आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61
वन का संगीतमय वातावरण
भौंरे किन्नरियों के गीतों, कोयल सिद्धों की वीणा, और हंस विद्याधरियों के नूपुरों का अनुकरण करते हैं। मयूर नृत्य करते हैं, और हंसों के शब्द सुबह सोए हुए पक्षियों को जगाते हैं। लतागृह चंद्रकांत शिलाओं और फूलों की शय्याओं से देवों के नंदन वन समान प्रीतिकर हैं। वन के बाहर दुर्गम जंगल है, जहां सेना के क्षोभ से मृग भयभीत होकर भागते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
कूजन्ति कोकिला मत्ताः केकायन्ते कलापिनः । उभयस्यास्य वर्गस्य हंसाः प्रत्यालपन्त्यमी ॥५२॥
इधर उन्मत्त कोकिलाएं कुह कुह कर रही हैं, मयूर केका वाणी कर रहे हैं और ये हंस इन दोनों के शब्दोंकी प्रतिध्वनि कर रहे हैं ।।५२।।
“Here, the intoxicated cuckoos are cooing sweetly, the peacocks are calling out with their cries, and these swans are echoing the sounds of both.”|| 52 ||
श्लोक ( Shlok ) 53
इतोऽमी किन्नरीगीतमनुकूजन्ति षट्पदाः । सिद्धोपवोणितान्येषुनिह्नुतेऽन्य भृतस्वनः ॥५३॥
इधर ये भ्रमर किन्नरियोंके द्वारा गाये हुए गीतोंका अनुकरण कर रहे हैं और इधर यह कोयल सिद्धोंके द्वारा बजाई हुई वीणाके शब्दोंको छिपा रहा है ।।५३।।
“Here, the bees are imitating the songs sung by the celestial maidens, and there, the cuckoo is overshadowing the sound of the veena played by the Siddhas.”|| 53 ||
श्लोक ( Shlok ) 54
जितनूपुरझङ्कारमितो हंसविकूजितम् । इतश्च खेचरीनृत्यम नुनृत्यच्छिखाबलम् ॥५४।।
इधर नूपूरोंकी झंकार को जीतता हुआ हंसों का शब्द हो रहा है, और इधर जिसका अनुकरण कर मयूर नाच रहे हैं ऐसा विद्याधरियों का नृत्य हो रहा है ।।५४।।
“Here, the sound of the swans is surpassing the jingling of the anklets, and there, the dance of the celestial damsels (Vidyādharīs) is such that the peacocks are imitating it as they dance.”|| 54 ||
श्लोक ( Shlok ) 55
इतश्च सेकतोत्सङ्गे सुप्तान् हंसान् सशावकान् । प्रातः प्रबोधयत्युद्यन् खेचरीनपुरारवः ।।५५।।
इधर बालूके टीलोंकी गोदमें अपने बच्चों सहित सोये हुए हंसोंको प्रातः कालके समय यह विद्याधरियों के नूपुरों का ऊंचा शब्द जगा रहा है ।।५५।।
Here, the swans, sleeping with their young ones in the lap of the sandy mounds, are being awakened in the morning by the loud sound of the anklets of the celestial maidens (Vidyādharīs).|| 55 ||
श्लोक ( Shlok ) 56
इतश्च रचितानल्पपुष्पतल्पमनोहराः । चन्द्रकान्तशिलागर्भा सुरैर्भोग्या लतालयाः ।।५६॥
इधर जो बहुतसे फूलोंसे बनाई हुई शय्याओंसे मनोहर जान पड़ते हैं, जिनके मध्यमें चन्द्रकान्त मणिकी शिलाएं पड़ी हुई हैं और जो देवोंके उपभोग करने योग्य हैं ऐसे लतागृह बने हुए हैं ।। ५६।।
“Here, there are delightful beds made of many flowers, among which lie moonstone-like gems, and these are the groves suitable for the enjoyment of the gods.”|| 56 ||
श्लोक ( Shlok ) 57
इतीदं वनमत्यन्तरमणीयः परिच्छदैः । स्वर्णोद्यानगतां प्रीतिं जनयेत् स्वःसदां सदा ॥५७॥
इस प्रकार यह वन अत्यन्त रमणीय सामग्री से देवोंके सदा नन्दन वनकी प्रीति को उत्पन्न करता रहता है ।॥५७।।
“Thus, this forest continuously creates the affection of the gods for the ever-blissful Nandan forest with its exceedingly delightful elements.”|| 57 ||
श्लोक ( Shlok ) 58
बहिस्तटवनादेतद्दृश्यते काननं महत् । नानाद्रुमलतागुल्मवीरुद्भिरतिदुर्गमम् ॥५८॥
इधर किनारे के वन के बाहर भी एक बड़ा भारी वन दिखाई दे रहा है जो कि अनेक प्रकारके वृक्षों, लताओं, छोटे छोटे पौधों और झाड़ियोंसे अत्यन्त दुर्गम है ।।५८।।
“Here, beyond the edge of the forest, a large and dense forest is visible, which is exceedingly difficult to traverse due to the numerous trees, vines, small plants, and shrubs.”|| 58 ||
श्लोक ( Shlok ) 59
दृष्टीनामप्यगम्ये ऽस्मिन् वने मृगकदम्बकम् । नानाजातीयमुद् भ्रान्तं सैन्यक्षोभात् प्रधावति ॥५९॥
जिसमें दृष्टि भी नहीं जा सकती ऐसे इस वनमें सेनाके क्षोभसे घबड़ाया हुआ यह अनेक जाति के मृगों का समूह बड़े जोरसे दौड़ा जा रहा है ।॥५९॥
“In this forest, where vision cannot even reach, a large group of deer, frightened by the commotion of the army, is running swiftly in panic.”|| 59 ||
श्लोक ( Shlok ) 60
इदमस्मद्बल क्षोभादुत्त्रस्तमृगसङ्कुलम् । वनमाकुलितप्राणमिवाभात्यन्धकारितम् ॥६०॥
जो हमारी सेनाके क्षोभसे भयभीत हुए हरिणों से व्याप्त है तथा जिसमें जीवोंके प्राण आकुल हो रहे हैं ऐसा यह वन अन्धकार से व्याप्त हुए के समान जान पड़ता है ।। ६० ।।
“This forest, filled with deer frightened by the commotion of our army, and in which the lives of the creatures are in turmoil, seems to be engulfed in darkness.”|| 60 ||
श्लोक ( Shlok ) 61
गजयूथमितः कच्छादन्धकारमिवाभितः । विश्लिष्टं बलसंक्षोभादपसर्पत्यतिद्रुतम् ॥६१।।
इधर सेनाके क्षोभसे अलग अलग हुआ यह हाथियों का झुण्ड गङ्गा किनारेके जलवाले प्रदेशसे अन्धकार के समान चारों ओर बड़े वेगसे भागा जा रहा है ॥६१।।
“Here, this herd of elephants, scattered due to the commotion of the army, is running rapidly in all directions, like darkness, from the water-rich region along the banks of the Ganges.”
|| 61 ||
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51