श्लोक 1 से 11 दुर्मर्षण का उत्तेजन और अर्ककीर्ति का क्रोध
दुर्मर्षण नामक दुष्ट व्यक्ति, जो राजकुमार अर्ककीर्ति का सेवक था, जयकुमार के वैभव को सहन न कर सका। उसने अन्य राजाओं को उकसाते हुए कहा कि अकम्पन नीच और दुष्ट है, जो झूठे ऐश्वर्य के मद में अर्ककीर्ति का अपमान करना चाहता है। उसने सुलोचना को सर्वोत्तम कन्या रत्न बताकर अर्ककीर्ति को उकसाया कि अकम्पन ने उसका तिरस्कार किया है। दुर्मर्षण ने अर्ककीर्ति को युद्ध के लिए उकसाया, जिससे क्रोधित अर्ककीर्ति ने शत्रुओं को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की।
श्लोक 12 से 21 अर्ककीर्ति का उग्र भाषण
अर्ककीर्ति ने क्रोध में कहा कि अकम्पन ने उसका अपमान कर स्वयं विनाश को आमंत्रित किया है। उसने अपनी शक्ति का बखान करते हुए कहा कि उसकी सेना और तलवार शत्रुओं को नष्ट कर देगी। वह जयकुमार की विजय को चुनौती देने और सुलोचना की माला को हरण करने की बात करता है। दुर्मर्षण के उकसावे और अन्य राजाओं के समर्थन से उसका क्रोध और बढ़ गया, जिससे वह युद्ध की तैयारी में जुट गया।
श्लोक 22 से 31 अनवद्यमति का धर्मयुक्त उपदेश
अनवद्यमति नामक बुद्धिमान मंत्री ने अर्ककीर्ति को समझाया कि पृथ्वी, चक्रवर्ती, और वह स्वयं संसार के कल्याण के आधार हैं। क्षमा जैसे गुण चक्रवर्ती और अर्ककीर्ति में ही संनिहित हैं। उन्होंने कहा कि भगवान वृषभदेव द्वारा स्थापित इस कर्मभूमि का पालन अर्ककीर्ति के पिता भरत और बाद में वह स्वयं करेंगे। किसी भी उपद्रव का समाधान करना उनका कर्तव्य है, क्योंकि वे क्षत्रिय हैं।
श्लोक 32 से 41 स्वयंवर की मर्यादा और अकम्पन की महत्ता
अनवद्यमति ने कहा कि स्वयंवर विवाह की प्राचीन और श्रेष्ठ विधि है, जिसमें कन्या अपनी इच्छा से वर चुनती है। इस न्याय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। उन्होंने अकम्पन को चक्रवर्ती भरत के समान पूज्य बताया और नाथवंश तथा सोमवंश को उनके कुल के सहायक अंग कहा। अकम्पन का सम्मान करना अर्ककीर्ति का कर्तव्य है, क्योंकि पूज्य पुरुषों का अपमान अकल्याणकारी है।
श्लोक 42 से 51 जयकुमार की प्रशंसा और युद्ध का विरोध
अनवद्यमति ने जयकुमार के पराक्रम और दिग्विजय की प्रशंसा की, जो चक्रवर्ती के सेनापति रहे हैं। उन्होंने अर्ककीर्ति को समझाया कि नाथवंश और सोमवंश का नाश करना अनुचित है, क्योंकि इससे चक्रवर्ती क्रोधित होंगे और अधर्म फैलेगा। सुलोचना को जबरदस्ती हासिल करना असंभव है, और अन्य कन्याएँ भी उपलब्ध हैं। युद्ध से कीर्ति के बजाय अपकीर्ति होगी।
श्लोक 52 से 61 अर्ककीर्ति की हठधर्मिता
अर्ककीर्ति ने अनवद्यमति के उपदेश को ठुकरा दिया। उसने स्वीकार किया कि स्वयंवर प्राचीन विधि है और अकम्पन मान्य हैं, लेकिन जयकुमार के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उसने कहा कि अकम्पन ने कपट से सुलोचना को जयकुमार को दिया। वह जयकुमार को नष्ट करने और अन्याय का निराकरण करने की बात कहता है, यह दावा करते हुए कि उसका पराक्रम और धर्म नष्ट नहीं होगा।
