आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21
शत्रुओं का भय और पराजय
भरत के आगमन से शत्रु राजा भयभीत और व्याकुल हो जाते हैं। जो उनके विरुद्ध खड़ा होता है, वह वंश सहित नष्ट हो जाता है। विरोधी राजा उनकी सेना का शब्द सुनकर भागते हैं या राज्य-चिह्न त्याग देते हैं। कुछ दुष्ट राजाओं को मंत्रबल से कैद कर उनके स्थान पर कुलीन राजा नियुक्त किए जाते हैं। कई राजा भरत के चरणों की शरण लेते हैं, जबकि उनके समीप आने से शत्रुओं के वाहन और तेज नष्ट हो जाते हैं, और वे मृत्यु के निकट पहुंच जाते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
निष्क्रान्त इति सम्भ्रान्तैरायात इति भीवशैः । प्राप्त इत्यनवस्थैश्च प्रणेमे सोऽरिभूमिपैः ॥१२॥
चक्रवर्ती भरत नगरसे बाहर निकला यह सुनकर जो व्याकुल हो जाते थे, चक्रवर्ती आया यह सुनकर जो भयभीत हो जाते थे और वह समीप आया यह सुनकर जो अस्थिरचित्त हो जाते थे ऐसे शत्रु राजा लोग उन्हें जगह जगह प्रणाम करते ॥१२॥
“When the enemy kings heard that Emperor Bharata had departed from the city, those who were anxious; when they heard that he had arrived, those who were struck with fear; and when they heard that he was near, those whose hearts were filled with uncertainty, would bow to him at every turn.” (Verse 12)
श्लोक ( Shlok ) 13
महापगारयस्येव तरुरस्य बलीयसः। यो यः प्रतीपमभवत् स स निर्मूलतां ययौ ॥१३॥
जिस प्रकार किसी महानदी के बलवान् वेगके विरुद्ध खड़ा हुआ वृक्ष निर्मूल हो जाता है-जड़ सहित उखड़ जाता है उसी प्रकार जो राजा उस बलवान् चक्रवर्तीके विरुद्ध खड़ा होता था उसके सामने विनयभाव धारण नहीं करता था वह निर्मूल हो जाता था-वंशसहित नष्ट हो जाता था ॥१३॥
“As a tree, standing against the mighty current of a great river, is uprooted and cast away with its very roots, so too would a king who opposed the strength of the mighty Emperor, failing to show reverence, be utterly destroyed — his lineage wiped out in its entirety.” (Verse 13)
श्लोक ( Shlok ) 14
“प्रतीपवृत्तिमादर्शै छायात्मानं च नात्मनः । विक्रमैकरसश्चक्री सोऽसोढ किमुत द्विषम् ॥१४॥
एक पराक्रम ही जिसे प्रिय है ऐसा वह भरत जब कि दर्पणमें उलटे पड़े हुए अपने प्रतिविम्ब को भी सहन नहीं करता था तब शत्रुओंको किस प्रकार सहन करता ? ॥१४॥
“Bharata, whose soul was enamored solely with valor, could not even bear to look upon the distorted reflection of himself in a mirror; how, then, could he tolerate the presence of his enemies?” (Verse 14)
श्लोक ( Shlok ) 15
चमूरवश्रवादेव कैश्चिदस्य विरोधिभिः । चमूरुवृत्तमारब्धमति दूरं पलायितैः ॥१५॥
कितने ही विरोधी राजाओंने तो उनकी सेना का शब्द सुनते ही बहुत दूर भागकर हरिण की वृत्ति प्रारम्भ की थी ।।१५।।
“Upon hearing the thunderous march of his army, many rival kings, stricken with fear, took flight as if they were deer, fleeing far into the distance.” (Verse 15)
श्लोक ( Shlok ) 16
“महाभोगैर्नृपैः कैश्चिद् भयादुत्सृष्टमण्डलैः। भुजङ्गैरिव निर्मोकस्तत्यजेऽपि परिच्छदः ॥१६॥
और कितने ही वैभवशाली बड़े बड़े राजाओं ने भयसे अपने अपने देश छोड़कर छत्र चमर आदि राज्य-चिह्नों को उस प्रकार छोड़ दिया था जिस प्रकार कि बड़े बड़े फणाओंको धारण करनेवाले सर्प अपने वलयाकार आसन को छोड़कर कांचली छोड़ देते हैं ।।१६।।
“Many illustrious kings, overcome with terror, deserted their realms, casting aside their regal symbols — the umbrella, the fan, and other emblems of power — much like mighty serpents, adorned with vast hoods, abandoning their coils and shedding their skins in the face of danger.” (Verse 16)
