आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 समवसरण का वर्णन
दिव्यध्वनि भगवान का गुण थी। समवसरण में भगवान सिंहासन पर थे। सभा पताकाओं, सरोवरों और परिखा से शोभती थी, जो इंद्रों को बुलाती-सी लगती थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
एकतयोऽपि यथा स्फटिकाश्मा यद्यदुपाहितमस्य विभासम् । स्वच्छतया स्वयमप्यनुधते विश्वबुधोऽपि तथा ध्वनिरुच्चैः ॥७२॥
अथवा जिस प्रकार स्फटिक मणि एक ही प्रकार का होता है तथापि उसके पास जो-जो रंगदार पदार्थ रख दिये जाते हैं वह अपनी स्वच्छता से अपने आप उन-उन पदार्थों के रंगों को धारण कर लेता है उसी प्रकार सर्वज्ञ भगवान् की उत्कृष्ट दिव्यध्वनि भी यद्यपि एक प्रकार की होती है तथापि श्रोताओं के भेद से वह अनेक रूप धारण कर लेती है ।।72।।
Or, just as a crystal gem remains the same yet reflects the colors of the objects placed near it due to its clarity, in the same way, the supreme divine voice of the omniscient Lord, though singular in nature, assumes various forms according to the differences among its listeners.
श्लोक ( Shlok ) 73
देवकृतो ध्वनिरि “त्यसदेतद् देवगुणस्य तथा विहतिः स्यात् । साक्षर एव च वर्णसमूहान्नैव विनार्थगतिर्जगति स्यात् ॥७३॥
कोई-कोई लोग ऐसा कहते हैं कि वह दिव्यध्वनि देवों के द्वारा की जाती है परंतु उनका वह कहना मिथ्या है क्योंकि वैसा मानने पर भगवान् के गुण का घात हो जायेगा अर्थात् वह भगवान् का गुण नहीं कहलायेगा, देवकृत होने से देवों का कहलायेगा । इसके सिवाय वह दिव्यध्वनि अक्षर रूप ही है क्योंकि अक्षरों के समूह के बिना लोक में अर्थ का परिज्ञान नहीं होता ।।73।।
Some people say that the divine voice is produced by the gods, but their claim is false. If that were the case, it would diminish the Lord’s glory, as it would no longer be considered His attribute but rather that of the gods. Moreover, this divine voice is indeed composed of letters, for in the world, meaning cannot be conveyed without a combination of letters.
श्लोक ( Shlok ) 74
इत्थंभूतां देवराड्विश्वभर्तुर्भक्त्या देवैः कारयामास भूतिम् । दिव्यास्थानी वराजोपसे व्या मध्यास्तैनां श्रीपतिर्विश्वदृश्वा ॥७४॥
इस प्रकार तीनों लोकों के स्वामी भगवान वृषभदेव की ऐसी विभूति इंद्र ने भक्तिपूर्वक देवों से करायी थी, और अनंतचतुष्टयरूप लक्ष्मी के अधिपति सर्वज्ञदेव इंद्रों के द्वारा सेवनीय उस समवसरण भूमि में विराजमान हुए थे ।।74।।
Thus, Lord Indra, with great devotion, had the divine splendor of Lord Rishabhadeva—the sovereign of the three worlds—manifested through the gods. The omniscient Lord, the master of the infinite fourfold virtues, resided in the Samavasarana, revered and served by the Indras.
श्लोक ( Shlok ) 75
देवः साक्षात्सकलं वस्तुतस्त्वं विद्वान् विद्वज्जनतावन्दिताङ्घ्रिः । हैमं पीठं हरिभिर्व्यात्त वक्त्रैरुडं भेजे जगतां बोधनाय ॥७५॥
जो समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष जानते हैं और अनेक विद्वान् लोग जिनके चरणों की वंदना करते हैं ऐसे वे भगवान् वृषभदेव जगत् के जीवों को उपदेश देने के लिए मुँह फाड़े सिंहों के द्वारा धारण किये हुए सुवर्णमय सिंहासन पर अधिरूढ़ हुए थे ।।75।।
Lord Rishabhadeva, who possesses direct knowledge of all substances and whose feet are worshiped by many learned scholars, ascended the golden lion throne, supported by lions with open mouths, to impart teachings to the beings of the world.
श्लोक ( Shlok ) 76
दृष्ट्वा देवाः समवसृतिमहीं चक्रुर्भक्त्या परिगतिमुचिताम् । त्रिः संभ्रान्ताः प्रमुदितमनसो देवं द्रष्टुं विविशुरथ सभाम् ॥७६॥
इस प्रकार समवसरण भूमि को देखकर देव लोग बहुत ही प्रसन्नचित्त हुए, उन्होंने भक्तिपूर्वक तीन बार चारों ओर फिरकर उचित रीति से प्रदक्षिणाएँ दीं और फिर भगवान् के दर्शन करने के लिए उस सभा के भीतर प्रवेश किया ।।76।।
Seeing the sacred Samavasarana, the gods became immensely delighted. With great devotion, they circumambulated it three times in the proper manner and then entered the assembly to behold the divine presence of the Lord.
