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मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 274 to 283
श्लोक ( Shlok ) 274
हास्तिनाख्यपुराधीशो राज्ञो मेघरथश्रुतेः । पद्मावत्याश्च सञ्जातौ विष्णुपद्मरथौ सुतौ ॥ २७४ ॥
हस्तिनापुरके राजा मेघरथके पद्मावती रानीसे विष्णु और पद्मरथ नामके दो पुत्र हुए थे ॥ २७४ ॥
King Megharatha of Hastinapur had two sons, named Vishnu and Padmaratha, born to his queen, Padmavati. || 274 ||
श्लोक ( Shlok ) 275 – 278
सह विष्णुकुमारेण भूपतौ तपसि स्थिते । पश्चात्पद्मरथे राज्यमलङ्कुर्वत्यथान्यदा ॥ २७५ ॥प्रत्यन्तवासिसंक्षोभे सञ्जते सचिवाग्रणीः । सामादिभिरुपायैस्तं प्रशान्ति समजीगमत् ॥ २७६ ॥राशा तुष्टवतावादि त्वयेष्टं वाच्यतामिति । राज्यं सप्तदिनं कर्तुमिच्छामीत्यब्रवीद् बली ॥ २७७ ॥ दत्तं जरसृणं मत्वा “तेन तस्मै तदूर्जितम् । कृतोपकारिणे देयं किं न तत्कृतवेदिभिः ॥ २७८ ॥
कुछ समय बाद राजा मेघरथ तो विष्णुकुमार पुत्रके साथ तप करने लगे और पद्मरथ राज्य करने लगा। किसी अन्य समय समीपवर्ती किसी राजाने राज्य में क्षोभ उत्पन्न किया जिसे प्रधान मन्त्री वलिने साम आदि उपायोंसे शान्त कर दिया। राजा पद्मरथने वलिके कार्यसे सन्तुष्ट होकर कहा कि ‘तुझे क्या इष्ट है ? तू क्या चाहता है ?’ सो कह ! उत्तरमें वलिने कहा कि मैं सात दिन तक राज्य करना चाहता हूँ। राजाने भी वलिकी इस माँगको जीर्णतृणके समान तुच्छ समझ उसे सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो किये हुए उपकारको जानते हैं अर्थात् कृतज्ञ हैं वे उपकार करनेवालेके लिए क्या नहीं देते हैं? ॥ २७५-२७८ ॥
After some time, King Megharatha began practicing penance along with his son Vishnukumar, while Padmaratha began to rule the kingdom. At another time, a neighboring king created a disturbance in the kingdom, which the prime minister, Bali, pacified using political expedients such as Sama (conciliation) and others. Pleased with Bali’s work, King Padmaratha said, “What is your desire? Speak, what do you want?” In response, Bali said, “I wish to rule the kingdom for seven days.” Considering this request of Bali as trivial as a blade of withered grass, the King agreed to grant him the kingdom for seven days. This is indeed fitting, for what is there that those who acknowledge favors received—that is, the grateful ones—will not give to their benefactor? || 275-278 ||
श्लोक ( Shlok ) 279 – 280
तत्राकम्पनगुर्वाद्यमागत्य मुनिमण्डलम् । अग्रहीदातपे योगं सर्व सौम्यमहीभृति ॥ २७९ ॥निर्जिता प्राग्विदुब्विण्यामकम्पनमुनीशिना । वादे सभायां तत्कोपात्तं जिघांसुरवात्मकः ॥ २८० ॥
उसी समय अकम्पन गुरु आदि मुनियोंके समूहने हस्तिनापुर आकर वहाँ के सौम्य पर्वत पर आतापन योग धारण कर लिया। पहले जब वलि मन्त्री उज्जयिनी नगरीमें रहता था तब उसे अकम्पन गुरुने शास्त्रार्थके समय विद्वानोंकी सभामें जीत लिया था इसलिए वह पापी क्रोधसे उनका घात करनाचाहता था ।। २७९-२८० ॥
At that very same time, a group of ascetics led by Guru Akampana arrived in Hastinapur and undertook Atapana Yoga (the austerity of enduring the sun’s heat) on the Saumya Mountain there. Earlier, when the minister Bali used to reside in the city of Ujjayini, Guru Akampana had defeated him in a scriptural debate before an assembly of scholars. For this reason, that wicked sinner, driven by anger, wished to harm them. || 279-280 ||
श्लोक ( Shlok ) 281 – 283
यागग्याजं समारभ्य स मन्त्री परितो गिरिम् । ‘अर्थिताहारदानार्थ देवसन्तर्पणाय च ॥ २८१ ॥पार्क प्रकल्पयामास धूमज्वालाग्निसन्ततम् । ज्ञात्वा विष्णुकुमारस्तमुपसर्ग मुनीश्वरः ॥ २८२ ॥गत्वा पद्मरथाभ्यर्ण वीतरागासने स्थितः । राज्ञाभिवन्द्य सम्पूज्य किं कृत्यमिति भाषितः ॥ २८३ ॥
पापी वलि मन्त्रीने यज्ञका बहाना कर उस सौम्य पर्वतके चारों ओर याचकोंको दान देने तथा देवताओंको सन्तुष्ट करनेके लिए पाक अर्थात् रसोई बनवाना शुरू किया जिससे धुआँ तथा ज्वालाओंका समूह चारों ओर फैलने लगा। जब मुनिराज विष्णुकुमारको इस उपसर्गका पता चला तो वे आकर राजा पद्मरथके पास गये और वीतराग आसन पर बैठ गये । राजा पद्मरथने उनकी बन्दना की, पूजा की तथा कहा कि मुझसे क्या कार्य है ? ॥ २८१-२८३ ॥
Using a sacrificial ritual (Yajna) as a pretext, the wicked minister Bali began cooking food all around that Saumya Mountain to distribute alms to beggars and to please the deities, due to which a massive amount of smoke and flames began to spread in all directions. When the monk-king Vishnukumar came to know of this affliction, he arrived and approached King Padmaratha, seating himself in a detached (Veetaraga) posture. King Padmaratha bowed to him, worshipped him, and asked, “What service can I perform for you?” || 281-283 ||
श्लोक 284 से 292
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