आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की शोभा
चक्रवर्ती भरत ने प्रातःकाल की क्रियाएँ पूर्ण कर चक्ररत्न के पीछे प्रस्थान किया। चक्ररत्न और दण्डरत्न, दोनों देवों द्वारा रक्षित, सेना के अग्रभाग में थे और विजय के प्रमुख कारण थे। भरत विजयपर्वत नामक विशाल हाथी पर सवार हुए, जो विजयार्ध पर्वत से स्पर्धा करता था। उनकी शोभा इन्द्र के समान थी, सफेद छत्र यश का प्रतीक था, और चमरों की पंक्ति लक्ष्मी के हास्य-सी शोभित थी। सेनापति सैनिकों को समुद्र तक शीघ्र प्रस्थान के लिए प्रेरित कर रहे थे।
श्लोक 12 से 21
सेना का समुद्र की ओर प्रयाण और गंगा के साथ समानता
सेनापतियों के आह्वान पर सैनिकों ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया, जहाँ मागधदेव को वश करना था। नगाड़ों के शब्द से आकाश गूंज उठा। सेना गंगा के किनारे चलती हुई गंगा नदी की तरह प्रतीत होती थी, जिसमें चमर, ध्वजाएँ, और घोड़े गंगा के हंस, बगुले, और तरंगों जैसे थे। सेना की गति अविचल थी और वह गंगा को भी परास्त करती प्रतीत होती थी, क्योंकि यह चक्रवर्ती की आज्ञा का पालन करती थी। ध्वजाएँ आकाश को स्वच्छ करती सी प्रतीत होती थीं।
श्लोक 22 से 31
मार्ग में देशों और शत्रुओं पर विजय
भरत ने मार्ग में अनेक देश, नदियाँ, पर्वत, और किले पार किए। शत्रु बिना युद्ध के समर्पण कर रहे थे, और मण्डलेश्वर राजा उन्हें प्रणाम करते थे। भरत ने अपनी प्रभुता से शत्रुओं की भूमि छीन ली और उनकी धूल में मिला दिया। सन्धि आदि गुणों में वे अद्वितीय थे, जिससे शत्रुओं को परास्त करना उनके लिए सहज था। बिना तलवार या धनुष का उपयोग किए उन्होंने पूर्व दिशा जीत ली।
श्लोक 32 से 41
ग्वालाओं और भीलों का दर्शन
भरत ने मार्ग में गोकुलों में दही मथती ग्वालाओं को देखा, जो श्रम और शोभा से युक्त थीं। उनकी गतिविधियाँ और सौन्दर्य मनमोहक थे। वनों में भील लोग जंगली हाथियों के दाँत और मोती भेंट करते दिखे। भील कन्याएँ सौन्दर्य और सादगी से युक्त थीं, जो सेना को देखकर विस्मित थीं।
श्लोक 42 से 51
समुद्र के समीप शिविर और उप-समुद्र का दर्शन
म्लेच्छ राजाओं ने भेंट देकर भरत की आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने अन्तपालों के किलों को वश में किया। सेना गंगाद्वार और समुद्र तक पहुँची, जहाँ उप-समुद्र का जल गहरा और स्थायी था। भरत ने गंगा के उपवन में सेना को ठहराया, जहाँ शिविर की रचना नन्दन वन-सी थी। सेना गंगा की शीतल वायु में सुखपूर्वक रही।
श्लोक 52 से 61
लवण समुद्र विजय की तैयारी
भरत ने मागधदेव को वश करने के लिए अरहन्त देव की आराधना का विचार किया। उन्होंने पंच परमेष्ठी की पूजा की, सेना की रक्षा हेतु सेनापति नियुक्त किया, और अजितंजय रथ पर सवार होकर समुद्र विजय के लिए प्रस्थान किया। पुरोहित ने मंगल आशीर्वाद और ऋचा पढ़कर उनकी विजय की कामना की।
श्लोक 62 से 102
समुद्र का वर्णन और भरत की वेदी पर आरूढ़ता
भरत गंगाद्वार की वेदी पर चढ़े, जिसे वे समुद्र में प्रवेश और कार्य-सिद्धि का द्वार मानते थे। समुद्र का वर्णन अनेक रूपकों से किया गया: वह लहरों से उछलता, शंखों और रत्नों से युक्त, और चक्रवर्ती की सेना-सा अलंघनीय था। यह अपस्मार रोगी, सर्प, पेटू, राक्षस, बालक, और सिद्धालय-सा प्रतीत होता था। इसकी गहराई, चंचलता, और रत्नों की शोभा विस्मयकारी थी। भरत ने इसे अपूर्व महानिधि के रूप में देखा, जो उनकी विजय की वेदी पर उनकी शोभा को बढ़ा रहा था।