श्लोक 62 से 72 युद्ध की तैयारी
अर्ककीर्ति ने सेनापति को बुलाकर युद्ध का ऐलान किया और भेरी बजवाई। उसकी सेना में हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक तैयार हो गए। कोलाहल और शस्त्रों की ध्वनि से वातावरण भयंकर हो गया, मानो प्रलयकाल आ गया हो। अर्ककीर्ति ने युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया।
श्लोक 73 से 81 सेना का प्रस्थान
अर्ककीर्ति की सेना, जिसमें शक्तिशाली हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक शामिल थे, युद्ध के लिए कूच कर गई। नगाड़ों, घंटियों, और शस्त्रों की ध्वनियों से दिशाएँ गूंज उठीं। सेना का कोलाहल भयावह था, जो युद्ध की भयंकरता को दर्शाता था।
श्लोक 82 से 92 युद्ध का प्रारंभ और राजनैतिक संकट
अर्ककीर्ति विजयघोष नामक हाथी पर सवार होकर अकम्पन की ओर बढ़ा। अकम्पन ने यह समाचार सुनकर दूत भेजा, जो अर्ककीर्ति को समझाने का प्रयास करता है, परन्तु वह अशांत रहा। दूत के लौटने पर अकम्पन व्याकुल और मूर्छित हो गए। जयकुमार ने अकम्पन को सान्त्वना दी और सुलोचना की रक्षा का वचन देते हुए अर्ककीर्ति को बांधने का संकल्प लिया।
श्लोक 93 से 103 जयकुमार की युद्ध
जयकुमार ने क्रोध में आकर मेघघोषा नामक भेरी बजवाई, जिसकी ध्वनि प्रलयकाल के मेघों की गर्जना को मात देती थी। उसकी सेना में उत्साह बढ़ा, और हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक युद्ध के लिए तैयार हो गए। विशेष रूप से, उसकी सेना में स्त्रियाँ भी योद्धाओं की तरह लड़ रही थीं। जयकुमार विजयार्ध नामक हाथी पर सवार होकर, सेना और छोटे भाइयों के साथ युद्ध के लिए निकला, मानो प्रलयकाल की लहरों को ललकार रहा हो।
श्लोक 104 से 111 अकम्पन और जयकुमार की सेनाएँ
महाराज अकम्पन ने सुलोचना को नित्यमनोहर चैत्यालय में भेजकर स्वयं सेना के साथ युद्ध के लिए निकले। सुकेतु, सूर्यमित्र, श्रीधर, जयवर्मा, और देवकीर्ति जैसे राजा अपनी सेनाओं के साथ जयकुमार से मिले। मेत्रप्रभ नामक विद्याधर भी अपनी तलवार और विद्याधरों के साथ युद्ध में शामिल हुआ। जयकुमार ने मकरव्यूह रचना बनाकर सेना को सुसज्जित किया, जबकि अर्ककीर्ति चक्रव्यूह के साथ सूर्य की तरह चमक रहा था।
श्लोक 112 से 121 युद्ध का प्रारंभ और बाणों का प्रभाव
सुनमि जैसे विद्याधरों ने गरुड़व्यूह बनाया, और आठ चन्द्र नामक विद्याधर अर्ककीर्ति की रक्षा कर रहे थे। दोनों सेनाओं में बाजों की ध्वनि और धनुर्धारी योद्धाओं के बाण युद्धक्षेत्र में छाए। बाणों को पक्षियों, मंत्रियों, और दूतों की तरह वर्णित किया गया, जो तीक्ष्ण, सरल, और शत्रुओं के हृदय को भेदने वाले थे। ये बाण शत्रुओं को मारकर परलोक पहुँचाते थे, मानो पापी जीवों को नरक में ले जाते हों।
श्लोक 122 से 131 बाणों की तुलना और युद्ध की तीव्रता
