श्लोक 1 से 11 वृषभदेव की महिमा और पुराण की प्रस्तुति
भगवान वृषभदेव की महिमा का वर्णन किया गया है, जिनके ध्वज में वृषभ चिह्न है और जिन्होंने मोक्ष मार्ग का उपदेश देकर तीनों लोकों को प्रकाशित किया। वे प्रथम तीर्थंकर हैं, जिनके उपदेश से मोक्ष मार्ग की स्थापना हुई, और अन्य तीर्थंकरों के उपदेश उनके अनुसरण में ही हैं। उनकी महिमा को एकमात्र ओम् अक्षर के समान बताया गया है। जिनसेनाचार्य द्वारा रचित इस पुराण का शेष भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा पूर्ण किया जा रहा है, जो गुरु के मार्गदर्शन में शब्द और अर्थ से सुशोभित है। विद्वानों से इसकी स्वीकृति और श्रवण की अपेक्षा की गई है।
श्लोक 12 से 21 पुराण की रचना और इसका महत्व
पुराण का पूर्व भाग जिनसेनाचार्य द्वारा और उत्तर भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा रचित है, जो गुरु-शिष्य परंपरा से सुंदर बनता है। इसकी रचना को धर्म ग्रहण करने की सलाह दी गई है, न कि रचनाकार की योग्यता पर ध्यान देने की। गुरुओं का प्रभाव रचना को सुसंस्कृत करता है। यह पुराण दोषों को गुणों में बदलने और भव्य जीवों के लिए निर्दोष होने का दावा करता है। सज्जन गुणों को ग्रहण करते हैं, जबकि दुर्जन दोषों को देखते हैं, जो सम्यक् और मिथ्या ज्ञान का परिचायक है।
श्लोक 22 से 31 रचना की चुनौतियाँ और कवि की भूमिका
दुर्जनों द्वारा निंदा को स्वीकार किया गया है, पर गुणों को ग्रहण न करने की प्रार्थना की गई है, ताकि रचना निर्दोष रहे। अज्ञानी की निंदा या स्तुति हास्यास्पद होती है, और महापुरुष छोटे उपद्रवों से विचलित नहीं होते। कवि का परिश्रम केवल कवि ही समझ सकता है। रचना की स्तुति और निंदा दोनों ही कवि की कीर्ति को बढ़ाती हैं, जैसे अर्जुन के बाण खोटे संस्कारों को दुख देते हैं।
श्लोक 32 से 46 पुराण की पूर्णता और प्रभाव
रचना को गुरुओं के मार्गदर्शन में शुद्ध करने की अपेक्षा की गई है। यह पुराण धर्मरूपी रत्न है, जिसे पंडित ग्रहण करेंगे। यह रचना सुंदरी स्त्री के समान रस, अलंकार और विचित्र शब्दों से युक्त है, जो सभी के मनोरथ पूर्ण करती है। यह पापों को नष्ट करती है, पुण्य को बढ़ाती है, और युगों तक स्थिर रहेगी। इसकी सिद्धि में गुरु जिनसेनाचार्य का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है।
श्लोक 47 से 69 जयकुमार के चरित्र की मांग
राजा श्रेणिक, वृषभदेव के चरित्र से प्रभावित होकर, उनके 84 गणधरों में से 71वें गणधर जयकुमार के चरित्र को सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को युद्ध में जीता और उनके प्रताप की प्रशंसा की गई। गणधरों के नामों का उल्लेख करते हुए उनकी महिमा और गुणों का वर्णन किया गया है, जो सर्वज्ञ के अनुरूप थे।
श्लोक 70 से 81 जयकुमार के चरित्र का प्रारंभ
राजा श्रेणिक की प्रार्थना पर गौतम गणधर जयकुमार का18 के चरित्र को सुनाने के लिए तैयार होते हैं। कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में राजा सोमप्रभ और उनकी पत्नी लक्ष्मीवती के पुत्र जयकुमार का जन्म हुआ। जयकुमार गुणों से युक्त और कीर्ति विस्तारक थे। उनके 14 अन्य भाई भी गुणवान थे, जो राजा सोमप्रभ को सुशोभित करते थे।
