भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
वनषण्डवृतप्रान्तं यदर्कस्याशको भृशम् । न तेपु संवृतं को वा तपेदार्दान्तरात्मकम् ॥१५२॥
उस सरोवर के किनारे के प्रदेश हरे-हरे वनखंडों से घिरे हुए थे इसलिए सूर्य की किरणें उसे संतप्त नहीं कर सकती थीं सो ठीक ही है जो संवृत है―वन आदि से घिरा हुआ हैं (पक्ष में गुप्ति समिति आदि से कर्मों का संवर करने वाला है) और जिसका अंतःकरण―मध्यभाग (पक्ष में हृदय) आर्द्र है―जल से सहित होने के कारण गीला है (पक्ष में दया से भीगा है) उसे कौन संतप्त कर सकता है ।।152।।
The shores of that lake were surrounded by lush green forest patches, preventing the sun’s rays from scorching it. This is only fitting—what is enveloped (symbolically, shielded by virtues like restraint) and whose heart (or center) remains moist (by water, or metaphorically softened by compassion) cannot be tormented by anything. 152.
श्लोक ( Shlok ) 153
विहङ्गमरुतैर्नूनं तत्सरो नृपसाधनम् । आजुहाव निवेष्टव्यमिहेत्युद्वीचिबाहुकम् ॥ १५३॥
उस सरोवर में लहरें उठ रही थीं और किनारे पर हंस, चकवा आदि पक्षी मधुर शब्द कर रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो यह सरोवर लहररूपी हाथ उठाकर पक्षियों के द्वारा मधुर शब्द करता हुआ ‘यहाँ ठहरिए’ इस तरह वज्रजंघ की सेना को बुला ही रहा हो ।।153।।
Waves rippled through the lake, while swans, chakvas, and other birds chirped melodiously along the shores. It seemed as though the lake, raising its wave-like arms and speaking through the sweet sounds of the birds, was inviting Vajrajangha’s army, saying, “Stay here.” 153.
श्लोक ( Shlok ) 154
ततस्तस्मिन् सरस्यस्य न्यविक्षत बलं प्रभोः । तरुगुल्मलताच्छन्नपर्यन्ते मृदुमारुते ॥ १५४॥
तदनंतर, जिसके किनारे छोटे-बड़े वृक्ष और लताओं से घिरे हुए हैं तथा जहाँ मंद-मंद वायु बहती रहती है ऐसे उस सरोवर के तट पर वज्रजंघ की सेना ठहर गयी ।।154।।
Thereafter, Vajrajangha’s army halted on the shores of the lake, which was surrounded by small and large trees intertwined with vines, and where a gentle breeze continuously flowed. 154.
श्लोक ( Shlok ) 155
दुर्बलाः स्वं जहुः स्थानं बलवद्भिरभिदूताः । आदेशैरिव संप्राप्तैः स्थानिनो हन्तिपूर्वकाः ॥१५५॥
जिस प्रकार व्याकरण में ‘वध’ ‘घस्लृ’ आदि आदेश होने पर हन् आदि स्थानी अपना स्थान छोड़ देते हैं उसी प्रकार उस तालाब के किनारे बलवान् प्राणियों द्वारा ताड़ित हुए दुर्बल प्राणियों ने अपने स्थान छोड़ दिये थे । भावार्थ―सैनिकों से डरकर हरिण आदि निर्बल प्राणी अन्यत्र चले गये थे और उनके स्थान पर सैनिक ठहर गये थे ।।155।।
Just as in grammar, roots like han vacate their position when replaced by substitutes such as vadh or ghaslu, similarly, on the shores of that lake, weaker creatures, intimidated by the powerful ones, abandoned their places.
Interpretation: Frightened by the soldiers, weaker animals like deer moved elsewhere, and the soldiers occupied their spots. 155.
