आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131
हाथियों का व्यवहार
कुछ नवीन और पुराने हाथी तालाबों में प्रवेश नहीं करते थे, या तो कमलिनी के भय से या वन के सुखों के स्मरण में। वे सूंड़ से पानी उछालते और मदोन्मत्त होकर क्रीड़ा करते थे। कुछ हाथी जंगली हाथियों की गंध से कुपित हो जल में प्रवेश नहीं करते थे, और अपने मद से तालाब का जल बढ़ा देते थे, मानो उदारता दिखाते हों।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
प्रवेष्टु मब्जिनी पत्रच्छन्नं नागो नवग्रहः । नैच्छत् प्रचोद्यमानोऽपि वारि वारी विशङ्कया ॥१२२॥
कोई नवीन पकड़ा हुआ हाथी बार-बार प्रेरित होनेपर भी कमलिनीके पत्तोंसे ढके हुए जलमें समुद्रकी आशंकासे प्रवेश नहीं करना चाहता था ।।१२२।।
“Even after repeated urging, a newly captured elephant, fearful of the vastness of the ocean, refused to enter the waters covered with lotus leaves, hesitant as though it anticipated the perils of the sea.” (122)
श्लोक ( Shlok ) 123
वनं विलोकयन् स्वैरं कवलोचितपल्लवम् । गजश्चिरगृहीतोऽपि किमप्यासीत् समुत्सुकः ॥१२३।।
बहुत दिनका पकड़ा हुआ भी कोई हाथी अपने इच्छानुसार खाने योग्य नवीन पत्तोंवाले वनको देखता हुआ विलक्षण रीतिसे उत्कण्ठित हो रहा था ।।१२३॥
“Even an elephant, captured for many days, gazed longingly at the forest with fresh, edible leaves, growing ever more eager in an unusual manner, as though driven by an innate desire to feast upon them.” (123)
श्लोक ( Shlok ) 124
स्वैरं न पपुरम्भांसि नागृह्णन् कवलानपि । केवलं वनसम्भोगसुखानां सस्मरुर्गजाः ॥१२४।॥
कितने ही हाथियोंने इच्छानुसार न तो पानी ही पिया था और न ग्रास ही उठाये थे, वे केवल वनके संभोग-सुखोंका स्मरण कर रहे थे ।। १२४।।
“Many of the elephants, having neither drunk at will nor fed upon grass, were lost in thought, reminiscing about the pleasures of the forest and the joys of their natural habitats.” (124)
श्लोक ( Shlok ) 125
उत्पुष्करान् स्फुरद्रौक्म कक्ष्यान्नित्युर्द्विपान् सरः । सशयूनिव नीलाद्रीन् सविद्युत इवाम्बुदान् ॥१२५।।
जिनकी सूंड़ ऊंची उठी हुई है और जिनकी बगलमें सुवर्ण की मालाएं देदीप्यमान हो रही हैं ऐसे हाथियोंको महावत लोग सरोवरोंपर ले जा रहे थे, उस समय वे हाथी ऐसे जान पड़ते थे मानो अजगर सहित नील पर्वत ही हो अथवा बिजली सहित मेघ ही हों ॥ १२५॥
“With trunks raised high and golden garlands gleaming on their sides, the elephants were being led by their mahouts to the ponds. In that moment, they seemed to embody the grandeur of the Nīla Mountain with its serpentine strength or the majesty of clouds charged with lightning.” (125)
श्लोक ( Shlok ) 126
वनद्विपमदामोदवाहिने गन्धवाहिने । श्रजः कुप्यञ्जलोपान्तं निन्ये कृच्छ्रान्निषादिना ॥१२६।।
जो जंगली हाथीके मदकी गन्धको धारण करनेवाले वायुसे कुपित हो रहा है ऐसे किसी हाथीको उसका महावत बड़ी कठिनाईसे जलके समीप ले जा सका था ।।१२६।।
