आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141
मागधदेव का क्रोध और देवों की सलाह
मागधदेव ने शत्रु को युद्ध और मृत्यु देने की घोषणा की, पर समीपवर्ती देवों ने उनके क्रोध को शांत किया। उन्होंने कहा कि बलवानों से विरोध पराभव लाता है और यश की रक्षा समर्थ पुरुष के आश्रय से ही संभव है। बुद्धिमान को बिना विचार किए कार्य नहीं करना चाहिए। देवों ने सुझाव दिया कि बाण की उत्पत्ति की जाँच हो, क्योंकि यह चक्रवर्ती का ही हो सकता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
विजिगीषुतया देवा’ वयं नेच्छाविहारतः । ततोऽरिविजयादेव सम्पदस्तु सदापि नः ॥१३२॥
हम लोग शत्रुओंको जीतने से ही ‘देव’ कहलाते हैं, इच्छानुसार जहां तहां विहार करने मात्र से देव नहीं कहलाते इसलिये हम लोगोंकी संपत्ति सदा शत्रुओंको विजय करने मात्रसे ही प्राप्त हो ।। १३२।।
“We are called ‘Devas’ only by conquering our enemies; merely roaming about freely here and there does not make one a Deva. Therefore, may our wealth always be attained solely through the conquest of our foes.” (132)
श्लोक ( Shlok ) 133
वस्तुवाहनराज्याङ्गैराराधयति यः परम्। परभोगीणंमैश्वर्य तस्य मन्ये विडम्बनम् ॥ १३३॥
जो मनुष्य रत्न आदि वस्तु, हाथी घोड़े आदि वाहन और छत्र चमर आदि राज्यके चिह्न देकर किसी दूसरेकी आरा-धना-सेवा करता है उसका ऐश्वर्य दूसरोंके उपभोगके लिये हो और मैं ऐसे ऐश्वर्यको केवल विडम्बना समझता हूं ।॥१३३।।
“A person who, by giving away treasures, elephants, horses, and the insignia of royalty such as umbrellas and fans, serves another through begging or labor, his wealth is for the enjoyment of others, and I consider such wealth to be nothing but a mockery.” (133)
श्लोक ( Shlok ) 134
शरशाली प्रभुः कोऽपि मत्तोऽयं धनमोप्सति । धनायतोऽस्य दास्यामि निधनं प्रधनैः समम् ॥१३४।।
बाण चलानेवाला यह कोई राजा मुझसे धन चाहता है सो इसके लिये मैं युद्धके साथ साथ निधन अर्थात् मृत्यु दूंगा ।।१३४।।
“The one who shoots an arrow, this king desires wealth from me; for this, I will grant him death, along with war.” (134)
श्लोक ( Shlok ) 135
विचूण्यैंनं शरं तावत् कोपाग्नेः प्रथमेन्धनम् । करवाणीदमेवास्तु तनुशल्कैरुपेन्धनम् ॥१३५॥
सबसे पहले मैं इस बाण को चूर कर अपने क्रोधरूपी अग्निका पहला ईंधन बनाऊंगा, यही बाण अपने छोटे छोटे टुकड़ों से मेरी क्रोधरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेवाला हो ।। १३५।
“First, I will break this arrow and make its pieces the first fuel for my fire of anger. This arrow, with its small fragments, will ignite the fire of my rage.” (135)
श्लोक ( Shlok ) 136
साक्षेपमिति संरम्भादुदीर्य गिरमूर्जिताम् । व्यरंसीद् दशनज्योत्स्नां संहरन्मागधां मरः ॥१३६॥
इस प्रकार वह मागध देव क्रोध से तिरस्कार के साथ साथ कठोर वचन कहकर दांतोंकी कान्तिको संकुचित करता हुआ जब चुप हो रहा ।।१३६।।
“Thus, the Magadh Dev, with contempt and harsh words, clenched his teeth in anger and remained silent.” (136)
श्लोक ( Shlok ) 137
ततस्तमूचुरभ्यर्णाः सुरा दृष्टपरम्पराः। प्रभु शमयितुं क्रोधाद् विद्या वृद्धैर्विभोः स्थितिः ॥१३७॥
तब कुल-परम्पराको देखने वाले समीपवर्ती देव उसका क्रोध शमन करनेके लिये उससे कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि राजा लोगोंकी स्थिति विद्याकी अपेक्षा वृद्ध हुए मनुष्यों से ही होती है, भावार्थ-जो मनुष्य विद्यावृद्ध अर्थात् विद्या की अपेक्षा बड़े हैं उन्हींसे राजा लोगोंकी मर्यादा स्थिर रहती है किन्तु जो मनुष्य केवल अवस्थासे बड़े हैं उनसे कुछ लाभ नहीं होता ।। १३७।।
“Then, the nearby gods, who observed the family traditions, spoke to him to calm his anger, saying, ‘That is indeed correct, because the status of kings is determined by those who are older in wisdom, not just by age alone.’
