मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 24 to 33
श्लोक ( Shlok ) 24
नृपमावेदयत्स्वप्नांस्तत्फलश्रवणेच्छया । सावधिः सोऽप्यभाषिष्ट सम्भूतिं त्रिजगत्पतेः ॥ २४ ॥
अवधिज्ञानी राजाने बतलाया कि तुम्हारे तीन जगत्के स्वामी जिनेन्द्र भगवान्का जन्म होगा ॥२४।।
“The king, possessed of Avadhijnana (clairvoyant knowledge), foretold: ‘The Lord of the Three Worlds, Lord Jinendra, shall be born unto you.’ ॥24॥”
श्लोक ( Shlok ) 25
तद्वाश्रवणसम्फुल्लमनोवदनपङ्कजा । तदैवायातदेवेन्द्रकृताभिषवणोत्सवा ॥ २५ ॥
राजाके वचन सुनते ही रानीका हृदय तथा मुखकमल खिल उठा। उसी समय देवोंने आकर उसका अभिषेकोत्सव किया ॥ २५ ॥
“Upon hearing the king’s words, the queen’s heart and lotus-like face blossomed with joy. At that very moment, the celestial deities arrived and performed her ceremonial ablution (Abhisheka). ॥25॥”
श्लोक ( Shlok ) 26
सुरोपनीत भोगोपभोगैः स्वर्गसुखावहैः । नवमं मासमासाद्य सुखेनासूत सुप्रजाम् ॥ २६ ॥
स्वर्गीय सुख प्रदान करने वाले देवोपनीत भोगोपभोगोंसे उसका समय आनन्दसे बीतने लगा । अनुक्रमसे नवमा माह पाकर उसने सुखसे उत्तम बालक उत्पन्न किया ।। २६ ।।
“Her time passed in bliss, surrounded by the celestial comforts and enjoyments brought by the deities, which bestowed heavenly happiness. In due course, when the ninth month arrived, she happily gave birth to an exceptional male child. ॥26॥”
श्लोक ( Shlok ) 27
संवत्सरचतुः पञ्चाशलक्षप्रमितं व्रजन् । मल्लीशतीर्थसन्तानकालान्तर्गतजीवितम् ॥ २७ ॥
श्रीमल्लिनाथ तीर्थंकरके बाद जब चौवन लाख वर्ष बीत चुके तब इनका जन्म हुआ था, इनकी आयु भी इसीमें शामिल थी ॥ २७ ॥
“He was born when fifty-four lakh (5.4 million) years had elapsed after Lord Mallinatha Tirthankara; his own lifespan was also included within this period. ॥27॥”
श्लोक ( Shlok ) 28
तज्जन्मसमयायातैः स्वदीप्तिव्याप्तदिङ्मुखैः । मेरौ सुरेन्द्रैः सम्प्राप मुनिसुव्रतसुश्रुतिम् ॥ २८ ॥
जन्म-समयमें आये हुए एवं अपनी प्रभासे समस्त दिङ्मण्डलको व्याप्त करने वाले इन्द्रोंने सुमेरु पर्वतपर ले जाकर उनका जन्माभिषेक किया और मुनिसुव्रतनाथ यह नाम रक्खा ॥ २८ ॥
“The Indras, who had arrived at the time of birth and whose radiant splendor pervaded all directions, carried him to Mount Sumeru, performed his birth ablution (Janma-Abhisheka), and named him ‘Munisuvratanatha’. ॥28॥”
श्लोक ( Shlok ) 29
त्रिंशत्सहस्त्रवर्षायुश्चापविंशतिसम्मितः । ‘सर्पाशनगलच्छायः सम्पन्नाखिललक्षणः ॥ २९ ॥
उनकी आयु तीस हजार वर्षकी थी, शरीरकी ऊंचाई बीस धनुषकी थी, कान्ति मयूरके कण्ठके समान नीली थी, और स्वयं वे समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न थे ।। २९ ।।
“His lifespan was thirty thousand years, the height of his body was twenty Dhanushas, his complexion was deep blue like a peacock’s throat, and he himself was endowed with all auspicious marks. ॥29॥”
श्लोक ( Shlok ) 30
खद्वयेन्द्रियसप्ताङ्कवर्षेः कौमारनिर्गमे । राज्याभिषेकं सम्प्राप्य प्राप्तानन्दपरम्परः ॥ ३० ॥
कुमार कालके सात हजार पाँच सौ वर्ष बीत जानेपर वे राज्याभिषेक पाकर आनन्दकी परम्पराको प्राप्त हुए थे ॥ ३० ॥
“After seven thousand five hundred years of his youth (Kumara-kala) had passed, he received his royal coronation, attaining a continuous lineage of bliss. ॥30॥”
श्लोक ( Shlok ) 31- 33
शून्यत्रिकेन्द्रियैकोक्तसंवत्सरपरिक्षये । गर्जङ्घनघटाटोपसमये यागहस्तिनः ॥ ३१ ॥वनस्मरणसन्त्यक्तकवलग्रहणं नृपः । निरीक्ष्यावधिनेत्रेण विज्ञातैतन्मनोगतः ॥ ३२ ॥तत्पूर्वभवसंबद्धं कौतूहलवतां नृणाम् । अवोचद् वृत्तिमित्युच्चैः स मनोहरया गिरा ॥ ३३ ॥
इस प्रकार जब उनके पन्द्रह हजार वर्ष बीत गये तब किसी दिन गर्जती हुई घन-घटाके समय उनके यागहस्तीने वनका स्मरण कर ग्रास उठाना छोड़ दिया- खाना पीना बन्द कर दिया। महाराज मुनिसुव्रतनाथ, अपने अवधिज्ञान रूपी नेत्रके द्वारा देख कर उस हाथीके मनकी सब बात जान गये। वे कुतूहलसे भरे हुए मनुष्योंके सामने हाथीके पूर्वभवसे सम्बन्ध रखने वाला वृत्तान्त उच्च एवं मनोहर वाणीसे इस प्रकार कहने लगे ।। ३१-३३ ॥
“In this manner, when fifteen thousand years of his reign had passed, one day, amidst the rumbling of gathering dark clouds, his sacrificial elephant (Yaga-hasti) remembered the wild forests and stopped taking its feed—completely halting its eating and drinking. King Munisuvratanatha, perceiving through the eye of his Avadhijnana (clairvoyant knowledge), understood everything that was passing in the elephant’s mind. Then, in the presence of the people filled with curiosity, he began to narrate the tale of the elephant’s past life in an elevated and beautiful voice, as follows: ॥31–33॥”
श्लोक 34 से 43
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