नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 376 to 392
श्लोक ( Shlok ) 376
जीवद्यशाश्च तत्सर्वमवधार्य यथाश्रुतम् । गत्वा बुद्धिमती कंसं मिथः समवबोधयत् ॥३७६॥
जीवयशा इन सुनी हुई बातोंका विचार कर कंसके पास गई और उसे परस्परमें सब समझा आई ॥ ३७६ ॥
“Reflecting upon these words she had heard, Jivayasha went to Kansa and explained everything to him thoroughly.” 376
श्लोक ( Shlok ) 377
हासेनापि मुनिप्रोक्तमवन्ध्यमिति भीतिमान् । वसुदेवमहीशं स स्नेहादिदमयाचत ॥ ३७७॥
‘मुनि जो बात हँसीमें भी कह देते हैं वह सत्य निकलती है’ यह विचार कर कंस डर गया और राजा बसुदेवके पास जाकर बड़े स्नेहसे याचना करने लगा कि आपकी आज्ञासे प्रसूतिके समय देवकी हमारे ही घर आकर प्रसूतिकी पूरी विधि करे ।। ३७७ ।।
“Reflecting that ‘whatever a sage says, even in jest, turns out to be true,’ Kansa became terrified. He went to King Vasudeva and, with great affection, began to beg: ‘By your command, when it is time for her delivery, let Devaki come to our house and complete the entire process of childbirth here.'” 377
श्लोक ( Shlok ) 378 – 379
प्रसूतिसमयेऽवाप्य देवकी मद्गृहान्तरम् । प्रसूतिविधिपर्याप्तिं विदध्यात्त्वन्मतादिति ॥३७८॥सोऽपि तेनोपरुद्धः संस्तथात्वेतदमंस्त तम् । अवश्यम्भाविकार्येषु मुह्यन्त्यपि मुनीश्वराः ॥३७९॥
कंसके अनुरोधसे वसुदेवने भी ‘ऐसा ही होगा’ यह कहकर उसकी बात मान ली सो ठीक ही है क्योंकि अवश्यम्भावी कार्योंमें मुनिराज भी भूल कर जाते हैं ।॥ ३७८-३७९ ।।
“At Kansa’s request, Vasudeva also accepted his word, saying, ‘So shall it be.’ And this is only natural, for when it comes to events that are absolutely predestined, even great sages can make an oversight.”378 – 379
श्लोक ( Shlok ) 380 – 383
भिक्षार्थ देवकीगेहं स पुनश्च प्रविष्टवान् । प्रत्युत्थाय यथोक्तेन विधिना प्रतिगृह्य तम् ॥३८०॥देवकी वसुदेवश्च दीक्षात्र स्यान्न वावयोः । किमिति छद्मना बूतां ज्ञात्वा सोऽपि तदिङ्गितम् ॥३८१॥सप्तपुत्राः समाप्स्यन्ते भवद्भयां तेषु षट्सुताः । परस्थानेषु वर्धित्वा यास्यन्ति परमां गतिम् ॥३८२॥ सप्तमः सकलां पृथ्वी स्वच्छत्रच्छायया चिरम् । पालयिष्यति निर्वाप्य चक्रवर्तीत्यभाषत ॥३८३॥
किसी दिन वही अति-मुक्त मुनि भिक्षाके लिए देवकीके घर प्रविष्ट हुए तो देवकीने खड़े होकर यथोक्त विधिसे उनका पडिगाहन किया। आहार देनेके बाद देवकी और वसुदेवने उनसे पूछा कि क्या कभी हम दोनों भी दीक्षा ले सकेंगे ? मुनिराजने उनका अभिप्राय जानकर कहा कि इस तरह छलसे क्यों पूछते हो ? आप दोनों सात पुत्र प्राप्त करेंगे, उनमेंसे छह पुत्र तो अन्य स्थानमें बढ़कर निर्वाण प्राप्त करेंगे और सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती होकर अपने छत्रकी छायासे चिरकाल तक समस्त पृथिवीका पालन करेगा ।। ३८०-३८३ ।।
“Once again, he (the ascetic/sage) entered Devaki’s house to beg for alms. Standing up to welcome him, Devaki and Vasudeva received him according to the prescribed rituals. With a hidden motive, they both asked him: ‘Will the two of us receive initiation (spiritual vow) or not?’ Understanding their underlying intention, he replied: ‘Seven sons will be born to you. Out of them, six sons will grow up in other places and will eventually attain the supreme spiritual state (liberation/Moksha). The seventh son will bring peace to the world and protect the entire earth under the shadow of his single royal umbrella for a long time as a Chakravartin (Sovereign Emperor).’ Thus he spoke.” 380 – 383
श्लोक ( Shlok ) 384 – 386
देवकी च मुदा पश्चात्त्रिष्कृत्वाप्तवती यमान् । चरमाङ्गानिमान् ज्ञातवता शक्रेण चोदितः ॥३८४॥दिविजो नैगमार्षाख्यो १ भद्रिलाख्यपुरेऽलका । वणिक्सुताया निक्षिप्य पुरस्तात्तत्सुतान् मृतान् ॥३८५॥तदा तदैव सम्भूय गृहीत्वा त्रिमितान्यमान् । तान् पुरस्तान्निचिक्षेप देवक्या गूढकृत्यवित् ॥३८६॥
यह सुनकर देवकी बहुत हर्षित हुई। तदनन्तर उसने तीन बारमें दो-दो युगल पुत्र प्राप्त किये । इन्द्रको मालूम हुआ कि ये सब पुत्र चरमशरीरी हैं अतः उसने देवकीके गूढ़ कार्यको जाननेवाले नैगमर्ष नामके देवको प्रेरणा की। इन्द्रके द्वारा प्रेरित हुआ नैगमर्ष देव देवकीके इन पुत्रोंको ले जाकर भद्रिलपुर नगरमें अलका नामकी वैश्य पुत्रीके आगे डाल आता था और उसके तत्काल उत्पन्न होकर मरे हुए तीन युगल पुत्रोंको देवकीके सामने डाल देता था ।। ३८४-३८६ ॥
“Hearing this, Devaki was filled with great joy. Thereafter, in three separate births, she gave birth to three pairs of twin sons. When Indra came to know that all these sons were Charam-shariri (souls in their final incarnation destined for liberation), he prompted the deity Naigamaresh (Naigamesha), who was well-aware of Devaki’s secret situation.
