नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 258 to 272
श्लोक ( Shlok ) 258 – 264
तन्निर्वेगेण चित्राङ्गदाद्याः सप्तापि संयमम् । भूतानन्दाख्यतीर्थेशपादमूले समाश्रयन् ॥ २५८ ॥ते कालान्तेऽभवन्कल्पे तुर्ये सामानिकाः सुराः । सप्ताब्ध्यायुः स्थितिप्रान्ते ततः प्रच्युत्य भारते ॥ २५९॥कुरुजाङ्गलदेशेऽस्मिन् हास्तिनाख्यपुरेऽभवत् । बन्धुमत्यां सुतः श्वेतवाहनाख्यवणिक्पतेः ॥ २६० ॥ शङ्खो नाम धनद्धर्यासौ सुभानुर्धनदः स्वयम् । तत्पुराधिपतेर्गङ्गदेवनामधरेशिनः ॥ २६१ ॥ तद्देव्या नन्दयशसः शेषास्ते यमलास्त्रयः । गङ्गाख्यो गङ्गदेवश्च गङ्गमित्रश्च नन्दवाक् ॥ २६२ ॥ सुनन्दो नन्दिषेणश्च जाताः स्निग्धाः परस्परम् । गर्भेऽन्यस्मिन् महीनाथस्तस्यामासीग्निरुत्सुकः ॥२६३॥तदौदासीन्यमुत्पन्न पुत्र हेतुकमित्यसौ । न्यदिशङ्गेवतीं धात्रीं तदपत्यनिराकृतौ ॥ २६४ ॥
यह सब देखकर चित्राङ्गद आदि सातों भाई विरक्त हो गये और उन्होंने श्रीभूतानन्द तीर्थङ्करके चरणमूल में जाकर संयम धारण कर लिया। आयुका अन्त होने पर वे सब चतुर्थ स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ सात सागरकी उनकी आयु थी। उसके बाद वहाँ से च्युत होकर इसी भरत क्षेत्रके कुरुजांगल देशसम्बन्धी हस्तिनापुर नगर में सेठ श्वेतवाहनके उसकी स्त्री बन्धुमतीसे सुभानुका जीव शङ्ख नामका पुत्र हुआ। वह सुभानु धन-सम्पदा में स्वयं कुबेर था । उसी नगर में राजा गङ्गदेव रहता था। उसकी स्त्रीका नाम नन्दयशा था, सुभानु के बाकी छह भाइयोंके जीव उन्हीं दोनोंके दो-दो कर तीन बारमें छह पुत्र हुए। गङ्ग, गङ्गदेव, गङ्गमित्र, नन्द, सुनन्द, और नन्दिद्वेण ये उनके नाम थे। ये छहों भाई परस्परमें बड़े स्नेहसे रहते थे। नन्दयशाके जब सातवां गर्भरहा तब राजा उससे उदास हो गया, रानीने राजाकी इस उदासीका कारण गर्भमें आया बालक ही समझा इसलिए उसने रेवती धायको आज्ञा दे दी कि तू इस पुत्रको अलग कर दे । ॥ २५८-२६४ ॥
Seeing all of this, Chitrangad and the other seven brothers became detached from worldly life (attained vairagya). They approached the feet of Shri Bhutanand Tirthankara and initiated themselves into self-restraint (samyama).
Upon reaching the end of their lifespans, they were all reborn as Samanika category celestial beings (devas) in the fourth heaven. Their lifespan there was seven sagar (a long cosmic unit of time).
After descending from that realm, the soul of Subhanu was reborn in Hastinapur city, located within the Kurujangal region of this Bharat Kshetra. He was born as a son named Shankha to Seth Shvetavahan and his wife, Bandhumati. In terms of wealth and prosperity, Shankha was like Kubera himself.
In that same city lived King Gangadev, whose wife was named Nandayasha. The souls of the remaining six brothers of Subhanu were born to this royal couple as six sons across three births (two sons each time). Their names were:
- Ganga
- Gangadev
- Gangamitra
- Nanda
- Sunanda
- Nandishena
These six brothers lived together with deep affection for one another.
When Nandayasha became pregnant with her seventh child, the King grew detached and indifferent toward her. Attributing the King’s sadness to the unborn child in her womb, the Queen ordered her wet nurse, Revati, to get rid of the child.[ 258-264]
श्लोक ( Shlok ) 265 – 272
तं सा नन्दयशोज्येष्ठबन्धुमत्यै समर्पयत् । निर्नामकाख्यां तत्राप्य परेद्युर्नन्दने वने ॥ २६५ ।। प्रपश्यन् सहभुञ्जानान् षण्महीशसुतान् समम् । त्वमप्यमीभिर्भुक्ष्वेति शङ्खन समुदाहृतम् ॥ २६६ ॥स्थितो भोक्तुमसौ नन्दयशास्यं वीक्ष्य कोपिनी । कस्यायमिति पादेनाहंस्तावन्वीयतुः शुचम् ॥ २६७ ॥ शङ्खनिर्नामकौ राज्ञा कदाचित्सह वन्दितुम् । द्रमसेनमुनि याताववधिज्ञानलोचनम् ॥ २६८ ॥ अभिवन्द्य ततो धर्मश्रवणानन्तरं पुनः । निर्नामकाय किं नन्दयशाः कुप्यत्यकारणम् ॥ २६९॥ इति शङ्खन पृष्टोऽसौ मुनिरेवमभाषत । सुराष्ट्रविषये राजा गिर्यादिनगराधिपः ॥ २७० ॥ अभूष्चित्ररथो नाम तस्यामृतरसायनः । सूपकारः पलं पक्तुं कुशलोऽस्मै प्रतुष्टवान् ॥ २७१ ॥ अदित द्वादशग्रामान् महीशो मांसलोलुपः । स कदाचित्सुधर्माख्ययत्यभ्याशे श्रुतागमः ॥ २७२ ॥
रेवती भी उत्पन्न होते ही वह पुत्र नन्दद्यशाकी बड़ी बहिन बन्धुमतीके लिए सौंप आई । उसका नाम निर्नामक रक्खा गया। किसी एक दिन ये सब लोग नन्दनवनमें गये, वहाँपर राजाके छहों पुत्र एक साथ खा रहे थे, यह देखकर शंखने निर्नामकसे कहा कि तू भी इनके साथ वा ।शङ्खके कहनेसे निर्नामक उनके साथ खानेके लिए बैठा ही था कि नन्दयशा उसे देखकर क्रोध करने लगी और यह किसका लड़का है, यह कहकर उसे एक लात मार दी। इस प्रकरणसे शङ्ख और निर्नामक दोनोंको बहुत शोक हुआ। किसी एक दिन शङ्ख और निर्नामक दोनों ही राजाके साथ-साथ अवधिज्ञानी द्रुमसेन नामक मुनिराजकी वन्दनाके लिए गये। दोनोंने मुनिराजकी वन्दना की, धर्मश्रवण किया और तदनन्तर शङ्खने मुनिराजसे पूछा कि नन्दयशा निर्नामकसे अकारण ही क्रोध क्यों करती है ? इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिराज कहने लगे कि सुराष्ट्र देशमें एक गिरिनगर नामका नगर है। उसके राजाका नाम चित्ररथ था। चित्ररथके एक अमृत-रसायन नामका रसोइया था । वह मांस पकाने में बहुत ही कुशल था इसलिए मांसलोभी राजाने सन्तुष्ट होकर उसे बारह गाँव दे दिये थे। एक दिन राजा चित्ररथने सुधर्म नामक मुनिराजके समीप आगमका उपदेश सुना ॥ २६५-२७२ ।।
As soon as the boy was born, Revati handed him over to Nandayasha’s elder sister, Bandhumati. The boy was named Nirnamak.
One day, all of them went to the Nandanvan garden. There, the king’s six sons were eating together. Seeing this, Shankha said to Nirnamak, “You go and eat with them too.” At Shankha’s insistence, just as Nirnamak sat down to eat with them, Nandayasha saw him and grew furious. Exclaiming, “Whose boy is this?”, she kicked him. This incident caused immense grief to both Shankha and Nirnamak.
On another day, both Shankha and Nirnamak accompanied the king to pay their respects to a Muniraj (monk) named Drumasen, who possessed Avadhijnana (clairvoyance). Both of them bowed to the Muniraj and listened to his religious discourse. Afterward, Shankha asked the Muniraj, “Why does Nandayasha hold such baseless anger toward Nirnamak?”
Upon being asked this, the Muniraj began to explain:
In the country of Surashtra, there was a city named Girinagar. Its king was named Chitrarth. King Chitrarth had a cook named Amrit-Rasayan, who was highly skilled in cooking meat. Pleased with his skills, the meat-loving king rewarded him with twelve villages. One day, King Chitrarth listened to the teachings of the scriptures in the presence of a Muniraj named Sudharma.[265-272]
श्लोक 273 से 282
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257
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