आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81
श्लोक 82 से 91 जयकुमार का राज्य और धर्म श्रवण
राजा सोमप्रभ, रानी लक्ष्मीवती, छोटा भाई श्रेयांस और पुत्र जयकुमार से सुशोभित राज्य पूजनीय था। सोमप्रभ ने संसार की अनित्यता समझकर जयकुमार को राज्य सौंपा और श्रेयांस के साथ भगवान वृषभदेव से दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। जयकुमार ने पिता के पद पर पृथ्वी का पालन किया और भाइयों के साथ भोगों का उपभोग किया। एक दिन उद्यान में मुनि शीलगुप्त के दर्शन कर धर्म सुना। वहाँ सर्प दंपति ने भी धर्म श्रवण किया, जिनमें सर्प वज्रपात से मरकर देव हुआ।
आदिपुराण पर्व 43 – श्लोक 82 से 91
श्लोक ( Shlok ) 82
राजा राजप्रभो लक्ष्मीमती देवी प्रियानुजः । श्रेयान् ज्यायान् जयः पुत्रस्तद्राज्यं पूज्यते न केः ॥८२॥
जिस राज्यका राजा सोमप्रभथा, लक्ष्मीमती रानी थी, प्रिय छोटा भाई श्रेयांस था और बड़ा राजपुत्र जयकुमार था भला वह राज्य किसके द्वारा पूज्य नहीं होता ? ॥८२॥
In that kingdom where Somaprabha reigned as king, Lakṣmīvatī graced the throne as queen, the noble Śreyāṁsa stood as the beloved younger brother, and the valiant Jayakumāra was crown prince—indeed, what soul would not revere such a realm?॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
स पुत्रविटपाटोपः सोमकल्पाङघ्रिपश्चिरम् । भोग्यः सम्भृतपुण्यानां स्वस्य चाभूत्तदद्भुतम् ॥ ८३॥
जिसपर पुत्ररूपी शाखाओंका विस्तार है ऐसा वह राजा सोमप्रभरूपी कल्पवृक्ष, पुण्य संचय करनेवाले अन्य पुरुषोंको तथा स्वयं अपने आपको भोग्य था यह आश्चर्यको बात है। भावार्थ पुत्रों द्वारा वह स्वयं सुखी था तथा अन्य सब लोग भी उनसे सुख पाते थे ॥८३॥
That king, Somaprabha—like a celestial wish-fulfilling tree, whose boughs extended as noble sons—was a source of joy not only to others who sought the fruits of virtue, but even unto himself. Wondrous indeed! For through his sons, he himself rejoiced, even as others found delight in them.॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84 – 86
अथान्यदा जगत्कामभोगबन्धून् विधुप्रभः । अनित्याशुचिदुःखान्यान्मत्वा याथात्म्यवीक्षणः ॥८४॥विरज्य राज्यं संयोज्य “धुर्ये शौर्योर्जिते जये। ‘अजयौंदार्यवी” र्यादिप्राज्यराज्यसमुत्सुकः ॥८५।। अभ्येत्य वृषभाभ्याशं दीक्षित्वा मोक्षमन्वभूत् । श्रेयसा सह नार्पत्यमनुजेन यथा पुरा ॥ ८६॥
अथानन्तर किसी समय, पदार्थोंके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले राजा सोमप्रभ संसार, शरीर, भोग और भाइयोंको क्रमशः अनित्य, अपवित्र, दुःखस्वरूप और अपनेसे भिन्न मानकर विरक्त हुए तथा कभी नष्ट न होनेवाले अनन्त वीर्य आदि गुणोंसे श्रेष्ठ मोक्षरूपी राज्यके पाने में उत्सुक हो, शूरवीर तथा धुरंधर जयकुमारको राज्य सौंपकर भगवान् वृषभदेव के समीप गये और वहाँ अपने छोटे भाई श्रेयांसके साथ दीक्षा लेकर मोक्षसुखका अनुभव करने लगे । जिस प्रकार वे पहिले यहाँ अपने छोटे भाईके साथ राज्यसुखका उपभोग करते थे उसी प्रकार मोक्षमें भी अपने छोटे भाईके साथ वहाँका सुख उपभोग करने लगे। भावार्थ-दोनों भाई मोक्षको प्राप्त हुए ॥८४-८६।।
Thereafter, at a certain time, King Somaprabha—knower of the true nature of all substances—became disenchanted, recognizing the world to be transient, the body impure, pleasures to be fraught with sorrow, and kinsmen as other than the Self. Desiring to attain the sovereign state of liberation, exalted by the imperishable virtues of infinite energy and bliss, he renounced all.
