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श्लोक 242 से 251 कल्पवृक्ष वन
दूसरे कोट में नाट्यशालाएँ और धूपघट थे। कल्पवृक्ष वन रत्नों से दैदीप्यमान था। ये राजाओं-से ऊँचे और फलयुक्त थे। ये देवकुरु-से लगते थे। फल आभूषण-से थे। देव वहाँ क्रीड़ा करते थे। सिद्धार्थ वृक्ष सूर्य-से थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
शेषो विधिरशेषोऽपि सालेनाद्येन वर्णितः । पौनरुक्त्य भयान्ना तस्तत्प्रपञ्चो निदर्शितः ॥२४२॥
उस कोट की और सब विधि पहले कोट के वर्णन के साथ ही कही जा चुकी है, पुनरुक्ति दोष के कारण यहाँ फिर से उसका विस्तार के साथ वर्णन नहीं किया जा रहा है ।।242।।
The features of this fortification have already been described along with the first fort, and to avoid redundancy, they are not elaborated here again. ॥242॥
श्लोक ( Shlok ) 243
अत्रापि पूर्ववद्वेद्यं द्वितयं नाट्य शालयोः । तद्व द् धूपघटी द्वन्द्वं महावीथ्युभयान्तयोः ॥२४३॥
पहले के समान यहाँ भी प्रत्येक महावीथी के दोनों ओर दो नाट्यशालाएँ थीं और दो धूपघट रखे हुए थे ।।243।।
Just like before, on both sides of each main avenue, there were two theaters and two incense burners placed. ॥243॥
श्लोक ( Shlok ) 244
ततो वीथ्यन्तरेष्वस्यां कक्ष्या यां कस्पभूरुहाम्। नानारत्न प्रभो त्सर्पैर्वनमासीत् प्रभास्वरम् ॥२४४॥
इस कक्षा में विशेषता इतनी है कि धूपघटों के बाद गलियों के बीच के अंतराल में कल्पवृक्षों का वन था, जो कि अनेक प्रकार के रत्नों की कांति के फैलने से दैदीप्यमान हो रहा था ।।244।।
The special feature of this enclosure was that, beyond the incense burners, in the intervening spaces between the lanes, there was a forest of Kalpavriksha (wish-fulfilling trees), which was radiant due to the spread of the brilliance of various kinds of gems. ॥244॥
श्लोक ( Shlok ) 245
कल्पद्रुमाः समुतुङ्गाः सच्छायाः फलशालिनः । नानास्रग्वस्त्रभूषाढ्या राजायन्ते स्म संपदा ॥२४५॥
उस वन के वे कल्पवृक्ष बहुत ही ऊँचे थे, उत्तम छाया वाले थे, फलों से सुशोभित थे और अनेक प्रकार की माला, वस्त्र तथा आभूषणों से सहित थे इसलिए अपनी शोभा से राजाओं के समान जान पड़ते थे क्योंकि राजा भी बहुत ऊँचे अर्थात् अतिशय श्रेष्ठ अथवा उदार होते हैं, उत्तम छाया अर्थात् कांति से युक्त होते हैं, अनेक प्रकार की वस्तुओं की प्राप्तिरूपी फलों से सुशोभित होते हैं और तरह-तरह की माला, वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त होते हैं ।।245।।
The Kalpavriksha trees in that forest were very tall, provided excellent shade, were adorned with fruits, and were decorated with various types of garlands, fabrics, and ornaments. Because of their splendor, they appeared similar to kings—just as kings are exceptionally high (i.e., supremely noble or generous), possess brilliant radiance, are adorned with the fruits of prosperity, and are embellished with diverse garlands, garments, and ornaments. ॥245॥
श्लोक ( Shlok ) 246
देवोदक्कुरवो नूनमागताः सेवितुं जिनम् । दशप्रभेदैः स्वैः कल्पतरुभिः श्रेणि सात्कृतैः ॥२४६॥
उन कल्पवृक्षों को देखकर ऐसा मालूम होता था मानो अपने दस प्रकार के कल्पवृक्षों की पंक्तियों से युक्त हुए देवकुरु और उत्तरकुरु ही भगवान् की सेवा करने के लिए आये हों ।।246।।
Seeing those Kalpavriksha trees, it seemed as if Devakuru and Uttarakuru, adorned with their ten types of celestial trees, had themselves arrived to serve the Lord. ॥246॥
श्लोक ( Shlok ) 247
फलान्या भरणान्येषामंशुकानि च पल्लवाः। स्त्रजः शाखाग्रलम्बिन्यो महाप्रारोहयष्टयः ॥२४७॥
उन कल्पवृक्षों के फल आभूषणों के समान जान पड़ते थे, नवीन कोमल पत्ते वस्त्रों के समान मालूम होते थे और शाखाओं के अग्रभाग पर लटकती हुई मालाएँ बड़ी-बड़ी जटाओं के समान सुशोभित हो रही थीं ।।247।।
The fruits of those Kalpavriksha trees appeared like ornaments, their tender new leaves resembled fine garments, and the garlands hanging from the tips of the branches looked like magnificent matted locks. ॥247॥
श्लोक ( Shlok ) 248
तेषामधःस्थलच्छायामध्यासीनाः सुरोरगाः । स्वावासेषु धृतिं हित्वा चिरं तत्रैव रेमिरे ॥२४८॥
उन वृक्षों के नीचे छायातल में बैठे हुए देव और धरणेंद्र अपने-अपने भवनों में प्रेम छोड़कर वहीं पर चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहते थे ।।248।।
Under the shade of those trees, the Devas and Dharaṇendras abandoned their own palaces and remained there for a long time, joyfully engaged in divine play. ॥248॥
श्लोक ( Shlok ) 249
ज्योतिष्का ज्योतिरङ्गेषु दीपाङ्गेषु च कल्पजाः। भावनेन्द्राः स्त्रगङ्गेषु यथायोग्यां धृतिं दधुः ॥२४९॥
ज्योतिष्कदेव ज्योतिरंग जाति के कल्पवृक्षों में, कल्पवासी देव दीपांग जाति के कल्पवृक्षों में और भवनवासियों के इंद्र मालांग जाति के कल्पवृक्षों में यथायोग्य प्रीति धारण करते थे । भावार्थ―जिस देव को जो वृक्ष अच्छा लगता था वे उसी के नीचे क्रीड़ा करते थे ।।249।।
The Jyotiṣka Devas took delight in the Jyotiraṅga class of Kalpavṛkṣas, the Kalpavāsi Devas cherished the Dīpāṅga class of Kalpavṛkṣas, and the Bhavanavāsi Indras found joy in the Mālāṅga class of Kalpavṛkṣas, each according to their preference.