बाणों की तुलना वेश्याओं, नौकरों, और पक्षियों से की गई, जो रक्त बहाते और शत्रुओं को वश में करते थे। धनुर्धारी योद्धा शत्रु के बाणों का जवाब देते थे, और बाण सन्धि-विग्रह जैसे गुणों से युक्त होकर सिद्धि प्राप्त करते थे। युद्ध में रुधिर की धारा वीररस की तरह सुशोभित थी, और बाण शत्रुओं को भेदकर उनकी मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 132 से 141 जयकुमार का पराक्रम
जयकुमार ने क्रोधित होकर वज्रकाण्ड धनुष से युद्ध शुरू किया। उसके बाण दूतों और कपट युद्ध की तरह तीक्ष्ण और प्रभावी थे, जो शत्रुओं के हृदय को भेदते थे। उसने विद्याधरों को भयभीत कर उनके बाणों को नष्ट किया। उसकी सेना ने शत्रुओं को पीछे हटाया, और युद्ध में उसका पराक्रम सूर्य की तरह चमका।
श्लोक 142 से 152 विद्याधरों और भूमिगोचरियों का युद्ध
विद्याधरों के तीक्ष्ण बाण वज्र की तरह योद्धाओं पर गिरे, जिससे युद्धक्षेत्र अंधकारमय हो गया। बाणों ने अकाल मृत्यु को जन्म दिया। विद्याधरों और भूमिगोचरियों के बाणों ने आकाश को ढक लिया, जिससे युद्ध कुछ समय के लिए रुक गया। जयकुमार ने क्रोधित होकर वज्रकाण्ड धनुष से शत्रुओं को भयभीत किया और युद्ध को पुनः तीव्र किया।
श्लोक 153 से 161 जयकुमार की वीरता
जयकुमार के धनुष की टंकार से शत्रु भयभीत हो गए, और उनके बाण अदृश्य होकर शत्रुओं को मार गिराते थे। उसके बाण उल्काओं की तरह दिशाओं को ढक लेते थे। विद्याधरों के मुकुटों से गिरी मणियाँ जयकुमार को भेंट की तरह प्रतीत हुईं। उसने मृत विद्याधरों की स्त्रियों पर दया दिखाई। यमराज की तरह वह अन्यायियों का वध कर धर्मस्वरूप हो गया।
श्लोक 162 से 171 घुड़सवारों का युद्ध
अर्ककीर्ति के घुड़सवार सामने आए, और जयकुमार ने जयतुरंगम घोड़े पर सवार होकर अपनी घुड़सवार सेना को युद्ध की आज्ञा दी। घोड़ों की हिनहिनाहट और तलवारों की चोट से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। घोड़े और योद्धा परस्पर क्रोधित होकर लड़ते रहे, और तलवारें आकाश में चमकती रहीं। घायल घोड़े अपने स्वामियों को खोजते हुए दौड़ रहे थे।
श्लोक 172 से 182 रथों का युद्ध और जयकुमार की विजय
योद्धा कपिशीर्षक धनुष और तलवारों से युद्ध करते रहे, कुछ अंधे होकर भी लड़ते रहे। जयकुमार ने क्रोधित होकर सिंह की तरह युद्ध किया, और शत्रु की सेना समुद्र की लहरों की तरह पीछे हट गई। रथों के पहियों से खून और मांस की कीचड़ बन गई। जयकुमार ने शस्त्रों से युक्त रथ पर सवार होकर, सूर्य की तरह शत्रुओं के अंधकार को भेदा और युद्ध में विजय प्राप्त की।
श्लोक 183 से 191 जयकुमार का युद्ध कौशल
जयकुमार ने वैद्य की तरह शत्रुओं का रक्त निकाला और तलवार से शत्रुरूपी शल्य को हटाया। उसके बाण धूमकेतु की तरह शत्रुओं की ध्वजाओं को नष्ट करते थे। उसने शत्रुओं को वंशहीन और पौरुषहीन कर दिया। शत्रु उसकी अग्नि को सहन न कर पतंगों की तरह उस पर टूट पड़े। हेमांगद जैसे राजकुमारों ने बाणों की वर्षा की, और रथों के घोड़े युद्ध में अग्नि की तरह दौड़े। दोनों सेनाओं के शस्त्र परस्पर टकराए, जिससे कोई भी शस्त्र शत्रु तक नहीं पहुँचा।
