आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 नगर का उत्सव और भरत नामकरण
गलियाँ चंदन जल से शोभायमान थीं। आकाश में इंद्रधनुष और तोरण शोभायमान थे। सुवर्ण कलश रखे गए। अयोध्या उत्सव से भर गई। भगवान ने दान बरसाया, कोई दरिद्र नहीं रहा। बालक भगवान से उदित चंद्रमा सा था। बंधुओं ने उसे भरत नाम दिया। इतिहासकारों ने कहा कि यह क्षेत्र भरत के नाम से भारतवर्ष कहलाया। भरत कुमुदों में आनंद बढ़ाता और अंधकार नष्ट करता था। वह दूध उगलकर यश बाँटता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
पुरवीथ्यस्तदा रेजुश्चन्दनाम्भश्छटोक्षिताः । कृताभिरुपशोभाभिः प्रहसन्त्यो दिवः श्रियम् ।।१५२।।
उस समय चंदन के जल से सींची गयी नगर की गलियाँ ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो अपनी सजावट के द्वारा स्वर्ग की शोभा की हंसी ही कर रही हो ।।152।।
At that time, the streets of the city, sprinkled with sandalwood water, appeared so splendid as if they were mocking the grandeur of heaven with their own decoration. ॥152॥
श्लोक ( Shlok ) 153
रत्नतोरणविन्यासाः पुरे रेजुर्गृहे गृहे। इन्द्रचापतडिद्वल्ली ललितं दधतोऽम्बरे ।।१५३।।
उस समय आकाश में इंद्रधनुष और बिजलीरूपी लता की सुंदरता को धारण करते हुए रत्ननिर्मित तोरणों की सुंदर रचनाएँ घर-घर शोभायमान हो रही थीं ।।153।।
At that time, the beautifully crafted gemstone-embellished arches adorned every house, reflecting the beauty of the rainbow and lightning-like vines in the sky. ॥153॥
श्लोक ( Shlok ) 154
कृतरङ्गवलौ रत्नचूर्णैर्भूमौ महोदराः । कुम्भा हिरण्मया रेजुः रोक्माब्जपिहिताननाः ॥ १५४॥
जहाँ रत्नों के चूर्ण से अनेक प्रकार के वेलबूटों की रचना की गयी है ऐसी भूमि पर बड़े-बड़े उदर वाले अनेक सुवर्णकलश रखे हुए थे । उन कलशों के मुख सुवर्ण कमलों से ढके हुए थे इसलिए वे बहुत ही शोभायमान हो रहे थे ।।154।।
On the ground, where various intricate floral designs were created with crushed gemstones, numerous large golden pots were placed. The mouths of these pots were covered with golden lotuses, making them appear exceptionally magnificent. ॥154॥
श्लोक ( Shlok ) 155
तस्मिन् नृपोत्सवे सासीत् पुरी सर्वेव सोत्सवा। यथाब्धि वृद्धौ संवृद्धिं याति वेलाश्रिता नदी ॥१५५॥
जिस प्रकार समुद्र की वृद्धि होने से उसके किनारे की नदी भी वृद्धि को प्राप्त हो जाती है उसी प्रकार राजा के घर उत्सव होने से वह समस्त अयोध्यानगरी उत्सव से सहित हो रही थी ।।155।।
Just as a river along the shore swells when the ocean rises, in the same way, the entire city of Ayodhya was filled with celebration due to the grand festivity in the king’s palace. ॥155॥
श्लोक ( Shlok ) 156
न दीनोऽभूत्तदा कश्चित् नदीनोदकभूयसोम् । दानधारां नृपेन्द्रेभे मुक्तधारं प्रवर्षति ।॥१५६॥
उस समय भगवान् वृषभदेवरूपी हाथी समुद्र के जल के समान भारी दान की धारा (सुवर्ण आदि वस्तुओं के दान की परंपरा, पक्ष में―मदजल की धारा) बरसा रहे थे इसलिए वहाँ कोई भी दरिद्र नही रहा था ।।156।।
