अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 22 to 34
श्लोक ( Shlok ) 22
तस्य जन्मोत्सवस्यालं वर्णनाय मरुद्वराः । यदि स्वर्ग समुद्वास्य” सर्वेऽप्यत्र सजानयः ॥ २२ ॥
उनके जन्म के समय जो उत्सव हुआ था उसका वर्णन करनेके लिए इतना लिखना ही बहुत है कि उसमें शामिल होनेके लिए अपनी-अपनी देवियों सहित समस्त उत्तम देव स्वर्ग खाली कर यहाँ आये थे ॥ २२ ॥
“To describe the celebration that took place at the time of his birth, it is enough to say that all the prominent gods, accompanied by their respective goddesses, had vacated heaven to come and attend it. || 22 ||”
श्लोक ( Shlok ) 23
अत्यल्पं तृप्तिमापन्ना दीनानाथवनीपकाः । इतीदमिह सम्प्राप्तं यदि तृप्तिं जगत्त्रयम् ॥ २३ ॥
उस समय दीन अनाथ तथा याचक लोग सन्तोषको प्राप्त हुए थे यह कहना बहुत छोटी बात थी क्योंकि उस समय तो तीनों लोक अत्यन्त सन्तोषको प्राप्त हुए थे ।। २३ ।।
“To say that the poor, the helpless, and the beggars attained satisfaction at that time would be an understatement; for at that moment, all the three worlds themselves had attained supreme satisfaction. || 23 ||”
श्लोक ( Shlok ) 24 – 28
कुन्थुतीर्थेशसन्ताने पल्ये तुर्थांशसम्मिते । सहस्त्रकोटिवर्षोने तदभ्यन्तरजीवितः ॥ २४ ॥अरो जिनोऽजनि श्रीमानशीतिं चतुरुत्तराम् । वत्सराणां सहस्त्राणि परमायुः समुद्वहन् ॥ २५ ॥त्रिंशच्चापतनूत्सेधः चारुचामीकरच्छविः । लावण्यस्य परा कोटिः सौभाग्यस्याकरः परः ॥ २६ ॥सौन्दर्यस्य समुद्रोऽयमालयो रूपसम्पदः । गुणाः किमस्मिन् सम्भूताः किं गुणेष्वस्य सम्भवः ॥ २७ ॥अभूद्गुणमयः किं वेत्याशङ्कां ‘सानयन् जनान् । अवर्द्धत समं लक्ष्म्या बालकल्पद्मोपमः ॥ २८ ॥
श्रीकुन्थुनाथ तीर्थकरके तीर्थके बाद जब एक हजार करोड़ वर्ष कम पल्यका चौथाई भाग बीत गया था तब श्रीअरनाथ भगवान्का जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी । भगवान् अरनाथकी उत्कृष्टठ-श्रेष्ठतम आयु चौरासी हजार वर्षकी थी, तीस धनुष ऊँचा उनका शरीर था, सुवर्णके समान उनकी उत्तम कान्ति थी, वे लावण्यकी अन्तिम सीमा थे, सौभाग्यकी श्रेष्ठ खान थे, भगवान्को देखकर शङ्का होती थी कि ये सौन्दर्य के सागर हैं या सौन्द्रय सम्पत्तिके घर हैं, गुण इनमें उत्पन्न हुए हैं या इनकी गुणोंमें उत्पत्ति हुई है अथवा ये स्वयं गुणमय हैं-गुणरूप ही हैं। इस प्रकार लोगोंको शङ्का उत्पन्न करते हुए, बाल कल्पवृक्षकी उपमा धारण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीके साथ-साथ वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे ।। २४-२८ ॥
“After the era of Tirthankara Shri Kunthunath, when a quarter of a Palya minus one thousand crore years had passed, Shri Aranatha Bhagavan was born. His own lifespan was also included within this intervening period.
The supreme and ultimate lifespan of Bhagavan Aranatha was eighty-four thousand years, his body was thirty Dhanush (bows) tall, and his magnificent complexion resembled pure gold. He was the ultimate boundary of elegance and a supreme treasury of auspiciousness.
