आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 |
श्लोक 45 से 61 लक्षणों की महिमा और विवाह चिंताह्व
इन लक्षणों से व्याप्त उनका शरीर ज्योतिषी देवों से भरे आकाश सा शोभायमान था। उनके निर्मल शरीर के स्पर्श से इन लक्षणों के अंतर्लक्षण शुभ थे। रागद्वेषरहित भगवान के मन में लक्ष्मी कठिनाई से स्थान पा सकी, क्योंकि वे वीतराग थे। उन्हें सरस्वती और कीर्ति प्रिय थीं, पर लक्ष्मी पर उनका प्रेम कम था। उनके रूप-यौवन से आकृष्ट लोगों के नेत्र भौंरे से दूसरी जगह रमण नहीं करते थे। एक दिन नाभिराज ने उनकी यौवन अवस्था देखकर विवाह की चिंता की। उन्होंने सोचा कि ये सुंदर हैं, पर इनका चित्त हरण करने वाली स्त्री कौन होगी, और इनका विषयराग मंद होने से विवाह कठिन है। उनका धर्मतीर्थ में उद्योग है, अतः वे परिग्रह छोड़कर दीक्षा लेंगे। फिर भी, तपस्या की काललब्धि तक लोकव्यवहार के लिए योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए। ऐसी कुलीन स्त्री उनके निर्मल मन में निवास करे। यह निश्चय कर नाभिराज ने भगवान से कहा कि आप जगत के अधिपति हैं, अतः उपकार करें। आप ब्रह्मा और स्वयंभू हैं; हम निमित्त मात्र हैं। आप गर्भ में कमल पर उत्पन्न हुए, अतः शरीररहित हैं। मैं निमित्त पिता हूँ, फिर भी आपसे कहता हूँ कि सृष्टि की ओर बुद्धि लगाएँ।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 45 to 61
श्लोक ( Shlok ) 45
अमिरामं वपुर्भर्तर्लक्षणैरभिरूर्जितैः । ज्योतिर्भिरिव संछन्न गगनप्राङ्गणं बभौ ॥४५॥
इन मनोहर और श्रेष्ठ लक्षणों से व्याप्त हुआ भगवान का शरीर ज्योतिषी देवों से भरे हुए आकाशरूपी आँगन की तरह शोभायमान हो रहा था ।।45।।
The Lord’s divine body, adorned with these enchanting and supreme auspicious markings, shone brilliantly like the vast celestial courtyard of the sky, filled with radiant heavenly bodies. ||45||
श्लोक ( Shlok ) 46
लक्ष्मणां च ध्रुवं किंचिदस्त्यन्तर्लक्षणं शुभम् । येन तैः श्रीपतेरङ्ग स्प्रष्टुं लब्धमकल्मषम् ॥४६॥
चूँकि उन लक्षणों को भगवान् का निर्मल शरीर स्पर्श करने के लिए प्राप्त हुआ था इसलिए जान पड़ता है कि उन लक्षणों के अंतर्लक्षण कुछ शुभ अवश्य थे ।।46।।
Since these auspicious markings had the fortune of manifesting on the Lord’s pure and divine body, it is evident that their deeper essence must have held an even greater, hidden sacredness. ||46||
श्लोक ( Shlok ) 47
लक्ष्मी र्निकामकठिने विरागस्य जगद्गुरोः । कथं कथमपि प्रापदवकाशं मनोगृहे ॥४७॥
रागद्वेषरहित जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव के अतिशय कठिन मनरूपी घर में लक्ष्मी जिस प्रकार―बड़ी कठिनाई से अवकाश पा सकी थी । भावार्थ―भगवान् स्वभाव से ही वीतराग थे, राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करना अच्छा नहीं समझते थे ।।47।।
Goddess Lakshmi was able to find space with great difficulty in the extremely austere mind-like abode of the world teacher, Lord Rishabhadeva, who was free from attachment and aversion.
