आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 युद्ध की शांति की कामना
लोग मध्यस्थ भाव से युद्ध की शांति की कामना करते हैं, क्योंकि यह अनेक लोगों के विनाश का कारण बन सकता है। कुछ पक्षपात से अपने पक्ष की प्रशंसा करते हैं। राजा बाहुबली के समीप पहुंचते हैं, जहां उनकी भुजाओं का दर्प देखकर भरत के योद्धा भयभीत होते हैं। बाहुबली की सेना समुद्र-सी क्षुब्ध हो उठती है। दोनों सेनाएं युद्ध की तैयारी करती हैं, पर मंत्रियों को यह क्रूर युद्ध अशांतिपूर्ण लगता है। वे कहते हैं कि दोनों भाइयों को क्षति नहीं होगी, पर सेवकों का नाश होगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
तन्मा भूदनयोर्युद्धं जनसंक्षयकारणम् । कुर्वन्तु देवताः शान्ति यदि सन्निहिता इमाः ॥३२॥
इसलिये जो अनेक लोगोंके विनाशका कारण है ऐसा इन दोनोंका युद्ध नहीं हो तो अच्छा है, यदि देव लोग यहां समीपमें हों तो वे इस युद्धकी शान्ति करें ।॥ ३२॥
Therefore, it were better that this battle — which brings destruction upon multitudes — not be waged between these two. And if the gods themselves be present nearby, let them bring peace to this war.32
श्लोक ( Shlok ) 33
इति माध्यस्थ्यवृत्त्यैके जनाः श्लाध्यं वचो जगुः । पक्षपातहताः केचित् स्वपक्षोत्कर्षमुज्जगुः ॥३३॥
इस प्रकार कितने ही लोग मध्यस्थ भावसे प्रशंसनीय वचन कह रहे थे और कितने ही पक्षपातसे प्रेरित होकर अपने ही पक्षकी प्रशंसा कर रहे थे ॥३३॥
Thus did many speak commendable words in a spirit of impartiality, while many others, swayed by partiality, extolled only their own side.33
श्लोक ( Shlok ) 34
एवं प्रायैर्जनालापैर्महीनाथा विनोदिताः । द्रुतं प्रापुस्तमुद्देशं यत्र वीराग्रणीरसौ ॥३४॥
प्रायः लोगों के इसी प्रकारके वचनोंसे मन बहलाते हुए राजा लोग शीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुंचे जहां वीरशिरोमणि कुमार बाहुबली पहलेसे विराजमान था ।। ३४।।
Amused and entertained by such words from the multitude, the kings swiftly made their way to the place where the valiant prince, the foremost among warriors—Kumāra Bāhubali—was already seated in majesty.34
श्लोक ( Shlok ) 35
दोर्दर्प विगणय्यास्य दुर्विलङ्घयमरातिभिः । त्रेसुः प्रतिभटाः प्रायस्त स्मिन्नासन्नसन्निधौ ॥३५॥
बाहुबली के समीप पहुंचते ही भरत के योद्धा, जिसका शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते ऐसा बाहुबलीको भुजाओं-का दर्प देखकर प्रायः कुछ डर गये ।। ३५।।
No sooner had they approached Bāhubali than Bharata’s warriors—beholders of his mighty arms, whose strength no foe could dare withstand—were, for the most part, seized with a certain fear.35
श्लोक ( Shlok ) 36
इत्यभ्यर्णे बले जिष्णोः बलं भुजबलीशिनः । जलमब्धेरिवाक्षुभ्यद् वीरध्वाननिरुद्धदिक् ॥३६॥
इस प्रकार चक्रवर्ती भरतकी सेनाके समीप पहुँचने-पर वीरोंके शब्दोंसे दिशाओंको भरनेवाली बाहुबलीकी सेना समुद्रके जलके समान क्षोभको प्राप्त हुई ।।३६।।
Thus, as the army of the Emperor Bharata drew near, Bāhubali’s host—its heroes’ voices filling the quarters with thunder—was stirred like the waters of the ocean, rising in agitation.36
श्लोक ( Shlok ) 37
अथोभयबले धीराः सन्नद्धगजवाजयः। बलान्यारचयामासुरन्योऽन्यं प्रयुयुत्सया ।॥३७॥
अथानन्तर-दोनों ही सेनाओंमें जो शूरवीर लोग थे वे परस्पर युद्ध करनेकी इच्छा-से आने हाथी घोड़े आदि सजाकर सेनाकी रचना करने लगे अनेक प्रकारके व्यूह आदि बनाने लगे ।। ३७।।
Thereafter, the valiant warriors of both armies, eager to engage in battle, began arraying their forces—mounting elephants, horses, and chariots, and organizing their troops in manifold formations and strategic battle arrays.37
श्लोक ( Shlok ) 38
तावच्च मन्त्रिणो मुख्याः सम्प्रधार्यावदन्निति । शान्तये नैनयोर्युद्धं ग्रहयोः क्रूरयोरिव ॥ ३८ ॥
इतने में ही दोनों ओरके मुख्य मुख्य मंत्री विचार कर इस प्रकार कहने लगे कि क्रूरग्रहों के समान इन दोनोंका युद्ध शान्तिके लिये नहीं है ॥ ३८।।
Just then, the chief ministers on both sides, reflecting deeply, began to say: “The clash between these two, fierce as malignant stars, is not destined to bring peace—it portends only devastation.”38
श्लोक ( Shlok ) 39
चरमगात्रधरावेतौ नानयोः काचन क्षतिः । क्षयो जनस्य पक्षस्य व्याजेनानेन जृम्भितः ॥३९॥
क्योंकि ये दोनों ही चरम शरीरी हैं, इनकी कुछ भी क्षति नहीं होगी, केवल इनके युद्धके बहानेसे दोनों ही पक्षके लोगोंका क्षय होगा ।।३९।।
For these two possess bodies beyond decay; no harm shall befall them. Yet under the pretext of their battle, the ruin of countless lives on both sides shall be wrought.39
श्लोक ( Shlok ) 40
इति निश्चित्य मन्त्रज्ञा भीत्वा भूयो जनक्षयात् । तयोरनु मति लब्ध्वा धर्म्यं रणमघोषयन् ॥४०॥
इस प्रकार निश्चय कर तथा भारी मनुष्योंके संहारसे डरकर मंत्रियोंने दोनोंकी आज्ञा लेकर धर्मयुद्ध करनेकी घोषणा कर दी ॥४०॥
Thus resolved, and fearing the slaughter of countless men, the ministers obtained permission from both sides and proclaimed the commencement of a righteous war.40
श्लोक ( Shlok ) 41
अकlरणरणेनालं जनसंहारकारिणा । महानेव” मधर्मश्च गरीयांश्च यशोवधः ॥४१॥
उन्होंने कहा कि मनुष्योंका संहार करनेवाले इस कारणहीन युद्धसे कोई लाभ नहीं है क्योंकि इसके करनेसे बड़ा भारी अधर्म होगा और यशका भी बहुत विघात होगा ।।४१।।
They declared that this senseless war, which brings only the slaughter of men, yields no gain; for such strife breeds grievous unrighteousness and great ruin to renown and glory.41
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
Download PDF