नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 132 to 144
श्लोक ( Shlok ) 132 – 135
तदागत्य वणिपुत्रो तत्प्रदेशे निजं धनम् । अनिरीक्ष्य मृतौ हत्वा श्रद्धधानौ परस्परम् ॥ १३२ ॥बद्ध्वायुः क्रोधलोभाभ्यामाद्यं नरकमीयतुः । तत्र दुःखं चिरं भुक्त्वा ततो विन्ध्याद्रिकन्दरे ॥ १३३ ॥जातौ मेषौ पुनस्तत्राप्यन्योन्यवधकारिणौ । गोकुले वृषभौ जातौ गङ्गातटनिवासिनि ॥ १३४ ॥तत्र जन्मान्तरद्वेषात् कृतयुद्धौ गतासुकौ । सम्मेदपर्वते जातौ वानरौ वा नरौ धिया ॥ १३५ ॥
दूसरे दिन जब वैश्यपुत्र उस स्थान पर आये तो अपना धन नहीं देखकर परस्पर एक दूसरे पर धन लेनेका विश्वास करते हुए लड़ने लगे और परस्पर एक दूसरेको मारते हुए मर गये। वे क्रोध और लोभके कारण नरकायुका बन्धकर पहले नरकमें जा पहुँचे । चिरकाल तक वहाँ के दुःख भोगनेके बाद वहाँ से निकले और विन्ध्याचलकी गुफामें मेढ़ा हुए। वहाँ भी परस्पर एक दूसरेका वध कर वे गङ्गा नदीके किनारे बसनेवाले गोकुलमें बैल हुए। वहाँ भी जन्मान्तरके द्व`षके कारण दोनों युद्ध कर मरे और सम्मेदपर्वत पर बुद्धिसे मनुष्योंकी समानता करनेवाले वानर हुए ॥ १३२-१३५ ।।
“The next day, when the merchant sons returned to that spot and did not find their wealth, they suspected each other of taking it. Falling into a fierce argument, they fought and ended up killing one another. Due to their intense anger and greed, they bound themselves to a hellish lifespan (narakayu) and were reborn in the first hell.
After enduring the miseries of that realm for a very long time, they emerged from there and were born as rams in a cave of the Vindhyachal mountains. There too, they slaughtered each other. Following that, they were born as bulls in a cowherd village (gokul) on the banks of the Ganges River. Driven by the deep-seated hatred of their past births, the two bulls fought to the death there as well, and were subsequently reborn on Mount Sammed (Sammed Shikhar) as monkeys whose intelligence rivaled that of humans.” ( 132–135)
श्लोक ( Shlok ) 136 – 139
शिलासलिलहेतोस्तौ कलहं खलु चक्रतुः । मृतस्तयोः सपद्येकः परः कण्ठगतासुकः ॥ १३६ ॥सुरदेवादिगुर्वन्तचारणाभ्यां समुत्सुकः । श्रुत्वा पञ्चनमस्कारं धर्मश्रुतिपुरस्सरम् ॥ १३७ ॥सौधर्मकल्पे चित्राङ्गदाख्यो देवोऽजनिष्ट सः । ततो निर्गत्य जम्ब्वादिद्वीपे भरतमध्यगे ॥ १३८ ॥सुरम्यविषये पोदनेशः सुस्थितभूपतेः । सुलक्षणायां पुत्रोऽभूत्सुप्रतिष्ठावरिष्ठधीः ॥ १३९ ॥
वहाँ पर भी पत्थरसे निकलनेवाले पानी के कारण दोनों कलह करने लगे । उनमेंसे एक तो शीघ्र ही मर गया और दूसरा कण्ठगत प्राण हो गया। उसी समय वहाँ सुरगुरु और देवगुरु नामके दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज आ पहुँचे। उन्होंने उसे पश्च नमस्कार मन्त्र सुनाया, जिसे उसने बड़ी उत्सुकतासे सुना और धर्मश्रवणके साथ-साथ मरकर सौधर्म स्वर्गमेंचित्राङ्गद नामका देव हुआ। वहाँ से निकल कर वह उसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रके मध्यमें स्थित पोदनपुर नगरके स्वामी राजा सुस्थितकी सुलक्षणा नामकी रानीसे उत्कृष्ट बुद्धिका धारक सुप्रतिष्ठ नामका पुत्र हुआ ॥ १३६-१३९ ॥
“There, too, they began to quarrel over the water trickling from a stone. One of them died very quickly, while the other was on the verge of death, with his life-breath caught in his throat. At that very moment, two Charan Riddhi-dhari sages (monks possessing the supernatural power of astral travel) named Suraguru and Devaguru arrived. They recited the holy Pancha Namaskara Mantra to him, which he listened to with great eagerness. Imbued with the listening of this sacred teaching, he passed away and was reborn as a celestial being named Chitrangada in the Saudharma heaven.