श्लोक 192 से 203 युद्ध की तीव्रता और अर्ककीर्ति का क्रोध
युद्ध में दोनों सेनाएँ एक-दूसरे को जीत न सकीं, क्योंकि जयकुमार को छोड़कर किसी के लिए विजय दुर्लभ थी। जयकुमार ने अर्ककीर्ति की सेना को बाणों से ढक दिया। क्रोधित अर्ककीर्ति ने प्रतिज्ञा की कि वह जयकुमार को मारकर नाथवंश और सोमवंश का नाश करेगा। उसकी सेना के हाथी भयभीत और मंद गति से चल रहे थे, जो अशुभ संकेत दे रहे थे।
श्लोक 204 से 212 जयकुमार का पराक्रम
अर्ककीर्ति के हाथी मंद, भयभीत, और अशुभ संकेतों से युक्त थे। दूसरी ओर, जयकुमार विजयार्ध हाथी पर सवार होकर सिंह की तरह गर्ज रहा था। उसकी सेना की ध्वजाएँ अनुकूल वायु में लहरा रही थीं, और शस्त्रों की दीप्ति से दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं। नगाड़ों और घंटियों की ध्वनि से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। जयकुमार ने प्रलयकाल की लहरों को ललकारते हुए युद्ध में उत्कृष्टता दिखाई।
श्लोक 213 से 221 युद्ध की वर्षा ऋतु समान शोभा
युद्धक्षेत्र वर्षा ऋतु की तरह सुशोभित था, जिसमें हाथी मेघ, बाण मयूर, तलवारें बिजलियाँ, और रुधिर जल के समान थे। दोनों सेनाओं के शस्त्रों का आदान-प्रदान हुआ। आकाश गिद्धों, ध्वजाओं, और शस्त्रों से भर गया। जयकुमार ने सुलोचना को जयलक्ष्मी की सौत बनाने की इच्छा से अर्ककीर्ति पर आक्रमण किया। अष्टचन्द्र विद्याधरों ने उसे रोका, लेकिन जयकुमार उत्साह से देदीप्यमान रहा।
श्लोक 222 से 232 हाथियों का युद्ध और योद्धाओं की मृत्यु
हाथियों का युद्ध पर्वतों की टक्कर जैसा था। भद्र जाति के हाथी यमराज की तरह लड़े, जबकि मृगजाति के हाथी भय से भागे। शक्तिशाली योद्धा शस्त्रों से शत्रुओं को परास्त करते थे। कई योद्धाओं ने मृत्यु के समय अर्हंत का स्मरण कर स्वर्ग गति प्राप्त की। युद्धक्षेत्र रुधिर और मृत शरीरों से भरा था, जो जयकुमार की विजयलक्ष्मी को दर्शाता था।
श्लोक 233 से 241 जयकुमार और विद्याधरों का युद्ध
जयकुमार के बाणों ने अष्टचन्द्र विद्याधरों को घेरा, जिन्हें उन्होंने विद्या बल से रोका। सुनमि ने शत्रुओं पर बाणों की वर्षा की, लेकिन मेघप्रभ ने जयकुमार की आज्ञा से सुनमि के विद्यामयी बाणों को नष्ट कर उसे परास्त किया। जयकुमार की सेना ने अर्ककीर्ति के पक्ष को रोका, और उसका पराक्रम बढ़ता गया।
श्लोक 242 से 251 मेघप्रभ की विजय और जयकुमार का संदेश
मेघप्रभ ने सुनमि को परास्त किया, जिससे जयकुमार की विजय पुष्ट हुई। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को संदेश दिया कि चक्रवर्ती के न्याय मार्ग का पालन करना चाहिए। उसने अर्ककीर्ति के क्रोध को दुराचारियों का परिणाम बताया और युद्ध बंद करने की सलाह दी। उसने कहा कि अन्याय से चक्रवर्ती को पीड़ा होगी और वह दुष्टों को बाँधकर अर्ककीर्ति को सौंप देगा।
