आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111
श्लोक 112 से 121 नागकुमार का परिवर्तन और जयकुमार का शांत जीवन
जयकुमार ने रानी को अपवाद बताया कि लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, मुक्ति और वह स्वयं दुर्लभ हैं। नागकुमार ने जयकुमार की निंदा सुनी, पर धर्म के प्रभाव से क्रोध त्यागकर उसकी पूजा की और अपने इरादे बताकर लौट गया। जयकुमार ने भरत के साथ दिग्विजय किया और शांत भाव से नगर में निवास किया, जो सौम्य, गुणाकर और सुंदर था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
लक्ष्मीः सरस्वती कीर्तिर्मुक्तिस्त्वमिति विश्रुताः । दुर्लभास्तासु वल्लीषु कल्पवल्ल्य इव प्रिये ॥११२॥
हे प्रिये, जिस प्रकार लताओंमें कल्पलता दुर्लभ है उसी प्रकार स्त्रियोंमें लक्ष्मी, सरस्वती, कीति, मुक्ति और तू ये प्रसिद्ध स्त्रियाँ अत्यन्त दुर्लभ हैं ।॥११२।।
O Beloved, as among countless vines The wish-fulfilling creeper is rare to find,So too among women are Lakshmi, Saraswati,Fame, Liberation—and thou thyself—Renowned and radiant ones—Exceedingly rare.॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
इत्येतच्चाह तच्श्रुत्वा तं “जिघांसुरहिस्तदा। पापिना चिन्तितं पापं मया पापापलापतः ॥११३॥
यह सब जयकुमारने अपनी स्त्रीसे कहा, उसे सुनकर जयकुमारको मारनेकी इच्छा करनेवाला वह नागकुमार अपने मनमें कहने लगा कि देखो उस स्त्रीके पाप छिनानेसे ही मुझ पापीने इस पापका चिन्तवन किया है ।।११३।।
All this did Jayakumāra speak unto his wife,And hearing it, the Nāgakumāra—Who in wrath had yearned to slay Jayakumāra—Reflected within himself,”Lo! ‘Tis the sinful charm of that woman Which, stripping her of virtue,Has planted in me this evil thought—I, the sinner, have merely mirrored her sin.”॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
आर्याणामपि वाग्भूयो विचार्या कार्यवेदिभिः । वर्ज्यायाः किं पुनर्नार्याः कामिनां का विचारणा ॥११४॥
कार्यके जाननेवाले पुरुषों को सज्जनोंके वचनोंपर भी एक बार पुनः विचार करना चाहिये फिर त्याग करने योग्य स्त्रियों के वचनोंकी तो बात ही क्या है? उनपर तो अवश्य ही विचार करना चाहिये परन्तु कामी जनोंको यह विचार कहाँ हो सकता है ? ॥११४।।
Even the words of the noble—The wise weigh them well a second time Before accepting their counsel;What, then, of the words of women,Who are to be renounced?Surely, such utterances demand Even greater scrutiny. But how can those ensnared by desire Ever pause to think? ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
भवेऽस्मिन्नेव भव्योऽयं भविष्यति भवान्तकः । तन्नास्य भयमन्येभ्यो भयमेतद्भयैषिणाम् ॥११५।।
यह भव्य जीव इसी भवमें संसारका नाश करनेवाला होगा, इसलिये इसे अन्य लोगोंसे कुछ भय होनेवाला नहीं है बल्कि जो इसे भय देना चाहते हैं उन्हें ही यह भय है ।।११५।।
This exalted soul shall, in this very life,Bring an end to the cycle of worldly existence.Hence, he has naught to fear from others—Rather, it is those who seek to instill fear in himWho themselves are seized by fear.॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116
अहं कुतः कुतो धर्मः संसर्गादस्य सोऽप्यभूत् । ममेह मुक्तिपर्यन्तो नान्यत् सत्सङ्गमाद्धितम् ॥११६॥
में कहाँ ? और यह धर्म कहाँ ? यह धर्म भी मुझे इसीके संसर्गसे प्राप्त हुआ है इसलिये इस संसारमें मुझे मोक्ष प्राप्त होनेतक सज्जनोंके समागम के सिवाय अन्य कुछ कल्याण करनेवाला नहीं है ।।११६॥
