नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481 | श्लोक 482 से 491
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 492 to 497
श्लोक ( Shlok ) 492
पाताभिधातचलिताचलसन्धिबन्धः । आपत्य खादशनिवद्भुवमात्मपाद-वल्गन्मुहुः परिसरत्प्रविजृम्भमाणः सिन्दूररञ्जितभुजौ चलयनुदग्रौ ॥ ४९२ ॥
फिर आकाशसे वज्रकी भाँति पृथिवी पर आये, उन्होंने अपने पैर पटकनेकी चोटसे पर्वतोंके सन्धि-बन्धनको शिथिल कर दिया, वे बराबर गर्जने लगे, इधर-उधर दौड़ने लगे और सिन्दूरसे रंगी अपनी दोनों भुजाओंको चलाने लगे ॥४९२।।
“Then, he plunged from the sky onto the earth like a thunderbolt. With the powerful impact of his stomping feet, he loosened the very joints of the mountains. He roared continuously, sprinted here and there, and began swinging his long arms, which were smeared with vermilion (sindoor).” || 492 ||
श्लोक ( Shlok ) 493
क्रुद्धः कटीद्वितयपार्श्वविलम्बिपीत-वस्त्रो नियुद्धकुशलं प्रतिमलमुग्रम् ।चाणूरमन्त्रिशिखरोन्नतमापतन्त-‘मासाद्य सिंहवदिभं सहसा बभासे ॥ ४९३ ॥
उस समय वे अत्यन्त कुपित थे, उनकी कमरके दोनों ओर पीत वस्त्र बँधा हुआ था, और जिस प्रकार सिंह हाथीको मार कर सुशोभित होता है उसी प्रकार वे बाहु-युद्धमें कुशल, अतिशय दुष्ट और पहाड़की शिखरके समान ऊँचे प्रतिद्वन्दी चाणूर मल्लको सहसा मार कर सुशोभित हो रहे थे ॥४९३।।
“At that moment, he was exceedingly furious, with his yellow garment (pitambara) wrapped tightly around both sides of his waist. And just as a lion looks magnificent after slaying an elephant, he too looked splendid after suddenly destroying his opponent, Chanoora—a wrestler highly skilled in hand-to-hand combat, utterly wicked, and as towering as a mountain peak.” || 493 ||
श्लोक ( Shlok ) 494
दृष्ट्वैनं रुधिरोद्गमोग्रनयनो योद्धं स्वयं मल्लतां सम्प्राप्यापतदुग्रसेनतनयो जन्मान्तरद्वेषतः ।तं व्योन्नि भ्रमयन्करेण चरणे संगृह्य वाल्पाण्डजं भूमौ नेतुमुपान्तमन्तकविभोः कृष्णः समास्फालयत् ॥ ४९४ ॥
यह देख, खूनके निकलनेके-से जिसके नेत्र अत्यन्त भयंकर हो रहे हैं ऐसा कंस स्वयं जन्मान्तरके द्वेषके कारण मल्ल बन कर युद्धके लिए रंगभूमिमें आ कूदा, श्रीकृष्णने हाथसे उसके पैर पकड़ कर छोटेसे पक्षीकी तरह पहले तो उसे आकाश में घुमाया और फिर यमराजके पास भेजनेके लिए जमीन पर पछाड़ दिया ॥ ४९४ ॥
“Seeing this, Kansa—whose eyes had turned terrifyingly blood-red with fury—leaped into the arena himself to fight as a wrestler, driven by an animosity spanning past lifetimes. Shri Krishna grabbed him by his feet with his bare hands, whirled him around in the air like a small bird, and then slammed him violently onto the ground to dispatch him to the realm of Yama (the God of Death).” || 494 ||
श्लोक ( Shlok ) 495
आपेतुर्नभसस्तदा सुमनसो देवानकैर्दध्वने स्वारावो वसुदेवसैन्यजलधौ प्रक्षोभणादुद्ङ्गतः ।सीरी वीरवरो विरुद्धनृपतीनाक्रम्य रङ्गे स्थितः स्वीकृत्याप्रतिमलमाप्तविजयं शौयोंजितं स्वानुजम् ॥ ४९५ ॥