श्लोक 252 से 261 जयकुमार की युद्ध निपुणता
जयकुमार ने अर्ककीर्ति से युद्ध बंद करने की प्रार्थना की, लेकिन अर्ककीर्ति ने उसके वचनों को अनसुना कर युद्ध जारी रखा। जयकुमार ने अपने विजयार्ध हाथी से अर्ककीर्ति और अष्टचन्द्र के नौ हाथियों को घायल कर गिराया। युद्ध के बीच सूर्यास्त हो गया, जो अर्ककीर्ति की पराजय का प्रतीक था।
श्लोक 262 से 271 सूर्यास्त और अर्ककीर्ति की पराजय
सूर्य का अस्त होना अर्ककीर्ति की पराजय का संकेत था। सूर्य की तुलना एक दोषयुक्त राजा से की गई, जो क्रूर, असहनशील, और अन्यायी है। उसकी किरणें संताप देती हैं, और वह सहायकों के बिना नष्ट हो जाता है। विद्वानों ने कहा कि जब सूर्य जैसा उपमान नष्ट हो गया, तो अर्ककीर्ति की हार निश्चित थी। युद्धक्षेत्र में जयकुमार की विजयलक्ष्मी स्थापित हुई।
श्लोक 272 से 281 चन्द्रमा का उदय और युद्ध का विराम
चन्द्रमा का उदय हुआ, जो अंधकार को दूर करने के लिए अमृत से भरे चांदी के कलश की तरह प्रतीत हुआ। उसकी किरणें अंधकार को पी रही थीं, मानो क्षय रोग का नाश करने के लिए धूम्रपान कर रही हों। हालांकि, चन्द्रमा पूर्ण रूप से अंधकार नष्ट करने में असमर्थ था, क्योंकि उसका मंडल अशुद्ध और प्रतापहीन था। युद्धक्षेत्र में रात्रि के आगमन के साथ युद्ध थम गया।
श्लोक 282 से 291 चन्द्रमा का प्रभाव और स्त्रियों की भावनाएँ
चन्द्रमा की किरणों से तालाबों में कुमुद खिल उठे, जो मानो प्रसन्नता से चन्द्रमा को निहार रहे थे। विरहिणी स्त्रियाँ चन्द्रमा को देखकर दुखी हुईं, क्योंकि उसकी किरणें उन्हें संताप दे रही थीं। कुछ स्त्रियों ने कामदेव के प्रभाव से मद्य त्याग दिया, जबकि अन्य ने पति के हाथ से मद्य पीकर आनंद लिया। चन्द्रमा का प्रकाश कामदेव के अट्टहास की तरह फैल गया, जिससे राग और प्रेम की भावनाएँ प्रबल हुईं।
श्लोक 292 से 301 युद्ध में मृत योद्धाओं की स्त्रियों का विलाप
कई स्त्रियाँ अपने पतियों को शत्रु के बाणों से मृत देखकर स्वयं मर गईं। कुछ ने वीरलक्ष्मी की ईर्ष्या में प्राण त्यागे, तो कुछ ने पति को अप्सराओं के साथ स्वर्ग में जाने की कल्पना कर विलाप किया। योद्धा अपनी स्त्रियों की प्रतीक्षा में मृत्यु के कगार पर थे, और कुछ ने पत्नी के प्रेम में प्राण छोड़े। युद्धक्षेत्र में प्रेम और शोक का मिश्रण देखने को मिला।
श्लोक 302 से 311 योद्धाओं और स्त्रियों का प्रेम और शोक
कुछ योद्धा यमराज के हाथों से कामदेव द्वारा छुड़ाए गए, क्योंकि वे अपनी पत्नी की चिंता में डूबे थे। कुछ ने पत्नी के साथ मृत्यु को गले लगाया। स्त्रियाँ अपने पतियों से स्वर्ग में मिलने की बात कहकर संतुष्ट करती थीं, जबकि अन्य ने वीरलक्ष्मी और कीर्ति के लिए पति को प्रेरित किया। कामदेव के बाणों को स्त्रियों के लिए यमराज समान बताया गया, जो पुरुषों को कम और स्त्रियों को अधिक कष्ट देते थे। रात्रि के अंत में संध्या की लाली युद्ध को देखने आई।
