आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92
श्लोक 93 से 103 जयकुमार की युद्ध
जयकुमार ने क्रोध में आकर मेघघोषा नामक भेरी बजवाई, जिसकी ध्वनि प्रलयकाल के मेघों की गर्जना को मात देती थी। उसकी सेना में उत्साह बढ़ा, और हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक युद्ध के लिए तैयार हो गए। विशेष रूप से, उसकी सेना में स्त्रियाँ भी योद्धाओं की तरह लड़ रही थीं। जयकुमार विजयार्ध नामक हाथी पर सवार होकर, सेना और छोटे भाइयों के साथ युद्ध के लिए निकला, मानो प्रलयकाल की लहरों को ललकार रहा हो।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 93 to 103
श्लोक ( Shlok ) 93
इत्युदीर्य जयो मेघकुमारविजयार्जिताम् । मेघघोषाभिधां भेरीं “प्रष्ठेनास्फोटयद् रुषा ॥९३॥
इस प्रकार कहकर जयकुमारने क्रोधमें आकर, युद्धमें आगे जानेवाले पुरुषके द्वारा मेघकुमारोंको जीतनेसे प्राप्त हुई मेघघोषा नामकी भेरी बजवाई ।।९३।।
Thus spoke Jayakumara; and, seized with wrath, he caused to be sounded the war-drum named Meghaghoṣā—a drum he had once won by vanquishing the Meghakumaras in battle, as befits a warrior advancing boldly to the frontlines of war.93
श्लोक ( Shlok ) 94
द्रोणादिप्रक्षयारम्भघनाघनघनध्वनिम् । तद्ध्वनिर्व्याप निर्जित्य निर्भिद्य हृदयं द्विषाम् ॥९४॥
प्रलयकालके प्रारम्भमें प्रकट होनेवाले द्रोण आदि मेघोंकी घोर गर्जनाको जीतकर तथा शत्रुओं का हृदय विदारणकर वह भेरीकी आवाज सब ओर फैल गई ॥९४॥
Surpassing even the terrible rumblings of the Droṇa and other storm-clouds that arise at the dawn of the cosmic dissolution, the resounding voice of that war-drum spread in all directions, rending the hearts of the enemy hosts.94
श्लोक ( Shlok ) 95
तद्रवाकर्णनाद् घूर्णितार्णवप्रतिमे बले । अतिवेलोत्सवोऽत्रासीदुत्सवो विजये यथा ॥९५॥
जिस प्रकार शत्रुके विजय करनेपर उत्सव होता है उसी प्रकार उस भेरीका शब्द सुनकर लहराते हुए समुद्रके समान चंचल जयकुमारकी सेनामें माला डालनेके उत्सवसे भी कहीं अधिक उत्सव होने लगा ॥९५॥
Just as a festival is held upon the conquest of an enemy, even so, at the sound of that war-drum, a celebration grander than the garlanding of victors arose within Jayakumara’s army, now stirred into restless motion like the billowing waves of the sea.95
श्लोक ( Shlok ) 96 – 97
तदोद्भिन्नकटप्रान्तप्रक्षरन्मदपायिनः । स्वमेदेनेव मातङ्गाः प्रोत्तुङ्गाः प्रोन्मदिष्णवः ॥९६॥सुस्वनन्तः खनन्तः खं वांजिनो वायुरंहसः । कृतोत्साहा रणोत्साहाद् रेजुस्तेजस्विता हि सा ॥९७॥
उस समय फटे हुए गण्डस्थलके समीपसे झरते हुए मदका पान करनेवाले और अपने उसी मदसे ही मानो उन्मत्त हुए ऊंचे ऊंचे हाथी युद्धके उत्साहसे सुशोभित हो रहे थे । तथा इसी प्रकार अच्छी तरह हींसते हुए, पैरोंसे आकाशको खोदते हुए और वायुके समान वेगवाले उत्साही घोड़े भी युद्धके उत्साहसे सुशोभित हो रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि उनका तेजस्वीपना वही था ।।९६-९७।।
At that moment, towering elephants—intoxicated by the ichor that flowed from their split temples, drinking of their own streaming glory as though maddened by it—stood resplendent with the fervor of war. Likewise, the spirited steeds, neighing gloriously, striking the very sky with their hooves, and swift as the wind itself, too shone forth in the ardor of battle. And rightly so—for such was the very nature of their fiery spirit. 96 – 97
