अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
तत्र पण्यस्त्रियो वीक्ष्य बाढ सुरकुमारकाः । विस्मयन्ते न रज्यन्ते ताभिर्जातिविशेषतः ॥ ४२ ॥
वहाँकी वेश्याओंको देखकर देवकुमार बहुत ही आश्चर्य करते थे परन्तु जाति भिन्न होनेके कारण उनके साथ क्रीड़ा नहीं करते थे ॥ ४२ ॥
“Upon seeing the courtesans of that city, the young gods (celestial princes) were filled with great wonder; however, because they belonged to a different realm and species, they did not engage in amorous play with them.”42
श्लोक ( Shlok ) 43
करणानामभीष्टा’ ये विषयास्तत्र ते ततः । न नाकेऽपि यतस्तत्र नाकिपूज्यसमुद्भवः ॥ ४३ ॥
इन्द्रियों को अच्छे लगनेवाले जो विषय वहाँ थे वे विषय चूंकि स्वर्गमें भी नहीं थे इसलिए देवताओंके द्वारा पूज्य तीर्थंकर भगवान्का जन्म वहीं होता था ।। ४३ ।।
“Because the sensory pleasures and objects of enjoyment found there could not be matched even in heaven, the Tirthankara Lord, who is worshipped by the gods themselves, chose that very place to take birth.”43
श्लोक ( Shlok ) 44
अकृत्रिमाणि निर्जेतुं विमानानि स्वकौशलात् । सुरैः कृतगृहाण्यत्र चेत्कान्या तेषु वर्णना ॥ ४४ ॥
देवोंने अपने कौशलसे जो घर वहां बनाये थे वे अकृत्रिम विमानोंको जीतनेके लिए ही बनाये थे, इससे बढ़कर उनका और क्या वर्णन हो सकता है ? ॥ ४४ ॥
“The mansions built there by the gods using their divine skills were created to surpass even the natural, un-built celestial cars (Vimanas) of the heavens; what greater description than this could there be for them?”44
श्लोक ( Shlok ) 45
बभूवास्याः पतिः पंक्तेः स्वर्गस्येवामरेश्वरः । भरताख्यः पुरोस्सूनुरिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥ ४५ ॥
जिस प्रकार स्वर्गकी पंक्तिका स्वामी इन्द्र होता है उसी प्रकार उस नगरीका स्वामी भरत था जो कि इक्ष्वाकुवंशको बढ़ानेवाला ” था और भगवान् वृषभदेवका पुत्र था ।। ४५ ।।
“Just as Indra is the lord of the celestial realms in heaven, so too was Bharata the lord of that city—he who was the enhancer of the Ikshvaku dynasty and the son of Lord Vrishabhadeva.”45
श्लोक ( Shlok ) 46 – 47
अकम्पनाद्या भूपाला नमिमुख्याश्च खेचराः । मागधाद्याश्च देवेशास्त्यक्तमानाः समुत्सुकाः ॥ ४६ ॥यस्याज्ञां मालतीमालामिव स्वानम्रमौलयः । भूषाधिकेयमस्माकमिति सन्धारयन्ति ते ॥ ४७ ॥
अकम्पन आदि राजा, नमि आदि विद्याधर और मगध आदि देव अपना अभिमान छोड़कर और उत्कण्ठित होकर अपना मस्तक झुकाते हुए मालतीकी मालाके समान जिसकी आज्ञाको ‘यह हमारा सबसे अधिक आभूषण है’ यह विचारकर धारण करते थे ।। ४६-४७ ॥
“Kings like Akampana, Vidyadharas like Nami, and deities like Magadha renounced their pride and, filled with deep longing, bowed their heads. They accepted his command like a wreath of jasmine flowers, thinking, ‘This is our most supreme ornament.'” 46 – 47
श्लोक ( Shlok ) 48
सत्कर्मभावितैर्भावैः क्षायोपशमिकैश्च सः । भव्यभावविशेषाच्च श्रेष्ठकाष्ठामधिष्ठितः ॥ ४८ ॥
अपने सत्कर्मोंकी भावनासे तथा कर्मोंके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे और भव्यत्व भावकी विशेषतासे वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी अन्तिम सीमाको प्राप्त था अर्थात् सबसे अधिक श्रेष्ठ माना जाता था ॥ ४८ ॥
“By the purity of his virtuous deeds, by the spiritual states arising from the destruction and suppression of his karmas ($Kṣayopaśama$), and by the excellence of his capacity for liberation ($Bhavyatva$), he had attained the ultimate pinnacle of noble souls—meaning, he was considered the most supreme among men.”48
श्लोक ( Shlok ) 49
आदितीर्थकृतो ज्येष्ठपुत्रो राजसु षोडशः । ज्यायांश्चक्रो मुहूर्तेन मुक्तोऽयं कैस्तुलां व्रजेत् ॥ ४९ ॥
वह भरत भगवान् आदिनाथका जेष्ठ पुत्र था, सोलहवाँ मनु था, प्रथम चक्रवर्ती था और एक मुहूर्तमें ही मुक्त हो गया था (केवल ज्ञानी हो गया था) इसलिए वह किनके साथ सादृश्यको प्राप्त हो सकता था ? अर्थात् किसीके साथ नहीं, वह सर्वथा अनुपम था ।॥ ४९ ॥
“That Bharata was the eldest son of Lord Adinatha, the sixteenth Manu, and the very first Chakravarti (universal emperor), who attained omniscience ($Kevala\ Jñāna$) and liberation in the span of just a single Muhurta (less than an hour). With whom then could he possibly be compared? That is to say, he was completely unparalleled and unique in every way.”49
श्लोक ( Shlok ) 50
तस्यानन्तमतिर्देवी प्रख्यातिरिव देहिनी । विमुच्य कमलावासं रेजे श्रीरिव चागता ॥ ५० ॥
उसकी अनन्तमति नामकी वह देवी थी जो कि ऐसी सुशोभित होती थी मानो शरीरधारिणी कीर्ति हो अथवा कमल रूपी निवासस्थानको छोड़कर आई हुई मानो लक्ष्मी ही हो ॥ ५० ॥
“His queen was named Anantamatī, who shone so resplendently that she seemed like glory personified in human form, or as if Goddess Lakshmi herself had arrived after leaving her abode in the lotus.”50
श्लोक ( Shlok ) 51
प्रज्ञाविक्रमयोर्लक्ष्मीविशेषो वा पुरूरवाः । मरुद्भूतस्तयोरासीन्मरीचिः सूनुरग्रणीः ॥ ५१ ॥
जिसप्रकार बुद्धि और पराक्रमसे विशेष लक्ष्मी उत्पन्न होती है उसी प्रकार उन दोनोंके पुरूरवा भीलका जीव देव, मरीचि नामका ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ५१ ॥
“Just as extraordinary wealth and fortune ($Lak\text{ṣ}m\bar{\imath}$) are generated through the combination of intellect and valor, similarly, from the union of those two (Bharata and Anantamati), their eldest son was born—who was named Marīci, and who in a past birth had been Purūravā the Bhīla.” 51
श्लोक 52 से 61
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41
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