At that time, Lord Vrishabhadeva, like a mighty elephant, was showering a stream of generous donations (such as gold and other valuables), akin to the heavy flow of ocean water (or, in another sense, the flow of ichor from an elephant). As a result, there was no poverty left in that place. ॥156॥
श्लोक ( Shlok ) 157
इति प्रमोदमुत्पाद्य पुरे सान्तःपुरे परम्। वृषभाद्रेरसौ बालः प्रालेयद्युतिरुद्ययौ ॥१५७।।
इस प्रकार अंतःपुरसहित समस्त नगर में परम आनंद को उत्पन्न करता हुआ वह बालकरूपी चंद्रमा भगवान वृषभदेवरूपी उदयाचल से उदय हुआ था ।।157।।
Thus, like the moon bringing immense joy to the entire city along with the royal palace, the divine child, Lord Vrishabhadeva, rose from the horizon of his birthplace. ॥157॥
श्लोक ( Shlok ) 158
प्रमोदभरतः प्रेमनिर्भरा बन्धुता तदा । तमाह्वदू भरतं भावि समस्त भरताधिपम् ।।१५८॥
उस समय प्रेम से भरे हुए बंधुओं के समूह ने बड़े भारी हर्ष से, समस्त भरतक्षेत्र के अधिपति होने वाले उस पुत्र को भरत इस नाम से पुकारा था ।।158।।
At that time, filled with love and great joy, the gathering of relatives affectionately named the child Bharata, who was destined to become the ruler of the entire Bharatkṣetra. ॥158॥
श्लोक ( Shlok ) 159
तन्नाम्ना भारतं वर्षमिति हासीञ्जनास्पदम् । हिमाद्रेरासमुद्राच्च क्षेत्रं चकभृतामिदम् ॥१५९॥
इतिहास के जानने वालों का कहना है कि जहाँ अनेक आर्य पुरुष रहते हैं ऐसा यह हिमवत् पर्वत से लेकर समुद्र पर्यंत का चक्रवर्तियों का क्षेत्र उसी ‘भरत’ पुत्र के नाम के कारण भारतवर्ष रूप से प्रसिद्ध हुआ है ।।159।।
Historians say that the vast region stretching from the Himavat Mountain to the ocean, where numerous noble Aryan men reside, became renowned as Bhāratavarsha after the name of that very prince, Bharata. ॥159॥
श्लोक ( Shlok ) 160
स तन्वन्परमानन्दं बन्धुताकुमुदाकरे। धुन्वन् वैरिकुलध्वान्तमवृधद् बालचन्द्रमाः ।।१६०।।
वह बालकरूपी चंद्रमा भाई-बंधुरूपी कुमुदों के समूह में आनंद को बढ़ाता हुआ और शत्रुओं के कुलरूपी अंधकार को नष्ट करता हुआ बढ़ रहा था ।।160।।
That moon-like child grew, bringing joy to the gathering of his brothers and relatives, just as the moon enhances the beauty of lotus flowers, while also dispelling the darkness of his enemies’ lineage. ॥160॥
श्लोक ( Shlok ) 161
स्त नन्धयन्नसौ मातुः स्तन्यं गण्डूषितं मुहुः। समुद्गिरन् यशो दिक्षु विभजन्निव विद्यते ॥१६१॥
माता यशस्वती के स्तन का पान करता हुआ वह भरत जब कभी दूध के कुरले को बार-बार उगलता था तब वह ऐसा दैदीप्यमान होता था मानो अपना यश ही दिशाओं में बाँट रहा हो ।।161।।
As Bharata nursed at the breast of his mother, Yaśasvatī, whenever he playfully spit out the curdled milk repeatedly, he appeared radiant—as if he were spreading his own glory in all directions. ॥161॥
श्लोक 162 से 171
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