वर्षा और शरद में सुभद्रा का सौन्दर्य
वर्षा में मेघमाला और जल-धाराएं पथिकों को बांधती हैं, और सुभद्रा सुगन्धित मुख से भरत के साथ रात्रि व्यतीत करती है। शरद में भरत सप्तच्छद वनों में सुभद्रा के साथ विहार करते हैं। चांदनी रातों में वे उसकी हार-युक्त स्तनों को प्रेम करते हैं। सुभद्रा की माला और कमल भरत के वक्ष पर लटकते हैं, जिन्हें वह प्रेम से सूंघती है, और दोनों मिलकर ऋतुओं का सुख भोगते हैं।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
नवाम्बुकलुषाः पूरा ध्वनिरुन्मदकेकिनाम् । कदम्बामोदिनो वाताः कामिनां धृतयेऽभवन् ॥१३२॥
उस वर्षाऋतुमें नये जलसे मलिन हुए नदियोंके प्रवाह, उन्मत्त मयूरों के शब्द और कदम्ब के फूलोंकी सुगन्धिसे युक्त वायु ये सब कामी लोगोंके संतोष के लिये थे ।।१३२।।
In that season of rains, the river currents were rendered turbid by the fresh torrents;the air was laden with the fragrance of blooming kadamba flowersand resounded with the cries of ecstatic peacocks
all this, as though fashioned for the delight of passionate souls.132
श्लोक ( Shlok ) 133
आरूढकालिकां पश्यन् बलाकामालभारिणीम् । घनालीं पथिकः साधुर्दिशो मेनेऽन्धकारिताः ॥ १३३॥
जिसपर कालिमा छाई हुई है और जो बगुलाओंकी पंक्तिको धारण कर रही है ऐसी मेघमाला-को देखते हुए पथिक आंसू डालते हुए दिशाओंको अन्धकारपूर्ण मानते थे ॥१३३।।
Beholding the mass of clouds darkened in hue and adorned with rows of white herons, the weary traveler, weeping, deemed the quarters of the sky to be shrouded in gloom. 133
श्लोक ( Shlok ) 134
धारारज्जुभिरानद्धा वागुरेव प्रसारिता। रोधाय पथिकैणानां” लुब्धकेनेव हृद्भुवा ।।१३४।॥
उस वर्षा-ऋतुमें जो जलकी धाराएं पड़ती थीं उनसे रस्सियोंके समान व्याप्त हुई यह पृथिवी ऐसी जान पड़ती थी मानो कामदेवरूपी शिकारीने पथिकरूपी हिरणोंको रोकने के लिये जाल ही फैलाया हो ।॥१३४।।
In that rainy season, the streams of water spread wide like ropes upon the earth—so vast it seemed, as if Kamadeva, the hunter of hearts,had cast a net to ensnare the travelers who wandered like timid deer.134
श्लोक ( Shlok ) 135
कृतावधिः प्रियो नागादगाच्च जलदागमः । इत्युदीक्ष्य घनात् काचिद् हृदि शून्याऽभवत् सती ।।१३५।।
जो आनेकी अवधि करके गया था ऐसा पति अब तक नहीं आया और यह वर्षा ऋतु आ गई इस प्रकार बादलोंको देखकर कोई पतिव्रता स्त्री अपने हृदय में शून्य हो रही थी अर्थात् चिन्तासे उसकी विचारशक्ति नष्ट हो गई थी ।। १३५॥
He who had vowed to return long ago had yet to come,and now the rainy season had arrived.Beholding the clouds thus,the devoted wife’s heart grew desolate—her very faculty of thought dissolved into a void of anxious despair.135
श्लोक ( Shlok ) 136
विभिन्दन् केतकी सूचीः स्तत्पांसूनाकिरन्मरुत् । पान्थानां दृष्टिरोधाय धूलिक्षेपमिवाकरोत् ।।१३६।।
केतकीकी बौड़ियोंको भेदन करता हुआ और उनकी धूलको चारों ओर बिखेरता हुआ वायु ऐसा जान पड़ता था मानो पथिकों-की दृष्टि रोकने के लिये धूलि ही उड़ा रहा हो ।। १३६।।
