आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 |
श्लोक 182 से 191 सुगंधित जल अभिषेक
वायु स्वेद चुंबन करता। द्वारपाल सभा नियंत्रित करते। सुगंधित जल से अभिषेक, धारा लज्जित सी। सुवर्ण झारी से नमस्कार सा, प्रभा से अग्नि आहुति सा। भगवान गुणों से धारा चरितार्थ।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
सञ्चरत्खचरी’ वक्त्रधर्माम्बुकणचुम्बिनि । धुतोपान्तवने वाति मन्दं मन्दं “नभस्वति ।।१८२।।
जब सब ओर घूमती हुई विद्याधरियों के मुख के स्वेदजल के कणों का चुंबन करने वाला वायु समीपवर्ती वनों को हिलाता हुआ धीरे-धीरे बह रहा था ।।182।।
When the breeze, gently swaying the nearby forests, moved slowly, kissing the droplets of sweat on the faces of the circling Vidyadhari celestial maidens. ॥182॥
श्लोक ( Shlok ) 183
सुरदौवारिकैश्चित्रवेत्रदण्डधरैर्मुहुः । सामाजिकजने विष्वक् सार्यमाणे सहुङ् कृतम् ॥१८३॥
जब विचित्र वेत्र के दंड हाथ में लिये हुए देवों के द्वारपाल सभा के लोगों को इंकार शब्द करते हुए चारों ओर पीछे हटा रहे थे ।।183।।
When the celestial gatekeepers, holding staffs of unique canes in their hands, were turning away the assembly of people in all directions with words of refusal. ॥183॥
श्लोक ( Shlok ) 184
तत्समुत्सारणत्रासान्मू की भावमुपागते । “अनियुक्त जने सद्यश्चित्रार्पित इव स्थिते ॥१८४॥
‘हमें द्वारपाल पीछे न हटा दें’ इस डर से कितने ही लोग चित्रलिखित के समान जब चुपचाप बैठे हुए थे ।।184।।
When the celestial gatekeepers, holding staffs of unique canes in their hands, were turning away the assembly of people in all directions with words of refusal. ॥183॥
श्लोक ( Shlok ) 185
शुद्धाम्बुस्नपने निष्ठां गते गन्धाम्बुभिः शुभैः । ततोऽभिषेक्तुमीशानं शतयज्वा प्रचक्रमे ।।१८५।।
और जब शुद्ध जल का अभिषेक समाप्त हो गया था तब इंद्र ने शुभ सुगंधित जल से भगवान् का अभिषेक करना प्रारंभ किया ।।185।।
And when the pure water consecration was completed, Indra began to anoint the Lord with auspicious and fragrant water. ॥185॥
श्लोक ( Shlok ) 186
श्रीमद्रन्धोदकैर्द्रव्यै र्गन्धाहूतमधुव्रतैः । अभ्यषिञ्चद् विधानज्ञो विधातारं शताध्वरः ॥१८६।॥
विधिविधान को जानने वाले इंद्र ने अपनी सुगंधि से भ्रमरों का आह्वान करने वाले सुगंधित जलरूपी द्रव्य से भगवान का अभिषेक किया ।।186।।
Indra, who was well-versed in sacred rituals, anointed the Lord with fragrant water, a liquid so aromatic that it invited swarms of bees. ॥186॥
श्लोक ( Shlok ) 187
पूता गन्धाम्बुधारासावापतन्ती तनौ विभोः । तद्गन्धातिशयात् प्राप्तलज्जेवासीदवाङ्मुखी ॥१८७॥
भगवान् के शरीर पर पड़ती हुई वह सुगंधित जल की पवित्र धारा ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् के शरीर की उत्कृष्ट सुगंधि से लज्जित होकर ही अधोमुखी (नीचे को मुख किये हुई) हो गई हो ।।187।।
The sacred stream of fragrant water falling upon the Lord’s body seemed as if it had bowed downward in humility, ashamed before the divine fragrance emanating from His body. ॥187॥
श्लोक ( Shlok ) 188
कन त्कनकभृङ्गारनालाद्धारा पतन्त्यसौ । रेजे भक्तिभरेणैव जिनमानन्तु मुद्यता ॥१८८॥
दैदीप्यमान सुवर्ण की झारी के नाल से पड़ती हुई वह सुगंधित जल की धारा ऐसी शोभायमान होती थी मानो भक्ति के भार से भगवान को नमस्कार करने के लिए ही उद्यत हुई हो ।।188।।
The stream of fragrant water, flowing from the spout of the radiant golden vessel, appeared so magnificent as if it were eager to bow down in reverence under the weight of devotion to the Lord. ॥188॥
श्लोक ( Shlok ) 189
विभोर्देहप्रभोस्तपैंस्तडिदा पिञ्जरेस्तता । साभाद् विभावसो दीप्ते प्रयुक्तेव घृताहुतिः ॥१८९॥
बिजली के समान कुछ-कुछ पीले भगवान् के शरीर की प्रभा के समूह से व्याप्त हुई वह धारा ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो जलती हुई अग्नि में घी की आहुति ही डाली जा रही हो ।।189।।
The stream, infused with the radiance of the Lord’s body, which was slightly golden like lightning, appeared so resplendent as if ghee were being offered into a blazing fire. ॥189॥
श्लोक ( Shlok ) 190
निसर्गसुरभिण्यङ्गे विभोरत्यन्तपावने । पतित्वा चरितार्था सा स्वसादकृत तद्गुणान् ॥१९०।।
स्वभाव से सुगंधित और अत्यंत पवित्र भगवान् के शरीर पर पड़कर वह धारा चरितार्थ हो गयी थी और उसने भगवान् के उक्त दोनों ही गुण अपने अधीन कर लिये थे―ग्रहण कर लिये थे ।।190।।
The naturally fragrant and supremely pure stream, upon touching the Lord’s body, became fully sanctified and imbibed both of these divine qualities—fragrance and purity—within itself. ॥190॥
श्लोक ( Shlok ) 191
सुगन्धिकुसुमैर्गन्धद्रव्यैरपि सुवासिता । साधान्नतिशयं कंचिद् विभोरङ्गेऽम्भसां ततिः ॥१९१॥
यद्यपि वह जल का समूह सुगंधित फूलों और सुगंधित द्रव्यों से सुवासित किया गया था तथापि वह भगवान् के शरीर पर कुछ भी विशेषता धारण नहीं कर सका था―उनके शरीर की सुगंधि के सामने उस जल की सुगंधि तुच्छ जान पड़ती थी ।।191।।
Although the stream of water was infused with the fragrance of aromatic flowers and scented substances, it could not acquire any special distinction upon touching the Lord’s body—its own fragrance seemed insignificant before the supreme aroma of the Lord’s divine form. ॥191॥
श्लोक 192 से 201
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 |