श्लोक 103 से 111
समुद्र में रथ का वेग और चक्रवर्ती का प्रभाव
चक्रवर्ती भरत ने गंभीर समुद्र को तुच्छ समझकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और रथ को शीघ्र बढ़ाने की आज्ञा दी। उनका रथ मन-सा वेगवान घोड़ों द्वारा समुद्र में जहाज की भाँति तेजी से चला। जल में भी रथ और घोड़े स्थल की तरह दौड़ रहे थे, जो चक्रवर्ती के पुण्य का आश्चर्य था। लहरें घोड़ों का परिश्रम दूर करती थीं, और रथ के पहियों से उछलता जल ध्वजा को भारी करता था। घोड़ों का अंगराग केवल जल के छींटों से धुल गया।
श्लोक 112 से 121
रथ का समुद्र में रुकना और बाण प्रक्षेपण
रथ के पहियों से जल दो भागों में बँटकर मार्ग बनाता प्रतीत हुआ। रथ समुद्र में बारह योजन चलकर रुक गया, तब क्रुद्ध भरत ने धनुष उठाया। धनुष की प्रत्यंचा के शब्द से समुद्र और मछलियाँ क्षुब्ध हो उठीं। विद्याधरों को संसार के संहार की आशंका हुई। भरत ने अमोघ बाण पर अपनी पहचान अंकित कर मागधदेव को अधीन करने का संदेश देते हुए उसे पूर्व दिशा में छोड़ा।
श्लोक 122 से 131
मागधदेव का क्रोध और प्रतिक्रिया
बाण का भारी शब्द मागधदेव की सेना में क्षोभ उत्पन्न करता हुआ उनके निवास में जा गिरा। व्यन्तरदेवों ने इसे कल्पान्त या भूकंप समझकर मागधदेव को घेर लिया। मागधदेव ने क्रोधित होकर बाण को चूर करने और शत्रु को नष्ट करने की बात कही। उन्होंने कहा कि पराभव सहन करना पुरुष के लिए कलंक है और सच्चा पुरुष पराक्रम से कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 132 से 141
मागधदेव का क्रोध और देवों की सलाह
मागधदेव ने शत्रु को युद्ध और मृत्यु देने की घोषणा की, पर समीपवर्ती देवों ने उनके क्रोध को शांत किया। उन्होंने कहा कि बलवानों से विरोध पराभव लाता है और यश की रक्षा समर्थ पुरुष के आश्रय से ही संभव है। बुद्धिमान को बिना विचार किए कार्य नहीं करना चाहिए। देवों ने सुझाव दिया कि बाण की उत्पत्ति की जाँच हो, क्योंकि यह चक्रवर्ती का ही हो सकता है।
श्लोक 142 से 151
मागधदेव का प्रबोधन और चक्रवर्ती की पहचान
देवों ने कहा कि चक्रवर्ती के बाण पर अंकित नाम उनकी पहचान प्रकट करता है। उन्होंने मागधदेव को क्रोध त्यागकर चक्रवर्ती की आज्ञा मानने और बाण की पूजा कर उन्हें अर्पित करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि चक्रवर्ती के साथ वैर से शांति नहीं मिलेगी और पूज्य पुरुषों की पूजा से दोनों लोकों में उन्नति होती है।
श्लोक 152 से 161
मागधदेव का समर्पण और भरत के प्रति नम्रता
मागधदेव ने देवों के वचनों से प्रबोध प्राप्त कर चक्रवर्ती भरत की महिमा स्वीकारी। उनके मन में भय, आशंका, और प्रबोध उत्पन्न हुआ। क्रोध शांत होने पर उन्होंने भरत को प्रथम चक्रवर्ती, वृषभदेव के पुत्र, और पूज्य माना। वे आकाश-मार्ग से भरत के पास पहुँचे, बाण अर्पित कर नमस्कार किया, और स्वयं को उनका सेवक स्वीकार करने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने अपराध की क्षमा माँगी और भरत के चरणों की सेवा से पवित्र होने की बात कही।
श्लोक 162 से 171
मागधदेव की भेंट और समुद्र का वर्णन
