आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 अयोध्या का वर्णन
शिखरों से ज्योतिश्चक्र छिपा, मेघ आश्रित। सुवर्ण परकोटा मेरु शोभा सा। परिखा समुद्र सा, शुद्ध खानि भूमि। उपवन कल्पवृक्ष सा। सरयू किनारे सारस-हंस। दुर्लंघ्य अयोध्या, सेनाओं से घिरी।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
सरोजरागमाणिक्य किरणैः क्वचिदम्बरम् । यत्र संध्याम्बुदच्छामिवालक्ष्यत पाटलम् ॥६२॥
उस नगरी का आकाश कहीं-कहीं पर पद्मरागमणियों की किरणों से कुछ-कुछ लाल हो रहा था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो संध्याकाल के बादलों से आच्छादित ही हो रहा हो ।।62।।
उस नगरी का आकाश कहीं-कहीं पर पद्मरागमणियों की किरणों से कुछ-कुछ लाल हो रहा था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो संध्याकाल के बादलों से आच्छादित ही हो रहा हो ।।62।।
“The sky of that city was turning somewhat red in places due to the rays of Padmaraga gems, making it appear as if it were covered by the clouds of twilight.”
श्लोक ( Shlok ) 63
इन्द्र नीलोपलैः सौधकूटलग्मैर्विलङ्गितम् । स्फुरद्भिज्योतिषां चक्रं यत्र नालक्ष्यताम्बरे ॥ ६३॥
वहाँ के राजमहलों के शिखरों में लगे हुए दैदीप्यमान इंद्रनील मणियों से छिपा हुआ ज्योतिश्चक्र आकाश में दिखाई ही नहीं पड़ता था ।।63।।
“The celestial sphere remained unseen in the sky, concealed by the radiant Indranila gems embedded in the spires of the royal palaces.”
श्लोक ( Shlok ) 64
गिरिकूटतटानीव सौधकूटानि शारदाः । घना यत्राश्रयन्ति स्म सून्नतः कस्य नाश्रयः ॥६४॥
उस नगरी के राजमहलों के शिखर पर्वतों के शिखरों के समान बहुत ही ऊँचे थे और उन पर शरद् ऋतु के मेघ आश्रय लेते थे सो ठीक ही है क्योंकि जो अतिशय उन्नत (ऊँचा या उदार) होता है वह किसका आश्रय नहीं होता ? ।।64।।
“The spires of the royal palaces in that city were as high as mountain peaks, and the autumn clouds took refuge upon them. This is only natural, for what is exceedingly elevated—whether in height or in generosity—does not provide refuge to others?”
श्लोक ( Shlok ) 65
प्राकारवलयो यस्याश्चामीकरमयोऽद्युतत् । मानुषोत्तरशैलस्य श्रियं रत्नैरिवाहसन् ॥६५॥
उस नगरी का सुवर्ण का बना हुआ परकोटा ऐसा अच्छा शोभायमान हो रहा था मानो अपने में लगे हुए रत्नों की किरणों से सुमेरु पर्वत की शोभा की हँसी ही कर रहा हो ।।65।।
“The golden rampart of that city shone so magnificently, as if mocking the splendor of Mount Sumeru with the radiance of the gems embedded within it.”
श्लोक ( Shlok ) 66
यत्खातिका महाम्भोधेर्लीला यादोभिरुद्धतैः । धते स्म क्षुभितालोलकल्लोलावर्त्तभीषणा ॥६६॥
अयोध्यापुरी की परिखा उद्धत हुए जलचर जीवों से सदा क्षोभ को प्राप्त होती रहती थी और चंचल लहरों तथा आवर्तों से भयंकर रहती थी इसलिए किसी बड़े भारी समुद्र की लीला धारण करती थी ।।66।।
“The moat of Ayodhya City was constantly disturbed by the restless aquatic creatures and remained formidable with its turbulent waves and whirlpools, appearing as if it had assumed the grandeur of a vast ocean.”
श्लोक ( Shlok ) 67
जिनप्रसवभूमित्वाद् या शुद्धाकरभूमिवत् । सूते स्म पुरुषानर्ध्यमहारत्नानि कोटिशः ॥६७॥
भगवान् वृषभदेव की जन्मभूमि होने से वह नगरी शुद्ध खानि की भूमि के समान थी और उसने करोड़ों पुरुषरूपी अमूल्य महारत्न उत्पन्न भी किये थे ।।67।।
“Being the birthplace of Lord Rishabhadeva, that city was like a land of pure treasure mines, having produced countless priceless gem-like men.”
श्लोक ( Shlok ) 68
यस्याश्च बहिरुद्यानैरनेकानो कहाकुलैः । फलच्छा यप्रदैः कल्पतरुच्छाया स्म लङ्ध्य ते ॥६८॥
अनेक प्रकार के फल तथा छाया देने वाले और अनेक प्रकार के वृक्षों से भरे हुए वहाँ के बाहरी उपवनों ने कल्पवृक्षों की शोभा तिरस्कृत कर दी थी ।।68।।
“The outer gardens of that city, filled with a variety of fruit-bearing and shade-giving trees, had surpassed even the splendor of the Kalpavriksha (wish-fulfilling trees).”
श्लोक ( Shlok ) 69
यास्या पर्यन्तमावेष्ट्य स्थिता सा सरयूर्नदी । लसत्पुलिनसंसुप्तसारसा हंसनादिनी ॥६९॥
उसके समीपवर्ती प्रदेश को घेरकर सरयू नदी स्थित थी जिसके सुंदर किनारों पर सारस पक्षी सो रहे थे और हंस मनोहर शब्द कर रहे थे ।।69।।
“The Sarayu River encircled the surrounding region, with cranes sleeping on its beautiful banks and swans producing melodious sounds.”
श्लोक ( Shlok ) 70
यां प्राहुररिदुर्लङ्घयामयोध्या योधसंकुलाम् । विनीता खण्डमध्यस्था” या तत्नाभिरिवाबभौ ॥७०॥
वह नगरी अन्य शत्रुओं के द्वारा दुर्लंघ्य थी और स्वयं अनेक योद्धाओं से भरी हुई थी इसीलिए लोग उसे ‘अयोध्या’ (जिससे कोई युद्ध नहीं कर सके) कहते थे । उसका दूसरा नाम विनीता भी था और वह आर्यखंड के मध्य में स्थित थी इसलिए उसकी नाभि के समान शोभायमान हो रही थी ।।70।।
“That city was impenetrable to enemy forces and was itself filled with numerous warriors; hence, it was called ‘Ayodhya’ (the unconquerable). It was also known as ‘Vinita’ and, being situated in the heart of Aryavarta, shone like its very navel.”
श्लोक ( Shlok ) 71
तामारुथ्य पुरीं विष्वगनीकानि सुधाशिनाम् । तस्थुर्जगन्ति तच्छोभामागतानीव वीक्षितुम् ॥७१॥
देवों की सेनाएँ उस अयोध्यापुरी को चारों ओर से घेरकर ठहर गयी थी जिससे ऐसी मालूम होती थी मानो उसकी शोभा देखने के लिए तीनों लोक ही आ गये हों ।।71।।
“The armies of the gods had encamped around Ayodhya, making it appear as if the three worlds themselves had gathered to witness its splendor.”
श्लोक 72 से 81
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61