Meaning:
Lord Rishabhadeva was naturally detached and did not consider the attainment of royal wealth to be desirable. ( 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
सरस्वती प्रियास्यासीत् कात्तिश्चाकल्पवर्तिनी । लक्ष्मी तडिल्लतालोलां मन्दप्रेम्णैव सोऽवहत् ॥४८॥
भगवान् को दो स्त्रियां ही अत्यंत प्रिय थीं―एक तो सरस्वती और दूसरी कल्पांतकाल तक स्थिर रहने वाली कीर्ति । लक्ष्मी विद्युत्लता के समान चंचल होती है इसलिए भगवान् उस पर बहुत थोड़ा प्रेम रखते थे ।।48।।
The Lord had only two dearly beloved—one was Saraswati (Goddess of Knowledge) and the other was Kirti (everlasting fame that remains steadfast until the end of time). Lakshmi, being as fickle as a lightning vine, did not receive much of His affection. ( 48)
श्लोक ( Shlok ) 49
तदीयरूपलावण्ययौवनादिगुणोद्रमैः । आकृष्टा जनतानेत्र भृङ्गा नान्यत्र रेमिरे ॥४९॥
भगवान के रूप-लावण्य, यौवन आदि गुणरूपी पुष्पों से आकृष्ट हुए मनुष्यों के नेत्ररूपी भौंरे दूसरी जगह कहीं भी रमण नहीं करते थे―आनंद नहीं पाते थे ।।49।।
Attracted by the flower-like qualities of the Lord, such as His beauty and youthful charm, the bee-like eyes of people found no joy or delight anywhere else. ( 49)
श्लोक ( Shlok ) 50
नाभिराजोऽन्यदा दृष्ट्वा यौवनारम्भमीशितुः । परिणाययितुं देवमिति चिन्तां मनस्यधात् ॥५०॥
किसी एक दिन महाराज नाभिराज भगवान् की यौवन अवस्था का प्रारंभ देखकर अपने मन में उनके विवाह करने की चिंता इस प्रकार करने लगे ।।50।।
One day, King Nabhiraj, upon witnessing the onset of Lord Rishabhadeva’s youth, began to contemplate His marriage with concern in his heart. ( 50)
श्लोक ( Shlok ) 51
देवोऽयमतिकान्ताङ्गः कास्य स्याच्चित्तहारिणी । सुन्दरी मन्दरागेऽस्मिन् प्रारम्भो दुर्घटो ह्ययम् ॥५१॥
कि यह देव अतिशय सुंदर शरीर के धारक हैं, इनके चित्त को हरण करने वाली कौन-सी सुंदर स्त्री हो सकती है ? कदाचित् इनका चित्त हरण करने वाली सुंदर स्त्री मिल भी सकती है, परंतु इनका विषयराग अत्यंत मंद है इसलिए इनके विवाह का प्रारंभ करना ही कठिन कार्य है ।।51।।
“This divine being possesses an extraordinarily beautiful body. But which beautiful woman could possibly captivate His mind? Even if such a woman is found, His attachment to worldly pleasures is extremely weak. Therefore, initiating His marriage itself is a difficult task.” ( 51)
श्लोक ( Shlok ) 52
अपि चास्य महानस्ति प्रारम्भस्तीर्थ वर्तने । सोऽतिवर्तींव गन्धेभो नियमात्प्रविशेदूवनम् ॥५२॥
और दूसरी बात यह है कि इनका धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करने में भारी उद्योग है इसलिए ये नियम से सब परिग्रह छोड़कर मत्त हस्ती की नाईं वन में प्रवेश करेंगे अर्थात् वन में जाकर दीक्षा धारण करेंगे ।।52।।
“Moreover, He is deeply inclined toward establishing the path of Dharma. Therefore, it is certain that He will renounce all possessions and, like a mighty elephant, walk into the forest to embrace asceticism.” (52)
श्लोक ( Shlok ) 53
तथापि काललब्धिः स्याद् यावदस्य तपस्थितुम् । तावत्कलत्रमुचितं चिन्त्यं लोकानुरोधतः ॥५३॥
तथापि तपस्या करने के लिए जब तक इनकी काललब्धि आती है तब तक इनके लिए लोकव्यवहार के अनुरोध से योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए ।।53।।
“Nevertheless, until the destined time for His asceticism arrives, it is appropriate to consider a suitable wife for Him in accordance with worldly customs.” ( 53)
श्लोक ( Shlok ) 54
ततः पुण्यवती काचिदुचिताभिजना वधूः । कलहंसीव निष्पङ्कमस्यावसतु मानसम् ॥५४॥
इसलिए जिस प्रकार हंसी निष्पंक अर्थात् कीचड़रहित मानस (मानसरोवर) में निवास करती है उसी प्रकार कोई योग्य और कुलीन स्त्री इनके निष्पंक अर्थात् निर्मल मानस मन में निवास करे ।।54।।
“Just as a swan resides in a spotless, mud-free Manas lake (Manasarovar), in the same way, a worthy and noble woman should reside in His pure and untainted mind.” ( 54)