मागधदेव ने भरत को अमूल्य रत्न, दिव्य मोतियों का हार, और कुण्डल भेंट किए, जो उनके वक्ष और कानों को शोभित करने योग्य थे। प्रसन्न मागधदेव ने रत्नों से भरत की पूजा की और उनकी अनुमति से अपने स्थान को लौट गए। भरत ने समुद्र और उसके अन्तर्वीपों को देखकर आश्चर्य अनुभव किया। सारथि ने समुद्र की शोभा का वर्णन किया, जिसमें लहरें मणियों से पूजा करती प्रतीत होती थीं, शंखों का शब्द गूंजता था, और जल दिशाओं में यश बांटता प्रतीत होता था। समुद्र का जल आकाश और राजकुलों से तुलनीय था।
श्लोक 172 से 181
समुद्र की तुलना और आश्चर्य
सारथि ने कहा कि गंगा और सिन्धु का जल समुद्र में मिलता है, पर यह तृप्त नहीं होता, जैसे मूर्ख मूर्खों के संग्रह से संतुष्ट नहीं होता। समुद्र के जलचर जीव इसके पुत्र, नदियाँ स्त्रियाँ, और बालू रत्न हैं, फिर भी यह महोदधि कहलाता है, जो आश्चर्यजनक है। सर्प अलातचक्र-से शोभित हैं, और समुद्र चन्द्र-स्पर्श से क्रोधित-सा उछलता है। इसके भीतर देवों के क्रीड़ास्थल और द्वीप किलों-से हैं। समुद्र किनारे के वनों को ताड़न करता प्रतीत होता है और कुलपर्वतों को चुनौती देता है। सर्प और मछलियाँ इसमें भोजन के लिए संघर्ष करती हैं।
श्लोक 182 से 191
समुद्र के जीव और किनारे की शोभा
सारथि ने समुद्र के जीवों का वर्णन किया: एक मछली रथ को मूर्खतावश बड़ा मच्छ समझती है, सर्प तरंगों-से दीपक प्रज्वलित करते प्रतीत होते हैं। समुद्र का जल रत्नों से दीप्तिमान और दीपकों-युक्त घर-सा है। ज्वार-भाटे और मयूरों के नृत्य से यह जीवंत है। किनारे के वन सूर्य के ताप से मुक्त, फूलों और लहरों से शोभित हैं। हरिण तालाबों के पास विचरण करते हैं और दावानल की शंका से लौटते हैं। समुद्र नदियों को आलिंगन करता है, पर तृप्त नहीं होता।
श्लोक 192 से 201
समुद्र की गतिविधियाँ और रत्नों की महिमा
समुद्र के किनारे मन्दार वृक्षों में विद्याधरियाँ टहलती हैं। मछलियाँ और अजगर परस्पर युद्धरत हैं, पर समान बल के कारण विजय नहीं होती। जंगली हाथी समुद्र को ताड़न करते हैं, जो मृदंग-सा बजता है। जल मछलियों, सीपों, और सर्पों की कांचलियों से भयानक है। वायु किनारे की सुगंध और लहरों को हिलाता है। समुद्र की भूमियाँ मोतियों और देवों की सेवा से शोभित हैं। जलचर जीव समुद्र को पिता मानकर इसके धन के लिए लड़ते हैं। समुद्र के रत्न और जल बड़वानल के बावजूद अक्षय हैं।
श्लोक 202 से 211
समुद्र और भरत की समानता, छावनी में वापसी
सारथि ने समुद्र और भरत की समानता बताई: दोनों आश्चर्यों, रत्नों, गंभीरता, और शक्ति से युक्त हैं, पर भरत मूर्खों से मुक्त हैं। भरत आनंदित होकर छावनी की ओर प्रस्थान करते हैं। सारथि ने कठिनाई से रथ लौटाया, और समुद्र की लहरें रथ का पीछा करती प्रतीत हुईं। रथ किनारे पहुँचा, और लोग भरत के पुण्य और सकुशल वापसी की प्रशंसा करते हैं। राजा और सैनिक जयघोष के साथ उनका स्वागत करते हैं। भरत छावनी में प्रवेश कर राजभवन पहुँचते हैं, जहाँ मंगलाक्षत और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
श्लोक 212 से 221
भरत की विजय और पुण्य की महिमा
