भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 ललितांगदेव की मृत्यु और पुनर्जन्म
ललितांगदेव ने धैर्य लिया, 15 दिन तक जिन-चैत्यालयों की पूजा की, और अच्युत स्वर्ग में चैत्यवृक्ष के नीचे नमस्कार मंत्र जपते हुए अदृश्य हुआ। जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश के उत्पलखेटक नगर में बज्रबाहु और वसुंधरा के पुत्र वज्रजंघ के रूप में जन्म लिया। वह शत्रुओं को संकुचित और बंधुओं को हर्षित करता हुआ यौवन तक बढ़ा।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
तत्पुण्यसाधने जैने शासने मतिमादधत् । विषादमुत्सृजानूनं येनानेना” भविष्यसि ॥२२॥
इसलिए पुण्य के साधनभूत जैनधर्म ही अपनी बुद्धि लगाकर खेद को छोड़िए, ऐसा करने से तुम निश्चय ही पापरहित हो जाओगे
“Therefore, engage your intellect in the practice of Jainism, which is the means of virtue, and abandon sorrow. By doing so, you will undoubtedly become free from sin.””
श्लोक ( Shlok ) 23
इति तद्वचनाद् धैर्यमवलम्थ्य स धर्मधीः । मासार्द्ध भुवने कृत्स्ने जिनवेस्मान्यपूजयत् ॥२३॥
इस प्रकार सामानिक देवों के कहने से ललितांगदेव ने धैर्य का अवलंबन किया, धर्म में बुद्धि लगायी और पंद्रह दिन तक समस्त लोक के जिन-चैत्यालयों की पूजा की ।।23।।
Thus, upon hearing the words of the Samanika gods, Lalitangadeva embraced patience, focused his intellect on righteousness, and for fifteen days, he worshipped all the Jain temples across the world.”
श्लोक ( Shlok ) 24 – 25
ततोऽच्युतस्य कल्पस्य जिनबिम्बानि पूजयन् । तच्चैत्यद्रममूलस्थः स्वायुरन्ते समाहितः ॥२४॥
नमस्कारपदान्युच्चैरनुध्यायनसाध्वसः । साध्वसौ मुकुलोकृत्य करौ प्रायाददृश्यताम् ॥२५॥
तत्पश्चात् अच्युत स्वर्ग की जिनप्रतिमाओं की पूजा करता हुआ वह आयु के अंत में वहीं सावधान चित्त होकर चैत्यवृक्ष के नीचे बैठ गया तथा वहीं निर्भय हो हाथ जोड़कर उच्चस्वर से नमस्कार मंत्र का ठीक-ठीक उच्चारण करता हुआ अदृश्यता को प्राप्त हो गया ।।24-25।।
“Afterwards, the incorruptible one, while worshiping the Jain idols of heaven, at the end of his life, sat with a focused mind beneath the sacred tree. There, with fearlessness, he joined his hands and, in a loud voice, recited the Namokar mantra correctly, and attained invisibility.”
श्लोक ( Shlok ) 26 – 27
जम्बुद्वीपे महामेरोविंदेहे पूर्वदिग्गते । या पुष्कलावतीत्यासीत् जानभूमिर्मनोरमा ॥२६॥
स्वर्गभूनिर्विशेषां तां पुरमुत्पलखेटकम् । भूषयस्युत्पलच्छणशालिवप्रादिसंपदा ॥२७॥
इसी जंबूद्वीप के महामेरु से पूर्व दिशा की ओर स्थित विदेह क्षेत्र में जो महामनोहर पुष्कलावती नाम का देश है वह स्वर्णभूमि के समान सुंदर है । उसी देश में एक उत्पलखेटक नाम का नगर है जो कि कमलों से आच्छादित धान के खेतों, कोट और परिखा आदि की शोभा से उस पुष्कलावती देश को भूषित करता रहता है ।।26-27।।
“In the Vidheha region, located to the east of Mount Meru in this Jambudvīpa, there is a beautiful land called Pushkalavati, which is as lovely as golden soil. In that land, there is a city named Utpalakhetaka, which adorns the Pushkalavati region with its fields of rice covered with lotuses, as well as the grandeur of its fortifications and moats.”
श्लोक ( Shlok ) 28
वज्रबाहुः पतिस्तस्य वज्रीवाज्ञापरोऽभवत् । कान्ता वसुन्धरास्यासोद् द्वितीयेव वसुन्धरा ॥२८
उस नगरी का राजा बज्रबाहु था जो कि इंद्र के समान आज्ञा चलाने में सदा तत्पर रहता था । उसकी रानी का नाम वसुंधरा था । वह वसुंधरा सहनशीलता आदि गुणों से ऐसी शोभायमान होती थी मानो दूसरी वसुंधरा पृथिवी ही हो ।।28।।
“The king of that city was Vajrabahu, who was always ready to command with the authority of Indra. His queen’s name was Vasundhara. She was adorned with qualities such as forbearance, and shone so brilliantly that she seemed like another Vasundhara, the very Earth itself.”
श्लोक ( Shlok ) 29
तयोः सूनुरभूद्दे वो ललिताङ्गस्ततश्च्युतः । वज्रजङ्ग इति ख्यातिं दधदन्वर्थतां गताम् ॥२९॥
ललितांग नाम का व स्वर्ग च्युत होकर उन्हीं वज्रबाहु और वसुंधरा के, वज्र के समान जंघा होने से ‘वज्रजंघ’ इस सार्थक नाम को धारण करने वाला पुत्र हुआ ।।29।।
“A son named Vajrajangha, who had thighs as strong as a diamond, was born to Vajrabahu and Vasundhara, after Lalitang, who had fallen from heaven. This son came to be known by the meaningful name ‘Vajrajangha’.”
श्लोक ( Shlok ) 30
स बन्धुकुमुदानन्दी प्रत्यहं वर्द्धयन् कलाः । संकोचयन् द्विषत्पद्मान् ववृधे बालचन्द्रमाः ॥ ३०।
वह वज्रजंघ शत्रुरूपी कमलों को संकुचित करता हुआ बंधुरूपी कुमुदों को हर्षित (विकसित) करता था तथा प्रतिदिन कलाओं (चतुराई, पक्ष में चंद्रमा का सोलहवाँ भाग) की वृद्धि करता था इसलिए द्वितीया के चंद्रमा के समान बढ़ने लगा ।।30।।
Vajrajangha, while constricting the enemy-like lotuses, made the friend-like lotuses blossom with joy, and daily increased in his arts (such as cleverness and the sixteenth part of the moon in his favor). Thus, he began to grow like the moon on the second day.”
श्लोक ( Shlok ) 31
आरुढयौवनस्यास्य रूपसंपदनीदृशी । जाता कान्तिरिवापूर्णमण्डलस्य निशाकृतः ॥३१॥
जब वह यौवन अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसकी रूपसंपत्ति अनुपम हो गयी जैसे कि चंद्रमा क्रम-क्रम से बढ़कर जब पूर्ण हो जाता है तब उसकी कांति अनुपम हो जाती है ।।31।।
“When he reached the age of youth, his beauty became incomparable, just as the moon, gradually waxing, becomes flawless when it reaches its full form.”
श्लोक 32 से 41
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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