आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264
श्लोक 265 से 275 राजाओं का आगमन और कामदेव की उपस्थिति
अकम्पन के संदेश पर भूमिगोचरी और विद्याधर राजा सज्जित हो आसनों पर बैठे, जो देवों से युक्त और कामदेव के रूपों जैसे थे। वे सुलोचना को जीतने की आशा में अहंकारी थे। कामदेव, वसंत ऋतु, मलय पर्वत की सुगंध, कावेरी के कमल, और कोयल-भ्रमरों के स्वरों से युक्त, दक्षिण वायु का सहयोग ले सब देशों को जीतकर वहाँ पहुँचा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 265 to 275
श्लोक ( Shlok ) 265 – 267
इतो महोशसन्देशान् नरखेचरनायकाः । श्वास्ते प्रसाधितान् कृत्वा प्रसाधनविदस्तदा ॥२६५॥ निजोचितासनारूढाः प्ररूढ श्रीसमुज्ज्वलाः । चलच्चामरसम्पत्त्या कान्त्या चामरसन्निभाः ॥२६६॥ कुमार्या निर्जितः कामः प्राक् स्वमेव विकृत्य” किम् । समागंस्त पुनर्जेतुमिति शङ्काविधायिनः ।॥
इधर महाराज अकम्पनके संदेशसे, सजावटको जाननेवाले वे सब भूमिगोचरी और विद्याधरोंके अधिपति अपने आपको सजाकर अपने अपने योग्य आसनों पर जा बैठे। वे प्रकृष्ट शोभासे उज्ज्वल थे, ढुलते हुए चमरोंकी संपत्ति और कान्तिसे देवोंके समान जान पड़ते थे और ऐसी शंका उत्पन्न कर रहे थे मानो इस कुमारीने पहले ही कामदेवको जीत लिया था इसलिये वह कामदेव ही अपने बहुतसे रूप धारणकर उसे जीतने के लिये पुनः आया हो ।।२६५-२६७॥
Meanwhile, in accordance with the command of King Akampana, all those sovereigns of the terrestrial and celestial realms—masters of elegance and refinement—adorned themselves with exquisite ornaments and took their respective, befitting seats in the hall.
Radiant with resplendent brilliance, and graced with gently waving yak-tail whisks, they appeared as if divine beings themselves. Their presence exuded such splendour that a wondrous doubt arose in the hearts of onlookers: “Has this maiden, perchance, already vanquished the god of love? For it seems as though he himself, humbled and defeated, has returned in manifold forms to win her favour once more.” ॥265–267॥
श्लोक ( Shlok ) 268
कञ्चिदेकं वृणीते ऽसाविति ज्ञात्वाऽप्यहंयवः। जेतुं सर्वेऽपि तां तस्थुः आशा हि महती नृणाम् ॥२६८॥
यह सुलोचना किसी एकको ही स्वीकार करेगी, ऐसा जानकर भी वे सब राजा लोग अहंकार करते हुए उसे जीतने के लिये वहां बैठे थे सो ठीक ही है क्योंकि मनुष्योंकी आशा बहुत ही बड़ी होती है ॥ २६८॥
Though it was well known that Sulocanā would choose but one among them, still, all those kings sat there with proud demeanour, each intent upon winning her for himself. And rightly so—for the hopes of men are boundless indeed. ॥268॥
श्लोक ( Shlok ) 269 – 275
केरलीकठिनोत्तुङ्गकुचकोटि विलङ्घन । श्रमापानीतसामर्थ्यात् परिक्षीणपरिक्रमम् ॥२६९॥माद्यन्मलय मातङ्गकटकण्डूविनोदनात् । क्षतचन्दननिष्यन्दसान्द्र सौगन्ध्यबन्धुरम् ॥ २७०॥कावेरीवारिजास्वादप्रहृष्टाण्डजनिर्भर । क्रीडोच्छलज्जलस्थूलकणमुक्तातिभूषणम् ॥ २७१॥दक्षिणा निलमापल्ल “कोत्कटानलदीपनम् । कोकिलालिकलालापैर्वाचालमनुकूलयन् ॥२७२॥योषितां मधूगण्डूषैर्नू पुरारावरञ्जितैः । कुर्वन् वामाङ्घिभिश्चालमङ् घ्रिपानपि कामुकान् ।।२७३।। कौसुमं धनुरादाय वामेनारूढविक्रमः । चूतसूनं करेणोच्चैः परेण परिवर्तयन् ॥ २७४॥ “वसन्तानु चरानीत निःशेषकुसुमायुधः । जित्वा तदाखिलान् देशानप्यायात् कुसुमायुधः ॥२७५।।
जो स्त्रियोंके मद्यके कुरलों तथा नूपुरोंकी झनकारसे सुशोभित बायें पैरोंके द्वारा वृक्षोंको भी कामी बना रहा है, जो बांयें हाथमें फूलोंका धनुष धारण कर दूसरे हाथसे आमकी मंजरीको खूब फिरा रहा है, जिसका पराक्रम प्रसिद्ध है और जिसने वसन्त ऋतुरूपी सेवकके द्वारा फूलरूपी समस्त शस्त्र बुला लिये हैं, ऐसा कामदेव, केरल देशकी स्त्रियोंके कठिन और ऊंचे करोड़ों कुचोंको उल्लंघन करनेसे उत्पन्न हुई थकावटके कारण जिसकी घूमनेकी शक्ति क्षीण हो गई है अर्थात् जो धीरे धीरे चल रहा है, मलय पर्वतके मदोन्मत्त हाथियोंके गण्डस्थलोंकी खाज खुजलानेसे टूटे हुए चन्दन वृक्षोंके निष्यन्दकी घनी सुगन्धिसे जो व्याप्त हो रहा है, कावेरी नदीके कमलोंके आस्वादसे हर्षित हुए पक्षियोंकी अल्हड़ क्रीड़ासे उछलती हुई जलकी बड़ी बड़ी बूँदें ही जिसके मोतियोंके आभूषण हैं, जो विरहरूपी तीव्र अग्निको प्रज्वलित करनेवाला है और कोयल तथा भ्रमरोंके मनोहर शब्दोंसे जो वाचा-लित हो रहा है ऐसे दक्षिणके वायुको अनुकूल करता हुआ सब देशोंको जीतकर उस समय वहां आ पहुंचा था ॥ २६९-२७५॥
He—whose left foot, adorned with the sweet jangling of anklets and the drunken cries of women, could stir even the trees to passion; who held in his left hand a bow of blossoms and with the other twirled a mango spray in playful charm; whose might was famed across the earth and who had summoned forth all flower-like weapons through the agency of his servant, the Spring—such was the god of Love, now fatigued by his attempt to surmount the lofty, firm, and unyielding bosoms of the women of Kerala.
He advanced slowly, his strength of movement diminished. He was perfumed with the dense fragrance exuding from the sandalwood trees, whose trunks had been broken by the eager scratching of the intoxicated tuskers of Mount Malaya. His ornaments were no more than the great pearl-like droplets of water tossed about in the frolic of joyous birds, who, delighted by tasting the lotus blooms of the Kāverī, leapt and played upon her streams.
He—who kindles the fierce fire of separation, who is eloquent with the melodious notes of the koel and the murmur of bees, and who rendered the southern wind his ally—conquered all realms and, at that very moment, arrived there triumphant. ॥269–275॥
श्लोक 276 से 291
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264
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