नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
तदालोक्य हरिः क्रुद्धो हरिर्वा करिणां कुलम् । सामन्तबलसन्दोहसहितो हन्तुमुद्यतः ॥ ११२ ॥
यह देख, जिस प्रकार सिंह हाथियोंके समूह पर टूट पड़ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण क्रुद्ध होकर तथा सामन्त राजाओंकी सेनाके समूह साथ लेकर शत्रुको मारनेके लिए उद्यत हो गये- शत्रु पर टूट पड़े ॥ ११२ ॥
“Seeing this, just as a lion springs upon a herd of elephants, even so Sri Krishna grew furious and, taking along the hosts of the vassal kings’ armies, prepared to slay the enemy—rushing fiercely upon them.” 112
श्लोक ( Shlok ) 113 – 114
भास्करस्योदयाद्वान्धकारं शत्रुबलं तदा । विलीनं तन्निरीक्ष्यैत्य जरासन्धोऽन्वितः क्रधा ॥ ११३ ॥द्योतिताखिलदिक्चक्रं चक्रमादाय विक्रमात् । त्रिविक्रमं समुद्दिश्य न्यक्षिपद्रूक्षवीक्षणः ॥ ११४ ॥
जिस प्रकार सूर्यका उदय होते ही अन्धकार विलीन हो जाता है उसी प्रकार श्रीकृष्णको देखते ही शत्रुओं की सेना विलीन हो गई – उसमें भगदड़ मच गई। यह देख, क्रोधसे भरा जरासन्ध आया और उसने रूक्ष दृष्टिसे देखकर, अपने पराक्रमसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला चक्ररत्न ले श्रीकृष्णकी ओर चलाया ।। ११३-११४ ।।
“Just as darkness vanishes the moment the sun rises, even so the army of the enemies scattered and fled in panic the moment they beheld Sri Krishna. Seeing this, Jarasandha, filled with rage, glared with a harsh look and, taking up his magnificent discuss weapon (Chakraratna)—which illuminated all directions with its supreme power—hurled it toward Sri Krishna.”113 – 114
श्लोक ( Shlok ) 115
तत्तं प्रदक्षिणीकृत्य स्थितवद्दक्षिणे भुजे । तदेवादाय कंसारिर्मगधेशोऽच्छिनच्छिरः ॥ ११५ ॥
परन्तु वह चक्र प्रदक्षिणा देकर श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजा पर ठहर गया। तदनन्तर वही चक्र लेकर श्रीकृष्णने मगधेश्वर – जरासन्धका शिर काट डाला ॥ ११५ ॥
“However, that discus, after circumambulating Sri Krishna, came to rest upon His right arm. Thereupon, taking that very same discus, Sri Krishna severed the head of Jarasandha, the Lord of Magadha.”
श्लोक ( Shlok ) 116
सद्यो जयानकानीकं नदन्ति स्मागलन् दिवः । सुरद्रुमप्रसूनानि सह गन्धाम्बुबिन्दुभिः ॥ ११६ ॥
उसी समय कृष्णकी सेनामें जीतके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे सुगन्धित जलकी बूँदोंके साथ-साथ कल्पवृक्षों के फूल बरसने लगे ॥ ११६ ॥
“At that very moment, the drums of victory began to resound in Sri Krishna’s army, and flowers from the Kalpavrikshas (celestial wish-fulfilling trees) began to rain down from the heavens along with drops of fragrant water.”116
श्लोक ( Shlok ) 117
चक्री चक्रं पुरस्कृत्य विजिगीषुर्दिशो भृशम् । प्रस्थानमकरोत्सार्धं बलेन स्वबलेन च४ ॥ ११७ ॥
चक्रवर्ती श्रीकृष्णने दिग्विजयकी भारी इच्छाके चक्ररत्न आगे कर बड़े भाई बलदेव तथा अपनी सेनाके साथ प्रस्थान किया ॥ ११७ ॥
“With a powerful desire for world conquest (Digvijaya), the universal sovereign (Chakravarti) Sri Krishna set forth with the magnificent discus weapon (Chakraratna) leading the way, accompanied by His elder brother Baladeva and His army.”117
श्लोक ( Shlok ) 118
मागधादीन्सुरान् जित्वा विधेयीकृत्य विश्रुतान् । गृहीत्वा साररत्नानि तद्दतान्यूर्जितोदयः ॥ ११८ ॥
जिनका उदय बलवान् है ऐसे श्रीकृष्णने मागध आदि प्रसिद्ध देवोंको जीत कर अपना सेवक बनाया और उनके द्वारा दिये हुए श्रेष्ठ रत्न ग्रहण किये ॥ ११८ ॥
“Sri Krishna, whose rise to power was mighty, conquered the renowned deities such as Magadha and made them his servants, accepting the magnificent jewels they offered to Him.” 118
श्लोक ( Shlok ) 119
सिन्धुसिन्धुखगाद्र्यन्तरालव्याधधराधिपान् । स्वपादनखभाभारमानमय्योदवाहयन् ॥ ११९ ॥
लवण समुद्र सिन्धु नदी और विजयार्धपर्वतके बीचके म्लेच्छ राजाओंसे नमस्कार कराकर उनसे अपने पैरोंके नखोंकी कान्तिका भार उठवाया ।। ११९ ॥
“Having forced the Mlechchha kings—who ruled the territories between the salt ocean, the Indus river, and Mount Vijayardha—to bow down before Him, He made them bear the weight of the radiant splendor of His toenails.”119
श्लोक ( Shlok ) 120
खेचराचलवाराशिगङ्गामध्यगतान् पुनः । वशीकृत्य वशी तूर्ण म्लेच्छराजान् सखेचरान् ॥ १२० ॥
तदनन्तर विजयार्ध पर्वत, लवणसमुद्र और गङ्गानदीके मध्यमें स्थित म्लेच्छ राजाओंको विद्याधरोंके साथ ही साथ जितेन्द्रिय श्रीकृष्णने शीघ्र ही वश कर लिया ।।1२० ।।
“Thereafter, Sri Krishna, who had completely mastered His senses, swiftly subjugated the Mlechchha kings residing between Mount Vijayardha, the salt ocean, and the Ganges river, along with the Vidyadharas (celestial beings).”।। १२० ।।
श्लोक ( Shlok ) 121
भरतार्धमहीनाथो दूरोच्छ्रितपताकिकाम् । उद्धद्धतोरणां द्वारवतीं हृष्टो विवेश सः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार आधे भरतके स्वामी होकर श्रीकृष्णने, जिसमें बहुत ऊँची पताकाएँ फहरा रही हैं और जगह जगह तोरण बाँधे गये हैं ऐसी द्वारावती नगरी में बड़े हर्षसे प्रवेश किया ॥ १२१ ॥
“In this manner, having become the lord of half of Bharata, Sri Krishna entered the city of Dwaravati with great joy—a city where exceedingly high flags were fluttering and triumphal arches (toranas) were erected at various places.”121
श्लोक 122 से 130
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