श्लोक 82 से 91 जयकुमार का राज्य और धर्म श्रवण
राजा सोमप्रभ, रानी लक्ष्मीवती, छोटा भाई श्रेयांस और पुत्र जयकुमार से सुशोभित राज्य पूजनीय था। सोमप्रभ ने संसार की अनित्यता समझकर जयकुमार को राज्य सौंपा और श्रेयांस के साथ भगवान वृषभदेव से दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। जयकुमार ने पिता के पद पर पृथ्वी का पालन किया और भाइयों के साथ भोगों का उपभोग किया। एक दिन उद्यान में मुनि शीलगुप्त के दर्शन कर धर्म सुना। वहाँ सर्प दंपति ने भी धर्म श्रवण किया, जिनमें सर्प वज्रपात से मरकर देव हुआ।
श्लोक 92 से 102 सर्पिणी का मरण और नागकुमार का क्रोध
जयकुमार ने उद्यान में सर्पिणी को काकोदर सर्प के साथ देखकर क्रोधित होकर दोनों को ताड़न किया। सैनिकों ने उन्हें मार डाला। सर्प जलदेवता और सर्पिणी नागकुमार की पत्नी बनी। नागकुमार ने जयकुमार पर सर्पिणी के मरण का दोष लगाकर उसे मारने की ठानी और उसके घर पहुँचा। जयकुमार ने रानी श्रीमती से सर्पिणी की कुकृत्य बताते हुए स्त्रियों की निंदा की।
श्लोक 103 से 111 स्त्रियों की निंदा
जयकुमार ने कहा कि स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं, उनमें विष भरा है, और उनके सत्याभास नमस्कार बुद्धिमानों को ठगते हैं। उनकी प्रसन्नता भयंकर है, और वे मायाचारी हैं। गुण स्त्रियों में स्थिर नहीं रहते, और दोष उनकी उत्पत्ति हैं। वे निर्गुण को गुणी मान लेती हैं, और उनके चंचल स्वभाव के कारण शास्त्रों में उनका मोक्ष नहीं माना गया।
श्लोक 112 से 121 नागकुमार का परिवर्तन और जयकुमार का शांत जीवन
जयकुमार ने रानी को अपवाद बताया कि लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, मुक्ति और वह स्वयं दुर्लभ हैं। नागकुमार ने जयकुमार की निंदा सुनी, पर धर्म के प्रभाव से क्रोध त्यागकर उसकी पूजा की और अपने इरादे बताकर लौट गया। जयकुमार ने भरत के साथ दिग्विजय किया और शांत भाव से नगर में निवास किया, जो सौम्य, गुणाकर और सुंदर था।
श्लोक 122 से 131 काशी और वाराणसी का वर्णन
भरत क्षेत्र में काशी देश स्वर्ग और मोक्ष को जीतने वाला था, जहाँ कल्पवृक्ष थे। वाराणसी नगरी अमरपुरी को लज्जित करती थी, जहाँ पापी जीव जन्म नहीं लेते थे। यह नगरी जिनवाणी की तरह धर्म मार्ग पर ले जाती थी। राजा अकम्पन, विद्या और नीति से युक्त, प्रजा का पालन करते थे और भगवान वृषभदेव को पूज्य मानते थे। उनकी रानी सुप्रभा चंद्रमा की तरह थी।
श्लोक 132 से 141 सुप्रभा और सुलोचना का वर्णन
सुप्रभा ने राजा को पुत्रों से आनंदित किया। उनके हजार पुत्रों में हेमांगद आदि थे। सुप्रभा से सुलोचना और लक्ष्मीमती कन्याएँ उत्पन्न हुईं। सुलोचना लक्ष्मी की तरह मनोहर थी, और धाय सुमित्रा ने उसका पालन किया। उसके चरणकमल रागी थे, और नख चांदनी की तरह कुमुदिनियों को विकसित करते थे। उसके पैरों की अंगुलियाँ कामदेव के वेगों की तरह थीं, और चरणों की शोभा अद्वितीय थी।