श्लोक ( Shlok ) 98
रथाः प्रागिव पर्याप्ताः पूर्णसर्वायुधायुधः । महावाहसमायुक्ताः प्रनृत्यत्केतुबाहवः ॥९८॥
जो सब प्रकारके शस्त्रोंसे पूर्ण हैं, जिनमें बड़े बड़े घोड़े जुते हुए हैं, और जिनकी ध्वजारूपी भुजाएं नृत्य कर रही हैं ऐसे युद्धके रथ पहलेके समान ही सब ओर फैल रहे थे ।॥९८॥
Chariots of war, fully equipped with all manner of weapons, yoked with mighty steeds, and adorned with fluttering standards that danced like arms raised in triumph, spread forth on all sides—just as they had in battles past.98
श्लोक ( Shlok ) 99
योषितोऽप्यभटायन्त’ पाटवात् संयुगं प्रति । ततः “प्रतिबलात्तत्र भूयांसो वा पदातयः । ९९।
जयकुमारकी सेनामें युद्धमें चतुर होनेके कारण स्त्रियां भी योद्धाओंके समान आचरण करती थीं इसलिये अन्य राजाओंकी अपेक्षा उसकी पैदल सेनाकी संख्या अधिक थी ।।९९।
In Jayakumara’s army, even the women, skilled in the art of war, bore themselves like seasoned warriors; and thus, surpassing the forces of other kings, his infantry stood vast in number and unmatched in might.99
श्लोक ( Shlok ) 100
वर्द्धमानो ध्वनिस्तूर्ये रणरङ्गे भविष्यतः । वीरलक्ष्मीप्रवृत्तस्य प्रोद्ययौ गुणयन्निवः ॥॥१००॥
उस समय जो बाजोंका शब्द बढ़ रहा था वह ऐसा जान पड़ता था मानो रणके मैदान-में जो वीरलक्ष्मीका उत्तम नृत्य होनेवाला है उसे कई गुना करता हुआ ही बढ़ रहा हो ।।१००।।
At that time, the swelling sound of the war-instruments seemed as though it were amplifying manifold the splendid dance of Vīralakṣmī—the goddess of valour—soon to unfold upon the battlefield.100
श्लोक ( Shlok ) 101 – 103
वनान्वयं वयश्शिक्षालक्षणैर्वीक्ष्य विग्रहम् । सुवर्माणं सुधर्माण कामवन्तं क्षरन्मदम् ॥१०१॥ सामजं विजयार्द्धाख्यं विजयार्द्धमिवापरम् । बहुशो दृष्टसङग्रामं “गजध्वजविराजितम् ॥१०२॥अधिष्ठाय” जयः सर्वसाधनेन सहानुजः । निर्जगाम युगप्रान्तकाललीलां विलङ्घयन् ॥१०३॥
तदनन्तर-जो वनमें उत्पन्न हुआ है, वय, शिक्षा और अच्छे अच्छे लक्षणोंसे जिसका शरीर देखने योग्य है, जिसका स्वभाव अच्छा है, शरीर अच्छा है, जो कामवान् है, जिसके मद झर रहा है, जिसने अनेक बार युद्ध देखे हैं, जो हाथी के चिह्नवाली ध्वजाओंसे सुशोभित है और दूसरे विजयार्ध पर्वतके समान जान पड़ता है ऐसे विजयार्ध नामके हाथीपर सवार होकर वह जयकुमार सब सेना और सब छोटे भाईयोंके साथ साथ युगके अन्त कालकी लोलाको उल्लंघन करता हुआ निकला ।।१०१-१०३।।
Then, mounted upon Vijayārddha—a noble elephant born of the forest, whose form, adorned with strength, education, and auspicious marks, was a sight to behold; whose nature was noble, whose limbs were splendid, who was inflamed with passion, with ichor streaming down his temples, seasoned by many battles, and radiant with standards bearing the emblem of the elephant, appearing as another Mount Vijayārddha himself—Jayakumara advanced.Surrounded by his entire army and his valiant younger brothers, he emerged as though transcending the trembling chaos of the end of an age.101 – 103
श्लोक 104 से 111
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103