Urged by Indra, the deity Naigamaresh would carry away Devaki’s newborn twin sons and place them before a merchant’s daughter named Alka in the city of Bhadrilapur. In exchange, he would take Alka’s stillborn twin infants and place them right before Devaki.” (384–386)
श्लोक ( Shlok ) 387 – 392
यमान् सोऽपि गतप्राणान् क्रमात्कंसः समीक्ष्य तान् । किमेभिर्मे गतप्राणैरभून्मुनिरसत्यवाक् ॥३८७॥इति मत्वापि साशङ्कः शिलापट्टे न्यपातयत् । पश्चात्सा सप्तमे मास एव स्वस्य निकेतने ॥३८८॥निर्नामकमलब्धोक्तं महाशुक्राच्च्युतं सुतम् । कंसानवगमेनैव नन्दगोपगृहे सुखम् ॥ ३८९॥बालकं वर्धयिष्याव इति नीतिविशारदौ । पिता भ्राता च तद्देवकीं विज्ञाप्य ततो बलः ॥३९९॥तमुद्दभ्रे पिता चास्य दधारातपवारणम् । ज्वलन्निशातभृङ्गाग्रविलसन्मणिदीपका ॥३९१॥निरस्ततिमिराटोपो वृषभोऽभूत्तदाग्रतः । तथा विकृतिमापन्ना तत्पुण्यात्पुरदेवता ॥ ३९२॥
कंसने उन मरे हुए पुत्रों को देखकर विचार किया कि इन निर्जीव पुत्रोंसे मेरी क्या हानि हो सकती है ? मुनि असत्यवादी भी तो हो सकते हैं। उसने ऐसा विचार किया सही परन्तु उसकी शङ्का नहीं गई इसलिए वह उन मृत पुत्रोंको शिलाके ऊपर पछाड़ता रहा। इसके बाद निर्नामक मुनिका जीव महाशुक्र स्वर्गसे च्युत होकर देवकीके गर्भमें आया। अबकी बार उसने अपने ही घर सातवें महीने में ही पुत्र उत्पन्न किया। नीतिविद्या में निपुण वसुदेव और बलभद्र पद्मने विचार किया कि कंसको बिना जताये ही इस पुत्रका नन्दगोपके घर सुखसे पालन-पोषण करावेंगे । पिता और भाईने अपने विचार देवकीको भी बतला दिये । बलभद्रने उस बालकको उठा लिया और पिताने उस पर छत्र लगा लिया उस समय घोर अन्धकार था अतः पुत्रके पुण्यसे नगरका देवता विक्रिया वश एक बैलका रूप बनाकर उनके आगे हो गया। उस बैलके दोनों पैने सींगों पर देदीप्यमान मणियोंके दीपक रखे हुए थे उनसे समस्त अन्धकार दूर होता जाता था ।। ३८७-३९२ ॥
“Seeing those dead infants, Kansa thought to himself, ‘How can these lifeless children cause me any harm? Perhaps the sage can speak untruths after all.’ Although he thought this way, his deep-seated suspicion never truly left him; therefore, he kept smashing those dead infants against a stone slab.
Thereafter, the soul of the ascetic named Nirnamaka descended from the Mahashukra heaven and entered Devaki’s womb. This time, she gave birth to a son in her own home, in just the seventh month of pregnancy.
Vasudeva and Balabhadra Padma (Balarama), both highly skilled in the art of diplomacy and strategy, decided that they would secretly send this son to Nandagopa’s house to be raised in safety, without letting Kansa know. The father and brother shared this plan with Devaki as well. Balabhadra lifted the infant, while the father held a royal umbrella over him. Because it was a night of absolute, dense darkness, the city’s guardian deity—moved by the infant’s profound merit (punya)—transformed himself into a bull using supernatural powers (vikriya) and walked ahead of them. Bright, glowing jewel-lamps were placed upon both sharp horns of that bull, completely dispersing the darkness along their path.” (387–392)
श्लोक 393 से 402
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