अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 43 to 51
श्लोक ( Shlok ) 43
सदसद्वादसद्भावमाविष्कुर्वन्ननन्तजित् । विहृत्य विश्रुतान् देशान् विनेयान्योजयन् पथि ॥ ४३ ॥
पदार्थ कथंचित् सद्रूप है और कथंचिद् असद्रूप है इस प्रकार विधि और निषेध पक्षके सद्भावको प्रकट करते हुए भगवान् अनन्तजित् ने प्रसिद्ध देशोंमें विहार कर भव्य जीवोंको सन्मार्गमें लगाया ॥ ४३ ॥
“Expounding that a substance is in some respect existent (Sat) and in some respect non-existent (Asat)—thus revealing the coexistence of both the affirmative and negative perspectives—Lord Anantajit wandered through many famous lands, guiding worthy souls (Bhavya Jivas) toward the path of righteousness.”43
श्लोक ( Shlok ) 44 – 45
सम्मेदगिरिमासाद्य विहाय विहृतिं स्थितः । मासं शताधिकैः षद्भिः सहस्त्रैः मुनिभिः सह ॥ ४४ ॥प्रतिमायोगधारी सन्नमावस्याग्ररात्रिभाक् । तुरीयध्यानयोगेन सम्प्रापत्परमं पदम् ॥ ४५ ॥
अन्तमें सम्मेद शिखर पर जाकर उन्होंने विहार करना छोड़ दिया और एक माहका योग निरोध कर छह हजार एकसौ मुनियोंके साथ प्रतिमा योग धारण कर लिया। तथा चैत्र कृष्ण अमावास्याके दिन रात्रिके प्रथम भागमें चतुर्थ शुक्त ध्यानके द्वारा परमपद प्राप्त किया ।। ४४-४५ ॥
“Finally, having reached Sammeta Shikhar, He ceased His wanderings. After one month of Yoga-nirodha (restraining all mental, vocal, and physical activities), He entered the Pratima-yoga posture along with six thousand one hundred monks. Then, during the first part of the night on the new moon day of the dark fortnight of Chaitra (Chaitra Krishna Amavasya), He attained the Supreme State (Param-pada) through the fourth stage of Pure Meditation (Shukla-dhyana).”44 – 45
श्लोक ( Shlok ) 46
सद्यो’ घुसत्समूहोऽपि सम्प्राप्यान्त्येष्टिमादरात् । विधाय विधिवत्स्वौकः स्वर्लोकं सर्वतो ययौ ॥४६॥
उसी समय देवोंके समूहने आकर बड़े आदरसे विधिपूर्वक अन्तिम संस्कार किया और यह सब क्रिया कर वे सब ओर अपने-अपने स्थानों पर चले गये ॥ ४६ ॥
“At that very moment, the hosts of gods arrived and performed the final rites (Antim Sanskar) with great reverence and according to the sacred traditions; having completed all these ceremonies, they departed in all directions to their respective abodes.”46
श्लोक ( Shlok ) 47
कुनयघनतमोऽन्धं कुश्रुतोलुकविद्विट् सुनयभयमयूखैः विश्वमाशु प्रकाश्य । प्रकटपरमदीप्तिर्बोधयन् भव्यपग्नान् प्रदहतु स जिनेनोऽनन्तजिद् दुष्कृतं वः ॥ ४७ ॥
जिन्होंने मिथ्या नयरूपी सघन अन्धकारसे भरे हुए समस्त लोकको सम्यङ नयरूपी किरणोंसे शीघ्र ही प्रकाशित कर दिया है, जो मिथ्या शास्त्ररूपी उल्लुओंसे द्वेष करनेवाले हैं, जिनकी उत्कृष्ट दीप्ति अत्यन्त प्रकाशमान है और जो भव्य जीवरूपी कमलोंको विकसित करनेवाले हैं ऐसे श्री अनन्तजित् भगवान् रूपी सूर्य तुम सबके पापको जलावें ।॥ ४७ ॥
“The Lord Anantajit, acting as a divine Sun, has swiftly illuminated the entire world—which was otherwise filled with the dense darkness of false perspectives (Mithya-naya)—with the radiant rays of right perspectives (Samyak-naya). He bears a natural ‘enmity’ toward the owls of false scriptures and possesses a supreme, brilliant splendor. May He, who causes the lotus-like worthy souls (Bhavya Jivas) to blossom, burn away all your sins.”47
श्लोक ( Shlok ) 48
प्राक्पालकः प्रथितपद्मरथः पृथिव्याः ४ पश्चाद्विनिश्चितमतिस्तपसाच्युतेन्द्रः । तस्माच्च्युतोऽभवदनन्तजिदन्तकान्तो यः सोऽवताद् द्रुतमनन्तभवान्तकाद् वः ॥ ४८ ॥
जो पहले पद्मरथ नामके प्रसिद्ध राजा हुए, फिर तपके प्रभावसे निःशङ्क बुद्धिके धारक अच्युतेन्द्र हुए और फिर वहाँसे चयकर मरण-को जीतनेवाले अनन्तजित् नामक जिनेन्द्र हुए वे अनन्त भवोंमें हानेवाले मरणसे तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ४८ ॥
“He who was first the renowned King named Padmaratha, then through the power of his penance became the celestial Achyutendra (the Lord of the Achyuta heaven) possessing an unwavering intellect, and thereafter, descending from that realm, became the Lord Anantajit who conquered death—may He protect you all from the cycle of death occurring across infinite births.” 48
श्लोक ( Shlok ) 49
तत्रैव सुप्रभो रामः केशवः पुरुषोत्तमः । व्यावर्ण्यते भवेपूष्चैः त्रिषु वृत्तकमेतयोः ॥ ४९ ॥
अथानन्तर–इन्हीं अनन्तनाथके समय में सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नामक नारायण हुए हैं इसलिए इन दोनोंके तीन भवोंका उत्कृष्ट चरित्र कहता हूँ ॥ ४९ ॥
“Thereafter—it was during the era of this very Lord Anantanatha that Suprabha Balabhadra and Purushottama Narayana emerged. Therefore, I shall now narrate the illustrious life-stories of these two, spanning their three incarnations.”49
श्लोक ( Shlok ) 50
एतस्मिन् भारते वर्षे पोदनाधिपतिः नृपः । वसुषेणो महादेवी तस्य नन्देत्यनिन्दिता ॥ ५० ॥
इसी भरत क्षेत्रके पोदनपुर नगरमें राजा वसुषेण रहते थे उनकी महारानीका नाम नन्दा था जो अतिशय प्रशंसनीय थी ॥ ५० ॥
“In the city of Podanpur within this very Bharat Kshetra, lived King Vasusena. His Chief Queen was named Nanda, who was exceedingly praiseworthy.”50
श्लोक ( Shlok ) 51
देवी पञ्चशतेऽप्यस्यां स राजा प्रेमनिर्भरः । रेमे वसन्तमञ्जर्या चञ्चरीक इवोत्सुकः ॥ ५१ ॥
उस राजा के यद्यपि पाँच सौ स्त्रियाँ थी तो भी वह नन्दाके ऊपर ही विशेष प्रेम करता था सो ठीक ही है क्यों कि वसन्त ऋतु में अनेक फूल होने पर भी भ्रमर आम्रमंजरी पर ही अधिक उत्सुक रहता है ।। ५१ ।।
“Although that King had five hundred wives, he held a special and singular affection for Queen Nanda. This is only fitting; for even though the Spring season brings forth a multitude of flowers, the honeybee remains most eagerly drawn to the mango blossoms (Amramanjari).”51
श्लोक 52 से 61
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