विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 263 to 271
श्लोक ( Shlok ) 263 – 264
सोऽपि तद्गणिकावार्ता यथावृत्तं न्यवेदयत् । परेद्युर्मन्त्रितुग् भिक्षावेलायां गणिकागृहम् ॥ २६३ ॥प्राविशत्सापि तं दृष्ट्वा समुत्थाय ससम्भ्रमम् । वन्दित्वा पूर्ववद्धर्ममन्वयुक्त कृतादश ॥ २६४ ॥
उन्होंने भी वेश्याके साथ जो बात हुई थी वह ज्यों की त्यों निवेदन कर दी। दूसरे दिन मंत्रिपुत्र विचित्रमति मुनिने भिक्षाके समय वेश्याके घरमें प्रवेश किया। वेश्या मुनिको देखकर एकदम उठी तथा नमस्कार कर पहलेके समान बड़े आदरसे धर्मका स्वरूप पूछने लगी ।॥ २६३-२६४ ।।
“He (Pritinkar) then recounted exactly everything that had transpired with the courtesan. The following day, during the time for alms, the minister’s son, Monk Vichitramati, entered the house of the courtesan. Upon seeing the Monk, the courtesan stood up at once, bowed to him, and with the same great respect as before, began to ask about the nature of Dharma.”263 – 264
श्लोक ( Shlok ) 265
कामरागकथामेव व्याजहार स दुर्मतिः । तदिङ्गितज्ञयावज्ञा तया तस्मिन्न्यधीयत ॥ २६५ ॥
परन्तु दुर्बुद्धि विचित्रमति मुनिने उसके साथ काम और राग सम्बन्धी कथाएँ ही कीं। वेश्या उनके अभिप्रायको समझ गई अतः उसने उनका तिरस्कार किया ।। २६५ ॥
“However, the evil-minded Monk Vichitramati engaged only in talk related to lust and passion with her. The courtesan understood his hidden intentions and, consequently, she treated him with contempt and rejected him.”265
श्लोक ( Shlok ) 266 – 267
प्राप्तापमानेन रुषा सूपशास्त्रोक्तिसंस्कृतात् । मांसात्चनगराधीशं गन्धमित्रमहीपतिम् ॥ २६६ ॥वशीकृत्य ततो बुद्धिषेणा चात्मकृतामुना । स विचित्रमतिर्मृत्वा तवायमभवद्गजः ॥ २६७ ॥
विचित्रमति वेश्यासे अपमान पाकर बहुत ही क्रुद्ध हुआ। उसने मुनिपना छोड़ दिया और राजाकी नौकरी कर ली। वहाँ पाकशास्त्रके कहे अनुसार बनाये हुए मांससे उसने उस नगरके स्वामी राजा गन्धभित्रको अपने बश कर लिया और इस उपायसे उस बुद्धिषेणाको अपने आधीन कर लिया। अन्त में वह विचित्रमति मरकर तुम्हारा हाथी हुआ है ।। २६६-२६७ ॥
“Having been insulted by the courtesan, Vichitramati became very furious. He abandoned his monkhood and took up a job with the King. There, he won over King Gandhabhitra, the ruler of that city, by preparing meat dishes according to the culinary arts (Pakashastra). Through this influence, he managed to bring Buddhishena under his control. Ultimately, after his death, that Vichitramati was reborn as your elephant.”266 – 267
श्लोक ( Shlok ) 268
अस्मिन् त्रिलोकप्रशतिश्रवणाज्जातिसंस्मृतेः । निविण्णोऽयं समासन्नविनेयो नाग्रहीद्विधाम् ॥ २६८ ॥
मैं यहाँ त्रिलोकप्रज्ञप्तिका पाठ कर रहा था उसे सुनकर इसे जाति-स्मरण हुआ है। अब यह संसारसे बिरक्त है, निकट भव्य है और इसीलिए इसने अशुद्ध भोजन करना छोड़ दिया है ॥ २६८ ॥
“I was reciting the Trilokaprajnapti here; upon hearing it, he (the elephant) attained Jati-Smarana (recollection of past lives). Now, he is detached from the world and is a Nikata-Bhavya (one who is close to liberation); this is why he has stopped consuming impure food.”268
श्लोक ( Shlok ) 269
त्यागो भोगाय धर्मस्य काचायैव महामणेः । जनन्या इव दास्यर्थ तस्मात्तादृक् त्यजेद् बुधः ॥ २६९ ॥
भोगके लिए धर्मका त्याग करना ऐसा है जैसा कि काचके लिए महामणिका और दासीके लिए माताका त्याग करना है इसलिए विद्वानोंको चाहिये कि वे भोगोंका सदा त्याग करें ॥ २६९ ॥
“To abandon Dharma for the sake of worldly pleasures is like discarding a precious jewel for a piece of glass, or forsaking one’s mother for a servant-maid. Therefore, the wise should always renounce such pleasures.”269
श्लोक ( Shlok ) 270
इति तद्भूभुगाकर्ण्य धिक्कार्म धर्मदूषकम् । धर्म एव परं मित्रमिति धर्मरतोऽभवत् ॥ २७० ॥
यह सुनकर राजा कहने लगा कि ‘धर्मको दूषित करनेवाले कामको धिक्कार है, वास्तवमें धर्म ही परम मित्र है’ ऐसा कहकर वह धर्ममें तत्पर हो गया ।। २७० ।।
“Hearing this, the King said, ‘Woe to this sensual desire (Lust) which corrupts Dharma! It is indeed despicable.’ Saying so, he became deeply devoted to Dharma, recognizing it as the only true friend.”270
श्लोक ( Shlok ) 271
तदैव दत्त्वा स्वं राज्यं स्वपुत्रायैत्य संयमम् । मात्रा सहायुषः प्रान्ते कल्पेऽन्तेऽनिमिषो ऽभवत् ॥२७१॥
उसने उसी समय अपना राज्य पुत्रके लिए दे दिया और माताके साथ संयम धारण कर लिया। तपञ्चरण कर मरा और आयुके अन्तमें सोलहवें स्वर्गमें देव हुआ ।।२७१।।
“At that very moment, he handed over his kingdom to his son and, along with his mother, embraced self-restraint (Sanyam). After practicing rigorous penance, he passed away and, at the end of his life, was reborn as a celestial being (Deva) in the sixteenth heaven.” 271
श्लोक 272 से 281
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