मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 53 to 62
श्लोक ( Shlok ) 53
बोधिता इव देवेन्द्राः सर्वे ज्ञानेन तेन ते । सम्भूयागत्य तत्पूजामकुर्वन् सर्ववेदिनः ॥ ५३ ॥
उसी केवलज्ञानसे मानो जिन्हें प्रबोध प्राप्त हुआ है ऐसे समस्त इन्द्रोंने एक साथ आकर उन सर्वज्ञ भगवान्की पूजा की ॥ ५३ ॥
“As if awakened by that very omniscience (Kevalajnana), all the Indras arrived simultaneously and worshipped the All-Knowing, Omniscient Lord. || 53 ||”
श्लोक ( Shlok ) 54 – 57
अष्टाविंशतिरस्यासन् विशाखाद्या गणाधिपाः । स्वपञ्चेन्द्रियमानोक्ता मुनयः पूर्वधारिणः ॥ ५४ ॥शून्यत्रितयरन्ध्रद्विप्रोक्तसङख्यानशिक्षकाः । द्विशतद्विसहस्त्रोक्ततृतीयावगमस्तुताः ॥ ५५ ॥तावन्तः पञ्चमज्ञानाः खद्वयाब्ध्येकवादिनः । शून्यद्वयनवद्वयुक्तविक्रियद्धिविभूषिताः ॥ ५६ ॥शून्यपञ्चमुनी ‘न्दैकमनःपर्ययबोधनाः । चत्वारिंशत्सहस्त्राणि सर्वे सङ्कलनां श्रिताः ॥ ५७ ॥
उनके समवसरणमें विशाखको आदि लेकर अट्ठाईस गणधर थे, पाँच सौ पचास पूर्वधारी थे, उनतीस हजार शिक्षक थे, दो हजार दो सौ पूज्य अवधिज्ञानी थे, इतने ही केवलज्ञानी थे, एक हजार चार सौ वादी थे, दो हजार नौ सौ विक्रिया ऋद्धिसे विभूषित थे और एक हजार सात सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी थे। इस प्रकार सब मिलाकर चालीस हजार मुनिराज उनके साथ थे ।। ५४-५७ ।।
“In His Samavasarana (divine assembly), there were twenty-eight Ganadharas (chief disciples) headed by Vishakha, five hundred and fifty Purvadharas (scholars of the ancient Purva texts), twenty-nine thousand teachers, two thousand two hundred revered Avadhijnanis (possessors of clairvoyant knowledge), an equal number of Kevalajnanis (omniscient beings), one thousand four hundred Vadis (disputants/debaters), two thousand nine hundred adorned with Vikriya Riddhi (the supernatural power of transformation), and one thousand seven hundred and fifty Manahparyayajnanis (possessors of mind-reading knowledge). Thus, in total, forty thousand holy monks accompanied Him. || 54-57 ||”
श्लोक ( Shlok ) 58 – 59
खत्रयेन्द्रियपञ्चोक्ता बन्धुषेणादिकार्यिकाः । श्रावकाः लक्षमाः प्रोक्ताः श्राविकास्त्रिगुणास्ततः॥ ५८॥देवा देव्यस्स्त्वसङ्ख्याताः अगण्या कण्ठीरवादयः । एवं द्वादशभिर्देवो गणैरेभिः परिष्कृतः ॥ ५९॥
बन्धुषेणाको आदि लेकर पचपन हजार आर्यिकाएँ थीं, श्रावक एक लाख थे और श्राविकाएँ तीन लाख थीं, देव-देवियाँ असंख्यात थीं, और सिंह आदि तिर्यञ्च संख्यात थे। इस प्रकार मल्लिनाथ भगवान् इन बारह सभाओंसे सदा सुशोभित रहते थे ।। ५८-५९ ॥
“There were fifty-five thousand Aryikas (ascetic nuns) headed by Bandhushena, one hundred thousand Shravakas (laymen), and three hundred thousand Shravikas (laywomen). The Devas and Devis (celestial beings) were innumerable (Asankhyata), and the Tiryanchas (animals), such as lions and others, were numerable (Sankhyata). In this manner, Lord Mallinatha was eternally graced and adorned by these twelve assemblies. || 58-59 ||”
श्लोक ( Shlok ) 60
मुक्तिमार्ग नयन् भव्यपथिकान् प्रथितध्वनिः । विजहार महादेशान् भव्यसत्त्वानुरोधतः ॥ ६० ॥
जिनकी दिव्य ध्वनि अत्यन्त प्रसिद्ध है ऐसे भगवान् मल्लिनाथने भव्य जीवरूपी पथिकोंको मुक्तिमार्गमें लगाते हुए, भव्य जीवोंके अनुरोधसे अनेक बड़े-बड़े देशोंमें विहार किया था ।। ६० ।।
“Lord Mallinatha, whose divine voice (Divya Dhvani) is immensely renowned, guided the fortunate souls (Bhavya Jivas), who are like travelers on a journey, onto the path of liberation. At the earnest request of these pious souls, He wandered (Vihara) through many grand and vast regions. || 60 ||”
श्लोक ( Shlok ) 61 – 62
ततो मासावशेषायुः सम्मेदाचलमाश्रितः । प्रतिमायोगमादाय मुनिभिः सह पञ्चभिः ॥ ६१ ॥सहस्त्रैर्ध्यानमास्थाय भरण्यां पूर्वरात्रतः । फाल्गुनोज्ज्वलपञ्चम्यां तनुवातं समाश्रयत् ॥ ६२ ॥
जब उनकी आयु एक माहकी बाकी रह गई तब वे सम्मेदाचल पर पहुंचे। वहाँ पाँच हजार मुनियोंके साथ उन्होंने प्रतिमायोग धारण किया और फाल्गुन शुक्ला सप्तमीके दिन भरणी नक्षत्रमें सन्ध्याके समय तनुवात वलय – मोक्षस्थान प्राप्त कर लिया ।। ६१-६२ ॥
“When only one month of His lifespan remained, He arrived at Mount Sammedachala. There, along with five thousand monks, He assumed the Pratima-yoga (motionless meditative posture). On the seventh day of the bright half of the month of Phalguna (Phalguna Shukla Saptami), under the Bharani Nakshatra in the evening hours, He transcended the Tanuvata-valaya and attained the ultimate state of liberation (Moksha). || 61-62 ||”
श्लोक 63 से 71
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 192
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