अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132 – 135
इति श्रुत्वा वचो राज्ञा तयोश्चक्रेण वर्तितुम् । शीलोऽसौ किं घटादीनां कारकः कारकाग्रणीः ॥ १३२ ॥तस्य किं प्रेक्ष्यमित्युक्तौ तौ सकोपाववोचताम् । कन्यारत्नमिदं चक्रिभोग्यं किं तेऽद्य जीर्यते ॥ १३३ ॥रथनूपुररानाऽसौ ज्वलनादिजटी कथम् । प्रजापतिश्च नामापि सन्धत्ते चक्रिणि द्विषि ॥ १३४ ॥इति सद्यस्ततो दूतौ निर्पत्य द्रुतगामिनौ । प्राप्याश्वग्रीवमानम्य प्रोचतुस्तद्विजृम्भणम् ॥ १३५ ॥
दूतोंके वचन सुनकर त्रिपृष्ठने फिर कहा कि तुम्हारा राजा चक्र फिराना जानता है सो क्या वह घट आदिको बनाने वाला (कुम्भकार) कर्ता कारक है, उसका क्या देखना है? यह सुनकर दूतोंको क्रोध आ गया। वे कुपित होकर बोले कि यह कन्यारत्न जो कि चक्रवर्तीके भोगने योग्य है क्या अब तुम्हें हजम हो जावेगा ? और चक्रवर्तीके कुपित होने पर रथनूपुरका राजा ज्वलनजटी तथा प्रजापति अपना नाम भी क्या सुरक्षित रख सकेगा। इतना कह वे दूत वहाँ से शीघ्र ही निकल कर अश्वग्रीवके पास पहुँचे और नमस्कार कर त्रिपृष्ठके वैभवका समाचार कहने लगे ॥ १३२-१३५ ॥
“Hearing the words of the messengers, Triprishta spoke again, ‘Your king knows how to spin a wheel—so is he a potter (pot-maker) who acts as the creator? What is there to see in that?’ Hearing this, the messengers were filled with rage. Becoming incensed, they said, ‘Will you now be able to digest this jewel of a maiden, who is worthy of being enjoyed only by a Chakravarti (universal emperor)? And if the Chakravarti becomes angry, will King Jvalanajati of Rathanupura or Prajapati even be able to protect their own names?’ Saying this, the messengers quickly departed from there, reached Ashvagriva, and after bowing to him, began to report the news of Triprishta’s opulence.”132 – 135
श्लोक ( Shlok ) 136
खगेश्वरोऽपि तत्क्षन्तुमक्षमो रूक्षवीक्षणः । भेरीमास्फालयामास रणप्रारम्भसूचिनीम् ॥ १३६ ॥
अश्वग्रीव यह सब सुननेके लिए असमर्थ हो गया, उसकी आंखें रूखी हो गई और उसी समय उसने युद्ध प्रारम्भकी सूचना देने वाली भेरी बजवा दी ॥ १३६ ॥
“Ashvagriva became unable to bear hearing all this; his eyes grew harsh (with rage), and at that very moment, he ordered the war drums to be sounded to signal the commencement of battle.”136
श्लोक ( Shlok ) 137
तद्ध्वनिर्व्याप दिक्षान्तान् हत्वा दिग्दन्तिनां मदम् । चक्रवर्तिनि संक्रुद्धे महान्तः के न बिभ्यति ॥ १३७॥
उस भेरीका शब्द दिग्गजोंका मद नष्टकर दिशाओंके अन्त तक व्याप्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि चक्रवर्तीके कुपित होने पर ऐसे कौन महापुरुष हैं जो भयभीत नहीं होते हों ।॥ १३७ ।।
“The sound of that war drum, destroying the pride of the directional elephants, reverberated to the very ends of the earth. And this is only fitting, for when a Chakravarti (universal emperor) becomes enraged, who is the great man that does not tremble with fear?”137
श्लोक ( Shlok ) 138
चतुरङ्गबलेनासौ रथावर्तमगात् गिरिम् । पेतुरुल्काश्चचा लैला दिक्षु दाहा जजृम्भिरे ॥ १३८ ॥
वह अश्वग्रीव चतुरङ्ग सेनाके साथ रथावर्त पर्वत पर जा पहुँचा, वहाँ उल्काएँ गिरने लगीं, पृथिवी हिलने लगी और दिशाओंमें दाह दोष होने लगे ॥ १३८ ॥
“Accorpanied by his fourfold army, Ashvagriva arrived at Mount Rathavarta, where meteors began to fall, the earth began to shake, and a fiery glow of ill-omen began to consume the horizons.”138
श्लोक ( Shlok ) 139
प्रजापतिसुतौ चैतद्विदित्वा विततौजसौ । प्रतीयतुः प्रतापाग्निभस्मितारीन्धनोच्चयौ ॥ १३९ ॥
जिनका ओज चारों ओर फैल रहा है और जिन्होंने अपने प्रतापरूपी अग्निके द्वारा शत्रुरूपी इन्धनकी राशि भस्म कर दी है ऐसेप्रजापतिके दोनों पुत्रोंको जब इस बातका पता चला तो इसके संमुख आये ॥ १३९ ॥
“When both the sons of Prajapati—whose aura was spreading in all directions and who, through the fire of their majesty, had reduced the fuel-like mass of their enemies to ashes—came to know of this matter, they came forward to face him.”139
श्लोक ( Shlok ) 140
उभयोः सेनयोस्तत्र संग्रामः समभून्महान् । समक्षयात्तयोः प्रापदन्तकः समवर्तिताम् ॥ १४० ॥
वहाँ दोनों सेनाओंमें महान् संग्राम हुआ । दोनों सेनाओंका समान क्षय हो रहा था इसलिए यमराज सचमुच ही समवर्तिता – मध्यस्थताको प्राप्त हुआ था ।। १४० ।।
“A monumental battle took place there between the two armies. Since both armies were suffering equal destruction, Yamaraja (the Lord of Death) truly embodied his name ‘Samavarti’—acting as a perfectly neutral and impartial mediator.”140
श्लोक ( Shlok ) 141
युद्ध्वा चिरं पदातीनां वृथा किं क्रियते क्षयः । इति त्रिपृष्ठो युद्धार्थभभ्यश्वग्रीवमेयिवान् ॥ ॥ १४१ ॥
चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद त्रिपृष्ठने सोचा कि सैनिकोंका व्यर्थ ही क्षय क्यों किया जाता है। ऐसा सोचकर वह युद्धके लिए अश्वग्रीवके सामने आया ॥ १४१ ॥
“After fighting for a long time, Triprishta thought, ‘Why should the soldiers be destroyed in vain?’ Thinking thus, he stepped forward to face Ashvagriva directly for combat.”141
श्लोक 142 से 151
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