आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11| श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12
श्लोक 13 से 21 क्षत्रिय न्याय और वंशरक्षा
क्षत्रियों का न्याय धर्म का उल्लंघन किए बिना धन कमाना, रक्षा करना, बढ़ाना, और योग्य पात्र को दान देना है। यह जैन धर्म के अनुसार उत्तम न्याय है। रत्नत्रय के प्रताप से क्षत्रिय अयोनिज कहलाते हैं। बड़े वंशों के राजा लोकोत्तम पुरुष हैं, जो धर्ममार्ग में स्वयं और अन्य को स्थिर रखते हैं। उन्हें अन्य मतों के शेषाक्षत आदि ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे महत्त्व का नाश और विघ्न उत्पन्न होते हैं। अन्य मतों के प्रति श्रद्धा से कुल की हीनता और राजा का नाश संभव है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 13 to 21
श्लोक ( Shlok ) 13
स तु न्यायोऽनतिक्रान्त्या धर्मस्यार्थ समर्जनम् । रक्षणं वर्धनं चास्य पात्रे च विनियोजनम् ॥१३॥
धर्मका उल्लंघन न कर धनका कमाना, रक्षा करना, बढ़ाना और योग्य पात्रमें दान देना ही उन क्षत्रियोंका न्याय कह-लाता है ।।१३।।
To earn wealth without violating Dharma, to protect and increase it, and to bestow it upon worthy recipients — this, indeed, is deemed justice for those Kshatriyas. ॥13॥
श्लोक ( Shlok ) 14
सैषा चतुष्टयी वृत्तिर्न्यायः सद्भिरुदीरितः । जैनधर्मानुवृत्तिश्व न्यायो लोकोत्तरो मतः ॥१४॥
इस चार प्रकारकी प्रवृत्तिको सज्जन पुरुषोंने क्षत्रियोंका न्याय कहा है तथा जैनधर्मके अनुसार प्रवृत्ति करना संसारमें सबसे उत्तम न्याय माना गया है ।।१४।।
These fourfold duties have been declared by noble souls as the just conduct of Kshatriyas; and according to the Jain faith, performing these duties constitutes the highest form of justice in the world. ॥14॥
श्लोक ( Shlok ) 15
दिव्यमूर्त्ते रुदुंत्पद्य जिनादुत्पादयज्जिनान् । रत्नत्रयं तु तद्योनिर्नृ पास्त’स्मादयोनिजाः ।।१५।।
दिव्य-मूर्तिको धारण करने वाले श्री जिनेन्द्रदेवसे उत्पन्न होकर तीर्थ करोंको उत्पन्न करनेवाला जो रत्नत्रय है वही क्षत्रियोंकी योनि है अर्थात् क्षत्रिय पदकी प्राप्ति रत्नत्रय के प्रतापसे ही होती है। यही कारण है कि क्षत्रिय लोग अयोनिज अर्थात् बिना योनिके उत्पन्न हुए कहलाते हैं ।। १५।।
Born from the illustrious Lord Jinendra, the embodiment of divine form, and the source of the Tīrthaṅkaras, the Ratnatraya is the very origin of the Kshatriya lineage—that is to say, attainment of the Kshatriya state is achieved solely through the power of the Ratnatraya. For this reason, Kshatriyas are said to be ayonija, born without the usual womb-born origin. ॥15॥
श्लोक ( Shlok ) 16
ततो महान्वयोत्पन्ना नृपा लोकोत्तमा मताः । पथिस्थिताः स्वयं धर्म्ये स्थापयन्तः परानपि ॥१६॥
इसलिये बड़े बड़े वंशोंमें उत्पन्न हुए राजा लोग लोकोत्तम पुरुष माने गये हैं। ये लोग स्वयं धर्ममार्ग में स्थित रहते हैं तथा अन्य लोगोंको भी स्थित रखते हैं ।। १६ ।।
Therefore, kings born in great and illustrious lineages are regarded as the foremost among men in the world. These sovereigns themselves abide steadfastly on the path of Dharma, and they ensure that others do likewise. ॥16॥
श्लोक ( Shlok ) 17
तैस्तु सर्वप्रयत्नेन कार्य स्वान्वयरक्षणम् । तत्पालनं कथं कार्यमिति चेत्तदनूद्य ते ॥१७॥
उन क्षत्रियोंको सर्वप्रकारके प्रयत्नोंसे अपने वंशकी रक्षा करनी चाहिये। वह वंशकी रक्षा किस प्रकार करनी चाहिये यदि तुम लोग यह जानना चाहते हो तो मैं आगे कहता हूं ।।१७।।
Those Kshatriyas must, by every effort, protect the honor of their lineage. If you wish to know how one should guard the sanctity of their house, then listen closely as I now declare it. ॥17॥
श्लोक ( Shlok ) 18
स्वयं महान्वयत्वेन महिम्नि क्षत्रियाः स्थिताः । धर्मास्थया न शेषादि ग्राह्यं तैः परलिङ्गिनाम् ॥१८॥
बड़े बड़े वंशोंमें उत्पन्न होनेसे क्षत्रिय लोग स्वयं बड़प्पनमें स्थिर हैं इसलिये उन्हें अन्यमतियोंके धर्ममें श्रद्धा रखकर उनके शेषाक्षत आदि ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ १८॥
Born of noble and illustrious lineages, Kshatriyas are firmly established in their own grandeur; therefore, they ought to hold reverence for the faiths of others but must not accept their residual rites such as Śeṣākṣat and the like. ॥18॥
श्लोक ( Shlok ) 19
तच्छेषादिग्रहे दोषः कश्चेन्माहात्म्यविच्युतिः । अपायाः बहवश्चास्मिन्न तस्तत्परिवर्जनम् ॥१९॥
उनके शेषाक्षत आदिके ग्रहण करनेमें क्या दोष है ? कदाचित् कोई यह कहे तो उसका उत्तर यह है कि उससे अपने महत्त्वका नाश होता है और अनेक विघ्न या अनिष्ट आते हैं इसलिये उनका परित्याग ही कर देना चाहिये ।।१९।।
What is the fault in accepting rites such as Śeṣākṣat from them? Should anyone ask this, the answer is that doing so diminishes one’s own dignity and invites numerous obstacles and misfortunes; therefore, such practices ought to be forsaken entirely. ॥19॥
श्लोक ( Shlok ) 20
माहात्म्यप्रच्युतिस्तावत् कृत्वाऽन्यस्य शिरोनतिम् । ततः शेषाद्युपादाने स्यान्निष्कृष्टत्वमात्मनः ॥२०॥
अन्य मतावलम्बियोंको शिरोनति करनेसे अपने महत्त्वका नाश हो जाता है इसलिये उनके शेषाक्षत आदि लेनेसे अपनी निकृष्टता हो सकती है ।। २० ।।
By bowing before adherents of other faiths, one diminishes one’s own honor; therefore, accepting their rites such as Śeṣākṣat may lead to one’s degradation. ॥20॥
श्लोक ( Shlok ) 21
प्रद्विषन् परपाषण्डी विषपुष्पाणि निक्षिपेत् । यद्यस्य मूर्ध्नि नन्वेवं स्यादपायो महीपतेः ॥२१॥
संभव है द्वेष करनेवाला कोई पाखण्डी राजाके शिरपर विषपुष्प रख दे तो इस प्रकार भी उसका नाश हो सकता है ॥२१॥
It is possible that a deceitful enemy, harboring malice, might place a poisonous flower upon the king’s head—thus, through such means, his downfall may come to pass. ॥21॥
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12
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