आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 बाहुबली के गुण और रत्नत्रय की रक्षा
बाहुबली 28 मूलगुणों और 84 लाख उत्तरगुणों का पालन करते हैं, जिसमें महाव्रत, समितियां, इंद्रिय-दमन, और एक बार आहार शामिल हैं। वे तप की किरणों से देदीप्यमान होते हैं। रस, शब्द, और ऋद्धि-गौरव से मुक्त, दशधर्मों से मोक्षमार्ग में दृढ़ रहते हैं। तीन गुप्तियों और पांच समितियों से कर्म-शत्रुओं को जीतते हैं। कषाय-चोरों से रत्नत्रय की रक्षा करते हैं। मौन रहकर विकथाओं से दूर रहते हैं। उनका मन ज्ञान-दीपक से प्रकाशित रहता है, जिससे सभी पदार्थ उनके ध्यान के योग्य होते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
इत्यन्तरङ्गशत्रूणां स भञ्जन् प्रसरं मुहुः । जयति स्माऽऽत्मनाऽऽत्मानमात्मविद् विदिताखिलः ॥१३२॥
इस प्रकार अन्तरङ्ग शत्रुओंके प्रसारको बार बार नष्ट करते हुए उन आत्मज्ञानी तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाले मुनिराजने अपने आत्माके द्वारा ही अपने आत्माको जीत लिया था ।॥१३२॥
Thus, repeatedly vanquishing the rising tides of his inner enemies, the self-realized sage—knower of all substances—conquered his very self by the power of his own soul.132
श्लोक ( Shlok ) 133 –135
व्रतं च समितीः सर्वाः सम्यगिन्द्रियरोधनम् । अचेलतां च केशानां प्रतिलुञ्चनसङ्गरम् ॥१३३॥आवश्यकेष्वसम्बाधमस्नानं क्षितिशायिताम् । अदन्तधावनं स्थित्वा भुक्तिं भक्तं च नासकृत् ॥१३४।।प्राहुर्मूलगुणानेतान् तथोत्तरगुणाः परे । तेषामाराधने यत्नं सोऽतनिष्टातनुर्मुनिः ll१३५ ll
पांच महाव्रत, पांच समितियां, पांच इन्द्रियदमन, वस्त्र परित्याग, केशोंका लोंच करना, छह आवश्यकोंमें कभी बाधा नहीं होना, स्नान नहीं करना, पृथिवीपर सोना, दांतौन नहीं करना, खड़े होकर भोजन करना और दिनमें एक बार आहार लेना, इन्हें अट्ठाईस मूलगुण कहते हैं इनके सिवाय चौरासी लाख उत्तर गुण भी हैं, वे महामुनि उन सबके पालन करने में प्रयत्न करते थे ।।१३३-१३५।।
The five great vows, the five forms of careful conduct, the restraint of the five senses, the renunciation of clothing, the plucking of one’s own hair, unwavering observance of the six essential duties, abstaining from bathing, sleeping upon the bare earth, foregoing the use of toothbrushes, partaking of food while standing, and eating but once a day—these constitute the twenty-eight fundamental virtues (mūlaguṇas).
Beyond these lie eighty-four lakh auxiliary virtues (uttara guṇas), and the great sage strove with steadfast effort to observe them all in their entirety.133 –135
श्लोक ( Shlok ) 136
एतेष्वहापयन् ” काञ्चिद् व्रतशुद्धिं परां श्रितः । सोऽदीपि किरणैर्भास्वानिव दीप्तैस्तपोंऽशुभिः ।॥१३६॥
इनमें कुछ भी नहीं छोड़ते हुए अर्थात् सबका पूर्ण रीतिसे पालन करते हुए वे मुनिराज व्रतोंकी उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त हुए थे तथा जिस प्रकार देदीप्यमान किरणोंसे सूर्य प्रकाशमान होता है उसी प्रकार वे भी तपकी देदीप्यमान किरणोंसे प्रकाशमान हो रहे थे ॥ १३६।।
Leaving nothing undone, observing each vow in its fullest purity, the noble sage attained the loftiest sanctity in his disciplines. Even as the sun shines resplendent through its radiant beams, so did he glow with the luminous brilliance of his austerities.136
श्लोक ( Shlok ) 137
गौरवैस्त्रिभिरुन्मुक्तः परां निःशल्यतां गतः । धर्मैर्दशभिरारुढदाढ्र्योऽभून्मुक्ति वर्त्मनि ॥१३७॥
वे रसगौरव, शब्द गौरव, और ऋद्धिगौरव इन तीनोंसे रहित थे, अत्यन्त निःशल्य थे और दशधर्मोंके द्वारा उन्हें मोक्ष मार्ग में अत्यन्त दृढ़ता प्राप्त हो गई थी ॥ १३७।।
He was untouched by the pride of taste, the pride of eloquence, and the pride of supernatural powers. Utterly free from all inner afflictions, he stood steadfast upon the path of liberation, firmly established through the ten supreme virtues.137
श्लोक ( Shlok ) 138
