धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 53 to 61
श्लोक ( Shlok ) 53
तदामृताशनाधीशाः सहसाऽऽगत्य सर्वतः । कृत्वा निर्वाणकल्याणमवन्दिषत तं जिनम् ॥ ५३ ॥
उसी समय सब ओरसे देवोंने आकर निर्वाण कल्याणकका उत्सव किया तथा वन्दना की ॥ ५३ ॥
“At that very moment, gods arrived from all directions, celebrated the auspicious occasion of the Nirvana (Nirvana Kalyanaka), and offered their obeisances.” || 53 ||
श्लोक ( Shlok ) 54
निर्जित्य दशरथः स रिपून्नृपोन्त्याहमिन्द्रतां गत्वा । धर्मः स पातु पापैर्धर्मा युधि यस्य दशरथायन्ते ॥ ५४ ॥
जो पहले भवमें शत्रुओंको जीतनेवाले दशरथ राजा हुए, फिर अहमिन्द्रताको प्राप्त हुए तथा जिनके द्वारा कहे हुए दश धर्म पापोंके साथ युद्ध करनेमें दश रथोंके समान आचरण करते हैं वे धर्मनाथ भगवान् तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ५४ ॥
“May Lord Dharmanatha protect you all—He who was King Dasharatha, the conqueror of enemies in a previous birth, who then attained the status of an Ahamindra (a supreme celestial being), and whose ten-fold righteousness (Dasha Dharma) acts like ten chariots in battling against sins.” || 54 ||
श्लोक ( Shlok ) 55
निहतसकलघाती निश्चलाग्रावबोधो गदितपरमधर्मो धर्मनामा जिनेन्द्रः । त्रितयतनुविनाशा निर्मलः शर्मसारो दिशतु सुखमनन्तं शान्तसर्वात्मको वः ॥ ५५ ॥
जिन्होंने समस्त घातिया कर्म नष्ट कर दिये हैं, जिनका केवलज्ञान अत्यन्त निश्चल है, जिन्होंने श्रेष्ठ धर्मका प्रतिपादन किया है, जो तीनों शरीरोंके नष्ट हो जानेसे अत्यन्त निर्मल है, जो स्वयं अनन्त सुखसे सम्पन्न है और जिन्होंने समस्त आत्माओंको शान्त कर दिया है ऐसे धर्मनाथ जिनेन्द्र तुम सबके लिए अनन्त सुख प्रदान करें ।॥ ५५॥
“May Lord Dharmanatha Jinendra grant eternal bliss to you all—He who has destroyed all Ghatiya Karmas (destructive karmas), whose Kevalajnana (omniscience) is perfectly unshakeable, who has propounded the supreme Dhamma, who is utterly pure due to the dissolution of the three bodies, who is himself endowed with infinite bliss, and who has brought peace to all souls.” || 55 ||
श्लोक ( Shlok ) 56
अस्मिन्नेवाभवत्तीर्थे बजः श्रीमान् सुदर्शनः । केशवः सिंहशब्दान्तपुरुषः परिषद्धलः ॥ ५६ ॥
अथानन्तर इन्हीं धर्मनाथ भगवान् के तीर्थमें श्रीमान् सुदर्शन नामका बलभद्र तथा सभामें सबसे बलवान् पुरुषसिंह नामका नारायण हुआ ॥ ५६ ॥
“Thereafter, during the spiritual reign (Teertha) of this very Lord Dharmanatha, there arose the illustrious Balabhadra named Shri Sudarshana, and the Purushasimha (lion among men) named Narayana, who was the most powerful warrior in the assembly.” || 56 ||
श्लोक ( Shlok ) 57 – 58
तयोराख्यानकं वक्ष्ये भवत्रयसमाश्रयम् । इह राजगृहे राजा सुमित्रो नाम गर्वितः ॥ ५७ ॥’महामल्लो बहून् जित्वा लब्धपूजः परीक्षकैः । तृणायमन्यमानोऽन्यानमाद्यद् दुष्टदन्तिवत् ॥ ५८ ॥
अतः यहाँ उनका तीन भवका चरित कहता हूं। इसी राजगृह नगरमें राजा सुमित्र राज्य करता था, वह बड़ा अभिमानी था, बड़ा मल्ल था, उसने बहुत मल्लोंको जीत लिया था इसलिए परीक्षक लोग उनकी पूजा किया करते थे- उसे पूज्य मानते थे, वह सदा दूसरोंको तृणके समान तुच्छ मानता था, और दुष्ट हाथीके समान मदोन्मत्त था ।। ५७-५८ ॥
“Therefore, I shall now narrate the account of their three previous incarnations (Bhavas). In this very city of Rajagriha, there ruled a king named Sumitra. He was immensely proud and a formidable wrestler, who had defeated numerous other wrestlers, earning him the deep respect and adoration of the judges. He constantly looked down upon others as if they were mere blades of grass, and was completely intoxicated with pride, much like a rogue elephant.” || 57-58 ||
श्लोक ( Shlok ) 59
कदाचिद्राजसिंहाख्यः महीनाथो मदोद्धतः । तद्दर्पशातनायागात्तां पुरीं मल्लयुद्धवित् ॥ ५९ ॥
किसी समय मदसे उद्धत तथा मल्लयुद्धको जानने वाला राजसिंह नामका राजा उसका गर्व शान्त करनेके लिए राजगृह नगरी में आया ।॥ ५९ ॥
“Once upon a time, a king named Rajasimha, who was arrogant with pride and highly skilled in the art of wrestling, arrived in the city of Rajagriha to shatter King Sumitra’s conceit.” || 59 ||
श्लोक ( Shlok ) 60
सुमित्रस्तेन रङ्गस्थो निर्जितः सुचिराद्यथा । उत्खातदन्तदन्तीव तदास्थादतिदुःखितः ॥ ६० ॥
उसने बहुत देर तक युद्ध करनेके बाद रङ्गभूमिमें स्थित राजा सुमित्र को हरा दिया जिससे वह दाँत उखाड़े हुए हाथी-के समान बहुत दुःखी हुआ ।। ६० ।।
“After fighting for a long time, King Rajasimha defeated King Sumitra in the wrestling arena (Rangabhumi), leaving Sumitra deeply dejected, much like an elephant whose tusks have been violently uprooted.” || 60 ||
श्लोक ( Shlok ) 61
मानभङ्गेन भन्नः सन्नसौ राज्यभराक्षमः । नियुक्तवान् सुतं राज्ये मानप्राणा हि मानिनः ॥ ६१ ॥
मान भङ्ग होनेसे उसका हृदय एकदम टूट गया, वह राज्या भार धारण करनेमें समर्थ नहीं रहा अतः उसने राज्य पर पुत्रको नियुक्त कर दिया सो ठीक ही है; क्योंकि मान ही मानियोंके प्राण हैं ॥ ६१ ॥
“With his pride utterly shattered, his heart broke completely, and he was no longer capable of bearing the burden of the kingdom. Consequently, he appointed his son to the throne—which is only fitting, for self-respect alone is the very life-breath of the proud.” || 61 ||
श्लोक 62 से 71
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धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52
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