श्लोक ( Shlok ) 77
व्योममार्गपरिरोधिकेतनैः संमिमाजिषुमिवाखिलं नमः । धूलिसालवलयेन वेष्टितां सन्त तामरधनुर्वृतामिव ॥७७॥
जो कि आकाशमार्ग को उल्लंघन करने वाली पताकाओं से ऐसी जान पड़ती थी मानो समस्त आकाश को झाड़कर साफ ही करना चाहती हो और धूलीसाल के घेरे से घिरी होने के कारण ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो निरंतर इंद्रधनुष से ही घिरी रहती हो ।।77।।
The Samavasarana appeared as if it wished to sweep and cleanse the entire sky with its towering flags that seemed to transcend the heavens. Surrounded by a halo of dust particles, it shone magnificently, as if it were perpetually encircled by a radiant rainbow.
श्लोक ( Shlok ) 78
स्तम्भशब्द परमानवाग्मितान् या स्म धारयत्ति खाग्रलङ्घिन । स्वर्गलोकमिव सेत्रितुं विभुं व्याजु हृषुरमकाग्रकेतुमिः ॥७८॥
वह सभा आकाश के अग्रभाग को भी उल्लंघन करने वाले चार मानस्तंभों को धारण कर रही थी तथा उन मानस्तंभों पर लगी हुई निर्मल पताकाओं से ऐसी जान पड़ती थी मानो भगवान् की सेवा करने के लिए स्वर्गलोक को ही बुलाना चाहती हो ।।78।।
That grand assembly hall stood tall with four majestic pride-pillars that seemed to surpass even the forefront of the sky. The pure and radiant banners attached to those pillars appeared as if they were inviting the heavenly realms themselves to descend in service of the Lord.
श्लोक ( Shlok ) 79
स्वच्छवारिशिशिराः सरसीश्च या बिभर्विकसितोत्पलनेत्राः । द्रष्टुमीशमसुरा न्त कमुच्चैपक्तिमिव संघटयन्ती ॥७९॥
वह सभा स्वच्छ तथा शीतल जल से भरी हुई तथा नेत्रों के समान प्रफुल्लित कमलों से युक्त अनेक सरोवरियों को धारण किये हुए थी और उनसे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो जन्म जरा मरणरूपी असुरों का अंत करने वाले भगवान् वृषभदेव का दर्शन करने के लिए नेत्रों की पंक्तियाँ ही धारण कर रही हो ।।79।।
That grand assembly hall contained many lakes filled with pure and cool water, adorned with blooming lotuses that resembled radiant eyes. It appeared as if it had taken the form of countless eyes, eager to behold Lord Rishabhadeva, the destroyer of the demons of birth, old age, and death.
श्लोक ( Shlok ) 80
खातिकां जलविहङ्गविरावरुन्नतैश्च विततोर्भिकरोधैः । या दधे जिनमुपासितुमिन्द्रान् आजुहूषुरिव निर्मलतोयाम् ॥८०॥
वह समवसरण भूमि निर्मल जल से भरी हुई, जलपक्षियों के शब्दों के शब्दायमान तथा ऊंची उठती हुई बड़ी-बड़ी लहरों के समूह से युक्त परिखा को धारण कर रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो लहरों के समूहरूपी हाथ ऊँचे उठाकर जलपक्षियों के शब्दों के बहाने भगवान् की सेवा करने के लिए इंद्रों को ही बुलाना चाहती हो ।।80।।
That Samavasarana land was surrounded by a moat filled with pure water, resounding with the calls of water birds and adorned with rising waves. It appeared as if the waves, like uplifted hands, were calling upon the Indras to serve the Lord, using the melodious sounds of the water birds as their medium.
श्लोक ( Shlok ) 81
बहुविधव नलतिकाकान्त मदमधुकरविरुतातोद्यम् । वनमुपवहति च वल्लीनां स्मितमिव कुसुमचितं या स्म ॥८१॥
वह भूमि अनेक प्रकार की नवीन लताओं से सुशोभित, मदोन्मत्त भ्रमरों के मधुर शब्दरूपी बाजा से सहित तथा फूलों से व्याप्त लताओं के वन धारण कर रही थी और उनसे ऐसी जान पड़ती थी मानो मंद-मंद हँस ही रही हो ।।81।।
That land was adorned with various fresh creepers, accompanied by the sweet buzzing sounds of intoxicated bees as if playing a melodious tune. It was covered with forests of flowering vines, appearing as though it was gently smiling.
श्लोक 82 से 91
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71