Meaning: “The dignity of kings is maintained by those who are advanced in wisdom, not merely by those who are older in age.” (137)
श्लोक ( Shlok ) 138
यथार्थ वरमर्थ्य च मित च बहुविस्तरम् । अनाकलं च गम्भीर “नाधियामीदृशं वचः ॥१३८॥
उन देवोंने जो वचन कहे थे वे समयके अनुकूल थे, अर्थसे भरे हुए थे, परिमित थे, अर्थकी अपेक्षा बहुत विस्तारवाले थे, आकुलता-रहित थे और गंभीर थे सो ठीक ही है क्योंकि मूखोंके ऐसे वचन कभी नहीं निकलते हैं ।॥ १३८।।
“The words spoken by those gods were timely, full of meaning, measured, expansive in terms of their significance, free from agitation, and profound. This is indeed correct because such words never come from foolish people.” (138)
श्लोक ( Shlok ) 139
सत्यं परिभवः सोढुम शक्यो मानशालिनाम् । बलवद्भिर्विरोधस्तु स्वपराभवकारणम् ॥१३९॥
उन देवोंने कहा कि हे प्रभो, यह ठीक है कि अभिमानी मनुष्योंको अपना पराभव सहन नहीं हो सकता है परन्तु बलवान् पुरुषोंके साथ विरोध करना भी तो अपने पराभवका कारण है ।।१३९।।
“The gods said, ‘O Lord, it is true that arrogant humans cannot bear their defeat, but opposing powerful individuals also leads to one’s own downfall.'” (139)
श्लोक ( Shlok ) 140
सत्यमेव यशो रक्ष्यं प्राणैरपि धनेरपि । तत्तु प्रभुमनाश्रित्य कथं लभ्येत धीधनेः ॥१४०॥
यह बिलकुल ठीक है कि अपने प्राण अथवा धन देकर भी यशकी रक्षा करनी चाहिये परन्तु वह यश किसी समर्थ पुरुषका आश्रय किये बिना बुद्धिमान् मनुष्योंको किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ? ।।१४०।।
“It is certainly true that one should protect their honor even at the cost of their life or wealth, but how can wise men attain such honor without taking refuge in a powerful person?” (140)
श्लोक ( Shlok ) 141
अलब्धभावो लब्धार्थपरिरक्षणमित्यपि । द्वयमेतत् सुखाल्लभ्यं जिगीषोर्नाश्रयं विना ॥१४१॥
प्राप्त नहीं हुई वस्तुका प्राप्त होना और प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना ये दोनों ही कार्य किसी विजिगीषु राजाके आश्रयके बिना सुखपूर्वक प्राप्त नहीं हो सकतें ॥ १४१ ॥
“The attainment of an unacquired object and the protection of an acquired one — both these tasks cannot be accomplished easily without taking refuge under a conquering king.” (141)
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131