विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162 – 163
सद्भावप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता । अङ्कमारुह्य सुप्तस्य हन्तुः किं नाम पौरुषम् ॥ १६२ ॥महामोहग्रहग्रस्त-श्रीभूते भाविजन्मना । त्वं तन्मा नीनशो देहि मह्यं रत्नकरण्डकम् ॥ १६३ ॥
सद्भावनासे पासमें आये हुए मनुष्योंको ठगने-में क्या चतुराई है ? गोद आकर सोये हुएको मारने वालेका पुरुषार्थ क्या पुरुषार्थ है ? हे श्रीभूति ! तू महामोह रूपी पिशाचसे ग्रस्त हो रहा है, तू अपने भावी जीवनको नष्ट मत कर, मेरा रत्नोंका पिटारा मुझे दे दे ।। १६२-१६३ ॥
“What cleverness is there in deceiving someone who came to you in good faith? What bravery is there in striking one who sleeps in your lap? O Shribhuti! You are being consumed by a great delusion. Do not needlessly destroy your future lives and your soul’s path. Give me back my chest of gems!” [162-163]
श्लोक ( Shlok ) 164
ईदृश्येतत्प्रमाणानि जातिस्तेषामियं स्वयम् । जानंश्च मम रत्नानि किमित्येवमपहुषे ॥ १६४ ॥
मेरे रत्न ऐसे हैं, इतने बड़े हैं और उनकी यह जाति है, यह सब तू जानता है फिर क्यों इस तरह उन्हें छिपाता है ? ।। १६४ ॥
“You know exactly what my gems are like, how large they are, and what their quality is. Knowing all this, why are you hiding them in this manner?” [164]
श्लोक ( Shlok ) 165
एवं अनित्यं निशाप्रान्ते रोरौत्यारुह्य भूरुहम् । कृत्ये कृच्छ्रेऽपि सत्त्वात्या न त्यजन्ति समुद्यमम् ॥ १६५॥
इस प्रकार वह भद्रमित्र प्रति दिन प्रातः कालके समय किसी वृक्षपर चढ़कर बार-बार रोता था सो ठीक ही हैं क्योंकि धीर वीर मनुष्य कठिन कार्यमें भी उद्यम नहीं छोड़ते ॥ १६५ ॥
In this manner, Bhadramitra would climb a tree every morning and repeatedly wail his grievances. This was only fitting, for even in the face of the most difficult challenges, the steadfast and courageous do not abandon their efforts. [165]
श्लोक ( Shlok ) 166
मुहुर्मुहुस्तदाकर्ण्य महादेव्या मनस्यभूत् । जानेऽहं नायमुन्मत्तः सर्वदानुगतं वदन् ॥ १६६ ॥
बार-बार उसका एक-सा रोना सुनकर एक दिन रानीके मनमें विचार आया कि चूँकि ‘यह सदा एक ही सदृश शब्द कहता है अतः यह उन्मत्त नहीं है, ऐसा समझ पड़ता है ।। १६६ ।।
Hearing his consistent, unchanging lamentation day after day, a thought occurred to the Queen: “Since he speaks the exact same words every single time, it appears that he is not truly insane.” [166]
श्लोक ( Shlok ) 167
इति सावेद्य भूपालं द्यूतोपायेन मन्त्रिणम् । जित्वा यज्ञोपवीतेन सार्द्धं तन्नाममुद्रिकाम् ॥ १६७ ॥
रानीने यह विचार राजासे प्रकट किये और मंत्रीके साथ जुआ खेलकर उसका यज्ञोपवीत तथा उसके नामकी अंगूठी जीत ली ॥ १६७ ॥
The Queen expressed these thoughts to the King; subsequently, she engaged the minister in a game of gambling and won both his Yagnopavit (sacred thread) and the signet ring bearing his name. [167]
श्लोक ( Shlok ) 168 – 169
दत्त्वा निपुणमत्याख्यधात्रीकरतले मिथः । प्रहितं मन्त्रिणा देहि भद्रमित्रकरण्डकम् ॥ १६८ ॥अभिज्ञानं च तस्यैतदित्युक्त्वा सान्निधानृतः । तदानयेति सन्दिश्य ‘धात्रीमानीनयशदा ॥ १६९ ॥
तदनन्तर उसके निपुणमती नामकी धायके हाथमें दोनों चीजें देकर उसे एकान्तमें समझाया कि ‘तू श्रीभूति मंत्रीके घर जा और उनकी स्त्रीसे कह कि मुझे मंत्रीने भेजा है, तू मेरे लिए भद्रमित्रको पिटारा दे दे। पहिचानके लिए उन्होंने यह दोनों चीजें भेजी हैं इस प्रकार झूठ-मूठ ही कह कर तू वह रत्नोंका पिटारा ले आ, इस तरह सिखला कर रानी रामदत्ताने धाय भेजकर मंत्रीके घरसे वह रत्नोंका पिटारा बुला लिया ।। १६८-१६९ ॥
Thereafter, the Queen handed both items to her nurse named Nipunamati and instructed her in private: “Go to the house of Minister Shribhuti and tell his wife that the minister has sent you to fetch Madramitra’s chest. Tell her that he has sent these two items as proof of identity.” Having thus tutored her to bring the chest through this deception, Queen Ramadatta dispatched the nurse and had the chest of gems brought from the minister’s house. [168–169]
श्लोक ( Shlok ) 170
तत्रान्यानि च रत्नानि क्षिप्त्वा क्षितिभुजा स्वयम् । भद्रमित्रं समाहृय रहस्येतद्भवेत्तव ॥ १७० ॥
राजाने उस पिटारेमें और दूसरे रत्न डालकर भद्रमित्रको स्वयं एकान्तमें बुलाया और कहा कि क्या यह पिटारा तुम्हारा है ? ॥ १७० ॥
The King added several other gems into that chest, called Bhadramitra to a private meeting, and asked him, “Is this chest yours?” [170]
श्लोक ( Shlok ) 171
इत्युक्तः स भवेद्देव ममैव तत्करण्डकम् । किन्तु रत्नान्यनर्थ्याणि मिश्रितान्यत्र कानिचित् ॥ १७१ ॥
राजाके ऐसा कहने पर भद्रमित्रने कहा कि हे देव! यह पिटरा तो हमारा ही है परन्तु इसमें कुछ दूसरे अमूल्य रत्न मिला दिये गये हैं ।।१७१।।
Upon the King saying this, Bhadramitra replied, “O Lord! This chest is indeed mine, but some other priceless gems have been added to it.” [171]
श्लोक 172 से 181
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