Upon completing his heavenly lifespan, he departed from that realm and was reborn in this very Jambudvipa, in the center of Bharatakshetra, within the city of Podanpur. There, he became the son of King Susthita and Queen Sulakshana, named Supratishtha, possessing a supreme intellect.” ( 136–139)
श्लोक ( Shlok ) 140
कदाचित्प्रावृडारम्भे गिरावसितनामनि । युद्धं मर्कटयोर्वीक्ष्य स्मृतप्राग्जन्मचेष्टितः ॥ १४० ॥
किसी एक समय वर्षा ऋतुके प्रारम्भमें उसने असित नामके पर्वत पर दो वानरोंका युद्ध देखा। जिससे उसे अपने पूर्व जन्मकी समस्त चेष्टाओंका स्मरण हो गया ।॥ १४० ॥
“At one time, at the beginning of the rainy season, he witnessed a fierce battle between two monkeys on Mount Asita. Upon seeing this, he was instantly reminded of all the actions and events of his own past births.” ( 140)
श्लोक ( Shlok ) 141 – 144
सुधर्माचार्यमासाद्य दीक्षित्वाऽभवदीदृशः । सूरदत्तचरः सोऽहं सुदत्तोप्यनुजो भवे ॥ १४१ ॥भ्रान्त्वान्ते सिन्धुतीरस्थमृगायणतपस्विनः । विशालायाश्च तोकोऽभूद्ङ्गोतमाख्यः कुदर्शनात् ॥ १४२ ॥तपः पञ्चाग्निमध्येऽसौ विधाय ज्योतिषां गणैः । देवः सुदर्शनो नान्ना भूत्वा प्राग्जन्मवैरतः ॥ १४३ ॥ममायमकरोदीद्धगिति तद्वाक्यमादरात् । श्रुत्वा सुदर्शनो मुक्तवैरः सद्धर्ममग्रहीत् ॥ १४४ ॥
उसी समय उसने सुधर्माचार्यके पास जाकर दीक्षा ले ली। वही सूरदत्तका जीव मैं यह सुप्रतिष्ठ हुआ हूँ। मेरा छोटा भाई सुदत्त संसारमें भ्रमण करता हुआ अन्तमें सिन्धु नदीके किनारे रहनेवाले मृगायण नामक तपस्वीकी विशाला नामकी स्त्रीसे गोतम नामका पुत्र हुआ । मिध्यादर्शनके प्रभावसे वह पञ्चाग्नियों के मध्यमें तपश्चरण कर सुदर्शन नामका ज्यौतिष्क देव हुआ–है। पूर्व भवके वैरके कारण ही इसने मुझ पर यह उपसर्ग किया है। सुदर्शन देवने उन सुप्रतिष्ठ केवलीके वचन बड़े आदरसे सुने और सब वैर छोड़कर समीचीन धर्म स्वीकृत किया ।। १४१-१४४ ।।
“At that very moment, he approached Acharya Sudharma and accepted the vows of initiation (Diksha). I, who have now become this sage Supratishtha, am that very soul of Suradatta. Meanwhile, my younger brother Sudatta, wandering through the cycle of worldly existence, was eventually reborn as a son named Gotama to Vishala, the wife of an ascetic named Mrigayana who lived on the banks of the Indus River.
Under the influence of false belief (Mithyadashana), he practiced severe austerities in the midst of five fires (Panchagni) and was subsequently reborn as a celestial being of the Jyotishka class named Sudarshana. It is solely due to the animosity of our past births that he inflicted this affliction upon me.’
The deity Sudarshana listened to the words of the omniscient Lord Supratishtha with deep reverence. Abandoning all past hatred, he wholeheartedly accepted the true Dharma.” ( 141–144)
श्लोक 145 से 153
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131
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