श्लोक 142 से 151 सुलोचना की शारीरिक शोभा
सुलोचना की जंघाएँ संतुलित थीं, और नितम्ब कामदेव की वेदी जैसे थे। उसका मध्य भाग त्रिवली से बंधा था, और नाभि से रोमराजि घास की तरह थी। उसके स्तन स्याद्वाद की तरह विरुद्ध धर्म धारण करते थे। भुजाएँ लक्ष्मी को आलिंगन करती थीं, और कंठ जयकुमार के हाथों से सुशोभित था। कपोल दर्पण जैसे थे, और ओठ बिम्बी फल से भी श्रेष्ठ थे।
श्लोक 152 से 161 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के दाँत सुंदर और चमकीले थे, और नाक मुख की सुगंध का स्वाद लेती थी। उसके नेत्र विशाल और कटाक्षपूर्ण थे, जो जयकुमार को जीतते थे। कान जयकुमार के प्रेम संभाषण के पात्र थे। भौंहें कामदेव के धनुष थीं, और ललाट उन्नत था। बाल काले सर्प जैसे थे, और उसका शरीर परमाणुओं से बना था। उसका मुख चंद्रमा से भी श्रेष्ठ था, क्योंकि वह निष्कलंक और पूर्ण था।
श्लोक 162 से 171 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के मुख की शोभा कमल से श्रेष्ठ थी, जो सदा एकरूप रहकर भी प्रतिक्षण विलक्षण शोभा धारण करती थी, स्याद्वाद का स्वरूप प्रकट करती थी। यह शोभा न चंद्रमा के समान सूर्य से नष्ट होती थी, न कमल की तरह चंद्रमा से। यह रात-दिन पूर्ण और विकसित रहती थी। सुलोचना का मुख देखने वाले और उसके द्वारा देखे जाने वालों की शोभा बढ़ती थी। उसने कुमारी अवस्था में कामदेव और युवावस्था में जयकुमार को जीत लिया, लक्ष्मी आदि को परास्त किया। उसकी कान्ति ने चंद्रमा को क्षयरोगी बना दिया, और उसका मुख कुमुद, कमल सहित सब कुछ जीत लेता था।
श्लोक 172 से 181 सुलोचना की भक्ति और विवाह चिंता
सुलोचना ने जिनेंद्रदेव की रत्नमयी प्रतिमाएँ बनवाकर उनकी पूजा, स्तुति, दान और धर्म-श्रवण किया, जिससे सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। फाल्गुन में अष्टाह्निकी पूजा और उपवास कर वह राजा अकम्पन को शेषाक्षत देने गई। राजा ने उसे पारणा के लिए विदा किया और उसकी यौवनावस्था देखकर विवाह की चिंता करने लगा। उन्होंने चार मंत्रियों—श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ, सुमति—को बुलाकर कन्या के विवाह पर विचार-विमर्श किया।
श्लोक 182 से 191 मंत्रियों का परामर्श
राजा अकम्पन ने मंत्रियों से पूछा कि सुलोचना किसे दी जाए। श्रुतार्थ ने चक्रवर्ती के पुत्र अर्ककीर्ति को उपयुक्त बताया, जिसके गुण और कीर्ति सर्वत्र फैली थी। सिद्धार्थ ने छोटे कुल के साथ बड़े कुल का संबंध उचित न मानकर प्रभंजन, जयकुमार आदि समकक्ष राजपुत्रों का सुझाव दिया। सर्वार्थ ने विद्याधरों से संबंध को लाभकारी और प्रशंसनीय बताया। सुमति ने स्वयंवर की प्राचीन विधि का प्रस्ताव रखा, जिससे किसी से वैर न हो और राजा की यश-कीर्ति बढ़े।
श्लोक 192 से 201 स्वयंवर का निर्णय
