आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 आत्मरक्षा और धर्म
क्षत्रिय को अन्य मतों से बुद्धि हटाकर समीचीन मार्ग में लगानी चाहिए। आत्मरक्षा इस लोक और परलोक के अपायों से बचाव है। परलोक की रक्षा धर्म से होती है, जो आपत्तियों का प्रतिकार, मनचाहा फल, कल्याण, और आनंद देता है। राज्य में शत्रुता, खेद, पाप, और शंका के कारण सुख नहीं। बुद्धिमान को अपथ्य राज्य का त्याग और तप ग्रहण करना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
दिगन्तरेभ्यो व्यावर्त्य प्रबुद्धां मतिमात्मनः । सन्मार्गे स्थापयन्नेवं कुर्यान्मत्यनुपालनम् ॥११२॥
क्षत्रियको चाहिये कि वह अपनी जागृत बुद्धिको अन्य दिशाओं अर्थात् मतोंसे हटाकर समीचीन मार्गमें लगाता हुआ उसकी रक्षा करे ।।११२।।
A Kshatriya ought to withdraw his awakened intellect from all divergent doctrines and firmly direct it toward the righteous path, guarding it with steadfast resolve.112
श्लोक ( Shlok ) 113
आत्रिकामुत्रिकापायात् परिरक्षणमात्मनः। आत्मानुपालनं नाम तदिदानीं विवृण्महे ॥११३॥
इस लोक तथा परलोक सम्बन्धी अपायोंसे आत्माकी रक्षा करना आत्माका पालन करना कहलाता है। अब आगे इसी आत्माके पालनका वर्णन करते हैं ।। ११३।।
To safeguard the soul from all harms pertaining to this world and the next is known as the true preservation of the self. Now, the discourse proceeds to elucidate this guardianship of the soul. 113
श्लोक ( Shlok ) 114
आत्रिकापायसंरक्षा सुप्रतीतैव धीमताम् । विषशस्त्राद्यपायानां परिरक्षणलक्षणा ॥११४॥
विष शस्त्र आदि अपायोंसे अपनी रक्षा करना ही जिसका लक्षण है ऐसी इस लोकसम्बन्धी अपायोंसे होनेवाली रक्षा तो विद्वान् पुरुषोंको विदित ही है ।॥ ११४॥
The protection from worldly harms—such as poison, weapons, and the like—characterized by safeguarding oneself against external perils, is well known to the wise.114
श्लोक ( Shlok ) 115
‘तत आमुत्रिकापायरक्षाविधिरनूद्यते । तद्रक्षणं च धर्मेण धर्मो ह्यापत्प्रतिक्रिया ॥११५॥
इसलिये अब परलोक सम्बन्धी अपायोंसे होनेवाली रक्षाकी विधि कहते हैं। परलोक सम्बन्धी अपायोंसे रक्षा धर्मके द्वारा ही हो सकती है क्योंकि धर्म ही समस्त आपत्तियोंका प्रतिकार है-उनसे बचनेका उपाय है ॥११५॥
Therefore, the method of protection from the perils of the hereafter shall now be expounded. Such protection can be attained only through Dharma, for Dharma alone is the shield against all afflictions— the sole means of deliverance from them.115
श्लोक ( Shlok ) 116
धर्मो रक्षत्यपायेभ्यो धर्मोऽभीष्टफलप्रदः । धर्मः श्रेयस्करोऽमुत्र धर्मेणेहाभिनन्दथुः ॥११६॥
धर्म ही अपायोंसें रक्षा करता है, धर्म ही मनचाहा फल देनेवाला है, धर्म ही परलोक में कल्याण करनेवाला है और धर्मसे ही इस लोकमें आनन्द प्राप्त होता है ।। ११६।।
Dharma alone is the guardian against all calamities; Dharma alone bestows the desired fruits; Dharma alone ensures blessedness in the hereafter; and through Dharma alone is true joy attained in this very world. 116
श्लोक ( Shlok ) 117
तस्माद्धमैंकतानः सन् कुर्यादेप्यत्प्रतिक्रियाम् । एवं हि रक्षितोऽपायाद् भवेदात्मा भवान्तरे ॥११७॥
इसलिये धर्ममें एकचित्त होकर भविष्यत् कालमें आनेवाली विपत्तियोंका प्रतिकार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करनेसे ही आत्माकी दूसरे भवमें विपत्तिसे रक्षा हो सकती है ॥११७॥
Therefore, with unwavering focus, one must adhere to Dharma as a means to counter the adversities that may arise in times to come; for only thus can the soul be shielded from misfortunes in future births.
श्लोक ( Shlok ) 118
बह्वपायमिदं राज्यं त्याज्यमेव मनस्विनाम् । यत्र पुत्राः ससोदर्या वैरायन्ते निरन्तरम् ॥११८॥
जिस राज्यके लिये पुत्र तथा सगे भाई आदि भी निरन्तर शत्रुता किया करते हैं और जिसमें बहुत अपाय हैं ऐसा यह राज्य बुद्धिमान् पुरुषोंको अवश्य ही छोड़ देना चाहिये ।।११८।।
That kingdom, for the sake of which even sons and close kinsmen remain in constant enmity, and which is fraught with manifold dangers—such a realm ought surely to be renounced by the wise. 118
श्लोक ( Shlok ) 119
अपि चात्र मनः खेदबहुले का सुखासिका । मनसो निर्वृति सौख्यमुशन्तीह विचक्षणाः ॥११९॥
एक बात यह भी है कि जिसमें मानसिक खेदकी बहुलता है ऐसे इस राज्यमें सुखपूर्वक कैसे रहा जा सकता है क्योंकि इस संसारमें पण्डितजन मनकी निराकुलताको ही सुख कहते हैं ।। ११९।।
There is yet another truth: how can one dwell happily in a kingdom laden with the torment of mental anguish? For in this world, the wise regard the serenity of the mind alone as true happiness.119
श्लोक ( Shlok ) 120
राज्ये न सुखलेशोऽपि दुरन्ते दुरितावहे। सर्वतः शङ्कमानस्य प्रत्युतात्रासुखं महत् ॥१२०॥
जिसका अन्त अच्छा नहीं है और जिसमें निरन्तर पाप उत्पन्न होते रहते हैं ऐसे इस राज्यमें सुखका लेश भी नहीं है बल्कि सब ओरसे शंकित रहनेवाले पुरुषको इस राज्यमें बड़ा भारी दुःख बना रहता है ।॥१२०॥
That kingdom, whose end is ruinous and wherein sin arises unceasingly, holds not even a trace of true happiness. Rather, for the one who dwells in constant fear and suspicion, it becomes a source of profound and abiding sorrow.120
श्लोक ( Shlok ) 121
ततो राज्यमिवं हेयमपथ्यमिव भेषजम् । उपादेयं तु विद्वद्भिस्तपः पथ्यमिवाशनम् ॥१२१॥
इसलिये विद्वान् पुरुषोंको अपथ्य औषधिके समान इस राज्यका त्याग कर देना चाहिये और पथ्य भोजनके समान तप ग्रहण करना चाहिये ।। १२१।।
Therefore, the wise should renounce this kingdom, which is like a harmful medicine, and instead embrace penance, which is as wholesome and nourishing as salutary food.121
श्लोक 122 से 131
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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