श्लोक ( Shlok ) 156
विजहुर्निजनीडानि विहगास्तत्रसुर्मृगाः। मृगेन्द्रा बलसंक्षोभात् शनैः समुदमीलयन् ॥156॥
उस सेना के क्षोभ से पक्षियों ने अपने घोंसले छोड़ दिये थे, मृग भयभीत हो गये थे और सिंहों ने धीरे-धीरे आँखें खोली थीं ।।156।।
Due to the commotion caused by the army, birds abandoned their nests, deer were frightened, and lions slowly opened their eyes. 156.
श्लोक ( Shlok ) 157
शाषाविषक्त भूषादि-रुचिरा वनपादपाः । कल्पदुमश्रियं भेजुराश्श्रितैमिथुनैर्मियः ।।१५७।।
सेना के जो स्त्री-पुरुष वन वृक्षों के नीचे ठहरे थे उन्होंने उनकी डालियों पर अपने आभूषण, वस्त्र आदि टाँग दिये थे इसलिए वे वृक्ष कल्पवृक्ष की शोभा को प्राप्त हो रहे थे ।।157।।
The men and women of the army who rested under the forest trees hung their ornaments, clothes, and other belongings on the branches. As a result, the trees appeared as splendid as wish-fulfilling Kalpavriksha trees. 157.
श्लोक ( Shlok ) 158
कुसुमापचये तेषां पादपा विटपैर्नताः । आनुकूलमिवातनुः संमता तिथ्यसत्क्रियाः ॥१५८॥
पुष्प तोड़ते समय वे वृक्ष अपनी डालियों से झुक जाते थे जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वे वृक्ष आतिथ्यसत्कार को उत्तम समझकर उन पुष्प तोड़ने वालों के प्रति अपनी अनुकूलता ही प्रकट कर रहे हों ।।158।।
As flowers were plucked, the trees bent their branches, making it seem as though they were graciously expressing their hospitality and goodwill toward the flower gatherers, considering such service to be noble. 158.
श्लोक ( Shlok ) 159
कृतावगाहनाः स्नान्तुस्तनदध्नं सरोजलम् । रूपसौन्दर्यलोभेण तदगारी दिवाङ्गनाः ॥१५९॥
सेना की स्त्रियाँ उस सरोवर के जल में स्तन पर्यंत प्रवेश कर स्नान कर रही थीं, उस समय वे ऐसी शोभायमान हो रही थीं मानो सरोवर का जल अदृष्टपूर्व सौंदर्य का लाभ समझकर उन्हें अपने आपमें निगल ही रहा हो ।।159।।
As the women of the army bathed in the lake’s waters up to their chests, they appeared so enchanting that it seemed as if the lake, recognizing their unprecedented beauty, was eager to engulf them within itself. 159.
श्लोक ( Shlok ) 160
किणीभूतदृढस्कन्धान् विशत काचवाहकान्। स्वा म्भो तिव्ययमीत्येव चकम्पे वीक्ष्य तत्सरः ॥ १६०॥
भार ढोने से जिनके मजबूत कंधों में बड़ी-बड़ी भट्टें पड़ गयी हैं, ऐसे कहार लोगों को प्रवेश करते हुए देखकर वह तालाब ‘इनके नहाने से हमारा बहुत-सा जल व्यर्थ ही खर्च हो जायेगा’ मानो इस भय से ही काँप उठा था ।।160 ।।
As the porters, whose sturdy shoulders bore deep indentations from heavy loads, approached the lake, it seemed to tremble, as if fearing that their bathing would waste a significant amount of its water. 160.
श्लोक ( Shlok ) 161
विश्व ददृशिरेदूप्यकुटीभेदा निवेशिताः। क्लृप्ता वत्स्र्य ज्जिनस्स्यया वनश्रीभिरिवालयाः ॥१६१॥
इस तालाब के किनारे चारों ओर लगे हुए तंबू ऐसे मालूम होते थे मानो वनलक्ष्मी ने भविष्यत्काल में तीर्थंकर होने वाले वज्रजंघ के लिए उत्तम भवन ही बना दिये हों ।।161।।
The tents set up all around the pond appeared as if the forest goddess had constructed exquisite dwellings for Vajrajangha, who is destined to become a Tirthankara in the future.
श्लोक 162 से 171
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151