सुमति के स्वयंवर प्रस्ताव को सबने स्वीकार किया, क्योंकि यह नीतिसम्मत और वैर-रहित था। राजा ने मंत्रियों को विदा कर सुप्रभा और पुत्र हेमांगद से विचार-विमर्श किया। उन्होंने कुल के वृद्धों और बंधुओं से परामर्श लिया। राजा ने विभिन्न प्रकार के दूत भेजकर राजाओं को स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया, जिसमें निसृष्टार्थ, मितार्थ और उपहार सहित पत्र ले जाने वाले दूत शामिल थे।
श्लोक 202 से 213 स्वयंवर भवन की रचना
पूर्वभव में राजा अकम्पन का भाई रहा विचित्रांगद देव सौधर्म स्वर्ग से सुलोचना का स्वयंवर देखने आया। उसने राजा की आज्ञा से नगर के समीप सर्वतोभद्र राजभवन बनाया, जो मंगलद्रव्यों, विवाह मंडप और रत्न-सुवर्ण से सुशोभित था। इसके चारों ओर स्वयंवर महाभवन बनाया गया, जिसमें चार दरवाजे, गोपुर, रत्न-तोरण, सुवर्ण-कलश और नीलमणि-जड़ित धरातल था। यह भवन भोग-उपभोग की वस्तुओं से परिपूर्ण और पुण्य के प्रभाव से निर्मित था।
श्लोक 214 से 221 वसंत ऋतु का आगमन
राजा अकम्पन स्वयंवर भवन देखकर संतुष्ट हुए। वसंत ऋतु का प्रारंभ हुआ, जिसमें मलयानिल चंदन, इलायची और लवंग की सुगंध लिए बह रहा था। लताएँ और वृक्ष शाखाएँ मलयानिल का आलिंगन करती थीं। सूर्य उत्तरायण में था, और कोयलें मधुर स्वर कर रही थीं। चंपा, अशक, चमेली और मौलश्री के वृक्ष फूलों से लदे थे, जो भक्तों और भमरों को आकर्षित करते थे।
श्लोक 222 से 232 स्वयंवर की तैयारियाँ और राजाओं का आगमन
मौलश्री वृक्ष गुणों से युक्त थे। वसंत के सहयोग से दूतों ने भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओं को स्वयंवर का समाचार दिया। नगाड़ों के शब्द और सुलोचना की आकर्षिणी विद्या से प्रेरित विद्याधर राजा विमानों से आए। राजा अकम्पन ने उनकी अगवानी की और वाराणसी में प्रवेश कराया। हेमांगद आदि पुत्रों के साथ उन्होंने अर्ककीर्ति और जयकुमार की अगवानी की, मानो उनकी सिद्धि को सूचित करते हुए।
श्लोक 233 से 242 राजाओं का स्वागत और उत्सव
तीनों समुद्रों के बीच के राजा बनारस आए। राजा अकम्पन ने कुछ राजाओं की स्वयं और कुछ की हेमांगद आदि के माध्यम से अगवानी की। सुलोचना के कारण वाराणसी अयोध्या को लज्जित करती थी, क्योंकि कन्या-रत्न सर्वश्रेष्ठ था। राजा ने अर्ककीर्ति आदि को स्वयंवर शाला में ठहराया, जिनेंद्रदेव की पूजा की, और दीन-अनाथों को दान देकर उत्सव की तैयारी की। यह सब पूर्वार्जित धर्म का फल था, जिससे उनकी लक्ष्मी क्षयरहित और पृथ्वी उपभोग्य बनी।
श्लोक 243 से 251 स्वयंवर उत्सव का प्रारंभ
राजा अकम्पन ने जिनेंद्रदेव की पूजा कर स्वयंवर कार्य प्रारंभ किया, जो सफलता की गारंटी थी। भेरी की ध्वनि से आनंद छाया। पृथ्वी पर फूल, आकाश में पताकाएँ, नगाड़ों से दिशाएँ गूंजीं। गलियाँ शुद्ध कर तोरण बाँधे गए, महल चूने से सजाए गए। स्त्रियाँ कज्जल, मालाएँ, तिलक, कुंडल, पत्ररचना, पान, मोती, चंदन, और नूपुरों से सुशोभित थीं, जो स्वर्गपुरी को लज्जित करती थीं।
श्लोक 252 से 264 नगरी और उत्सव की शोभा