श्लोक 312 से 322 युद्ध का पुनरारंभ और जयकुमार की तैयारी
प्रभात में बाजों की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं। सूर्योदय के साथ पूर्व दिशा शोभित हुई। सेनापतियों ने व्रत पालन कर, जिनेन्द्र की पूजा की और युद्ध के लिए तैयार हुए। जयकुमार रिंजय रथ पर सवार होकर, वज्रकाण्ड धनुष लेकर युद्धक्षेत्र में खड़ा हुआ, जो यमराज की तरह
श्लोक 323 से 331 जयकुमार और अर्ककीर्ति का युद्ध
अर्ककीर्ति अपने रथ पर सवार होकर जयकुमार पर आक्रमण करने आया, लेकिन उसकी ध्वजा और शस्त्र जयकुमार के बाणों से नष्ट हो गए। जयकुमार ने अष्टचन्द्र विद्याधरों के बाणों को रोककर हेमांगद और अनंतसेन के साथ युद्ध किया। दोनों पक्षों के राजा परस्पर
श्लोक 332 से 341 जयकुमार की विजय
जयकुमार के मित्र देव ने उसे नागपाश और अर्द्धचन्द्र बाण दिए। जयकुमार ने इन बाणों से अष्टचन्द्र विद्याधरों और उनके रथों को नष्ट कर दिया। अर्ककीर्ति पराजित होकर चेष्टाहीन खड़ा रहा। जयकुमार ने उसे और अन्य शत्रु राजाओं को नागपाश से बाँध लिया।
श्लोक 342 से 352 युद्ध का अंत और काशी में प्रवेश
जयकुमार ने अर्ककीर्ति को अकम्पन को सौंप दिया। उसने मृतकों का दाह संस्कार कराया और जीवितों की चिकित्सा की। वह मेघप्रभ के साथ काशी में प्रवेश कर विजयी हुआ। अकम्पन ने बंधे हुए राजाओं को समझाकर उनके योग्य स्थान पर भेजा। सभी ने नित्यमनोहर चैत्यालय में अर्हंत की वंदना की।
श्लोक 353 से 361 जिनेन्द्र की स्तुति
जयकुमार ने भक्ति के साथ जिनेन्द्र की स्तुति की, जिसमें उनके चरणों में भय का नाश और कर्मों का क्षय होने की बात कही गई। जिनेन्द्र की शरण लेने से सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और मोक्ष प्राप्त होता है। अर्ककीर्ति ने पराजय के कारण वीरलक्ष्मी के वियोग में शोक प्रकट किया।
श्लोक 362 से 367 जयकुमार की महिमा और पर्व का समापन
जयकुमार की विजयलक्ष्मी सूर्य की तरह चमकी। उसने सुलोचना के साथ विवाह की इच्छा प्रकट की और यशरूपी सेहरा धारण किया। यह पर्व विजय के लिए जिनेन्द्र की शरण लेने का महत्व दर्शाता है। गुणभद्राचार्य द्वारा रचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण का यह चवालीसवाँ पर्व जयकुमार की विजय के साथ समाप्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1 – 4
अथ दुर्मर्षणो नाम दुष्टस्तस्या ‘सहिष्णुकः । सर्वानुद्दीपयन् पापी सोऽर्ककीर्त्यनुजीवकः ॥१॥ अकम्पनः खलः क्षुद्रो बृथैश्वर्यमदोद्धतः । मृषा युष्मान् समाहूय श्लाघमानः स्वसम्पदम् ॥२॥ पूर्वमेव समालोच्य मालामासञ्जयज्जये । पराभूति विधित्सुर्वः स्थायिनीमायुगान्तरम् ॥३॥इति ब्रुवाणः सम्प्राप्य सव्रीडं चक्रिणः सुतम् । इह षट्खण्डरत्नानां स्वामिनौ त्वं पिता च ते ॥४॥