लोगों ने भरत को शत्रु-विजय और चिरायु होने के आशीर्वाद दिए, जो पुनरुक्त थे, क्योंकि वे पहले ही ये प्राप्त कर चुके थे। पुण्य के प्रभाव से भरत ने अगाध समुद्र को पार कर मागधदेव को वश किया। पुण्य ही जल-स्थल में शरण और सुख देता है। जिनेन्द्र द्वारा बताए गए पुण्यकर्मों—जिनपूजा, दान, व्रत, उपवास—का संचय करने की सलाह दी गई। भरत सभाभवन में सिंहासन पर विराजते हैं और गंगा के किनारे सेना के साथ सुखपूर्वक निवास करते हैं, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथान्येद्युर्दिनारम्भे कृतप्राभातिकक्रियः । प्रयाणमकरोच्चक्री चक्ररत्नानु मार्गतः ॥१॥
अथानन्तर-दूसरे दिन सवेरा होते ही जो प्रातःकालके समय करने योग्य समस्त क्रियाएं कर चुके हैं ऐसे चक्रवर्ती भरत ने चक्ररत्न के पीछे पीछे प्रस्थान किया ।।१।।
“Then, on the next day, as soon as morning arrived, Emperor Bharata—having performed all the actions appropriate to the early morning time—set out following the chariot-wheel gem (Chakra-ratna).” (1)
श्लोक ( Shlok ) 2
अलङ्घ्यं चक्रमाक्रान्तपरचक्र पराक्रमम् । दण्डश्च दण्डितारातिर्द्वयमस्य पुरोऽभवत् ॥२॥
शत्रु-समूह के पराक्रम को नष्ट करने वाला तथा स्वयं दूसरों के द्वारा उल्लंघन न करने योग्य चक्ररत्न और शत्रुओंको दण्डित करनेवाला दण्डरत्न, ये दोनों ही रत्न चक्रवर्ती की सेना के आगे आगे रहते थे ॥२॥
“The Chakra-ratna, which destroys the valor of enemy hosts and is itself inviolable by others, and the Danda-ratna, which punishes enemies—these two Ratnas moved ahead of the Emperor’s army.” (2)
श्लोक ( Shlok ) 3
रक्ष्यं देवसहस्त्रेण चक्रं दण्डश्च तादृशः । जयाङ्गमिदमेवास्य द्वयं शेषः परिच्छदः ॥३॥
चक्ररत्न एक हजार देवोंके द्वारा रक्षित था और दण्डरत्न भी इतने ही देवोंके द्वारा रक्षित था । वास्तव में चक्रवर्ती की विजय के कारण ये दो ही थे, शेष सामग्री तो केवल शोभा के लिये थी ।।३।।
“The Chakra-ratna was protected by a thousand deities, and the Danda-ratna was guarded by an equal number of deities as well. In truth, these two alone were the cause of the Emperor’s victory; all other elements were merely for display.” (3)
श्लोक ( Shlok ) 4
विजयार्ध” प्रति स्पर्धिवर्प्माणं यागहस्तिनम् । प्रतस्थे प्रभुरारुह्य नाम्ना विजयपर्वतम् ॥४॥
अबकी बार चक्रवर्ती ने, जिसका शरीर विजयार्ध पर्वतके साथ स्पर्धा कर रहा है ऐसे विजयपर्वत नाम के पूज्य हाथीपर सवार होकर प्रस्थान किया था ।।४।।
“This time, the Emperor set out mounted on the revered elephant named Vijayaparvata—whose body seemed to rival the mighty Vijayārddha mountain itself.” (4)
श्लोक ( Shlok ) 5
प्राचीं दिशमथो जेतुमापयोधेस्तमुद्यतम् । नूनं स्तम्बेरमव्याजादूहे विजयपर्वतम् ॥५॥
उस समय ऐसा मालूम होता था मानो समुद्र पर्यन्त पूर्व दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए महाराज भरतको उस हाथी के छल से विजयार्ध पर्वत ही धारण कर रहा हो ।।५।।
“At that moment, it seemed as though the mighty Vijayārddha mountain itself, deceivingly disguised as the elephant, was bearing Emperor Bharata—who had set out to conquer the entire eastern direction up to the ocean.” (5)
श्लोक ( Shlok ) 6
