अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152 – 153
अभिभूताखिलारातिरष्टमश्चक्रवर्तिषु । समा षष्टिसहस्त्रायुरष्टाविंशतिचापमः ॥ १५२ ॥ जातरूपच्छविः श्रीमानिक्ष्वाकुकुलकेसरी । विराजमानो विस्पष्टचक्रादिशुभलक्षणैः ॥ १५३ ॥
यह सुभौम समस्त शत्रुओंको नष्ट करनेवाला था और चक्रवर्तियोंमें आठवाँ चक्रवर्ती था। उसकी साठ हजार वर्षकी आयु थी, अट्ठाईस धनुष ऊँचा शरीर था, सुवर्णके समान उसकी कान्ति थी, वह लक्ष्मीमान् था, इक्ष्वाकु वंशका सिंह था- शिरोमणि था, अत्यन्त स्पष्ट दिखनेवाले चक्र आदि शुभ लक्षणोंसे सुशोभित था ॥ १५२-१५३ ।।
“This Subhauma was the destroyer of all enemies and was the eighth among the Chakravartis (universal rulers). His lifespan was sixty thousand years, his body was twenty-eight dhanushas (bow-lengths) tall, and his complexion possessed a golden radiance. He was majestic, a lion—the crest jewel—of the Ikshvaku dynasty, and was adorned with highly distinct auspicious marks such as the Chakra (discus).” (152–153)
श्लोक ( Shlok ) 154
ततो रत्नानि शेषाणि निधयोऽपि नवाभवन् । षट्खण्डस्याधिपत्येन प्रादुरासीत्स चक्रभृत् ॥ १५४ ॥
तदनन्तर बाकीके रत्न तथा नौ निधियों भी प्रकट हो गई इस प्रकार छह खण्डका आधिपत्य पाकर वह चक्रवर्तीके रूपमें प्रकट हुआ ।। १५४ ।।
“Thereafter, the remaining jewels and the nine treasures (Navanidhi) also manifested. In this manner, having attained sovereignty over the six realms (Shatkhanda), he emerged as a Chakravarti.” (154)
श्लोक ( Shlok ) 155
चक्रवर्तित्वसम्प्राप्यान् भोगान् दशविधांश्चिरम् । अन्वभूदिव देवेन्द्रो दिवि दिव्याननारतम् ॥ १५५ ॥
जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गमें निरन्तर दिव्य भोगोंका उपभोग करता रहता है उसी प्रकार सुभौम चक्रवर्ती भी चक्रवर्ती पद में प्राप्त होने योग्य दश प्रकारके भोगोंका चिरकाल तक उपभोग करता रहा ।। १५५ ।।
“Just as Indra constantly enjoys divine pleasures in heaven, similarly, the Chakravarti Subhauma also enjoyed for a long time the ten types of pleasures that are worthy of being attained in the position of a Chakravarti.” (155)
श्लोक ( Shlok ) 156
अन्येद्युः सूपकारोऽस्य नान्नाऽमृतरसायनः । ‘रसायनाह्निकामस्मै मुदाऽदादम्लिकां हितः ॥ १५६ ॥
सुभौमका एक अमृतरसायन नामका हितैषी रसोइया था उसने किसी दिन बड़ी प्रसन्नतासे उसके लिए रसायना नामकी कढ़ी परोसी ।। १५६ ॥
“Subhauma had a well-wishing cook named Amritarasayana, who one day, with great joy, served him a curried dish called Rasayana.” (156)
श्लोक ( Shlok ) 157 – 159
तन्नामश्रुतिमात्रेण तद्रुणस्याविचारकः । तद्वैरिचोदितः कोपाद् भूपतिस्तमदण्डयत् ॥ १५७ ॥ सोऽपि तेनैव दण्डेन श्रियमाणोऽतितीव्ररुट् । वध्यासं नृपमित्यात्तनिदानः पुण्यलेशतः ॥ १५८ ॥ज्योतिर्लोकेऽमरो भूत्वा विभङ्गज्ञानवीक्षणः । अनुस्मृत्य रुषा वैरं जिघांसुः स महीपतिम् ॥ १५९ ॥
सुभौमने उस कढ़ीके गुणोंका विचार तो नहीं किया, सिर्फ उसका नाम सुनने मात्रसे वह कुपित हो गया। इसीके बीच उस रसोइयाके शत्रुने राजाको उल्टी प्रेरणा दी जिससे क्रोधवश उसने उस रसोइयाको दण्डित किया। इतना अधिक दण्डित किया कि वह रसोइया उस दण्डसे म्रियमाण हो गया। उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर निदान किया कि मैं इस राजाको अवश्य मारूँगा। थोड़ेसे पुण्यके कारण वह भरकर ज्योतिर्लोकमें विभङ्गावधिज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाला देव हुआ। पूर्व वैरका स्मरण कर वह क्रोधवश राजाको मारनेकी इच्छा करने लगा ॥ १५७-१५९ ॥
“Without considering the actual qualities of that curry, Subhauma became furious merely upon hearing its name. Meanwhile, an enemy of that cook gave the king a distorted instigation, due to which, driven by anger, the king punished the cook. He punished him so severely that the cook lay on the verge of death from the punishment. Filled with intense rage, the cook made a binding resolution (Nidana): ‘I will certainly kill this king.’
Due to a small remnant of merit (punya), he died and was reborn as a deity in the Jyotirloka (astral celestial realm), possessing the eye of Vibhangavadhi-jnana (distorted clairvoyance). Recalling his past enmity, he began to desire to kill the king out of sheer wrath.” (157–159)
श्लोक ( Shlok ) 160
जिह्वालोलुपमालक्ष्य सन्धृत्य वणिगाकृतिम् । सुस्वादुफलदानेन प्रत्यहं तमसेवत ॥ १६० ॥
उसने देखा कि यह राजा जिह्वाका लोभी है अतः वह एक व्यापारीका वेष रख मीठे-मीठे फल देकर प्रतिदिन राजाकी सेवा करने लगा ।। १६० ॥
“He observed that this king was a slave to his palate (greedy for the taste of the tongue); therefore, disguising himself as a merchant, he began to serve the king daily by offering him exceedingly sweet fruits.” (160)
श्लोक ( Shlok ) 161
निष्ठिता विफलानीति कदाचित्तेन भाषितः ३ । आनेतव्यानि तान्येव गत्वेत्याख्यनृपोऽपि तम् ॥ १६१ ॥
किसी एक दिन उस देवने कहा कि महाराज ! वे फल तो अब समाप्त हो गये । राजाने कहा कि यदि समाप्त हो गये तो फिरसे जाकर उन्हीं फलोंको ले आओ ।। १६१ ।।
“One day, that deity said, ‘O King! Those fruits have now run out.’ The king replied, ‘If they have run out, go back and fetch those very same fruits again.'” (161)
श्लोक 162 से 171
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55
अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |