पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 134 to 141
श्लोक ( Shlok ) 134 – 138
नयन्स चतुरो मासान् छान्नस्थ्येन विशुद्धिभात् । दीक्षाग्रहवने देवदारुभूरिमहीरुहः ॥ १३४ ॥ अधस्तादष्टमाहाख्यागादाराविशुद्धिकः । प्रत्यासन्नभवप्रान्तो योगं सप्तदिनावधिम् ॥ १३५ ॥गृहीत्वा सत्त्वसारोऽस्थाद् धर्मध्यानं प्रवर्तयन् । शम्बरोऽत्राम्बरे गच्छन्नगच्छत्स्वं विमानकम् ।। १३६ ।। लोकमानो विभङ्गेन ‘स्पष्टप्राग्वैरबन्धनः । शेषात्कृतमहाघोषो महावृष्टिमपातयत् ॥ १३७ ॥ व्यधात्तदैव सप्ताहान्यन्यांश्च विविधान्विधीः । महोपसर्गान् शैलोपनिपातान्तानिवान्तकः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार अत्यन्त विशुद्धिको धारण करनेवाले भगवान् ने छद्मस्थ अवस्थाके चार माह व्यतीत किये । तदनन्तर जिस वनमें दीक्षा ली थी उसी वनमें जाकर वे देवदारु नामक एक बड़े वृक्षके नीचे विराजमान हुए। वहां तेलाका नियम लेनेसे उनकी विशुद्धता बढ़ रही थी, उनके संसारका अन्त निकट आ चुका था और उनकी शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जाती थी, इस प्रकार वे सात दिनका योग लेकर धर्मध्यानको बढ़ाते हुए विराजमान थे। इसी समय कमठ-का जीव शम्बर नामका असुर आकाशमार्गसे जा रहा था कि अकस्मात् उसका विमान रुक गया । जब उसने विभङ्गावधि ज्ञानसे इसका कारण देखा तो उसे अपने पूर्वभवका सब वैर-बन्धन स्पष्ट दिखने लगा। फिर क्या था, क्रोधवश उसने महा गर्जना की और महावृष्टि करना शुरू कर दिया । इस प्रकार यमराजके समान अतिशय दुष्ट उस दुर्बुद्धिने सात दिन तक लगातार भिन्न-भिन्न प्रकार के महा उपसर्ग किये। यहाँ तक कि छोटे-मोटे पहाड़ तक लाकर उनके समीप गिराये ।।१३४-१३८ ।।
In this manner, maintaining ultimate spiritual purity, the Lord spent four months in the Chhadmastha (pre-enlightened/non-omniscient) state. Thereafter, he returned to the very forest where he had taken initiation and sat beneath a massive Devadaru (Deodar) tree. There, by undertaking the vow of a three-day fast (Tela), his inner purity was intensifying, the end of his worldly transmigration had drawn near, and his spiritual power was growing exponentially. Thus, adopting a meditative stance for seven days, he remained seated, elevating his Dharma-Dhyana (righteous meditation).
At that very moment, an Asura named Shambara—the reincarnated soul of Kamatha—was traveling through the skyways when his celestial vehicle (Vimana) abruptly came to a halt. When he investigated the cause using his Vibhanga-Avadhi-Jnana (distorted clairvoyance), the entire bond of enmity from his previous births became vividly clear to him. What followed was immense fury; driven by blind rage, he roared thunderously and began to unleash a torrential downpour. In this manner, acting as cruel as Yama (the God of Death), that wicked and evil-minded being continuously inflicted various types of severe afflictions (Upasarga) for seven consecutive days, to the extent of hurling entire hillocks and boulders near the Lord. || 134-138 ||
श्लोक ( Shlok ) 139 – 141
‘तं ज्ञात्वाऽवधिबोधेन धरणीशो विनिर्गतः । धरण्याः प्रस्फुरद्रत्न फणामण्डपमण्डितः ॥ १३९ ॥ भद्रं तमस्थादावृत्य तत्पत्नी च फणाततेः । उपर्युच्चैः समुद्धत्य स्थिता वज्रातपच्छिदम् ॥ १४० ॥ अमू क्रूरौ प्रकृत्यैव नागौ सस्मरतुः कृतम् । नोपकारं परे तस्माद्विस्मरन्त्यार्द्रचेतसः ॥ १४१ ॥
अवधिज्ञानसे यह उपसर्ग जानकर धरणेन्द्र अपनी पत्नीके साथ पृथिवीतलसे बाहर निकला उस समय वह धरणेन्द्र, जिसपर रत्न चमक रहे हैं ऐसे फणारूपी मण्डपसे सुशोभित था । धरणेन्द्र भगवान को फणाओंके समूहसे आवृतकर खड़ा हो गया और उसकी पत्नी मुनिराज पार्श्वनाथ के ऊपर बहुत ऊँचा वज्रमय छत्र तानकर स्थित हो गयी। आचार्य कहते हैं कि देखो, स्वभाव से ही क्रूर रहने वाले सर्पसर्पिणीने अपने ऊपर किया उपकार याद रखा सो ठीक ही है, क्योंकि दयालु पुरुष अपने ऊपर किये उपकार को कभी नहीं भूलते ।। १३९ – १४१ ।।
Learning of this affliction (Upasarga) through his Avadhi-Jnana (clairvoyance), Dharanendra emerged from the depths of the earth along with his consort. At that moment, Dharanendra was beautifully adorned with a canopy of hoods glittering with radiant gems. He stood there, completely shielding the Lord with his cluster of expansive hoods, while his consort stood by, holding a magnificent, diamond-hard celestial umbrella (Vajramaya Chhatra) high above Sage Parshvanath. The Acharya reflects: Look, the serpent and his mate, who are cruel by nature, remembered the kindness once shown to them, which is only fitting—for compassionate beings never forget a favor done to them. || 139 – 141 ||
श्लोक 142 से 152
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