अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 232 to 240
श्लोक ( Shlok ) 232
मृगोऽगाद् वायुवेगेन तं ग्रहीतुमवारयन् । आगतोऽहं प्रयात्यस्तमर्को यावः पुरं प्रति ॥ २३२ ॥
कहने लगा कि हे प्रिये ! वह मृग तो वायुके समान वेग-से चला गया। मैं उसे पकड़ने के लिए असमर्थ रहा अतः लौट आया हूँ, अब सूर्य अस्त हो रहा है इसलिए हम दोनों अपने नगरकी ओर चलें ॥ २३२ ॥
“He began to say, ‘O beloved! That deer dashed away with the speed of the wind. I was unable to capture it and have therefore returned. Now, the sun is setting, so let us both head back toward our city.’ || 232 ||”
श्लोक ( Shlok ) 233 – 234
इत्युक्त्वाऽऽरोप्य तां खेटो विमानमगमत् शठः । गत्वाऽन्तरे स्वसौरूप्यशालिना दर्शितं निजम् ॥ २३३॥रूपमालोक्य तत्कोऽयमिति सा विह्वलाऽभवत् । इतस्तत्प्रोक्तवैतालीं सुतारारूपधारिणीम् ॥२३४॥
इतना कहकर उस धूर्त विद्याधरने सुताराको विमान पर बैठाया और वहाँ से चल दिया। बीचमें उसने अपना रूप दिखाया जिसे देख कर ‘यह कौन है’ ऐसा कहती हुई सुतारा बहुत ही विह्वल हुई। इधर उसी अशिनघोष विद्याधरके द्वारा प्रेरित हुई वैताली विद्या सुताराका रूप रखकर बैठ गई ॥ २३३-२३४ ॥
“Saying this, that deceitful Vidyadhara seated Sutara upon his celestial chariot (Vimana) and departed from there. Along the way, he revealed his true form; seeing this, Sutara became utterly overwhelmed with grief and panic, crying out, ‘Who is this?!’ Meanwhile, back at the forest, a Vaitali Vidya (an illusory entity) conjured by that same Vidyadhara Ashanighosh assumed the form of Sutara and sat waiting. || 233-234 ||”
श्लोक ( Shlok ) 235 – 237
स्थितां कुक्कुटसर्पेण दष्टाहमिति सम्भ्रमात् । श्रियमाणामिवालोक्य विनिवृत्यागतः स्वयम् ॥ २३५॥अहार्य तद्विषं ज्ञात्वा मणिमन्त्रौषधादिभिः । सुस्निग्धः पोदनाधीशो मर्तु सह तयोत्सुकः ॥२३६॥सूर्यकान्तसमुद्भूतदहनज्वलितेन्धनः । चितिकां कान्तया सार्द्धमारुरोह शुचाकुलः ॥ २३७ ॥
जब श्रीविजय वापिस लौटकर आया तब उसने कहा कि मुझे कुक्कुटसाँपने डस लिया है। इतना कह कर उसने बड़े संभ्रमसे ऐसी चेष्टा बनाई जैसे मर रही हो। उसे देख राजाने जाना कि इसका विष मणि, मन्त्र तथा औषधि आदिसे दूर नहीं हो सकता। अन्तमें निराश होकर स्नेहसे भरा पोदनाधिपति उस कृत्रिम सुताराके साथ मरनेके लिए उत्सुक हो गया। उसने एक चिता बनाई, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अग्निके द्वारा उसका इन्धन प्रज्वलित किया और शोकसे व्याकुल हो उस कपटी सुताराके साथ चिता पर आरूढ़ हो गया ।। २३५-२३७ ।।
“When Shrivijaya returned, she (the illusory Sutara) said, ‘A cock-atrice (Kukkuta-serpent) has bitten me.’ Saying this, she franticly put on an act as if she were dying. Seeing her, the king realized that her venom could not be cured by any mystical gems, mantras, or medicines. Ultimately, losing all hope and filled with deep affection, the Lord of Podanpur became eager to die alongside that counterfeit Sutara. He constructed a pyre, ignited the wood using fire generated from a Suryakantamani (sun-crystal gem), and, overwhelmed with intense grief, ascended the pyre with the deceitful Sutara. || 235-237 ||”
श्लोक ( Shlok ) 238 – 239
खेचरी कौचित् तत्र सन्निहितौ तयोः । विद्याविच्छेदिनीं विद्यां स्मृत्यैकेन महौजसा ॥२३८ ॥ हताऽसौ भीतवैताली वामपादेन दर्शित । स्वरूपास्य पुरः स्थातुमशक्ताऽगाददृश्यताम् ॥ २३९ ॥
उसी समय वहाँ से कोई दो विद्याधर जा रहे थे उनमें एक महा तेजस्वी था उसने विद्याविच्छेदिनी नामकी विद्याका स्मरण कर उस भयभीत वैतालीको बायें पैरसे ठोकर लगाई जिससे उसने अपना असली रूप दिखा दिया। अब वह श्री-विजयके सामने खड़ी रहनेके लिए भी समर्थ न हो सकी अतः अदृश्यताको प्राप्त हो गई ॥ २३८-२३९ ।।
“At that very moment, two Vidyadharas happened to be passing by that place. Among them, one who possessed immense radiance recalled a mystical power named Vidyavichhedini (the lore that destroys illusions/magical spells) and kicked that terrified Vaitali with his left foot, causing her to reveal her true, original form. Now, she was no longer able to even stand in front of Shrivijaya; therefore, she vanished from sight and became invisible. || 238-239 ||”
श्लोक ( Shlok ) 240
तद्विलोक्य महीपालो नितरां विस्मयं गतः । किमेतदित्यवोचत्तं खचरश्चाह तत्कथाम् ॥ २४० ॥
यह देख राजा श्रीविजय बहुत भारी आश्चर्यको प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि यह क्या है ? उत्तरमें विद्याधर उसकी कथा इस प्रकार कहने लगा ।। २४० ॥
“Seeing this, King Shrivijaya was struck with immense astonishment. He exclaimed, ‘What is the meaning of this?!’ In response, the Vidyadhara began to narrate her story in this manner. || 240 ||”
श्लोक 241 से 252
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