श्लोक ( Shlok ) 17
प्रदुष्टान् भोगिनः” कांश्चित् प्रभुरुद्धृत्य मन्त्रतः। वल्मीकेष्विव दुर्गेषु “कुल्यानन्यानतिष्ठिपत् ॥१७।।
जिस प्रकार दुष्ट सर्पो को मंत्रके जोरसे उठाकर वामी में डाल देते हैं उसी प्रकार भरत ने अन्य कितने ही भोगी-विलासी दुष्ट राजाओंको मंत्र (मंत्रियोंके साथ की हुई सलाह). के जोरसे उखाड़ कर किलों में डाल दिया था, उनके स्थानपर अन्य कुलीन राजाओं को बैठाया था ॥१७॥
“As venomous serpents are driven by the force of mantras and cast into pits, so did Emperor Bharata, with the might of his advisors’ counsel, uproot many wicked, indulgent kings and imprison them in fortresses, replacing them with more noble rulers in their place.” (Verse 17)
श्लोक ( Shlok ) 18
अनन्यशरणैरन्यैस्तापविच्छेदमिच्छभिः । तत्पादपादपच्छाया न्यषेवि सुखशीतला ॥१८।।
जिन्हें अन्य कोई शरण नहीं थी और जो अपना संताप नष्ट करना चाहते थे ऐसे कितने ही राजाओं ने सुख तथा शान्ति देने वाली भरतके चरणरूपी वृक्षोंकी छाया का आश्रय लिया था ॥१८॥
“Many kings, with no other refuge to turn to and eager to erase their torment, sought solace beneath the shade of Bharata’s feet, which were like trees offering peace and tranquility.” (Verse 18)
श्लोक ( Shlok ) 19
केषाञ्चित् पत्रनिर्मोक्षं छायापायं च भूभुजाम् । पादपानामिव ग्रीष्मः समभ्यर्णश्चकार सः ॥१९ ॥
जिस प्रकार समीप आया हुआ ग्रीष्म ऋतु वृक्षोंके पत्र अर्थात् पत्तोंका नाश कर देता है और उनकी छाया अर्थात् छांहरीका अभाव कर देता है उसी प्रकार समीप आये हुए भरतने कितने ही राजाओंके पत्र अर्थात् हाथी घोड़े आदि वाहनों (सवारियों) का नाश कर दिया था और उनकी छाया अर्थात् कान्तिका अभाव कर दिया था । भावार्थ-भरतके समीप आते ही कितने ही राजा लोग वाहन छोड़कर भाग जाते थे तथा उनके मुखकी कान्ति भयसे नष्ट हो जाती थी ।।१९।।
“As the approaching summer withers the leaves of trees and strips them of their shade, so did the nearing presence of Bharata bring ruin to the elephants, horses, and other royal steeds of many kings, leaving them bereft of their grandeur, their very radiance fading in the shadow of fear.” (Verse 19)
श्लोक ( Shlok ) 20
ध्वस्तोष्मप्रसरा” गाढमु च्छ्वसन्तोऽन्तराकुलाः । प्राप्तेऽस्मिन् वैरिभूपालाः प्रापुर्मर्तव्यशेषताम् ॥२०॥
महाराज भरतके समीप आते ही शत्रु राजाओंका सब तेज (पक्ष में गर्मी) नष्ट हो गया था, उनके भारी भारी श्वासोच्छ्वास चलने लगे थे और वे अन्तःकरण में व्याकुल हो रहे थे, केवल उनका मरना ही बाकी रह गया था ।। २० ।।
“Upon the approach of Emperor Bharata, the vigor of the enemy kings was shattered. Their breaths grew deep and labored, and their hearts were filled with inner turmoil; only their doom remained inevitable.” (Verse 20)
श्लोक ( Shlok ) 21
वैरकाम्यति वः स्मास्मिन् प्रागेव विननाश सः । ‘विदिध्यापयिषुर्वह्निं शलभः कुशली किमु ॥२१॥
जिस पुरुषने भरत के साथ शत्रुता करने की इच्छा की थी वह पहले ही नष्ट हो चुका था, सो ठीक ही है क्योंकि अग्नि को बुझानेकी इच्छा करनेवाला पतंगा क्या कभी सकुशल रह सकता है ? अर्थात् नहीं ॥२१॥
“The man who harbored the desire to oppose Bharata had already met his end, as was fitting, for how could a moth, bent on extinguishing a flame, ever hope to escape unscathed?” (Verse 21)
श्लोक 22 से 31
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
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आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11