नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोश्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
सन्ध्येव भानुमस्ताद्वावनु राजीमतिश्च तम् । ययौ वाचापि दत्तानां न्यायोऽयं कुलयोषिताम् ॥१७२॥
जिस प्रकार संध्या सूर्यके पीछे-पीछे अस्ताचलपर चली जाती है उसी प्रकार राजीमती भी उनके पीछे-पीछे तपश्चरणके लिए चली गई सो ठीक ही है क्योंकि शरीरकी बात तो दूर रही, वचन मात्रसे भी दी हुई कुलस्त्रियोंका यही न्याय है ॥ १७२ ॥
“Just as the evening twilight follows the sun to the western horizon where it sets, so too did Rajimati follow him to practice asceticism. And this is only right, for leave aside the body itself, this is the very law of noble women given even by word of mouth alone. || 172 ||”
श्लोक ( Shlok ) 173
स्वदुःखेनापि निर्विष्णः श्रूयते न जनः परः । परदुःखेन सन्तोऽमी त्यजन्त्येव महाश्रियम् ॥ १७३ ॥
अन्य मनुष्य तो अपने दुखसे भी विरक्त हुए नहीं सुने जाते पर जो सज्जन पुरुष होते हैं वे दूसरेके दुःखसे ही महाविभूतिका त्याग कर देते हैं ।॥ १७३ ।।
“Other common men are not known to detach themselves from the world even through their own suffering; but those who are truly noble and virtuous renounce great wealth and worldly majesty at the mere sight of another’s grief. || 173 ||”
श्लोक ( Shlok ) 174
बलकेशव मुख्यावनीशाः सम्पूज्य संस्तवैः । ससुरेशास्तमीशानं स्वं धाम समुपाश्रयन् ॥ १७४ ॥
बलदेव तथा नारायण आदि मुख्य राजा और इन्द्र आदिदेव, सब अनेक स्तवनोंके द्वारा उन भगवान्की स्तुतिकर अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥ १७४ ।।
“The chief kings, including Baladeva and Narayana, and the primary deities, including Indra, all praised the Lord with various hymns of adoration and then departed for their respective abodes. || 174 ||”
श्लोक ( Shlok ) 175 – 176
पारणादिवसे तस्मै वरदत्तो महीपतिः । कनकाभः प्रविष्टाय पुरीं द्वारावतीं सते ॥ १७५ ॥श्रद्धादिगुणसम्पन्नः प्रतीच्छादिनवक्रियः । अदितान्नं मुनिग्राह्यं पञ्चाश्चर्याणि चाप सः ॥ १७६ ॥
पारणाके दिन उन सज्जनोत्तम भगवान् ने द्वारावती नगरी में प्रवेश किया। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले तथा श्रद्धा आदि गुणोंसे सम्पन्न राजा वरदत्तने पडिगाहन आदि नवधा भक्तिकर उन्हें मुनियोंके ग्रहण करने योग्य-शुद्ध प्रासुक आहार दिया तथा पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। १७५-१७६ ॥
“On the day of breaking His fast (Parana), the Lord, the best among the righteous, entered the city of Dvaravati. There, King Varadatta—who possessed a golden complexion and was endowed with virtues like deep faith—welcomed Him with the ninefold devotion (Navadha Bhakti), including Pradighana (formally welcoming and receiving the monk). He then offered the Lord pure, animate-free (Prasuk) food fit for ascetics to accept, and thereby attained the five miraculous phenomena (Panchashcharya). || 175-176 ||”
श्लोक ( Shlok ) 177 – 178
“कोटीर्द्वादशरत्नानां सार्धाः सुरकरच्युताः । दृष्टि सौमनसीं वायुं मान्द्यादित्रिगुणान्वितम् ॥ १७७ ॥ घनान्तरितकायामराभिताडितदुन्दुभिः । ध्वानं मनोहरं साधुदानघोषणपूर्वकम् ॥ १७८ ॥
उसके घर देवोंके हाथसे छोड़ी हुई साढ़ेबारह करोड़ रत्नोंकी वर्षा हुई, फूल बरसे, मन्दता आदि तीन गुणोंसे युक्त वायु चलने लगी, मेघोंके भीतर छिपे देवोंके द्वारा ताडित दुन्दुभियोंका सुन्दर शब्द होने लगा और आपने बहुत अच्छा दान दिया यह घोषणा होने लगी ।। १७७-१७८ ।।
“At his palace, a shower of twelve and a half crore (125 million) gems rained down from the hands of the deities, celestial flowers fell, and a gentle breeze endowed with the three qualities (coolness, fragrance, and slowness) began to blow. A beautiful resonance arose from the kettledrums struck by the devas hidden within the clouds, and a proclamation resounded: ‘Oh, what a magnificent charity you have given!’ || 177-178 ||”
श्लोक ( Shlok ) 179 – 181
एवं तपस्यतस्यस्य षट्पञ्चाशद्दिनप्रमे । छद्मस्थसमये याते गिरौ रैवतकाभिधे ॥ १७९ ॥पष्ठोपवासयुक्तस्य महावेणोरधः स्थितेः । पूर्वेऽद्धयश्वयुजे मासि शुक्लपक्षादिमे दिने ॥ १८० ॥ चित्रायां केवलज्ञानमुदपद्यत सर्वगम् । पूजयन्ति स्म तं देवाः केवलावगमोत्सवे ॥ १८१ ॥
इस प्रकार तपस्या करते हुए जब उनकी छद्मस्थ अवस्थाके छप्पन दिन व्यतीत हो गये तब एक दिन वे रैवतक (गिरनार) पर्वतपर तेलाका नियम लेकर किसी बड़े भारी बाँसके वृत्तके नीचे विराजमान हो गये । निदान, आसौज शुक्ल पडिमाके दिन चित्रा नक्षत्रमें प्रातःकालके समय उन्हें समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हुआ । देवोंने केवलज्ञान कल्याणका उत्सवकर उनकी पूजा की ।। १७९ -१८१ ॥
“Thus practicing austerities, when fifty-six days of His stage of non-omniscience (Chhadmastha) had passed, one day He arrived at Mount Raivataka (Girnar). Taking a vow of a three-day fast (Tela), He seated Himself beneath a massive bamboo thicket. Ultimately, on the day of Ashvin Shukla Pratipada, under the Chitra constellation in the early morning hours, He attained Kevalajnana (omniscience), which encompasses the knowledge of all substances and cosmic realities. The deities then celebrated the Kevalajnana Kalyanaka (the auspicious festival of omniscience) and offered their worship to Him. || 179-181 ||”
श्लोक 182 से 190
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171
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