अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 332 to 341
श्लोक ( Shlok ) 332 – 335
बार्तापरम्पराज्ञातस्वकीयप्राभवं द्विजम् । स्वदारिद्रयापनोदार्थ स्वान्तिकं समुपागतम् ॥ ३३२ ॥दूरात् कपिलको दृष्ट्वा दुष्टात्मा धरिणीजटम् ४ । कुपितोऽपि मनस्यस्मै प्रत्युत्थायाभिवाद्य च ॥३३३॥समुञ्चासनमारोप्य मातुर्थाश्रोश्च किं मम । कुशलं ब्रूत मद्भाग्याद्यूयमत्रैवमागताः ॥ ३३४ ॥इति पृष्ट्वा प्रतोष्यैनं स्नानवस्त्रासनादिभिः । स्वजात्युभेदभीतत्वात् सम्यक् तस्य मनोऽग्रहीत् ॥३३५॥
इधर धरिणीजट दरिद्र हो गया। उसने परम्परासे कपिलके प्रभावकी सब बातें जान लीं इसलिए वह अपनी दरिद्रता दूर करनेके लिए कपिलके पास गया। उसे आया देख कपिल मन ही मन बहुत कुपित हुआ परन्तु बाह्यमें उसने उठकर अभिवादन-प्रणाम किया। उच्च आसन पर बैठाया और कहा कि कहिये मेरी माता तथा भाइयोंकी कुशलता तो है न ? मेरे सौभाग्यसे आप यहाँ पधारे यह अच्छा किया इस प्रकार पूजकर स्नान वस्त्र आसन आदिसे उसे संतुष्ट किया और कहीं हमारी जातिका भेद खुल न जावे इस भयसे उसने उसके मनको अच्छी तरह ग्रहण कर लिया ॥ ३३२-३३५ ।।
Meanwhile, Dharanijata became impoverished. Having learned about all of Kapil’s power and influence through tradition, he went to Kapil in order to rid himself of his poverty. Seeing him arrive, Kapil became highly infuriated within his heart; however, outwardly, he stood up, greeted, and bowed to him.
Seating him on a high seat, Kapil said, “Tell me, are my mother and brothers doing well? It is by my good fortune that you have graced this place; you have done well to come.” In this manner, Kapil honored him and satisfied him with a bath, clothing, and a comfortable seat. Out of fear that the secret of his caste might be revealed, Kapil completely won over Dharanijata’s heart. || 332-335 ||
श्लोक ( Shlok ) 336
सोऽपि विप्रोऽतिदारिद्र्याभिद्रुतः पुत्रमेव तम् । प्रतिपद्याचरत्यायो नार्थिनां स्थितिपालनम् ॥३३६॥
दरिद्रतासे पीड़ित हुआ पापी ब्राह्मण भी कपिलको अपना पुत्र कहकर उसके साथ पुत्र जैसा व्यवहार करने लगा सो ठीक है क्योंकि स्वार्थी मनुष्योंकी मर्यादाका पालन नहीं होता ।। ३३६ ॥
Afflicted by poverty, the sinful Brahmin also began calling Kapil his son and treating him like one. This is only natural, for those driven by selfishness observe no boundaries or moral constraints. || 336 ||
श्लोक ( Shlok ) 337 – 339
दिनानि कानिचिद्यातान्येवं संवृतवृत्तयोः । तयोः कदाचित्तं विप्रं सत्यभामाधनार्चितम् ॥ ३३७ ॥अप्राक्षीत्तत्परोक्षेऽयं किं सत्यं ब्रूत वः सुतः । एतत्कुत्सितचारित्रान्न प्रत्येमीति पुत्रताम् ॥ ३३८॥ स सुवर्णवसुर्गेहं यियासुश्चेतसा द्विषन् । गदित्त्वाऽगाद्यथावृत्तं दुष्टानां नास्ति दुष्करम् ॥ ३३९॥
इस प्रकार अपने समाचारोंको छिपाते हुए उन पिता-पुत्रके कितने ही दिन निकल गये । एक दिन कपिलके परोक्षमें सत्यभामाने ब्राह्मणको बहुत-सा धन देकर पूछा कि आप सत्य कहिये । क्या यह आपका ही पुत्र है ? इसके दुश्चरित्रसे मुझे विश्वास नहीं होता कि यह आपका ही पुत्र है। धरिणी-जट हृदयमें तो कपिलके साथ द्वेष रखता ही था और इधर सत्यभामाके दिये हुए सुवणे तथा धनको साथ लेकर घर आना चाहता था इसलिए सत्र वृत्तान्त सच-सच कहकर घर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट मनुष्योंके लिए कोई भी कार्य दुष्कर नहीं हैं ।। ३३७-३३९ ।।
In this manner, while concealing the truth about themselves, many days passed for the father and son. One day, in Kapil’s absence, Satyabhama gave the Brahmin a vast amount of wealth and asked, “Tell me the truth. Is he truly your son? Because of his wicked character, I cannot believe that he is your offspring.”
Dharanijata already harbored malice toward Kapil in his heart, and now, wanting to return home with the gold and wealth given by Satyabhama, he revealed the entire story exactly as it was and left for his home. This is only natural, for no vile act is too difficult for wicked men. || 337-339 ||
श्लोक ( Shlok ) 340 – 341
अथ तन्नगराधीशः श्रीपेणः सिंहनन्दिताऽ । निन्दिता च प्रिये तस्य तयोरिन्द्रेन्दुसन्निभौ ॥ ३४० ॥इन्द्रोपेन्द्रादिसेनान्तौ तनूजौ मनुजोत्तमौ । ताभ्यामतिविनीताभ्यां पितरः प्रीतिमागमन् ॥ ३४१ ॥
अथानन्तर उस नगरका राजा श्रीषेण था। उसके सिंहनन्दिता और अनिन्दिता नामकी दो रानियां थीं। उन दोनोंको इन्द्र और चन्द्रमाके समान सुन्दर मनुष्योंमें उत्तम इन्द्रसेन और उपेन्द्र-सेन नामके दो पुत्र थे। वे दोनों ही पुत्र अत्यन्त नम्र थे अतः माता-पिता उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ ३४०-३४१ ।।
Thereafter, the king of that city was Shrishena. He had two queens named Simhanandita and Anindita. They had two sons, Indrasena and Upendrasena, who were the best among men and as beautiful as Indra and the Moon. Both sons were exceedingly humble; therefore, their parents were highly pleased with them. || 340-341 ||
श्लोक 342 से 351
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धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
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