Entrusting his mighty and valiant son, Jayakumāra, with the kingdom, he went to the revered Lord Ṛṣabhadeva and, accompanied by his younger brother Śreyāṁsa, accepted initiation. There, both began to experience the supreme joy of liberation.
Even as they once shared the pleasures of royal sovereignty together, so too did the two brothers now partake in the eternal bliss of emancipation—together united, in the realm beyond all decay.॥84–86॥
श्लोक ( Shlok ) 87
पितुः पदमधिष्ठाय जयोऽतापि महीं महान् । महतोऽनुभवत् भोगान् संविभज्यानुजैः समम् ॥८७॥
इधर श्रेष्ठ जयकुमार पिताके पदपर आसीन होकर पृथिवी का पालन करने लगा। और अपने बड़े भारी भोगोपभोगोंको बाँटकर छोटे भाइयोंके साथ साथ उनका अनुभव करने लगा ।॥८७॥
Meanwhile, the noble Jayakumāra, ascending the throne of his father, began to rule the earth with righteousness. Partaking of grand and abundant enjoyments, he shared them graciously with his younger brothers, allowing them, too, to delight in their pleasures.॥87॥
श्लोक ( Shlok ) 88 – 89
एकदाऽयं विहारार्थ बाह्योद्यानमुपागतः । तत्रासीनं समालोक्य शीलगुप्तं महामुनिम् ॥८८॥त्रिःपरीत्य नमस्कृत्य नुत्वा भक्तिभरान्वितः । श्रुत्वा धर्म तमापृच्छ्य प्रीत्या प्रत्यविशत् पुरीम् ॥८९॥
एक दिन वह जयकुमार क्रीड़ा करनेके लिये नगरके बाहर किसी उद्यानमें गया उसने वहाँ विराजमान शीलगुप्त नामके महामुनिके दर्शन कर उनकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, बड़ी भारी भक्तिके साथ साथ नमस्कार किया, स्तुति की, प्रीतिपूर्वक धर्म सुना और फिर उनसे आज्ञा लेकर नगरको वापिस लौटा ॥८८-८९॥
One day, Jayakumāra went forth from the city to a pleasure-garden for sport. There he beheld the venerable great sage named Śīlagupta, seated in serene splendor. With deep reverence, he circumambulated him thrice, offered salutations with utmost devotion, praised him in earnest, and lovingly listened to his discourse on Dharma. Thereafter, having taken the sage’s leave, he returned to the city.॥88–89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
तस्मिन् वने वसन्नागमियुनं सह भूभुजा । श्रुत्वा धर्म सुधां मत्वा पयौ प्रीत्या दयारसम् ॥९०॥
उसी वनमें साँपों का एक जोड़ा रहता था उसने भी राजाके साथ साथ धर्म श्रवणकर उसे अमृत मान बड़े प्रेमसे दयारूपी रसका पान किया था ॥९०॥
In that very forest dwelled a pair of serpents, who, along with the king, listened to the sacred discourse. Taking it to be divine nectar, they too drank deeply of the elixir of compassion, with great love and devotion.॥90॥
श्लोक ( Shlok ) 91
कदाचित् प्रावृडारम्भे प्रचण्डाशनिताडितः । मृत्वाऽसौ शान्तिमादाय नागो नागाऽमरोऽभवत् ॥९१॥
किसी समय वर्षाऋतुके प्रारम्भमें प्रचण्ड वज्रके पड़ने से उस जोड़ेमें का वह सर्प शान्तिधारण कर मरा जिससे नागकुमार जातिका देव हुआ ॥९१॥
Once, at the onset of the rainy season, a fierce thunderbolt struck, and the male serpent of that pair, bearing it with composure, met his end. Through the merit of his peaceful forbearance, he was reborn as a celestial being in the Nāgakumāra class.॥91॥
श्लोक 92 से 102
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
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आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81
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