आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 वृषभदेव नामकरण और बाल्यावस्था
वृषभदेव नाम धर्म-अमृत वर्षा, गर्भ स्वप्न हेतु। पुरुदेव नाम से इंद्र पुरुहूत। देवकुमार-देवियाँ सेवा हेतु नियुक्त। भगवान शैशव में हँसते, चलते, माता-पिता हर्षित। चंद्रमा सा आनंददायक, हास्य चाँदनी सा, सरस्वती गीत सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
स्वर्गावतरणे दृष्टः स्वप्नेऽस्य वृषभो यतः । जनन्या तदयं देवैराहूतो वृषभाख्यया ॥१६२॥
अथवा उनके गर्भावतरण के समय माता मरुदेवी ने एक वृषभ देखा था इसलिए ही देवों ने उनका ‘वृषभ’ नाम से आह्वान किया था ।।162।।
“Or, when they were conceived, their mother, Marudevi, saw a bull; hence, the gods called them by the name ‘Vrishabha.'”
श्लोक ( Shlok ) 163
पुरुहूतः पुरुं देवमाह्वयन्नाख्ययानया । पुरुहूत इति क्यातिं बभारान्वर्थतां गताम् ॥ १६३॥
इंद्र ने सबसे पहिले भगवान् वृषभनाथ को ‘पुरुदेव’ इस नाम से पुकारा था इसलिए इंद्र अपने पुरुहूत (पुरु अर्थात् भगवान् वृषभदेव को आह्वान करने वाला) नाम को सार्थक ही धारण करता था ।।163।।
“Indra was the first to address Lord Vrishabhanatha by the name ‘Purudev.’ Therefore, Indra truly justified his title ‘Puruhuta,’ meaning ‘the one who invokes Puru (Lord Vrishabhadeva).'”
श्लोक ( Shlok ) 164
“ततोऽस्य सवयोरूप वेषान्सुरकुमारकान् । निरूप्य परिचर्यायै दिवं जग्मुर्द्युनायकाः ॥१६४॥
तदनंतर वे इंद्र भगवान् की सेवा के लिए समान अवस्था, समान रूप और समान वेष वाले देवकुमारों को निश्चित कर अपने-अपने स्वर्ग को चले गये ।।164।।
“After that, they appointed celestial youths of the same state, form, and attire for the service of the Lord Indra and then returned to their respective heavens.”
श्लोक ( Shlok ) 165
धात्र्यो नियोजिताश्चास्य देव्यः शक्रेण सादरम् । मज्जने मण्डने स्तन्ये संस्कारे क्रीडनेऽपि च ॥ १६५॥
इंद्र ने आदरसहित भगवान् को स्नान कराने, वस्त्राभूषण पहनाने, दूध पिलाने, शरीर के संस्कार (तेल, कज्जल आदि लगाना) करने और क्रीड़ा कराने के कार्य में अनेक देवियों को धाय बनाकर नियुक्त किया था ।।165।।
“With great reverence, Indra appointed many celestial maidens as nurses to bathe the Lord, adorn Him with garments and ornaments, feed Him milk, anoint His body with oils and collyrium, and engage Him in playful activities.”
श्लोक ( Shlok ) 166
ततोऽसौ स्मितमातन्वन् संसर्पन्मनिभूमिषु । पित्रोर्मुदं ततानाद्ये वयस्यद्भुत चेष्टितः ॥१६६।।
तदनंतर आश्चर्यकारक चेष्टाओं को धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव अपनी पहली अवस्था (शैशव अवस्था) में कभी मंद-मंद हंसते थे और कभी मणिमयी भूमि पर अच्छी तरह चलते थे, इस प्रकार वे माता-पिता का हर्ष बढ़ा रहे थे ।।166।।
“Thereafter, Lord Vrishabhadeva, displaying wondrous gestures, in His first stage of life (infancy), sometimes smiled gently and sometimes walked gracefully on the jeweled ground, thus bringing great joy to His parents.”