What am I—and what is this lofty Dharma?Even this righteousness has come to meOnly through the grace of his association.Therefore, in this vast world,Until I attain liberation,There is no greater blessing for me Than the company of the noble.॥116॥
श्लोक ( Shlok ) 117- 118
इत्यनुध्याय निःकोपः कृतवेदी जयं स्वयम् । रत्नैरनध्यै सम्पूज्य स्वप्रपञ्चं निगद्य च ॥ ११७ः।मां स्वकार्ये स्मरेत्युक्त्वा स्वावास प्रत्यसौ गतः । हन्ताऽत्यू जितपुण्यानां भवत्यभ्युदयावहः ॥११८॥
ऐसा विचारकर वह नागकुमार क्रोधरहित हुआ, उपकारको जानकर उसने अमूल्य रत्नोंसे स्वयं जयकुमारकी पूजा की, उसे मारने आदिके जो विचार हुए थे वे सब उससे कहे और अपने कार्यमें मुझे स्मरण करना इस प्रकार कहकर वह अपने स्थानको लौट गया सो ठीक ही है क्योंकि जिसका पुण्य तेज है उसका मारनेवाला भी कल्याण करनेवाला हो जाता है ।।११७-११८॥
Thus reflecting, the Nāgakumāra cast away all wrath,And, recognizing the benefaction he had received,He worshipped Jayakumāra with priceless jewels.He confessed all the thoughts he had once harbored—Of slaying him and such dire intent—And said, “Remember me when you have need in your task.”So saying, he returned to his own abode.And rightly so—for one whose merit shines brightEven his would-be slayer becomes his benefactor.॥117–118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
स चक्रिणा सहाक्रम्य दिक्चक्रं व्यक्तविक्रमः । क्रमान्नियम्य व्यायामं संयमीव शमं श्रितः ॥११९।।
व्यक्त पराक्रमको धारण करनेवाला वह जयकुमार चक्रवर्ती भरत महाराजके साथ साथ सब दिशाओंपर आक्रमण कर और अनुक्रमसे इधर उधरका फिरना बन्द कर संयमीके समान शान्तभावका आश्रय करने लगा ।।११९।।
Jayakumāra, the bearer of manifest valor,Marched alongside Emperor Bharata,Launching conquests in all directions.But in time, he forsook the restless wandering From place to place—And, like a true ascetic, He embraced the serene refuge of restraint. ॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
ज्वलत्प्रतापः सौम्योऽपि निर्गुणोऽपि गुणाकरः । सुसर्वाङ्गोऽप्यनङ्गाभः सुखेन स्वपुरे स्थितः ॥१२०॥
जो सौम्य होनेपर भी प्रज्वलित प्रतापका धारक था, निर्गुण (गुणरहित, पक्ष में सबमें मुख्य) होकर भी गुणाकर (गुणोंकी खानि) था और सुसर्वाङ्ग (जिसके सब अंग सुन्दर हैं ऐसा) होकर भी अनङ्गाभ (शरीररहित, पक्षमें कामदेवके समान कान्तिवाला) था ऐसा वह जयकुमार सुखसे अपने नगरमें निवास करता था ॥१२०॥
He, who though gentle, bore the blaze of sovereign might;Though beyond all attributes, was a treasure-house of virtues;Though flawless in form, was as if bodiless—Radiant like Love’s own lord, yet untouched by desire—Such was Jayakumāra,Who dwelt in his city in abiding joy and peace.॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
अथ देशोऽस्ति विस्तीर्णः काशिस्तत्रैव विश्रुतः । पिण्डीभूता भयात्काललुण्टाकादिव भोगभूः ॥१२१॥
अथानन्तर-इसी भरतक्षेत्रमें एक प्रसिद्ध और बहुत बड़ा काशी नामका देश है जो कि ऐसा विदित होता है मानो कालरूपी लुटेरेके भयसे भोगभूमि ही आकर एक जगह एकत्रित हो गई हो ।।१२१।।
Thereafter—within this very land of Bharata—Lay a renowned and mighty realm named Kāśī,So splendid, it seemed as though the enjoyments of the Bhogabhūmi Had gathered there in one place,Fleeing in fear from the lundering hand of Time.॥121॥
श्लोक 122 से 131
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