Beholding the Lord, people were struck with wonder and doubt: Is he an ocean of beauty, or the very abode of the wealth of beauty? Have virtues originated in him, or has he originated from virtues, or is he himself entirely composed of virtues—the very embodiment of virtues? Thus inspiring such wondrous awe among the people, the Lord, resembling a young Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), continued to grow in stature alongside abundant prosperity. || 24-28 ||”
श्लोक ( Shlok ) 29 – 34
तस्य शून्यत्रिकैकद्विप्रमाणामितवत्सरैः । गते कुमारकालेऽभूद्राज्यं माण्डलिकोचितम् ॥ २९ ॥तावत्येव गते काले तस्मिन् सकलचक्रिता । भोगान्समन्वभूद्भागे तृतीये स निजायुषः ॥ ३० ॥कदाचिच्छारदाम्भोदविलय “प्रतिलोकनात् । समुद्भूतस्वजन्मोपयोगबोधिः सुरोत्तमैः ॥ ३१ ॥प्रबोधितोऽनुवादेन दत्वा राज्यं स्वसूनवे । अरविन्दकुमाराय सुरैरूढामधिष्ठितः ॥ ३२ ॥शिबिकां वैजयन्त्याख्यां सहेतुकवनं गतः । दीक्षां षष्ठोपवासेन रेवत्यां दशमीदिने ॥ ३३ ॥शुक्लेऽगान्मार्गशीर्षस्य सायाद्धे भूभुजां सह । सहस्त्रेण चतुर्शानधारी च समजायत ॥ ३४ ॥
इस प्रकार कुमार अवस्थाके इकीस हजार वर्ष बीत जानेपर उन्हें मण्डलेश्वरके योग्य राज्य प्राप्त हुआ था और इसके बाद जब इतना ही काल और बीत गया तब पूर्ण चक्रवर्तीपद प्राप्त हुआ था। इस तरह भोग भोगते हुए जब आयुका तीसरा भाग बाकी रह गया तब किसी दिन उन्हें शरॠतुके मेघोंका अकस्मात् विलय हो जाना देखकर अपने जन्मको सार्थक करनेवाला आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। उसी समय लौकान्तिक देवोंने उनके विचारोंका समर्थनकर उन्हें प्रबोधित किया और वे अरविन्दकुमार नामक पुत्रके लिए राज्य देकर देवोंके द्वारा उठाई हुई वैजयन्ती नामकी पालकीपर सवार हो सहेतुक वनमें चले गये। वहाँ तेलाका नियम लेकर उन्होंने मगसिर शुक्ला दशमीके दिन रेवती नक्षत्रमें सन्ध्याके समय एक हजार राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर ली। दीक्षा धारण करते ही वे चार ज्ञानके धारी हो गये ॥ २९-३४॥
“In this manner, after twenty-one thousand years of his youth (Kumara state) had passed, he attained a kingdom worthy of a sovereign ruler (Mandaleshwar). When an equal amount of time (another 21,000 years) passed after that, he attained the supreme status of a Chakravarti (universal monarch).
While enjoying worldly pleasures in this way, when only the final third of his lifespan remained, he happened to witness the sudden dissolution of autumn clouds one day. This triggered a profound self-realization (Atma-gyan) within him, destined to make his birth truly meaningful. At that very moment, the Laukantika celestial gods arrived, validated his thoughts, and offered their praises.
He then handed over the reins of the kingdom to his son, Prince Aravindakumar. Mounting the divine palanquin named Vaijayanti, which was carried by the gods themselves, he departed for the Sahetuka forest. There, observing a three-day fast (Tela vow), on the tenth day of the bright half of the month of Margashirsha (Magsir Shukla Dashami), under the Revati constellation during the evening hours, he initiated himself into asceticism (Deeksha) along with one thousand kings. The moment he took initiation, he became the master of the four types of knowledge. || 29-34 ||”
श्लोक 35 से 50
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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