वाराणसी नगरी अचिंत्य वैभव से अलंकृत थी, राजमहल का उत्सव नगर से ही प्रकट था। सचेतन और अचेतन सभी उत्सव मना रहे थे। कोई भोग या भोक्ता अभावग्रस्त न था, कामदेव और लक्ष्मी सदा उपस्थित थे। धर्मात्मा इस पुण्य का माहात्म्य देख आदर करते थे। मुनि इसे धर्म का फल मान प्रसन्न हुए। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुलोचना को मंगलद्रव्यों से युक्त मंडप में ले गईं, अभिषेक कर चैत्यालय में जिनपूजा कराई, शेषाक्षत दिए, और शुभ लग्न की प्रतीक्षा में ठहरीं।
श्लोक 265 से 275 राजाओं का आगमन और कामदेव की उपस्थिति
अकम्पन के संदेश पर भूमिगोचरी और विद्याधर राजा सज्जित हो आसनों पर बैठे, जो देवों से युक्त और कामदेव के रूपों जैसे थे। वे सुलोचना को जीतने की आशा में अहंकारी थे। कामदेव, वसंत ऋतु, मलय पर्वत की सुगंध, कावेरी के कमल, और कोयल-भ्रमरों के स्वरों से युक्त, दक्षिण वायु का सहयोग ले सब देशों को जीतकर वहाँ पहुँचा।
श्लोक 276 से 291 सुलोचना का स्वयंवर मंडप में प्रवेश
राजा अकम्पन, सुप्रभा और कुटुंब के साथ स्वयंवर मंडप में विराजमान हुए। महेंद्रदत्त कंचुकी सुलोचना को अलंकृत रथ पर लाया। हेमांगद ने सेना के साथ रथ की रक्षा की। सुलोचना ने नगाड़ों, छत्र, और राजाओं की दृष्टियों के बीच स्वयंवर शाला में प्रवेश किया, नीलकमल-नेत्रों से राजाओं को सींचा। राजा उसकी दृष्टि से संतुष्ट हुए, और वह भी राजाओं को देख प्रसन्न हुई। कंचुकी के कहने पर वह महल से उतरी, जिससे राजा खिन्न हुए। सुलोचना रथ पर सवार हो कामदेव को स्वीकार कर सबके हृदय आकर्षित करती रही।
श्लोक 292 से 301 सुलोचना की श्रेष्ठता
कामदेव सुलोचना के अंगों में प्रविष्ट हो विकार प्रकट करता था, अपने शरीर-रहित होने को श्रेष्ठ मानता था। सुलोचना लक्ष्मी और रति से श्रेष्ठ थी, जो जयकुमार को प्राप्त होगी। उसका पाणिग्रहण करने वाला सच्चा लक्ष्मीवान होगा। उसका लावण्य समुद्र और सुलोचना में ही था, जिसने राजाओं को आकर्षित किया। समुद्र रत्नाकर होने का अहंकार करता था, पर सुलोचना रूपी रत्न अकम्पन और सुप्रभा के पास था। सुलोचना स्वयंवर भवन में लक्ष्मी-सी पहुँची, राजा प्रेम और शोक के मिश्रित रस में डूबे।
श्लोक 302 से 311 सुलोचना का जयकुमार की ओर अग्रसर होना
महेंद्रदत्त कंचुकी ने रथ को विद्याधर राजाओं की ओर ले जाकर नमि, विनमि, सुनमि, सुविनमि आदि का परिचय दिया। सुलोचना ने सबको छोड़ आगे बढ़ी। विद्याधर आशा में बैठे रहे। रथ भूमिगोचरियों की ओर उतरा। सुलोचना, कोयल की तरह, अर्ककीर्ति आदि को छोड़ जयकुमार के पास पहुँची। कंचुकी ने जयकुमार का गुण-वर्णन प्रारंभ किया।
श्लोक 312 से 321 जयकुमार का गुण-वर्णन
कंचुकी ने जयकुमार को सोमप्रभ का पुत्र, कुलदीपक, और भाइयों से युक्त बताया। उसका रूप वर्णनातीत था। उसने मेघकुमार को जीतकर सिंहनाद किया, जिसके लिए भरत ने उसे वीरपट्ट और मेघस्वर नाम दिया। वह गुणवान, आदरणीयों का संग करता था। उसका दोष केवल चार प्रियाएँ—श्री, कीर्ति, वीरलक्ष्मी, सरस्वती—थीं। वह सुलोचना को जीतने के लिए अधीर था, कामदेव को सहायक बनाकर। उसकी कीर्ति और प्रभा सूर्य-चंद्रमा को निस्तेज करती थी। उसकी प्रीति सुलोचना में फलीभूत होगी।
श्लोक 322 से 331 सुलोचना का जयकुमार को वरण
