भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 9 में वज्रजंघ के भोग, मृत्यु, और उत्तरकुरु जीवन , सम्यग्दर्शन, गुरु महिमा, और स्वर्गीय जीवन शामिल हैं।
This section narrates Vajrajangha and Shrimati’s life of indulgence across seasons, their sudden death due to incense smoke, their rebirth in Uttarakuru, the fate of their associates, and Vajrajangha’s encounter with munis in his new life, Vajrajangha’s dialogue with the munis, their revelation of past lives, the exposition on samyagdarshan (right faith), its acceptance by Vajrajangha and Shrimati, their reflections, and their subsequent rebirth in heaven.
श्लोक 12 से 20 वर्षा और भोग का वर्णन
ग्रीष्म में श्रीमती को शिरीष फूलों से सजाया। वर्षा में बिजली से भयभीत श्रीमती ने आलिंगन किया। मेघ, वीरबहूटी, और मयूरों ने मन मोहा। कदंब सुगंध और महल में रमण किया। नदियों के पूर से संतोष मिला।
श्लोक 21 से 31 शयनागार और मृत्यु
वज्रजंघ सुगंधित, रत्नमय शयनागार में श्रीमती के साथ शयन करता था। धूप से सुगंध बढ़ी, पर झरोखा बंद रहने से दोनों मूर्च्छित हो मृत्यु को प्राप्त हुए। शरीर निष्प्रभ हो गए। भोग ही मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 32 से 41 उत्तरकुरु और कल्पवृक्ष
पात्रदान के पुण्य से दोनों उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे। वहाँ दस कल्पवृक्ष (मद्यांग, वादित्रांग आदि) हैं, जो मधु, वाद्य, आभूषण आदि देते हैं। मद्य रस है, नशा नहीं करता।
श्लोक 42 से 51 कल्पवृक्षों का विस्तार
मालांग से मालाएँ, दीपांग से दीपक, गृहांग से भवन, भोजनांग से चार आहार और छह रस, भाजनांग से बर्तन, वस्त्रांग से वस्त्र मिलते हैं। ये वृक्ष अनादि, स्वाभाविक फलदायी हैं।
श्लोक 52 से 61 उत्तरकुरु की शोभा
उत्तरकुरु में रत्नमयी भूमि, चार अंगुल घास, कमल तालाब, कोमल वायु, और पुष्पपराग से शोभा है। न गरमी, न वर्षा, न दुष्ट जंतु हैं। सुख सदा एकरूप रहता है।
श्लोक 62 से 71 जीवन चक्र
वहाँ आर्य जन्म लेते हैं। सात दिन शय्या पर, फिर घुटनों पर चलते, तीसरे सप्ताह बोलते, सातवें में भोग भोगते हैं। गर्भ सुखद, माता-पिता की मृत्यु जन्म के साथ होती। छींक-जँभाई से मृत्यु होती है।
श्लोक 72 से 81 सुख और समानता
आयु तीन पल्य, आहार तीन दिन में। न रोग, न शोक, न कामज्वर। सभी समान सुखी, वज्रवृषभनाराच संहनन वाले, दीर्घायु, और कांतिमान हैं।
श्लोक 82 से 91 भोगभूमि और अन्य जीव
कलाओं में कुशल, मधुर कंठ वाले जीव क्रीड़ा करते हैं। पात्रदान से मनुष्य, अपात्र दान से तिर्यंच जन्म लेते। नकुल आदि वहाँ आर्य बने। मतिवर आदि ने दीक्षा ली।
श्लोक 92 से 101 जातिस्मरण और मुनि दर्शन
मतिवर आदि स्वर्ग गए। वज्रजंघ ने कल्पवृक्ष देखते हुए सूर्यप्रभ विमान देखा, जातिस्मरण पाया। चारण मुनियों को देख प्रणाम किया, अश्रुओं से चरण धोए, प्रश्न पूछने लगा
श्लोक 102 से 111 वज्रजंघ का प्रश्न और मुनि का परिचय
वज्रजंघ ने मुनियों से उनका परिचय, आगमन का कारण पूछा, उन्हें मित्र-बंधु माना। ज्येष्ठ मुनि प्रीतिंकर ने बताया कि वह स्वयंबुद्ध मंत्री था, जिसने महाबल भव में वज्रजंघ को ज्ञान दिया। स्वयं दीक्षा ली, स्वर्ग में मणिचूल बना, फिर पुंडरीकिणी में प्रीतिंकर हुआ। छोटा भाई प्रीतिदेव संग दीक्षा ली, चारण ऋद्धि पाई। वज्रजंघ को समझाने आए।