गुप्तित्रयमयीं गुप्तिं श्रितो ज्ञानासिभासुरः । संवर्मितः समितिभिः स भेजे विजिगीषुताम् ॥१३८ ।।
वे मुनिराज किसी विजिगीषु अर्थात् शत्रुओंको जीतने की इच्छा करनेवाले राजाके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार विजि-गीषु राजा किसी दुर्ग आदि सुरक्षित स्थानका आश्रय लेता है, तलवारसे देदीप्यमान होता है और कवच पहने रहता है उसी प्रकार उन मुनिराजने भी तीन गुप्तियोंरूपी दुर्गोंका आश्रय ले रक्खा था, वे भी ज्ञानरूपी तलवारसे देदीप्यमान हो रहे थे और पांच समितियांरूप कवच पहिन रक्खा था। भावार्थ-यथार्थमें वे कर्मरूप शत्रुओंको जीतने की इच्छा रखते थे ॥१३८।।
That noble sage appeared akin to a conquering monarch, intent on subduing his foes. Just as a victorious king takes refuge in a well-fortified citadel, shines with the brilliance of his sword, and is protected by a sturdy coat of mail, so too had the muni taken shelter in the fortress of the three restraints (guptis), gleamed with the sword of true knowledge, and donned the armor of the five forms of careful conduct (samitis). In truth, he was ever intent on vanquishing the enemies known as karma.138
श्लोक ( Shlok ) 139
कषायतस्करैर्नास्य हृतं रत्नत्रयं धनम् । सततं जागरूकस्य भूयो भूयोऽप्रमाद्यतः ॥१३९॥
कषायरूपी चोरोंके द्वारा उनका रत्नत्रयरूपी धन नहीं चुराया गया था क्योंकि वे सदा जागते रहते थे और बार बार प्रमादरहित होते रहते थे। भावार्थ-लोक में भी देखा जाता है कि जो मनुष्य सदा जागता रहता है और कभी प्रमाद नहीं करता उसकी चोरी नहीं होती । भगवान् बाहुबली अपने परिणामोंके शोधमें निरन्तर लवलीन रहते थे और प्रमादको पासमें भी नहीं आने देते थे इसलिये कषायरूपी चोर उनके रत्नत्रयरूपी धनको नहीं चुरा सके थे ।।१३९॥
The thieves of passion could not steal from him the priceless treasure of the Three Jewels—right faith, right knowledge, and right conduct—for he remained ever vigilant, free from even the slightest trace of negligence. Just as in the world, one who keeps constant watch is never robbed, so too did Lord Bahubali remain deeply absorbed in the purification of his inner states, never allowing delusion to draw near. Therefore, the bandits of defilement could not lay hands upon his spiritual wealth.139
श्लोक ( Shlok ) 140
वाचंयमस्य तस्यासीन्न जातु विकथादरः । नाभिद्यतेन्द्रियैरस्य मनोदुर्ग सुसंवृतम् ॥१४०।।
वे सदा मौन रहते थे इसलिये कभी उनका विकथाओंमें आदर नहीं होता था। और उनका मनरूपी दुर्ग अत्यन्त सुरक्षित था इसलिये वह इन्द्रियोंके द्वारा नहीं तोड़ा जा सका था । भावार्थ वे कभी विकथाएं नहीं करते थे और पांचों इन्द्रियों तथा मनको वशमें रखते थे ।।१४०।।
Ever abiding in silence, he never lent himself to idle or frivolous speech. His fortress-like mind was so well-guarded that it could not be breached by the senses. In essence, he spoke not in vain and held both the five senses and the mind firmly under his command. 140
श्लोक ( Shlok ) 141
मनोऽगार महत्यस्य बोधिता ज्ञानदीपिका । व्यदीपि तत एवासन् विश्वेऽर्था ध्येयतापदे ॥ १४१॥
उनके मनरूपी विशाल घरमें सदा ज्ञानरूपी दीपक प्रकाशमान रहता था इसलिये ही समस्त पदार्थ उनके ध्येयकोटिम थे अर्थात् ध्यान करने योग्य थे। भावार्थ -पदार्थोंका ध्यान करने के लिये उनका ज्ञान होना आवश्यक है, मुनिराज बाहुबलीको सब पदार्थों-का ज्ञान था इसलिये सभी पदार्थ उनके ध्यान करने योग्य थे ।। १४१।।
Within the vast mansion of his mind, the lamp of knowledge ever burned bright. Thus, all substances of existence were worthy objects of his meditation. For indeed, to contemplate a thing, one must first know it—and to Lord Bahubali, all things stood revealed through the radiance of his omniscient insight.141
श्लोक 142 से 151
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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