“One elephant, enraged by the wind carrying the scent of the wild elephant’s musk, was brought with great difficulty by its mahout to the water’s edge.” (126)
श्लोक ( Shlok ) 127
अकस्मात् कुपितो दन्ती शिरस्तिर्यग्विधूनयन् । अनङ्कुशवशस्तीव्रमाधोरणमखेदयत् ।।१२७।।
अचानक कुपित हुआ कोई हाथी अपने शिरको तिरछा हिला रहा था, वह अंकुशके वश भी नहीं होता था और महावतको खेद खिन्न कर रहा था ।। १२७।।
“Suddenly enraged, an elephant tilted its head in agitation, beyond the control of even the sharp goad, causing great distress and frustration to its mahout.” (127)
श्लोक ( Shlok ) 128
वन्यानेकपसम्भोगसङ्क्रान्तमदवासनाम् । ‘विसोढुं सरसीं नैच्छन्मदेभः करिणीमिव ॥ १२८॥
जंगली हाथीके संभोगसे जिसमें मदकी वास फैल रही है ऐसी हथिनीको जिस प्रकार कोई मदोन्मत्त हाथी नहीं चाहता है उसी प्रकार जिसमें जंगली हाथियोंकी क्रीड़ासे मदकी गंध मिली हुई है ऐसी सरोवरीमें कोई मदोन्मत्त हाथी प्रवेश नहीं करना चाहता था ।।१२८॥
“Just as a frenzied tusker refuses a she-elephant bearing the scent of union with a wild mate, so too did the rutting elephants shun the lake, fragrant with the musk of wild elephants’ revelries.” (128)
श्लोक ( Shlok ) 129
पीतं वनद्विपैः पूर्वमम्बु तद्दानवासितम् । द्विपः करेण सञ्जिघ्रन् नापादास्फालयत् परम् ॥१२९।।
जिस पानीको पहले वनके हाथी पी चुके थे और इसीलिये जो मदकी गन्धसे भरा हुआ था ऐसे पानीको सेनाके हाथियोंने नहीं पिया था, वे केवल सूंड़से सूंघ सूंघकर उसे उछाल रहे थे ।। १२९।।
“The elephants of the army, sensing the musk-laden scent in the water once drunk by wild tuskers, refused to drink it; they merely sniffed it with their trunks and cast it aside with disdainful splashes.” (129)
श्लोक ( Shlok ) 130
पीताम्भसो मदासारैर्वृद्धि निन्युः सरोजलम् । गजा मुधा धनादानं नूनं वाच्छन्ति नोन्नताः ॥ १३०॥
जिन हाथियोंने तालाबका पानी पिया था उन्होंने अपना मद बहा बहाकर तालाबका वह पानी बढ़ा दिया था, सो ठीक ही है क्योंकि जो उन्नत अर्थात् बड़े होते हैं वे किसीका व्यर्थ ही धन लेनेकी इच्छा नहीं करते हैं ।।१३०।।
“The elephants that drank from the pond released their own ichor into its waters, thus increasing its volume—rightly so, for the noble and exalted do not take without offering something in return.” (130)
श्लोक ( Shlok ) 131
उत्पुष्करं सरोमध्ये निमग्नोऽपि मदद्विपः । रंरणद्भिः खमुत्पत्य व्यज्यते स्म मधुव्रतैः ॥१३१।।
कोई मदोन्मत्त हाथी यद्यपि सूंड़ ऊपर उठाकर तालाबके मध्यभागमें डूबा हुआ था तथापि आकाशमें उड़कर शब्द करते हुए भ्रमरोंसे ‘वह यहाँ है’, इस प्रकार साफ समझ पड़ता था । ॥१३१।।
“Though a frenzied elephant was submerged in the middle of the pond with its trunk raised high, the buzzing bees circling above in the sky made it unmistakably known—’He is here.'” (131)
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121