आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 सुलोचना की भक्ति और विवाह चिंता
सुलोचना ने जिनेंद्रदेव की रत्नमयी प्रतिमाएँ बनवाकर उनकी पूजा, स्तुति, दान और धर्म-श्रवण किया, जिससे सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। फाल्गुन में अष्टाह्निकी पूजा और उपवास कर वह राजा अकम्पन को शेषाक्षत देने गई। राजा ने उसे पारणा के लिए विदा किया और उसकी यौवनावस्था देखकर विवाह की चिंता करने लगा। उन्होंने चार मंत्रियों—श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ, सुमति—को बुलाकर कन्या के विवाह पर विचार-विमर्श किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
इति सम्पूर्णसर्वाङ्गशोभां शुद्धान्ववायजाम् । स्मरो “जयभयाद्वैतां’ न ‘तदाऽप्यकरोत् करे ॥१७२ll
इस प्रकार जो समस्त अंगोंकी शोभासे परिपूर्ण है और शुद्ध वंशमें जिसकी उत्पत्ति हुई है ऐसी उस सुलोचनाको कामदेव जयकुमारके भयसे युवावस्थामें भी अपने हाथमें नहीं कर सका था ।।१७२।।
Thus, though endowed with exquisite beauty in every limb and born of a pure and noble lineage, that maiden Sulocanā could not be won over even in the prime of her youth by Kāma himself—out of fear for the valiant Jayakumāra.172
श्लोक ( Shlok ) 173 – 179
कारयन्ती जिनेन्द्रार्चाश्चित्रा” मणिमयीर्बहूः । तासां हिरण्मयान्येव विश्वोपकरणान्यपि ॥१७३।।तत्प्रतिष्ठाभिषेकान्ते महापूजाः प्रकुर्वती । मुहुः स्तुतिभिरर्थ्याभिः स्तुवती भक्तितोऽर्हतः ॥१७४।॥ददती पात्रदानानि मानयन्ती” महामुनीन् । शृण्वती धर्ममाकर्ण्य भावयन्ती मुहुर्मुहुः ॥ १७५।।आप्तागमपदार्थांश्च प्राप्तसम्यक्त्वशुद्धिका । अथ फाल्गुननन्दीश्वरेऽसौ भक्त्या जिनेशिनाम् ॥१७६॥विधायाष्टाह्निकीं पूजाम भ्यर्ध्यार्चा यथाविधि । कृतोपवासा तन्वङ्गी शेषां दातुमुपागता ॥१७७॥नृपं सिंहासनासीनं सोऽप्युत्थाय कृताञ्जलिः । तद्दत्तशेषामादाय निधाय शिरसि स्वयम् ॥१७८॥उपवासपरिश्रान्ता पुत्रिके त्वं प्रयाहि ते । शरणं पारणाकाल इति कन्यां व्यसर्जयत् ॥१७९॥
उस सुलोचनाने श्री जिनेन्द्रदेवकी अनेक प्रकारकी रत्नमयी बहुत सी प्रतिमाएं बनवाई थों और उनके सब उपकरण भी सुवर्ण हीके बनवाये थे। प्रतिष्ठा तथा तत्सम्बन्धी अभिषेक हो जाने के बाद वह उन प्रतिमाओंकी महापूजा करती थी, अर्थपूर्ण स्तुतियोंके द्वारा श्री अर्हन्त-देवकी भक्तिपूर्वक स्तुति. करती थी, पात्र दान देती थी, महामुनियोंका सन्मान करती थी, धर्मको सुनती थी तथा धर्मको सुनकर आप्त आगम और पदार्थोंका बार बार चिन्तवन करती हुई सम्यग्दर्शनकी शुद्धताको प्राप्त करती थी। अथानन्तर फाल्गुन महीनेकी अष्टाह्निकानें उसने भक्तिपूर्वक श्री जिनेन्द्रदेवकी अष्टाह्निकी पूजा की, विधिपूर्वक प्रतिमाओंकी पूजा की, उपवास किया और फिर वह कृशांगी पूजाके शेषाक्षत देने के लिये सिंहासनपर बैठे हुए राजा अकम्पनके पास गई। राजाने भी उठकर और हाथ जोड़कर उसके दिये हुए शेषाक्षत लेकर स्वयं अपने मस्तकपर रखे तथा यह कहकर कन्याको विदा किया कि हे पुत्रि, तू उपवाससे खिन्न हो रही है, अब घर जा, यह तेरे पारणाका समय है ।।१७३-१७९॥
That noble Sulocanā caused numerous images of Lord Jina to be fashioned, resplendent and adorned with various kinds of precious gems, and had all their accompanying requisites made entirely of gold. After duly performing the consecration and associated ablutions of those images, she engaged in their grand worship with profound devotion. With meaningful hymns, she praised the Blessed Arhant, offering alms to the worthy, honoring the great sages, listening attentively to the sacred Dharma, and—upon reflecting repeatedly upon the words of the Āpta (the omniscient) and the truths they revealed—she attained the purity of right-faith (samayagdṛṣṭi).Thereafter, on the occasion of the Aṣṭāhnikī observance in the month of Phālguna, she devoutly performed the eight-day worship of Lord Jina, conducted the ceremonial veneration of the images with due rites, undertook a fast, and—her body now emaciated from austerity—approached King Akampana, seated upon his lion-throne, to offer the remaining consecrated rice (śeṣākṣata) from her worship.The king too rose with reverence, folded his hands, received that sacred śeṣākṣata from her hands, and placed it upon his own head. Then, with affection and grace, he bade his daughter farewell, saying:“O child, thou art weary from fasting; now return home, for the time of thy ceremonial breaking of the fast has come.” 173 – 179
श्लोक ( Shlok ) 180
तां विलोक्य महीपालो बालामापूर्णयौवनाम् । निर्विकारां सचिन्तः सन् तस्याः “परिणयोत्सवे ॥१८०॥
राजा पूर्ण यौवनको प्राप्त हुई उस विकारशून्य कन्याको देखकर उसके विवाहोत्सवकी चिन्ता करने लगा ।।१८०।।
Beholding that flawless maiden, now blossomed into the full bloom of youth and untouched by any worldly blemish, the king’s heart turned toward contemplation of her marriage festival.180
श्लोक ( Shlok ) 181
शुभे श्रुतार्थसिद्धार्थसर्वार्थसुमतिश्रुतीन् । कोष्ठादिमतिभेदान्वा दिने व्याहूय मन्त्रिणः ॥१८१॥
उसने किसी शुभ दिनको कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, पदानुसारी और संभिन्नश्रोतृ इन चारों बुद्धि ऋद्धियों के समान श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ और सुमति नामके मंत्रियोंको बुलाया ॥१८१॥
On an auspicious day, he summoned four ministers whose wisdom rivalled the four-fold miraculous intellects—Koṣṭhabuddhi, Bījabuddhi, Padānusārī, and Saṃbhinnaśrotṛ. Their names were Śrutārtha, Siddhārtha, Sarvārtha, and Sumati.181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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