अथानन्तर-दुर्मर्षण नामका एक दुष्ट पुरुष राजकुमार अर्ककीतिका सेवक था वह जयकुमारके उस वैभवको नहीं सहन कर सका इसलिये उस पापीने सब राजाओंको इस प्रकार उत्तेजित किया । वह कहने लगा कि अकम्पन दुष्ट है, नीच है, झूठमूठके ऐश्वर्ष के मदसे उद्धत हो रहा है, अपनी सम्पदाओंकी प्रशंसा करते हुए उसने व्यर्थ ही आप लोगोंको बुलाया है। वह तुम लोगोंका दूसरे युगतक स्थिर रहनेवाला अपमान करना चाहता है इसीलिये उसने पहलेसे सोच विचारकर जयकुमारके गलेमें माला डलवाई है, इस प्रकार कहता हुआ वह दुर्मर्षण लज्जित हुए चक्रवर्तीके पुत्र अर्ककीर्तिके पास आया और कहने लगा कि इन छहों खण्डोंमें उत्पन्न हुए रत्नों के दो ही स्वामी हैं एक तू और दूसरा तेरा पिता ॥१-४।।
Thereafter, a wicked man named Durmarṣaṇa, a servant of Prince Arkakīrtī, could not endure the grandeur of Prince Jayakumāra. Consumed by envy, that sinful wretch incited all the assembled kings with the following words:
“Akampana is vile and ignoble! Drunk with the delusion of false prosperity, he has summoned you all here in vain, merely to vaunt his own wealth and possessions. He intends to disgrace you, to inflict upon you a humiliation that shall endure even into another age. With deliberate forethought, he has placed the garland around Jayakumāra’s neck—an act done with cunning intent!”
Thus speaking, Durmarṣaṇa, seething with malice, approached Arkakīrtī, the son of the now-ashamed Emperor, and said to him:
“Of all the treasures born of these six continents, only two are their rightful lords—your father and you.” ॥1–4॥
श्लोक ( Shlok ) 5
रत्नं रत्नेषु कन्यैव तत्राप्येषैव कन्यका । “तत्वां स्वगृहमानीय दौष्टयं पश्यास्य दुर्मतेः ॥५॥
रत्नोंमें कन्या ही रत्न है और कन्याओंमें भी यह सुलोचना ही उत्तम रत्न है इसलिये ही अकम्पनने तुझे अपने घर बुलाकर तेरा तिरस्कार किया है, जरा इस दुष्टकी दुष्टताको तो देखो ॥५॥
Among all jewels, the maiden is the true gem; and among maidens, this very Sulocanā is the most exalted jewel. It is for this reason that Akampana, under the guise of hospitality, summoned you to his abode—only to dishonour you. Behold, then, the wickedness of this vile man! ॥5॥
श्लोक ( Shlok ) 6
जयो नामात्र कस्तस्मै दत्तवान् मृत्युचोदितः । “तेनागतोऽस्मि दौर्वृत्त्यं तदेतत् सोढुमक्षमः ॥६॥
भला, जय-कुमार है कौन ? जिसके लिये मृत्युसे प्रेरित हुए अकम्पनने अपनी पुत्री दी है। में यह दुराचार सहन करनेसे लिये असमर्थ हूँ इसलिये ही आपके पास आया हूँ ।।६।।
Pray, who is this Jayakumāra, that Akampana—driven by some death-born delusion—should bestow upon him his daughter? I cannot endure such disgraceful conduct, and it is for this very reason that I have come before you. ॥6॥