उसी समय आकाशसे फूल बरसने लगे, देवोंके नगाड़ोंने जोरदार शब्द किया, वसुदेवकी सेनामें क्षोभके कारण बहुत कलकल होने लगा, और वीर शिरोमणि बलदेव, पराक्रमसे सुशोभित, विजयी तथा शत्रु रहित छोटे भाई कृष्णको आगे कर विरुद्ध राजाओं पर आक्रमण करते हुए रङ्गभूभिमें जा डटे ॥ ४९५ ॥
“At that very moment, flowers began raining down from the heavens, the drums of the gods resounded loudly, and a massive uproar arose from the excitement within Vasudeva’s army. Then Baladeva—the crest-jewel of warriors—placing his victorious, supremely powerful, and now foe-less younger brother Krishna at the forefront, marched aggressively against the opposing kings and firmly held his ground in the arena.” || 495 ||
श्लोक ( Shlok ) 496
अतुलबलमलङ्घयारातिमत्तेभघाता-कुपित हरिसमानं माननीयापदानम् ।सपदि समुपयाता वन्दिभिर्वन्यमानं जनितसकलरागं तं हरिं वीरलक्ष्मीः ॥ ४९६ ॥
जिनका बल अतुल्य है, जो अलङ्घनीय शत्रु रूपीमत्त हाथियोंके घातसे कुपित सिंहके समान हैं, जिनका पराक्रम माननीय है, बन्दीगण जिनकी स्तुति कर रहे हैं और जिन्होंने सब लोगोंको हर्ष उत्पन्न किया है ऐसे श्रीकृष्णके समीप वीरलक्ष्मी सहसा ही पहुँच गई ।॥ ४९६ ॥
“The Goddess of Heroic Victory (Veera-Lakshmi) instantly approached Shri Krishna—he whose strength is incomparable, who resembles a furious lion attacking unyielding rogue elephants in the form of his enemies, whose valor is highly revered, whose praises are sung by the bards, and who has brought immense joy to everyone.” || 496 ||
श्लोक ( Shlok ) 49
दूतीव मे श्रितवती वरवीश्लक्ष्मी-रेतस्य दक्षिणभुजं विजयैकगेहम् ।प्राप्तं पतिं चिरतरादिति तं कटाक्षै-रैक्षिष्ट रागतरलैर्भरतार्धलक्ष्मीः ॥ ४९७ ॥
मेरी दूतीके समान श्रेष्ठ वीरलक्ष्मी इनकी विजयी दाहिनी भुजाको प्राप्त कर चुकी है, इसलिए आधे भरत क्षेत्रकी लक्ष्मी भी चिरकालसे प्राप्त हुए उन श्रीकृष्ण रूपी पतिको रागके द्वारा चञ्चल कटाक्षोंसे देख रही थी ।। ४९७ ॥
“The supreme Goddess of Victory (Veera-Lakshmi), acting like my messenger, has already embraced his victorious right arm; hence, the sovereignty (Lakshmi) of half the Bharata region (Bharata-kshetra) was also gazing upon her long-destined husband, Shri Krishna, with playful, affectionate glances born of deep love.” || 497 ||
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे नेमिस्वामिचरिते कृष्णविजयो नाम सप्ततितमं पर्व ॥ ७० ॥
“Thus ends the seventieth chapter, describing the victory of Shri Krishna, within the life story of Lord Neminatha (Neminatha Swami ke Charitra), under the compendium of the ‘Trishashti-Lakshana Mahapurana’ composed by the venerable Acharya Gunabhadra, following the tradition of the ancient seers.” || 70 ||
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481 | श्लोक 482 से 491
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