श्लोक ( Shlok ) 167
जगदानन्दि नेत्राणामुत्सवप्रदमूर्जितम् । कलोज्ज्वलं तदस्यासीत् शैशवं शशिनो यथा ॥१६७॥
भगवान की वह बाल्य अवस्था ठीक चंद्रमा की बाल्य अवस्था के समान थी, क्योंकि जिस प्रकार चंद्रमा की बाल्य अवस्था जगत् को आनंद देने वाली होती है उसी प्रकार भगवान की बाल्य अवस्था भी जगत् को आनंद देने वाली थी, चंद्रमा की बाल्य अवस्था जिस प्रकार नेत्रों को उत्कृष्ट आनंद देने वाली होती है उसी प्रकार उनकी बाल्यावस्था नेत्रों को उत्कृष्ट आनंद देने वाली थी और चंद्रमा की बाल्यावस्था जिस प्रकार कला मात्र से उज्ज्वल होती है उसी प्रकार उनकी बाल्यावस्था भी अनेक कलाओं-विद्याओं से उज्ज्वल थी ।।167।।
“The childhood of the Lord was just like the early phase of the moon. Just as the moon’s infancy brings joy to the world, so did the Lord’s childhood delight all beings. Just as the young moon offers supreme pleasure to the eyes, His childhood was a feast for the eyes. And just as the moon’s early phase shines with its growing digits, His childhood radiated brilliance through many virtues and skills.”
श्लोक ( Shlok ) 168
मुग्धस्मितमभूदस्य मुखेन्दौ चन्द्रिकामलम् । तेन पित्रोर्मनस्तोषजलधिर्ववृधेतराम् ॥१६८।।
भगवान के मुखरूपी चंद्रमा पर मंद हास्यरूपी निर्मल चाँदनी प्रकट रहती थी और उससे माता-पिता का संतोषरूपी समुद्र अत्यंत वृद्धि को प्राप्त होता रहता था ।168।।
“The moon-like face of the Lord always shone with the pure radiance of a gentle smile, causing the ocean of His parents’ joy and contentment to swell immensely.”
श्लोक ( Shlok ) 169
पीठवन्धः सरस्वत्या लक्ष्म्या हसितविभ्रमः । कीर्तिवल्ल्या विकासोऽस्य मुखे मुग्धस्मयोऽभवत्॥ १६९
उस समय भगवान् के मुख पर जो मनोहर मंद हास्य प्रकट हुआ था वह ऐसा ज्ञान पड़ता था मानो सरस्वती का गीतबंध अर्थात् संगीत का प्रथम राग ही हो, अथवा लक्ष्मी के हास्य की शोभा ही हो अथवा कीर्तिरूपी लता का विकास ही हो ।।169।।
“At that time, the enchanting gentle smile that appeared on the Lord’s face seemed as if it were the very first melody of Goddess Saraswati’s song, the radiance of Goddess Lakshmi’s laughter, or the blossoming of the creeper of glory.”
श्लोक ( Shlok ) 170
श्रीमन्मुखाम्बुजेऽस्यासीत् क्रमान्मन्मनभारती। सरस्वतीव तद्बाल्यमनुकर्तुं तदाश्रिताः ॥१७०॥
भगवान् के शोभायमान मुखकमल में क्रम-क्रम से अस्पष्ट वाणी प्रकट हुई जो कि ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् की बाल्य अवस्था का अनुकरण करने के लिए सरस्वती देवी ही स्वयं आयी हों ।।170।।
“From the radiant lotus-like face of the Lord, indistinct speech gradually emerged, appearing as if Goddess Saraswati herself had come to imitate His childhood stage.”
श्लोक ( Shlok ) 171
स्खलत्पदं शनैरिन्द्रनीलभूमिषु संचरन् । स रेजे वसुधां रक्तैरब्जैरुपहरन्निव ॥१७१
इंद्रनील मणियों की भूमि पर धीरे-धीरे गिरते-पड़ते पैरों से चलते हुए बालक भगवान् ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पृथ्वी को लाल कमलों का उपहार ही दे रहे हों ।।171।।
“The child Lord, walking unsteadily with his tiny feet on the ground studded with sapphire gems, appeared as if He were offering the earth a gift of red lotuses.”
श्लोक 172 से 181
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आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161