आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 भरत की सेना और शारीरिक बल
गौतमस्वामी राजा श्रेणिक के प्रश्न पर भरत की विभूति का वर्णन करते हैं। उनके पास 84 लाख ऐरावत हाथी, 84 लाख रथ, 18 करोड़ घोड़े, और 84 करोड़ पैदल सिपाही हैं। भरत का शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से अभेद्य और समचतुरस्र संहनन से सुंदर है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सी और शरीर 64 लक्षणों से युक्त है। उनका शारीरिक बल छह खंडों के राजाओं से अधिक है, और उनका चक्र-शासन सभी राजा स्वीकार करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
कीदृक् परिच्छदस्तस्य विभवश्चक्रर्वार्तनः । इति “प्रश्नवशादस्य विभवोद्देशकीर्तनम् ॥ २२ ॥
उस चक्रवर्ती-का परिवार कितना था ? और विभूति कितनी थी ? राजा श्रेणिकके इस प्रश्नका उत्तर देनेके लिये गौतमस्वामी उसकी विभूतिका इस प्रकार वर्णन करने लगे ॥ २२॥
“How vast was the family of that Chakravartin? And how great was his splendour?”—In response to this inquiry from King Shreṇika, the venerable Gautama Svāmi began to recount his glories in the following manner.22
श्लोक ( Shlok ) 23
गलन्मदजलास्तस्य गजाः सुरगजोपमाः । लक्षाश्चतुरशीतिस्ते “रदैर्बद्धै सुकल्पितैः ॥ २३ ॥
महाराज भरतके, जिनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल झर रहा है, और जो जड़े हुए सुसज्जित दांतोंसे सुशोभित हैं ऐसे ऐरावत हाथीके समान चौरासी लाख हाथी थे ॥ २३॥
Maharaja Bharata possessed eighty-four lakhs of elephants, whose temples streamed with ichor and whose gleaming, bejeweled tusks adorned them with splendour—each one as majestic as the divine elephant Airāvata.23
श्लोक ( Shlok ) 24
दिव्यरत्नविनिर्माण रथास्तावन्त’ एव हि । मनोवायुजवाः सूर्यरथप्रस्पर्धिरंहसः ॥ २४ ॥
जिनका वेग मन और वायुके समान है अथवा जिनकी तेज चाल सूर्यके साथ स्पर्धा करनेवाली है ऐसे दिव्य रत्नोंके बने हुए उतने ही अर्थात् चौरासी लाख ही रथ थे ।। २४।।
He possessed an equal number—eighty-four lakhs—of celestial chariots, fashioned of divine gems, whose swiftness rivaled the wind and the mind, and whose radiant speed dared to compete with the very course of the sun.24
श्लोक ( Shlok ) 25
कोटयोऽष्टादशाश्वानां भूजलाम्बरचारिणाम् । यत्खुराग्राणि धौतानि पूतैस्त्रिपथगा जलैः ॥ २५ ॥
जिनके खुरोंके अग्रभाग पवित्र गंगा-जलसे धुले हुए हैं और जो पृथिवी, जल तथा आकाशमें समान रूपसे चल सकते हैं ऐसे अठारह करोड़ घोड़े हैं ।॥ २५॥
He commanded eighteen crores of steeds, whose hooves had been cleansed by the sacred waters of the Ganga—steeds so wondrous that they moved with equal ease across earth, water, and sky. 25
श्लोक ( Shlok ) 26
चतुर्भिरधिकाशीतिः कोट्योऽस्य : पदातयः । येषां सुभट सम्मर्दे निरूढं पुरुषव्रतम् ॥ २६ ॥
अनेक योद्धाओंके मर्दन करनेमें जिनका पुरुषार्थ प्रसिद्ध है ऐसे चौरासी करोड़ पैदल सिपाही थे ।। २६ ।।
He commanded eighty-four crores of foot soldiers, renowned for their valour in vanquishing countless warriors, their prowess resounding through the annals of war and glory.26
श्लोक ( Shlok ) 27
वज्रास्थिबन्धनं वाज्रैर्वलयैर्वेष्टितं वपुः । वज्रनाराचनिर्भिन्नम् अभेद्यमभवत् प्रभोः ।। २७ ।।
महाराज भरतका शरीर वज्र को हड्डियोंके बन्धन और वज्र के ही वेष्टनोंसे वेष्टित था, वज्रमय कीलोंसे कीलित था और अभेद्य अर्थात् भेदन करने योग्य नहीं था। भावार्थ-उनका शरीर वज्रवृषभनाराचसंहननका धारक था ।। २७।।
The body of Maharaja Bharata was sheathed in adamantine strength—bound by bones like thunderbolts, encased in layers as firm as diamond, and riveted with joints of indestructible force. In essence, he bore the impenetrable form known as Vajra-Vṛṣabha-Nārāca-Saṃhanana.27
श्लोक ( Shlok ) 28
समसुप्रविभक्ताङ्गं चतुरस्रं सुसंहति । वपुः सुन्दरमस्यासीत् संस्थानेनादिना विभोः ।॥ २८ ॥
उनका शरीर चतुरस्र था-चारों ओरसे मनोहर था, उसके अंगोंपांगोंका विभाग समानरूपसे हुआ था अंगोंकी मिलावट भी ठीक थी और समचतुरस्र नामके प्रथम संहननसे अत्यन्त सुन्दर था ।॥२८॥
His body was perfectly symmetrical—graceful from every angle—its limbs and sub-limbs proportioned in flawless harmony, their alignment impeccable; and he possessed the Sama-Chaturasra, the foremost of bodily structures, rendering him exceedingly handsome.28
श्लोक ( Shlok ) 29
निष्ट प्तकनकच्छायं सच्चतुःषष्टिलक्षणम् । रुरुच व्यञ्जनैस्तस्य निसर्गसुभगं वपुः ।। २ ९ ।।
जिसकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी और जिसपर चौंसठ लक्षण थे ऐसा उसका स्वभावसे ही सुन्दर शरीर तिल आदि व्यञ्जनोंसे बहुत ही सुशोभित हो रहा था ।। २९।।
His naturally resplendent form—radiant like molten gold and adorned with the sixty-four auspicious marks—was further beautified by auspicious signs such as the tilaka, making his divine body shine with unmatched splendour.29
श्लोक ( Shlok ) 30
शारीरं यच्च यावच्च बलं षट्खण्डभूभुजाम् । ततोऽधिकतरं तस्य बलमासीद् बलीयसः ॥ ३० ॥
छहों खण्डक राजाओंका जो और जितना कुछ शारीरिक बल था उससे कहीं अधिक बल उस बलवान् भरत-के शरीरमें था ॥३०॥
All the strength possessed by the rulers of the six great divisions of the world was far surpassed by the might that dwelled within the body of the powerful and valiant Bharata.30
श्लोक ( Shlok ) 31
शासनं तस्य चक्राङ्कमासिन्धोरनिवारितम् । शिरोभिरूढमारूढविक्रमैः पृथिवीश्वरैः ॥ ३१ ॥
जिसका चक्र ही चिह्न है और समुद्रपर्यन्त जिसे कोई नहीं रोक सकता ऐसे उसके शासनको बड़े बड़े पराक्रमको धारण करनेवाले राजालोग अपने शिरपर धारण करते थे ।॥३१॥
Marked by the emblem of the divine discus, his sovereign rule—unstoppable even unto the ocean’s edge—was borne upon their heads by mighty kings of great valour, as a crown of honour and submission.31
श्लोक 32 से 41
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
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