श्लोक 112 से 121 सम्यग्दर्शन का उपदेश
मुनि ने कहा कि वज्रजंघ पात्रदान से यहाँ जन्मा, पर सम्यग्दर्शन नहीं पाया। अब उसे देने आए हैं। समय उपयुक्त है। मिथ्यात्व दूर कर सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। यह ज्ञान-चारित्र का मूल है।
श्लोक 122 से 132 सम्यग्दर्शन के गुण और अंग
सम्यग्दर्शन सात तत्त्वों में श्रद्धा है। इसके चार गुण (प्रशम आदि) और आठ अंग (निःशंकित आदि) हैं। यह संसार का सर्वस्व, मोक्ष की सीढ़ी, और दुर्गति रोकने वाला है।
श्लोक 133 से 141 सम्यग्दर्शन की महिमा
यह रत्नहार समान है, संसार को सांत करता है। इसे ग्रहण करने वाला उत्तम जन्म पाता, नरक-तिर्यंच से मुक्त होता। यह मोक्ष का प्रधान अंग है। वज्रजंघ को इसे स्वीकारने का उपदेश दिया।
श्लोक 142 से 151 श्रीमती को उपदेश और स्वीकृति
मुनि ने श्रीमती को सम्यग्दर्शन ग्रहण करने, स्त्री पर्याय छोड़ने को कहा। वज्रजंघ और श्रीमती ने इसे स्वीकारा, संतुष्ट हुए। सम्यग्दर्शन मोक्ष का युवराज पद देता है।
श्लोक 152 से 161 अन्य जीव और मुनियों का प्रस्थान
सिंह आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन पाया। मुनियों ने स्पर्श कर आशीर्वाद दिया। वज्रजंघ ने प्रणाम कर विदा की। मुनि गगनगामी हो गए। वज्रजंघ उत्कंठित हुआ, मुनियों के गुणों का चिंतन किया।
श्लोक 162 से 171 साधुओं की महिमा
वज्रजंघ ने सोचा कि साधु समागम पाप नष्ट करता, कल्याण बढ़ाता है। वे परोपकारी, निःस्वार्थ, और यति हैं। प्रीतिंकर ने अपार प्रीति दिखाई।
श्लोक 172 से 181 गुरु की महत्ता
प्रीतिंकर महाबल में स्वयंबुद्ध, अब गुरु बने। गुरु बिना गुण नहीं, संसार नहीं तिरता। वज्रजंघ की सम्यक्त्व भावना दृढ़ हुई। श्रीमती की भी। तीन पल्य काल बीता।
श्लोक 182 से 191 स्वर्ग में जन्म
दोनों ऐशान स्वर्ग गए। वज्रजंघ श्रीधर, श्रीमती स्वयंप्रभ बने। सिंह चित्रांगद, शूकर मणिकुंडली, वानर मनोहर, नकुल मनोरथ बने। पुण्य से स्वर्ग मिला।
श्लोक 192 से 195 स्वर्गीय भोग
छहों जीव ललितांगदेव समान भोग भोगते हैं। श्रीधर को देवांगनाएँ चरण दबातीं, कटाक्ष बाण चलातीं। वह संतुष्ट रहता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 1 to 11
ऋतुओं में भोग
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ छह ऋतुओं में भोग भोगा। शरद में तालाबों और वनों में क्रीड़ा की, हेमंत में धूप-सुगंधित शयनागार में सुख पाया, शिशिर में आलिंगन से प्रसन्न रहा, वसंत में आम्रवनों में रमण किया, ग्रीष्म में जलक्रीड़ा और चंदन से शीतलता पाई।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ त्रिवर्गसंसर्गरम्यं राज्यं प्रकुर्वतः । तस्य कालोऽगमद् भूयान् मोगैः षडऋतुसुन्दरैः ॥१॥
तदनंतर धर्म, अर्थ और काम इन तीन वर्गों के संसर्ग से मनोहर राज्य करने वाले महाराज वज्रजंघ का छहों ऋतुओं के सुंदर भोग भोगते हुए बहुत-सा समय व्यतीत हो गया ।।1।।
Thereafter, King Vajrajangha, who ruled charmingly with the combination of Dharma (righteousness), Artha (wealth), and Kama (desires), spent a long time enjoying the delightful pleasures of all six seasons.
