आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171
श्लोक 172 से 181 कृषि और धन संग्रह
जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों को उपयुक्त स्थान पर चराता और दूध प्राप्त करता है, वैसे ही राजा को ग्रामों में खेती करवानी चाहिए। देश में भली-भांति खेती करवाकर न्यायपूर्ण धान्य संग्रह करना चाहिए, जिससे भंडार समृद्ध, बल बढ़े, और देश पुष्ट हो। प्रजा को दुख देने वाले अक्षरम्लेच्छों को कुलशुद्धि द्वारा आधीन करना चाहिए। सत्कार से वे उपद्रव नहीं करते, अन्यथा उपद्रव करते रहते हैं। सामान्य प्रजा की तरह उनसे कर लेना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
क्रीतांश्च वृत्तिमूल्येन तान् यथावसरं प्रभुः । कृत्येषु विनियुञ्जीत भृत्यैः साध्यं फलं हि तत् ॥१७२॥
और आजीविकाके मूल्यसे खरीदे हुए उन सेवकोंको समयानुसार योग्य कार्य में लगा देना चाहिये क्योंकि वह कार्यरूपी फल सेवकोंके द्वारा ही सिद्ध किया जा सकता है ॥ १७२।।
And those servants who have been acquired through rightful sustenance must be employed in appropriate duties at the proper time,for the fruits of royal endeavors can be attained only through the dedicated labor of loyal attendants.172
श्लोक ( Shlok ) 173
“यद्वच्च प्रतिभूः कश्चिद् यो क्रये प्रतिगृह्यते । बलवान् प्रतिभूस्तद्व द् ग्राह्यो भुत्योपसङ्ग्रहे ॥१७३॥
जिस प्रकार पशुओं के खरीदने में किसीको जामिनदार बनाया जाता है उसी प्रकार सेवकोंका संग्रह करनेमें भी किसी बलवान् पुरुषको जामिनदार बनाना चाहिये ।। १७३।।
Just as a guarantor is appointed in the purchase of cattle,so too, in the enlistment of servants, the king should appoint a strong and trustworthy man as surety.173
श्लोक ( Shlok ) 174 – 176
याममात्रावशिष्टायां रात्रावुत्थाय यत्नतः । “चारयित्वोचिते देशे गाः प्रभूततृणोदके ॥१७४।॥प्रातस्तरामथानीय वत्सपीतावशिष्टकम् । पयो दोग्धि यथा गोपो नवनीतादिलिप्सया ॥१७५॥तथा भूपोऽप्यतन्द्रालुर्भक्तग्रामेषु’ कारयेत् । कृषि कर्मान्तिकैर्बीजप्रदानाद्यैरुपक्रमैः ॥ १७६॥
जिस प्रकार ग्वाला रात्रिके प्रहरमात्र शेष रहनेपर उठकर जहां बहुतसा घास और पानी होता है ऐसे किसी योग्य स्थानमें गायोंको बड़े प्रयत्नसे चराता है तथा बड़े सबेरे ही वापिस लाकर बछड़ेके पीनेसे बाकी बचे हुए दूधको मक्खन आदि प्राप्त करनेकी इच्छासे दुह लेता है उसी प्रकार राजाको भी आलस्य-रहित होकर अपने आधीन ग्रामोंमें बीज देना आदि साधनों द्वारा किसानोंसे खेती कराना चाहिये ।।१७४-१७६।।
Just as the cowherd, with but a watch of the night remaining, rises without sloth and diligently leads his cattle to a place abundant in grass and water,and at dawn, returning early, milks the cows—leaving the calves their share, but drawing the rest with the desire for butter and ghee—in like manner should the king, free from indolence, cause cultivation to be carried out in his villages through the provision of seed and other means, engaging the farmers in fruitful labor. 174 – 176
श्लोक ( Shlok ) 177
देशेऽपि कारयेत् कृत्स्ने कृषि सम्यक्कृषीबलैः । धान्यानां सङ्ग्रहार्थ च न्याय्यमंशं ततो हरेत् ॥१७७॥
राजाको चाहिये कि वह अपने समस्त देशमें किसानों द्वारा भली भांति खेती करावे और धान्यका संग्रह करनेके लिये उनसे न्यायपूर्ण उचित अंश लेवे ।। १७७।।
The king should see to it that, throughout his entire dominion, the cultivators engage earnestly in the work of agriculture; and for the purpose of gathering the produce, he ought to receive from them a rightful and equitable share. 177
श्लोक ( Shlok ) 178
संत्येवं पुष्टतन्त्रः स्याद् भाण्डागारदिसम्पदा । पुष्टो देशश्च तस्यैवं स्याद् धान्यैराशितम्भवैः ॥१७८॥
ऐसा होनेसे उसके भांडार आदिमें बहुत सी सम्पत्ति इकट्ठी हो जावेगी और उससे उसका बल बढ़ जावेगा तथा संतुष्ट करनेवाले उन धान्योंसे उसका देश भी पुष्ट अथवा समृद्धिशाली हो जावेगा ।।१७८।।
By such means, his granaries and treasuries shall be filled with abundant wealth,his strength shall greatly increase, and through those nourishing and satisfying grains, his realm shall flourish and abound in prosperity. 178
श्लोक ( Shlok ) 179
स्वदेशे वाक्षरम्लेच्छान् प्रजाबाधाविधायिनः । कुलशुद्धिप्रदानाद्यैः स्वसात्कुर्यादुपक्रमै ॥१७९॥
अपने आश्रित स्थानोंमें प्रजाको दुःख देनेवाले जो अक्षरम्लेच्छ अर्थात् वेद से आजीविका करनेवाले हों उन्हें कुलशुद्धि प्रदान करना आदि उपायोंसे अपने आधीन करना चाहिये ।।१७९॥
Those ignoble men—living by the Vedas yet causing affliction to the people in their dependent regions—should be brought under control by the king through measures such as refinement of conduct and purification of lineage.179
श्लोक ( Shlok ) 180
विक्रियां न भजन्त्येते प्रभुणा कृतसत्क्रियाः । प्रभोरलब्धसम्माना विक्रियन्ते हि तेऽन्वहम् ॥१८०॥
अपने राजासे सत्कार पाकर वे अक्षरम्लेच्छ फिर उपद्रव नहीं करेंगे। यदि राजाओंसे उन्हें सन्मान प्राप्त नहीं होगा तो वे प्रतिदिन कुछ न कुछ उपद्रव करते ही रहेंगे ॥१८०॥
Once they receive honor and due regard from their sovereign, those ignoble scripturalists shall no longer provoke disturbances;but if denied the king’s esteem, they shall persist daily in causing turmoil and disorder. 180
श्लोक ( Shlok ) 181
ये केचिच्चाक्षरम्लेच्छाः स्वदेशे प्रचरिष्णवः । तेऽपि कर्षकसामान्यं कर्तव्याः करदा नृपैः ॥१८१॥
और जो कितने ही अक्षरम्लेच्छ अपने ही देशमें संचार करते हों उनसे भी राजाओं को सामान्य किसानोंकी तरह कर अवश्य लेना चाहिये ।।१८१॥
And even those numerous ignoble scripturalists who freely move about within the realm—from them too, the king must assuredly levy taxes, just as he does from ordinary cultivators.181
श्लोक 182 से 192
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171
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