सुरेभं शरदभ्राभमारूढो जयकुञ्जरम् । स रेजे दीप्तमुकुटः सुरेभं” सुरराडिव ॥६॥
जिस प्रकार देदीप्य-मान मुकुट को धारण करने वाला इन्द्र ऐरावत हाथी पर चढ़ा हुआ सुशोभित होता है उसी प्रकार देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाला भरत शरद् ऋतुके बादलोंके समान सफेद और देवों के द्वारा दिये हुए उस विजयपर्वत हाथीपर चढ़ा हुआ सुशोभित हो रहा था ।।६।।
“Just as Indra, adorned with a radiant crown, appears resplendent while mounted on Airavata, so too did Bharata—wearing a shining crown—appear splendid, mounted on that white Vijayaparvata elephant, white like the clouds of the autumn season and gifted by the gods.” (6)
श्लोक ( Shlok ) 7
सितातपत्रमस्योच्चैर्विधृतं श्रियमादधे । यशसां प्रसवागारमिव तद्व्याजजृम्भितम् ॥७॥
भरतेश्वर के ऊपर लगा हुआ सफेद छत्र ऐसी शोभा धारण कर रहा था मानो छत्र के बहाने से यशकी उत्पत्ति का स्थान हो हो ।।७।।
“The white parasol held above Lord Bharata shone with such splendor as though it were the very source of glory itself, taking form under the pretext of a parasol.” (7)
श्लोक ( Shlok ) 8
लक्ष्मीप्रहासविशदा चामराली समन्ततः । व्यधूयतास्य विध्वस्ततापा ज्योत्स्नेव शारवी ॥८॥
लक्ष्मी के हास्य के समान निर्मल और शरऋतु की चांदनी के समान संतापको नष्ट करनेवाली चमरों की पंक्ति महाराज भरत के चारों ओर ढुलाई जा रही थी ॥८॥
“A row of chowries, pure like the smile of Goddess Lakshmi and cooling like the moonlight of the autumn season, was being waved all around Emperor Bharata.” (8)
श्लोक ( Shlok ) 9
जयद्विरदमारूढो ज्वलज्जैत्रास्त्रभासुरः । जयलक्ष्मीकटाक्षाणामगमत् स शरव्यताम् ॥ ९॥
विजय नामके हाथी पर आरूढ़ हुए और विजय प्राप्त करानेवाले प्रकाशमान अस्त्रोंसे देदीप्यमान होने वाले भरतेश्वर जयलक्ष्मीके कटाक्षोंके लक्ष्य बन रहे थे। भावार्थ उनकी ओर विजय-लक्ष्मी देख रही थी ।।९।।
“Seated upon the elephant named Vijay and radiant with shining weapons that bring victory, Lord Bharata became the very target of the glances of Goddess Jayalakshmi.
In essence, the goddess of victory was gazing upon him.” (9)
श्लोक ( Shlok ) 10
महामुकुटबद्धानां सहस्त्राणि समन्ततः । तमनुप्रचलन्ति स्म सुराधिपमिवामराः ॥१०।।
जिस प्रकार देव लोग इन्द्रके पीछे पीछे चलते हैं उसी प्रकार हजारों मुकुटबद्ध वड़े बड़े राजा लोग चारों ओर भरत महाराज के पीछे पीछे चल रहे थे ॥१०॥
“Just as the gods follow Indra, in the same way, thousands of crowned and great kings were following Emperor Bharata on all sides.” (10)
श्लोक ( Shlok ) 11
दूरमद्य प्रयातव्यं निवेष्टव्यमुपार्णवम्’ । त्वरध्वमिति सेनान्यः सैनिकानुदतिष्ठयन् ॥११॥
‘आज बहुत दूर जाना है और समुद्र के समीप ही ठहरना है इसलिये जल्दी करो’ इस प्रकार सेना-पति लोग सैनिकों को जल्दी जल्दी उठा रहे थे ।।११।।
“Today, we must travel a great distance and halt near the ocean; therefore, hurry!” In this way, the commanders were quickly rousing the soldiers.” (11)
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152