The wind, piercing through the clusters of ketaki flowers and scattering their dust far and wide,seemed as if it sought to veil the travelers’ sight—raising clouds of dust to obscure their path.136
श्लोक ( Shlok ) 137
इत्यभर्णतमे तस्मिन् काले जलदमालिनि । स वासभवने रम्ये प्रियामरमयन्मुहुः ॥ १३७।।
इस प्रकार उस वर्षाकालमें जब बादलों के समूह अत्यन्त निकट आ जाते थे तब चक्रवर्ती भरत अपने मनोहर महलमें प्रिया सुभद्राको बार बार प्रसन्न करता था उसके साथ क्रीड़ा करता था ।। १३७।।
Thus, in that rainy season, when the clusters of clouds drew near,
the mighty Emperor Bharata, within his enchanting alace,repeatedly delighted his beloved Subhadra,and played with her in tender joy.137
श्लोक ( Shlok ) 138
आकृष्टनिचुलामोदं तद्वक्त्रामोदमाहरन् । तस्याः स्तनतटोत्सङ्गे सोऽनैषीद् वार्षिकी निशाम् ॥१३८॥
जिसने पानी में उत्पन्न होने-वाले बेंतकी सुगन्धि खींच ली है ऐसे उस सभद्राके मुखकी सुगन्धको ग्रहण करता हुआ चक्रवर्ती उसके स्तनतटके समीप ही वर्षाऋतुकी रात्रि व्यतीत करता था ।।१३८।।
Drawn as if by the fragrance of reeds rising from the water,the Emperor, inhaling the sweet scent of Subhadra’s lips,spent the rainy nights beside the gentle curve of her bosom.138
श्लोक ( Shlok ) 139
स रमे शरदारम्भ विहरन् कान्तया समम् । वनेष्वभिनवोद्भिन्नसप्तच्छदसुगन्धिषु ॥१३९॥
शरऋतु- के प्रारम्भमें वह चक्रवर्ती, जिनमें नवीन खिले हुए सप्तच्छद वृक्षोंकी सुगन्ध फैल रही है ऐसे वनोंमें अपनी स्त्रीके साथ विहार करता हुआ क्रीडा करता था ।। १३९।।
At the dawn of autumn, when the newly blossomed saptachhad trees diffused their fragrant breath through the groves,the Emperor wandered and played amidst the woods,reveling in tender pastime with his beloved wife.139
श्लोक ( Shlok ) 140
सकान्तां रमयामास हारज्योत्स्नाञ्चितस्तनीम् । शारदों निर्विशन् ज्योत्स्नां सौधोत्सङगेषु हारिषु ॥१४०।।
राजभवनकी मनोहर छतोंपर शरऋतुकी चांदनीका उपभोग करता हुआ वह चक्रवर्ती हारकी कान्तिसे जिसके स्तन सुशोभित हो रहे हैं ऐसी प्रिया सुभद्राको प्रसन्न करता था उसके साथ क्रीडा करता था ॥१४०।।
Beneath the enchanting roofs of the royal palace,bathed in the moonlight of autumn’s embrace,the Emperor, radiant as a jewel,
delighted his beloved Subhadra—whose bosom was adorned with the glow of his necklace—and played with her in tender joy.140
श्लोक ( Shlok ) 141
सोत्पलां ‘कुब्जकै ब्धां मालां चूडान्तलम्बिनीम् । बाला पत्युरुरः सङ्गान्मेने बहुरतिश्रियम् ॥१४१॥
जब कभी रानी सुभद्रा पतिके वक्षःस्थलपर लेट जाती थी उस समय उसके मस्तक-पर कंचुकियोंके द्वारा गुंथी हुई भरतकी कमलों सहित माला लटकने लगती थी और उसे वह बड़े प्रेमसे सूंघती थी ।। १४१।।
Whenever Queen Subhadra reclined upon her husband’s chest,
the garland, woven with lotus blossoms of Bharata’s adornment,
would rest upon her forehead,and she would lovingly inhale its fragrance with tender devotion.141
श्लोक 142 से 151
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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