भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 वज्रजंघ का प्रश्न और मुनि का परिचय
वज्रजंघ ने मुनियों से उनका परिचय, आगमन का कारण पूछा, उन्हें मित्र-बंधु माना। ज्येष्ठ मुनि प्रीतिंकर ने बताया कि वह स्वयंबुद्ध मंत्री था, जिसने महाबल भव में वज्रजंघ को ज्ञान दिया। स्वयं दीक्षा ली, स्वर्ग में मणिचूल बना, फिर पुंडरीकिणी में प्रीतिंकर हुआ। छोटा भाई प्रीतिदेव संग दीक्षा ली, चारण ऋद्धि पाई। वज्रजंघ को समझाने आए।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
भगवन्तौ युवां क्वत्यौ कुतस्त्यौ किं नु कारणम् । युष्मदागमने ब्रूतमिदमेतत्तयाद्य मे ॥१०२॥
वह बोला―हे भगवत् आप कहाँ के रहने वाले हैं ? आप कहां से आये हैं और आपके आने का क्या कारण है यह सब आज मुझसे कहिए ।।102।।
He said, “O Revered Ones, where do you reside? From where have you come, and what is the purpose of your visit? Please kindly tell me all this today.”
श्लोक ( Shlok ) 103
युष्मत्संदर्शनाज्जातसौहार्द मम मानसम् । प्रसीदति किमु ज्ञात पूर पूर्वौ ज्ञाती युवां मम ॥१०३॥
हे प्रभो, आपके दर्शन से मेरे हृदय में मित्रता का भाव उमड़ रहा है, चित्त बहुत ही प्रसन्न हो रहा है और मुझे ऐसा मालूम होता है कि मानो आप मेरे परिचित बंधु हैं ।।103।।
“O Lords, seeing you fills my heart with a surge of friendship. My mind feels immensely joyful, and it seems as though you are my familiar and beloved kin.”
श्लोक ( Shlok ) 104
इति प्रश्नावसानेऽस्य मुनि र्ज्यायानभाषत । दशनांशुजलोत्पीडेः क्षालयन्निव तत्तनुम् ॥१०४॥
इस प्रकार वज्रजंघ का प्रश्न समाप्त होते ही ज्येष्ठ मुनि अपने दांतों की किरणोंरूपी जल के समूह से उसके शरीर का प्रक्षालन करते हुए नीचे लिखे अनुसार उत्तर देने लगे ।।104।।
As Vajrajangha concluded his questions, the senior monk, with the radiant beams from his teeth appearing like streams of water cleansing Vajrajangha’s body, began to respond as follows.
श्लोक ( Shlok ) 105
त्वं विद्धि मां स्वयंबुद्धं यतो ऽबुद्धाः प्रबुद्धधीः । महाबलभवे जैनं धर्म कर्मनिवर्ह णम् ॥१०५॥
हे आर्य, तू मुझे स्वयंबुद्ध मंत्री का जीव जान, जिससे कि तूने महाबल के भव में सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर कर्मों का क्षय करनेवाले जैनधर्म का ज्ञान प्राप्त किया था ।।105।।
“O Arya, know me as the soul of the enlightened minister, through whom you attained right knowledge and learned the Jain Dharma that destroys karmas during your existence as Mahabal.”
श्लोक ( Shlok ) 106 – 107
त्वद्वियोगादहं जातनिर्वेदो बोधमाश्रितः । दीक्षित्वाऽभूवमुत्सृष्टदेहः सौधर्मकल्पजः ॥१०६॥
स्वयंप्रभविमानेऽग्रे मणिचूलाह्वयः सुरः । साधिकाव्ध्युपमायुष्कः ततश्च्युत्वा भुवं श्रितः ॥१०७॥
उस भव में तेरे वियोग से सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर मैंने दीक्षा धारण की थी और आयु के अंत में संन्यासपूर्वक शरीर छोड़ सौधर्म स्वर्ग के स्वयंप्रभ विमान में मणिचूल नाम का देव हुआ था । वहाँ मेरी आयु एक सागर से कुछ अधिक थी । तत्पश्चात् वहाँ से च्युत होकर भूलोक में उत्पन्न हुआ हूँ ।।106-107।।
“In that existence, after being separated from you, I attained right knowledge and took initiation. At the end of my lifespan, I renounced the body with detachment and was reborn as the deity Manichul in the self-radiant chariot of Saudharma heaven, where my lifespan was slightly more than one Sagara. After completing that existence, I descended and was reborn on this earthly realm.”
श्लोक ( Shlok ) 108 – 109
जम्बूद्वीपस्य पूर्वस्मिन् विदेहे पौष्कलावते । नगर्या पुण्डरीकिण्यां प्रियसेनमहीभृतः ॥१०८॥
सुन्दर्याश्च सुतोऽभूवं ज्यायान् प्रीतिकराह्वयः । प्रीतिदेवः कनीयान् मे मुनिरेष महातपाः ॥१०९॥
जंबूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में स्थित पुष्कलावती देशसंबंधी पुंडरीकिणी नगरी में प्रियसेन राजा और उनकी महाराज्ञी सुंदरी देवी के प्रीतिंकर नाम का बड़ा पुत्र हुआ हूँ और यह महातपस्वी प्रीतिदेव मेरा छोटा भाई है ।।108-109।।
“In the Pundarikinī city of the Pushkalavati region, situated in the eastern Videha of Jambudvipa, I was born as the eldest son, Pritinkar, to King Priyasen and his queen Sundari Devi. This great ascetic, Pritidev, is my younger brother.”
श्लोक ( Shlok ) 110
स्वयंप्रभजिनोपान्ते दीक्षित्वा वामलप्स्वहि। सावधिज्ञानमाकाशचारणत्वं तपोबलात् ॥ ११०॥
हम दोनों भाइयों ने भी स्वयंप्रभ जिनेंद्र के समीप दीक्षा लेकर तपोबल से अवधिज्ञान तथा आकाशगामिनी चारण ऋद्धि प्राप्त की है ।।110।।
“Both my brother and I took initiation under the guidance of Jinendra Swamy Suvayambha and, through the power of penance, attained Avadhijnana (clairvoyance) and the Charana Riddhi (the ability to travel through the sky).”
श्लोक ( Shlok ) 111
बुद्ध्वाऽवधिमयं चक्षुर्व्यापार्या जर्यसंगतम् । “त्यामार्यमिह संभूतं प्रबोधयितुमागतौ ॥ १११
हे आर्य, हम दोनों ने अपने अवधिज्ञानरूपी नेत्र से जाना है कि आप यहाँ उत्पन्न हुए हैं । चूँकि आप हमारे परम मित्र थे इसलिए आपको समझाने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं ।।111।।
“O Arya, through the divine sight of our Avadhijnana, we learned of your birth here. Since you were our dearest friend, we have come here to guide and enlighten you.”
श्लोक 112 से 121
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101