कामदेव, जयकुमार और सुलोचना का शत्रु, सुलोचना पर निष्ठुर था। सुलोचना ने अपनी दृष्टि से जयकुमार को जीत लिया। कंचुकी के वचनों से लज्जा छोड़, सुलोचना ने जन्मांतर के स्नेह, जयकुमार की आकृति, और कामदेव के प्रभाव से रथ से उतरकर रत्नमाला जयकुमार के गले में डाली। बाजों की ध्वनि से उत्सव गूंजा। जयकुमार का मुख लक्ष्मी से सुशोभित था।
श्लोक 332 से 339 उत्सव का समापन और जयकुमार की महिमा
अन्य राजाओं के मुख म्लान हो गए। अकम्पन, सुलोचना और जयकुमार को लेकर नगर में प्रविष्ट हुए। जयकुमार का यश कल्पान्त तक फैला। वह सूर्य-चंद्रमा को जीतने वाला, सौभाग्यशाली था। लोगों ने उसकी पुण्य, रूप, और सौभाग्य की प्रशंसा की। वह पृथ्वीमंडल को प्रसन्न करता, सदा बढ़ता रहा। जिनेंद्र की उपासना से जयकुमार को लक्ष्मी प्राप्त हुई। श्रद्धावान पुरुषों को जिनेंद्र के चरणों की उपासना की सलाह दी गई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रियं तनोतु स श्रीमान् वृषभो वृषभध्वजः । यस्यैकस्य ‘गतेर्मुक्तेमार्ग श्चित्रं महानभूत् ॥१॥
अथानन्तर, जिनकी ध्वजामें वृषभका चिह्न है और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन एकके जानेसे ही बहुत बड़ा मोक्षका मार्ग बन गया ऐसे अन्तरङ्ग बहिरङ्ग लक्ष्मीको धारण करनेवाले श्री वृषभदेव सबका कल्याण करें ।।१।।
And now, may the auspicious Lord Ṛṣabhadeva—whose banner bears the emblem of the bull, who is adorned with both inner and outer splendours of prosperity, and most wondrous of all, through whose very departure the grand path to liberation was revealed—bring about the welfare of all. ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2
विक्रम कर्मचक्रस्य यश्शक्राभ्यर्चितक्रमः । आक्रम्य धर्मचक्रेण चक्रे त्रैलोक्यचक्रिताम् ॥२॥
जिनके चरणकमलकी इन्द्र स्वयं पूजा करता है और जिन्होंने धर्मचक्रके द्वारा कर्मसमृहके पराक्रमपर आक्रमणकर तीनों लोकोंका चक्रवर्तीपना प्राप्त किया है ॥२॥
He whose lotus feet are worshipped by Indra himself, who, by wielding the wheel of Dharma, assailed the might of the entire host of karmas and attained sovereign lordship over all the three worlds—such is his supreme glory. ॥2॥
श्लोक ( Shlok ) 3
योऽस्मिंश्चतुर्यकालादौ दिनादौ वा’ दिवाकरः । जगदुद्योतयामास प्रोद्गच्छद्वाग्गभस्तिभिः ॥३॥
दिनके प्रारम्भमें सूर्यकी तरह इस चतुर्थकालके प्रारम्भमें उदय होकर जिन्होंने फैलती हुई अपनी वाणीरूपी किरणोंसे समस्त जगत्को प्रकाशित किया है अर्थात् दिव्य ध्वनिके द्वारा समस्त तत्त्वोंका उपदेश दिया है ॥ ३॥
At the dawn of this Fourth Era, like the rising sun at daybreak, he arose—illuminating the entire universe with the radiant rays of his speech, spreading far and wide; that is, through the divine resonant sound, he expounded the essence of all eternal truths. ॥3॥
श्लोक ( Shlok ) 4