श्लोक ( Shlok ) 55
इति निश्वित्य लक्ष्मीवान्नाभिराजोऽतिसंभ्रमी । ससान्त्वमुपसृत्येदमवोचद् वदतां वरम् ॥५५॥
यह निश्चय कर लक्ष्मीमान् महाराज नाभिराज बड़े ही आदर और हर्ष के साथ भगवान् के पास जाकर वक्ताओं में श्रेष्ठ भगवान् से शांतिपूर्वक इस प्रकार कहने लगे कि ।।55।।
Having made this decision, the illustrious King Nabhiraj, filled with great respect and joy, approached Lord Rishabhadeva and peacefully spoke to Him, saying— ( 55)
श्लोक ( Shlok ) 56
देव किंचिद् विवक्षामि सावधानमितः शृणु । त्वयोपकारो लोकस्य करणीयो जगत्पतें ॥५६॥
हे देव, मैं आप से कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए आप सावधान होकर सुनिए । आप जगत् के अधिपति हैं इसलिए आपको जगत् का उपकार करना चाहिए ।।56।।
“O Lord, I wish to say something to You, so please listen attentively. You are the master of the world, and therefore, You must work for the welfare of the world.” ( 56)
श्लोक ( Shlok ) 57
हिरण्यर्भस्त्वं धाता जगतां स्वं स्वभूरसि। निभमात्रं त्वदुत्पत्तौ पितृम्मन्या यतो वयम् ॥५७॥
हे देव, आप जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा हैं तथा स्वयंभू हैं अर्थात् अपने आप ही उत्पन्न हुए हैं । क्योंकि आपकी उत्पत्ति में अपने-आपको पिता मानने वाले हम लोग छल मात्र हैं ।।57।।
“O Lord, You are Brahma, the creator of the world, and self-existent (Swayambhu). In reality, we who consider ourselves Your parents are merely an illusion in the matter of Your birth.” (57)
श्लोक ( Shlok ) 58
यथार्कस्य समुद्भुतो निमित्तमुदयाचलः । स्वतस्तु भास्वानुद्याति तथैवास्मद् भवानपि ॥५८॥
जिस प्रकार सूर्य के उदय होने में उदयाचल निमित्त मात्र है क्योंकि सूर्य स्वयं ही उदित होता है उसी प्रकार आपकी उत्पत्ति होने में हम निमित्त मात्र हैं क्योंकि आप स्वयं ही उत्पन्न हुए हैं ।।58।।
“Just as the eastern mountain is merely a nominal cause for the sun’s rise, since the sun rises on its own, in the same way, we are only an instrumental cause in Your birth, as You are self-existent.” ( 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
गर्भगेहे शुचौ मातुस्त्वं दिव्ये पद्मविष्टरे । निधाय स्वां परां शक्तिमुद्भूतो निष्कलोऽस्यतः ॥५९।।
आप माता के पवित्र गर्भगृह में कमलरूपी दिव्य आसन पर अपनी उत्कृष्ट शक्ति स्थापन कर उत्पन्न हुए हैं इसलिए आप वास्तव में शरीररहित हैं ।।59।।
“You took birth by establishing Your supreme power upon the lotus-like divine seat within the sacred womb of Your mother. Therefore, in truth, You are beyond the physical body.” ( 59)
श्लोक ( Shlok ) 60
गुरुब्रुवोऽहं तद्देव स्वामित्यभ्यर्थयै विभुम् । मर्ति विधेहि लोकस्य सर्जनं प्रति संप्रति ॥६०॥
हे देव, यद्यपि मैं आपका यथार्थ में पिता नहीं हूँ, निमित्त मात्र से ही पिता कहलाता हूँ तथापि मैं आप से एक अभ्यर्थना करता हूँ आप इस समय संसार की सृष्टि की ओर भी अपनी बुद्धि लगाइए ।।60।।
“O Lord, although in reality, I am not Your true father and am only called so by circumstance, I still make a humble request to You—at this time, please also direct Your wisdom toward the creation and sustenance of the world.” ( 60)
श्लोक ( Shlok ) 61
त्यामादिपुरुषं दृष्ट्वा लोकोऽप्येवं प्रवर्तताम् । महतां मार्गवर्त्तिन्यः प्रजाः सुप्रजसो ह्यमूः ॥६१॥
आप आदिपुरुष हैं इसलिए आपको देखकर अन्य लोग भी ऐसी ही प्रवृत्ति करेंगे क्योंकि जिनके उत्तम संतान होने वाली है ऐसी यह प्रजा महापुरुषों के ही मार्ग का अनुगमन करती है ।।61।।
“You are the Adi Purusha (the primordial being); therefore, others will follow Your example. For the people, who are destined to give birth to noble offspring, always walk in the footsteps of great souls.”
( 61)
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