श्लोक ( Shlok ) 7
‘प्राकृतोऽपि न सोढव्यः प्राकृतैरपि किं पुनः । त्वादृशैः स्त्रीसमुद्भूतो मानभङ्गो मनस्विभि : ॥७॥
जब कि नीच लोग भी छोटे छोटे मानभङ्गको नहीं सहन कर पाते हैं तब भला आप जैसे तेजस्वी पुरुष स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मानभंग कैसे सहन कर सकेंगे ? ॥७॥
When even base men cannot tolerate the slightest affront to their honour, how then can illustrious warriors such as yourselves endure a humiliation wrought through a woman? ॥7॥
श्लोक ( Shlok ) 8
तदादिश दिशाम्यस्मै पदं वैवस्वतास्पदम् । दिशाम्यादेशमात्रेण समालां तेऽपि कन्यकाम् ॥८॥
इसलिये मुझे आज्ञा दीजिये में आपकी आज्ञा-मात्रसे ही इस अकम्पनको यमराजका स्थान दे सकता हूँ और माला सहित वह कन्या आपके लिये दे सकता हूँ ।।८।।
Therefore, grant me but your command—and by that command alone, I shall dispatch this Akampana to the abode of Yama. And along with the garland, I shall deliver the maiden herself into your hands. ॥8॥
श्लोक ( Shlok ) 9
इत्यसाध्वीं क्रुधं भर्तुः स्ववाचैवासृजत् खलः। सदसत्कार्यनिर्व त्तो” शक्तिः सवसतोः समा ॥९॥
इस प्रकार उस दुष्टने अपने वचनोंसे ही अपने स्वामीको दुष्ट क्रोध उत्पन्न करा दिया सो ठीक ही है क्योंकि अच्छा और बुरा कार्य करने के लिये सज्जन तथा दुर्जनों की एक सी शक्ति रहती है ।॥९॥
Thus did that wicked man, by his very words, kindle vile wrath within his master’s heart. And rightly so—for whether to accomplish good or evil, the power wielded by the virtuous and the wicked alike is often the same. ॥9॥
श्लोक ( Shlok ) 10 – 11
तद्वचः पवन प्रौढ क्रोध धूमध्वजारुणः । भ्रमद्विलोचनाङ्गारः क्रुद्धाग्निसुरसन्निभः ॥१०॥उज्जगार ज्वलत्स्थूलविस्फुलिङ्गोपमा गिरः । अर्ककीर्तिर्द्विषोऽशेषान् दिधक्षुरिव वाचया ॥११॥
उस दुर्मर्षणके वचनरूपी वायुसे बढ़ी हुई क्रोधरूपी अग्निसेजो लाल लाल हो रहा है, जिसके नेत्ररूपी अंगारे घूम रहे हैं, और क्रोधसे जो अग्निकुमार देवों के समान जान पड़ता है ऐसा वह अर्ककीति अपने वचनोंसे ही समस्त शत्रुओंको जलानेकी इच्छा करता हुआ ही मानो जलते हुए बड़े बड़े फुलिंगों के समान वचन उगलने लगा ।।१०-११।।
Fanned by the wind of Durmarṣaṇa’s words, the fire of wrath blazed forth crimson within Arkakīrti. His eyes rolled like fiery embers, and in his fury he seemed a very embodiment of the flame-born gods. Burning with the desire to consume all his enemies through mere speech, he began to hurl words like great flaming sparks, as though his very utterances were tongues of fire. ॥10–11॥
श्लोक 12 से 21
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
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