नष्टभष्टादशाम्भोधिकोटीकोटीषु कालयोः। निर्वाणमार्ग निर्दिश्य येन सिद्धाश्च वर्द्धिताः ॥४॥
उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी काल के अठारह कोड़ी सागरतक जो मोक्षका मार्ग नष्ट हो रहा था उसका निर्देशकर जिन्होंने सिद्धों की संख्या बढ़ाई है ।।४।।
When the path to liberation, through eighteen koṭi-sāgaras of the Utsarpiṇī and Avasarpiṇī cycles, was gradually fading into oblivion, it was he who revealed it anew, thereby increasing the host of liberated souls. ॥4॥
श्लोक ( Shlok ) 5
तोर्थ कृत्सु स्वतः प्राग्यो” नामादानपराभवः । यमस्मि अस्पृशन्नासौ स्वसूनुमिव चक्रिषु ॥५॥
जिस प्रकार चक्रवर्तीयों में अपने पुत्र भरत चक्रवर्तीको उसके पहले किसी अन्य चक्रवर्तीका नाम लेनेसे उत्पन्न हुआ पराभव नहीं छू सका था उसी प्रकार तीर्थङ्करों में अपने पहले किसी अन्य तीर्थङ्करका नाम लेनेसे उत्पन्न हुआ पराभव जिन्हें छू भी नहीं सका था । भावार्थ-जिस प्रकार भरत इस युगके समस्त चक्रवर्तीयों में पहले चक्रवर्ती थे उसी प्रकार जो इस युगके समस्त तीथङ्करों में पहले तीर्थंकर थे ॥ ५॥
Just as his son, Bharata, the Cakravartin, remained untouched by the defeat that might arise from the prior fame of any other sovereign, so too was he—among all Tīrthaṅkaras—unaffected by any diminution that could result from invoking the name of a predecessor. In essence: just as Bharata was the very first among all Cakravartins of this era, so was he the foremost among all the Tīrthaṅkaras of this age. ॥5॥
श्लोक ( Shlok ) 6
येन” प्रकाशिते मुक्तेर्मार्गेऽस्मिन्नपरेषु तत्” । प्रकाशित प्रकाशोक्तवैयर्थ्य तीर्थकृत्स्वभूत् ॥६॥
जिनके द्वारा इस मोक्षमार्गके प्रकाशित किये जानेपर अन्य तीर्थ करोंमें प्रकाशित हुए मोक्षमार्गको प्रकाशित करनेके कारण उपदेशकी व्यर्थता हुई थी। भावार्थ इस समय जो मोक्षका मार्ग चल रहा है उसका उपदेश सबसे पहले भगवान् वृषभदेवने ही दिया था उनके पीछे होनेवाले अन्य तीर्थ करोंने भी उसी मार्गका उपदेश दिया है इसलिये उनका उपदेश पुनरुक्त होनेके कारण व्यर्थ सा जान पड़ताहै ।।६।।
By whom the path of liberation was first illumined—so that the very same path, later declared by other Tīrthaṅkaras, seemed but a repetition, rendering their instruction seemingly redundant. In essence: the path to liberation that endures to this day was first proclaimed by Lord Ṛṣabhadeva; and as the Tīrthaṅkaras who followed merely reaffirmed that very path, their teachings appear as echoes of his, and thus seem almost superfluous. ॥6॥
श्लोक ( Shlok ) 7
युगभारं वहन्नेकश्चिरं धर्मरथं पृथुम् । व्रतशीलगुणापूर्ण चित्रं वर्तयति स्म यः ॥७॥
और आश्चर्य है कि जिन्होंने अकेले ही बहुत कालतक इस अवर्सापणी युगके भारको (पक्षमें जुवारीके बोझको) धारण करते हुए व्रतशील आदि गुणोंसे भरे हुए बड़े भारी धर्म-रथको चलाया था ।।७।।
