नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 373 to 382
श्लोक ( Shlok ) 373 – 374
सर्वविद्याच्छिदां श्रत्वा तज्जाम्बवतनृद्भवे । बलेनाक्रम्य सम्प्राप्ते कुमारे जम्बुनामनि ॥ ३७३ ॥ पलायत निजस्थानाश्नमिभर्भीत्वा समातुलः । अनालोचितकार्याणां किं मुक्त्वान्यत्पराभवम् ॥ ३७४ ॥
अपनी सब विद्याओंके छेदी जानेकी बात सुनकर राजा जाम्बवने अपना जम्बु नाम पुत्र भेजा। सेनाके साथ आक्रमण करता हुआ जम्बुकुमार जब वहाँ पहुँचा तो वह नमि डरकर अपने मामाके साथ अपने स्थानसे भाग खड़ा हुआ सो ठीक ही है क्योंकि जो कार्य बिना विचारके किये जाते हैं उनका फल पराभवके सिवाय और क्या हो सकता है ? ॥ ३७३-३७४ ।।
Upon hearing that all his mystical spells (vidyas) had been neutralized, King Jambav dispatched his son named Jambu. When Jambu Kumar arrived there, launching an assault with his army, Nami grew terrified and fled from his dwelling along with his maternal uncle. This is only natural, for what else can be the outcome of actions undertaken without due reflection, if not utter defeat?[ 373-374]
श्लोक ( Shlok ) 375 – 378
नारदस्तद्विदित्वाशु सम्प्राप्य कमलोदरम् । वर्णयामास जाम्बवतीरूपमतिसुन्दरम् ॥ ३७’५ ॥ हठात्कृष्णस्तदाकर्ण्य हरिष्यामीति तां सतीम् । सन्नद्धबलसम्पत्त्या गत्वा ‘खगनगान्तिके ॥ ३७६ ॥ निविष्टो मनसालोच्य ज्ञात्वा तत्कर्मदुष्करम् । उपोष्याचिन्तयद्रात्रौ केनेदं सेत्स्यतीत्यसौ ॥ ३७७ ॥ प्रसाधितत्रिखण्डोऽपि तत्राभूत्खण्डितायतिः । तद्विपक्षखगेन्द्रस्य पुण्यं किमपि तादृशम् ॥ ३७८ ॥
नारद, यह सब जानकर शीघ्र ही कृष्णके पास गया और जाम्बवतीके अतिशय सुन्दर रूपका वर्णन करने लगा। यह सुनकर श्रीकृष्णने कहा कि मैं उस सतीको हठात् (जबरदस्ती) हरण करूँगा। यह कहकर वे अपनी सेना रूपी सम्पत्तिके साथ चल पड़े और विजयार्ध पर्वतके समीपवर्ती वनमें ठहर गये। बलदेव उनके साथ थे ही। यह कार्य अत्यन्त कठिन है ऐसा जानकर उन्होंने उपवासका नियम लिया और रात्रिके समय मनमें विचार किया कि यह कार्य किसके द्वारा सिद्ध होगा। देखो, जिसने तीन खण्ड वशकर लिये ऐसे श्रीकृष्णका भी भविष्य वहाँ खण्डित दिखने लगा परन्तु उस विद्याधर राजाके विरोधी श्रीकृष्णका पुण्य भी कुछ वैसा ही प्रबल था ।। ३७५-३७८ ॥
Learning of all these events, Narada quickly went to Shri Krishna and began to describe the exceedingly exquisite beauty of Jambavati. Upon hearing this, Shri Krishna declared, “I shall abduct that virtuous lady by force.” Saying this, he set out alongside his magnificent army and halted in the forest adjacent to the Vijayardha mountain. Baladeva was, of course, with him.
Realizing that this undertaking was exceptionally difficult, Shri Krishna took a vow of fasting, and during the night, he pondered over who would successfully accomplish this task. Behold! The future of even Shri Krishna, who had conquered three realms (khands) of the earth, appeared uncertain at that moment. Yet, the merit (punya) of Shri Krishna, who stood against that Vidyadhar king, was equally powerful.[ 375-378]
श्लोक ( Shlok ) 379 – 382
यक्षिलाख्योऽनुजस्तस्य प्राक्तनस्तपसावसन् । महाशुक्रे तदैत्यैते विद्ये द्वे साधयेति ते ॥ ३७९ ॥ दत्त्वा तत्साधनोपायमभिधाय गतो दिवम् । स क्षीरसागरं कृत्वा तत्राहिशयने स्थितः ॥ ३८० ॥साधयामास मासांस्ते चतुरो विधिपूर्वकम् । सिंहाहिवैरिवाहिन्यौ विद्ये हलिहरी गतौ ॥ ३८१ ॥आरुह्य जाम्बवं युद्धे विजित्यादाय तत्सुताम् । महादेवीपदे प्रीत्या त्वामकार्षीक्षितीडिति ॥ ३८२ ॥
कि जिससे पूर्व जन्मका यक्षिल नामका छोटा भाई, जो तपकर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ था, आया और कहने लगा कि ‘मैं ये दो विद्याएँ देता हूँ इन्हें तुम सिद्ध करो’ इस प्रकार कह कर तथा विद्याएँ सिद्ध करनेकी विधि बतला कर वह स्वर्ग चला गया । इधर श्रीकृष्ण श्रीरसागर बनाकर उसमें नागशय्यापर आरूढ़ हुए और विधि पूर्वक चार माह तक विद्याएँ सिद्ध करते रहे। अन्तमें बलदेवको सिंहवाहिनी और श्रीकृष्णको गरुड़वाहिनी विद्या सिद्ध हो गई । तदनन्तर उन विद्याओं पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णने युद्धमें जाम्बवको जीता और उसकी पुत्री तुझे जाम्बवती को ले आये। घर आकर उन्होंने तुझे बड़ी प्रीतिके साथ महादेवीके पद पर नियुक्त किया ॥ ३७९-३८२ ।।
As a consequence of his merit, his younger brother from a previous birth named Yakshil, who had performed austerities and been reborn as a celestial being in the Mahashukra heaven, appeared before him. He said, “I grant you these two mystical spells (vidyas); master them.” Saying this, and after explaining the proper method to master the spells, he returned to heaven.
Following the instructions, Shri Krishna created a mystical ocean of milk (Kshirasagar), seated himself upon the serpent-bed (Nagasayyah), and methodically practiced for four months to master the spells. Ultimately, Baladeva mastered the lion-riding spell (Simhavahini) and Shri Krishna mastered the eagle-riding spell (Garudavahini).
Thereafter, mounting those very spells, Shri Krishna defeated Jambav in battle and brought you, Jambavati, away as his bride. Upon returning home, he affectionately anointed you to the exalted position of Chief Queen (Mahadevi).[ 379-382]
श्लोक 383 से 391
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372
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