श्लोक ( Shlok ) 2
स रेमे शरदारम्भे प्रफुल्लाब्जसरोजले । वनेष्वयुक्छंदामोदसुभगेषु प्रियान्वितः ॥२॥
अपनी प्रिया श्रीमती के साथ वह राजा शरद्ऋतु के प्रारंभ काल में फूले हुए कमलों से सुशोभित तालाबों के जल में और सप्तपर्ण जाति के वृक्षों की सुगंधि से मनोहर वनों में क्रीड़ा करता था ।।2।।
The king, along with his beloved queen Shrimati, enjoyed playful activities during the early period of the Sharad (autumn) season in ponds adorned with blooming lotuses and in enchanting forests filled with the fragrance of Saptaparna trees.
श्लोक ( Shlok ) 3
सरित्पुलिनदेशेषु प्रियाजघनहारिषु । राजहंसो धृतिं लेभे सध्रीचीमनुयन्नम् ॥३॥
कभी वह श्रेष्ठ राजा, राजहंस पक्षी के समान अपनी सहचरी के पीछे-पीछे चलता हुआ प्रिया के नितंब के समान मनोहर नदियों के तट प्रदेशों पर संतुष्ट होता था ।।3।।
At times, the noble king, like a royal swan following his companion, found delight on the enchanting riverbanks, as captivating as his beloved’s graceful hips.
श्लोक ( Shlok ) 4
कुर्वन्नीलोत्पलं कर्णे स कान्ताया वतंसकम् । शोभामिव दृसोरस्याः तेनाभूत् सन्नि कर्षयन् ॥४॥
कभी श्रीमती के कानों में नीलकमल का आभूषण पहनाता था । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो उस नीलकमल के आभूषणों के छल से उसके नेत्रों की शोभा ही बढ़ा रहा हो ।।4।।
Sometimes, he adorned Shrimati’s ears with blue lotus ornaments. At that moment, it seemed as though the charm of her eyes was being enhanced by the captivating beauty of those lotus ornaments.
श्लोक ( Shlok ) 5
सरसाब्जरजःपुञ्जपिञ्जरं स्तनमण्डलम् । स पश्यन् बहुमेनेऽस्याः कामस्येव करण्डकम् ॥५॥
श्रीमती का स्तन मंडल तालाबों की पराग के समूह से पीला पड़ गया था इसलिए कामदेव के पिटारे के समान जान पड़ता था । राजा वज्रजंघ उस स्तन-मंडल को देखता हुआ बहुत ही हर्षित होता था ।।5।।
Shrimati’s bosom had turned golden-yellow from the pollen of the lotus ponds, making it appear like the treasure chest of Kamadeva (the god of love). King Vajrajangha, gazing at her bosom, felt immense joy.