And wondrous indeed is this: that he alone, for a vast span of time, bore the heavy burden of the Avasarpiṇī age—like a gambler shouldering the weight of the wager—and, endowed with steadfast vows and noble virtues, drew forward the mighty chariot of Dharma. ॥7॥
श्लोक ( Shlok ) 8
तमेकमक्षरं ध्यात्वा व्यक्तमेकमिवाक्षरम् । वक्ष्ये समीक्ष्य लक्ष्याणि तत्पुराणस्य चूलिकाम् ॥८॥
ऐसे उन अद्वितीय अविनाशी भगवान् वृषभदेवको एक प्रसिद्ध ओम् अक्षरके समान ध्यान कर तथा पूर्वशास्त्रोंका विचार कर इस महापुराणकी चूलिका कहता हूं ।।८।।
Thus, meditating upon that peerless, imperishable Lord Ṛṣabhadeva—like the renowned sacred syllable Om—and reflecting upon the wisdom of the ancient scriptures, I now utter the prologue to this Mahāpurāṇa. ॥8॥
श्लोक ( Shlok ) 9
स्वोक्ते प्रयुक्ताः सर्वे नो रसा गुरुभिरेव ते । ‘स्नेहादिह’ तदुत्सृष्टान् भक्त्या “तानुपयुञ्ज्महे ॥ ९ ॥
हमारे गुरु जिनसेनाचार्यने हमारे स्नेहसे अपने द्वारा कहे हुए पुराणमें सब रस कहे हैं इसलिये उनकी भक्तिसे छोड़े गये रसोंका ही हम आगे इस ग्रन्थमें उपयोग करेंगे ।।९।।
Our revered preceptor, Ācārya Jinasena, out of his affection for us, has already expressed all the essential flavours within the Purāṇa composed by him. Therefore, out of devotion to him, in this present work we shall only employ those sentiments which were left untouched by him. ॥9॥
श्लोक ( Shlok ) 10
रागादीन् दूरतस्त्यक्त्वा शृङ्गारादिरसोक्तिभिः । पुराणकारकाः शुद्धबोधाः शुद्धा मुमुक्षवः ॥१०॥
राग आदिको दूरसे ही छोड़कर शृङ्गार आदि रसोंका निरूपण कर पुराणोंकी रचना करने-वाले शुद्ध ज्ञानी, पवित्र और मोक्षकी इच्छा करनेवाले होते हैं ।।१०।।
Those pure-knowing seers, sanctified in spirit and intent upon liberation, who compose the Purāṇas—though they portray sentiments such as Śṛṅgāra (love) and others—do so while having renounced all attachment and passions from afar. ॥10॥
श्लोक ( Shlok ) 11
निर्मितोऽस्य पुराणस्य सर्वसारो महात्मभिः। तच्छेषे यतमानानां प्रासादस्येव नः श्रमः ॥११॥
इस पुराणका समस्त सार तो महात्मा जिनसेनाचार्यने पूर्ण ही कर दिया है अब उसके बाकी बचे हुए अंशमें प्रयत्न करनेवाले हम लोगोंका परिश्रम ऐसा समझना चाहिये जैसा कि किसी मकानके किसी बचे हुए भागको पूर्ण करनेके लिये थोड़ा सा परिश्रम करना पड़ा हो ।।११।।
The noble Ācārya Jinasena has already rendered the very essence of this Purāṇa complete in itself; whatever effort now remains on our part should be regarded merely as one’s humble labour in finishing a small, remaining portion of a grand edifice already well constructed. ॥11॥
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
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