डनामनि । महाद्वीपे सरोजाक्षि स्वर्गभूम्यतिशायिनि ॥१२६॥
तत्रास्ति मम् पूर्वाद् विदेहे प्रस्यगाश्रिते । विषयो गन्धिलाभिख्यो यः कुरूनवि निर्जयेत् ॥ १२७॥
तत्रासीत् पार्टलीग्रामे नागदत्तो वणिक्सुतः । सुमतिस्तस्य कान्ताभूत् तयोर्जाताः सुता इमे ॥१२८॥
नन्दश्व नन्दिमित्रश्व नन्दिषेणाह्वयः परः । वरसेनो जयादिश्च सेनस्तत्सूनवः क्रमात् ॥१२९।।
पुत्रिके च तयोर्जाति मदनश्रीपदादिके । कान्ते तयोरहं जाता निर्नामेति कनीयसी ॥१३०॥
हे कमलनयने, इसी मध्यलोक में एक धातकीखंड नाम का महाद्वीप है वनों अपनी शोभा से स्वर्गभूमि को तिरस्कृत करता है । इस द्वीप के पूर्व मेरु से पश्चिम दिशा की ओर स्थित विदेह क्षेत्र में एक गंधिला नाम का देश है जो कि अपनी शोभा से देवकुरु और उत्तरकुरु को भी जीत सकता है । उस देश में एक पाटली नाम का आम है उसमें नागदत्त नाम का एक वैश्य रहता था । उसकी स्त्री का नाम सुमति था और उन दोनों के क्रम से नंद, नंदिमित्र, नंदिषेण, वरसेन और जयसेन ये पाँच पुत्र तथा मदनकांता और श्रीकांता नाम की दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुई । पूर्वभव में मैं इन्हीं के घर निर्नामा नाम की सबसे छोटी पुत्री हुई थी ।।126-130।।
“O lotus-eyed one, in this very middle world exists a continent called Dhātakīkhaṇḍa, whose forests, with their beauty, surpass even the heavenly realms. In this continent, stretching from Mount Meru in the east to the western direction, lies the Videha region, home to a country named Gandhila. This country, with its splendor, could even surpass Devakuru and Uttarakuru.
In that land, there was a village named Pāṭalī, where a merchant named Nāgadatta lived. His wife’s name was Sumati, and they had five sons in order: Nanda, Nandimitra, Nandiṣeṇa, Varasena, and Jayasena. They also had two daughters named Madanakāntā and Śrīkāntā.
In my previous life, I was born in their house as their youngest daughter, named Nirnāma.”126-130
श्लोक ( Shlok ) 131 – 133
कदाचित् कानने रम्ये चरिते चारणादिके । गिरावम्बरपूर्वेऽहं तिलके पिहितास्स्रवम् ।।१३१।।
नानर्द्धिभूषणं दृष्ट्वा मुनिं सावधिबोधनम् । इदमप्राक्षमानम्य संबोध्य भगवन्निति।।१३२।।
केनास्मि कर्मणा जाता कुले दौर्गत्यशालिनि । ब्रूहोदमतिनिर्विष्णों दोनामनुगृहाण माम् ॥१३३।
किसी दिन मैंने चारणचरित नामक मनोहर वन में अंबरतिलक पर्वत पर विराजमान अवधिज्ञान से सहित तथा अनेक ऋद्धियों से भूषित पिहितास्रव नामक मुनिराज के दर्शन किये । दर्शन और नमस्कार कर मैंने उनसे पूछा कि हे भगवन्, मैं किस कर्म से इस दरिद्रकुल में उत्पन्न हुई हूँ । हे प्रभो, कृपा कर इसका कारण कहिए और मुझ दीन तथा अतिशय उद्विग्न स्त्री-जन पर अनुग्रह कीजिए ।।131-133।।
“One day, in the enchanting Charancharit forest, I came across a mountain called Ambaratilak, where a revered sage named Pihitasrava was seated. He was adorned with the power of clairvoyance (Avadhijnana) and many other divine abilities.
After offering my respects and bowing to him, I asked, ‘O Lord, by what karma was I born into this impoverished family? O Master, kindly reveal the reason for this and show your grace upon me, a poor and deeply distressed woman.'”131-133
श्लोक 134 से 141
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122
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