Meaning: Every deity played and enjoyed beneath the Kalpavṛkṣa that pleased them the most. ॥249॥
श्लोक ( Shlok ) 250
स्त्रग्वि साभरणं भास्वदंशुकं पल्लवाधरम् । ज्वलद्दीपं वनं कान्तं वधूवरमिवारुचत् ॥२५०॥
वह कल्पवृक्षों का वन वधू-वर के समान सुशोभित हो रहा था क्योंकि जिस प्रकार वधू-वर मालाओं से सहित होते उसी प्रकार वह वन भी मालाओं से सहित था, वधू-वर जिस प्रकार आभूषणों से युक्त होते हैं उसी प्रकार वह वन भी आभूषणों से युक्त था, जिस प्रकार वधू-वर सुंदर वस्त्र पहिने रहते हैं उसी प्रकार उस वन में सुंदर वस्त्र टंगे हुए थे, जिस प्रकार वर-वधू के अधर (ओठ) पल्लव के समान लाल होते हैं उसी प्रकार उस वन के पल्लव (नये पत्ते) लाल थे । वर-वधू के आसपास जिस प्रकार दीपक जला करते हैं उसी प्रकार उस वन में भी दीपक जल रहे थे और वर-वधू जिस प्रकार अतिशय सुंदर होते हैं उसी प्रकार वह वन भी अतिशय सुंदर था । भावार्थ―उस वन में कहीं मालांग जाति के वृक्षों पर मालाएँ लटक रहीं थीं, कहीं भूषणांग जाति के वृक्षों पर भूषण लटक रहे थे, कहीं वस्त्रांग जाति के वृक्षों पर सुंदर-सुंदर वस्त्र टँगे हुए थे, कहीं उन वृक्षों में नये-नये, लाल-लाल पत्ते लग रहे थे, और कहीं दीपांग जाति के वृक्षों पर अनेक दीपक जल रहे थे ।।250।।
That forest of Kalpavṛkṣas appeared as splendid as a bride and groom, because just as a bride and groom are adorned with garlands, so too was the forest decorated with hanging floral garlands. Just as they are embellished with jewelry, the forest too was adorned with ornaments. The way a bride and groom wear beautiful garments, similarly, fine fabrics were hanging in the forest. The newly sprouted red leaves of the trees resembled the reddish lips of the couple.
Just as lamps illuminate the surroundings of a bride and groom, radiant lamps were glowing throughout the forest. Lastly, just as the couple appears exceedingly beautiful, the forest too radiated an exceptional charm.
Meaning: In different areas of the forest—on Mālāṅga trees, garlands were hanging; on Bhūṣaṇāṅga trees, ornaments were displayed; on Vastrāṅga trees, fine clothes were draped; on some trees, fresh red leaves had sprouted; and on Dīpāṅga trees, numerous lamps were glowing. ॥250॥
श्लोक ( Shlok ) 251
“अन्तर्वर्णमथाभूवन्निह सिद्धार्थपादपाः । सिद्धार्थाधिष्ठिता धीद्धबुध्ना ब्रध्ना इवोद्रचः ॥२५१॥
उन कल्पवृक्षों के मध्यभाग में सिद्धार्थ वृक्ष थे, सिद्ध भगवान् की प्रतिमाओं से अधिष्ठित होने के कारण उन वृक्षों के मूल भाग बहुत ही दैदीप्यमान हो रहे थे और उन सबसे वे वृक्ष सूर्य के समान प्रकाशमान हो रहे थे ।।251।।
In the center of those Kalpavṛkṣas, there stood the Siddhārtha trees. As they were consecrated with idols of the Siddha Lords, the base of these trees shone with radiant brilliance. Because of this divine presence, these trees appeared as luminous as the sun, radiating an extraordinary glow. ॥251॥
श्लोक 252 से 261
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