श्लोक ( Shlok ) 6
“वासगेहे समुत्सर्पद् धूपामोद सुगन्धिनि । प्रियास्तनोष्मणा भेजे हिमतौं स परां धृतिम् ॥६॥
हेमंत ऋतु में वह वज्रजंघ धूप की फैलती हुई सुगंधि से सुगंधित शयनागार में श्रीमती के स्तनों की उष्णता से परम धैर्य को प्राप्त होता था ।।6।।
During the Hemant season (early winter), Vajrajangha found supreme comfort in the warmth of Shrimati’s bosom while resting in a fragrant chamber filled with the spreading aroma of sunlight.
श्लोक ( Shlok ) 7
कुङ्कुमालिप्त सर्वाङ्गीमम्ला नमुखवारिजाम् । प्रियामरमयद् गाढमाश्लिष्यन् ” शिशिरागमे ॥७॥
तथा शिशिर ऋतु का आगमन होने पर जिसका संपूर्ण शरीर केशर से लिप्त हो रहा है और जिसका मुख-कमल प्रसन्नता से खिल रहा है ऐसी प्रिया श्रीमती को गाड़ आलिंगन से प्रसन्न करता था ।।
With the arrival of the Shishir season (late winter), the king delighted in tightly embracing his beloved Shrimati, whose entire body was adorned with saffron and whose lotus-like face blossomed with joy.
श्लोक ( Shlok ) 8
मधौ मधुमदामत्तकामिनीजनसुन्दरे । वनेषु सहकाराणां स रेमे रामया समम् ॥८॥
मधु के मद से उन्मत्त हुई स्त्रियों से हरे-भरे सुंदर वसंत में वज्रजंघ अपनी स्त्री के साथ-साथ आमों के वनों में क्रीड़ा करता था ।।8।।
In the lush and beautiful spring season, intoxicated by the sweetness of honey, Vajrajangha frolicked among mango groves with his wife, accompanied by other joyful women.
श्लोक ( Shlok ) 9
अशोककलिकां कर्णे न्यस्यन्नस्या मनोभवः । जनचेतोभिदो दध्यौ शोणिताक्ता
स तीरिकाः ॥९॥
कभी श्रीमती के कानों में अशोक वृक्ष की नयी कली पहनाता था । उस समय वह ऐसा सुशोभित होता था मानो मनुष्य के चित्त को भेदन करने वाले और खून से रंगे हुए अपने लाल-लाल बाण पहनाता हुआ कामदेव ही हो ।।9।।
Sometimes, he adorned Shrimati’s ears with fresh buds of the Ashoka tree. At that moment, he appeared as radiant as Kamadeva himself, as if wielding his crimson, blood-tipped arrows capable of piercing the hearts of mortals.
श्लोक ( Shlok ) 10
घर्मे घर्माम्बुविच्छेदिसरोऽनिलहृतक्लमः । जलकेलिविधौ कान्तां रमयन् विजहार सः ॥१०॥
ग्रीष्म ऋतु में पसीने को सुखाने वाली तालाबों के समीपवर्ती वायु से जिसकी सब थकावट दूर हो गयी है ऐसा वज्रजंघ जलक्रीड़ा कर श्रीमती को प्रसन्न करता हुआ विहार करता था ।।10।।
During the summer season, relieved of all fatigue by the pondside breeze that dried his sweat, Vajrajangha delighted Shrimati through playful water games as they wandered joyfully together.
श्लोक ( Shlok ) 11
चन्दनद्रवसिक्ताङ्गीं प्रियां हारविभूषणाम् । कण्ठे गृह्णन स धर्मोस्थं नाज्ञासीत् कमपि श्रमम् ॥११।।
चंदन के द्रव से जिसका सारा शरीर लिप्त हो रहा है और जो कंठ में हार पहने हुई है ऐसी श्रीमती को गले में लगाता हुआ वज्रजंघ गरमी से पैदा होने वाले किसी भी परिश्रम को नहीं जानता था ।।11।।
With his entire body anointed with sandalwood paste and embracing Shrimati, who wore a necklace around her neck, Vajrajangha remained untouched by any exertion caused by the summer heat.
श्लोक 12 से 20
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257